सेबी का यह बदलाव भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 5 जून, 2026 के परिपत्र के बाद आया है. आरबीआई ने सामान्य रास्ते से सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले एफपीआई के लिए तय कन्संट्रेशन लिमिट की शर्त हटा दी थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए अनुपालन नियमों में बड़ी राहत दी है. अब केवल सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले एफपीआई को निवेशक समूह की जानकारी देने की जरूरत नहीं होगी. सेबी का यह फैसला ऐसे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बॉन्ड बाजार में निवेश की प्रक्रिया को आसान बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.
सभी सरकारी बॉन्ड निवेशकों तक बढ़ाई गई छूट
सेबी ने सोमवार को जारी परिपत्र के जरिए एफपीआई, डेजिग्नेटेड डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट्स (DDP) और पात्र विदेशी निवेशकों से जुड़े अपने मास्टर सर्कुलर में संशोधन किया है. इससे पहले यह छूट केवल फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के तहत सरकारी बॉन्ड में निवेश करने वाले एफपीआई तक सीमित थी. अब इसका दायरा बढ़ाकर उन सभी एफपीआई तक कर दिया गया है, जो केवल सरकारी ऋण प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं.
आरबीआई के फैसले के बाद बदला नियम
सेबी का यह बदलाव भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 5 जून, 2026 के परिपत्र के बाद आया है. आरबीआई ने सामान्य रास्ते से सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले एफपीआई के लिए तय कन्संट्रेशन लिमिट की शर्त हटा दी थी. सेबी के मुताबिक, जब ऐसी कन्संट्रेशन लिमिट ही लागू नहीं है तो इन एफपीआई के लिए निवेशक समूह की पहचान करना भी जरूरी नहीं रह जाता.
तुरंत प्रभाव से लागू हुआ संशोधन
सेबी ने कहा है कि संशोधित प्रावधान तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं. नियामक ने डिपॉजिटरी, कस्टोडियन और डीडीपी को अपने सिस्टम में जरूरी बदलाव करने के निर्देश भी दिए हैं, ताकि नए नियमों को लागू किया जा सके.
विदेशी डेट निवेशकों के लिए अनुपालन होगा आसान
निवेशक समूह का ब्योरा देने की अनिवार्यता हटने से सॉवरिन वेल्थ फंड, केंद्रीय बैंक और भारतीय बॉन्ड बाजार में निवेश करने वाले अन्य बड़े डेट-केंद्रित विदेशी निवेशकों के लिए अनुपालन प्रक्रिया आसान होने की उम्मीद है. सेबी अब तक एफपीआई के बीच मालिकाना हक और नियंत्रण पर नजर रखने के साथ-साथ सेक्टर या किसी कंपनी में निवेश की सीमा लागू करने के लिए निवेशक समूह और लाभार्थी मालिकों से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल करता रहा है.
सोमवार को सेंसेक्स 382.62 अंक यानी 0.50 फीसदी की गिरावट के साथ 76,132.81 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 118 अंक यानी 0.50 फीसदी टूटकर 23,779.15 पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच घरेलू शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला सोमवार को भी जारी रहा. सेंसेक्स और निफ्टी दोनों करीब 0.50 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए. पिछले चार हफ्तों से बाजार पर दबाव बना हुआ है और निवेशकों की नजर अब वैश्विक घटनाक्रम के साथ-साथ कंपनियों से जुड़े अहम कॉरपोरेट अपडेट पर है.
सेंसेक्स 382 अंक लुढ़का, निफ्टी भी लाल निशान में
सोमवार को कारोबार खत्म होने पर सेंसेक्स 382.62 अंक यानी 0.50 फीसदी की गिरावट के साथ 76,132.81 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 118 अंक यानी 0.50 फीसदी टूटकर 23,779.15 पर आ गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में इन्फोसिस सबसे ज्यादा दबाव में रहा और करीब 3.81 फीसदी की गिरावट के साथ 1,087 रुपये पर बंद हुआ.
इन शेयरों में रही तेजी और गिरावट
बाजार में कुछ चुनिंदा शेयरों ने कमजोरी के बीच बढ़त दर्ज की. सेंसेक्स में लार्सन एंड टुब्रो, भारती एयरटेल और मारुति प्रमुख गेनर्स रहे. वहीं, इन्फोसिस, टेक महिंद्रा और टाटा स्टील सबसे ज्यादा दबाव में रहे. निफ्टी में अपोलो हॉस्पिटल 1.27 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. इसके बाद लार्सन एंड टुब्रो 0.88 फीसदी और कोल इंडिया 0.84 फीसदी चढ़े. दूसरी ओर, इन्फोसिस 3.81 फीसदी, एसबीआई लाइफ 2.42 फीसदी और एचडीएफसी लाइफ 2.42 फीसदी टूटे.
शुक्रवार को कैसा रहा था बाजार?
पिछले कारोबारी सत्र यानी 4 सितंबर को सेंसेक्स 76,657.02 के स्तर पर खुला था. कारोबार के दौरान यह 76,883.14 के हाई और 76,515.43 के लो तक गया. अंत में सेंसेक्स 0.48 फीसदी की बढ़त के साथ 76,515.43 पर बंद हुआ था. निफ्टी 23,910.90 पर खुला और 24,005.75 का हाई तथा 23,895.85 का लो बनाया. कारोबार के अंत में निफ्टी 0.10 फीसदी की तेजी के साथ 23,897.70 पर बंद हुआ था.
गिरावट के पीछे क्या हैं बड़ी वजहें?
घरेलू शेयर बाजार में कमजोरी के पीछे पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव में बढ़ोतरी और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी अहम वजहों में शामिल हैं. वैश्विक स्तर पर बढ़ी अनिश्चितता का असर निवेशकों के सेंटीमेंट पर पड़ा है. इसके अलावा विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और बाजार में लगातार बनी बिकवाली पर भी निवेशकों की नजर है.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
मंगलवार के कारोबार में Swiggy, Maruti Suzuki India, Garuda Construction, PVR INOX, Arisinfra Solutions, Asian Energy Services, Adani Power और RBL Bank फोकस में रह सकते हैं. Swiggy अपनी स्टेप-डाउन सब्सिडियरी Lynks Logistics में पूरी हिस्सेदारी Trustroot Internet को शेयर-स्वैप डील के जरिए बेचने वाली है, जबकि Lynks के B2B डिस्ट्रीब्यूशन कारोबार ने वित्त वर्ष 2026 में करीब 668 करोड़ रुपये का राजस्व दर्ज किया था. Maruti Suzuki India ने चुनिंदा कार मॉडलों की कीमतों में 20,000 रुपये तक की बढ़ोतरी की है. Garuda Construction की सब्सिडियरी ने जेद्दा में 93 मंजिला टावर के निर्माण के लिए समझौता ज्ञापन किया है, जिससे अगले पांच वर्षों में करीब 1,800 करोड़ रुपये की अनुमानित आय हो सकती है. PVR INOX ने कथित 200 करोड़ रुपये की किकबैक डील से जुड़े मामले में कहा है कि शुरुआती जांच में रिश्वतखोरी के कोई सबूत नहीं मिले हैं. Arisinfra Solutions की सब्सिडियरी को बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड स्थित Morning Mist रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट के लिए नया ऑर्डर मिला है. Asian Energy Services की सब्सिडियरी Oilmax Energy को अरुणाचल प्रदेश सरकार से Pakro Vanadium and Graphite Block के लिए Composite Licence से जुड़ा Letter of Intent मिला है. वहीं, Adani Power को GVK Energy के अधिग्रहण के लिए Letter of Intent मिला है, जबकि RBL Bank के बोर्ड ने विदेशों से 1 अरब डॉलर तक जुटाने को मंजूरी दी है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
रक्षा खरीद परिषद (DAC) ने थल सेना, नौसेना और वायु सेना के लिए हेलीकॉप्टर, रडार, जैमर, वाहन और अन्य सैन्य उपकरणों की खरीद को दी आवश्यकता की स्वीकृति
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत ने अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में सोमवार को हुई रक्षा खरीद परिषद (DAC) की बैठक में तीनों सेनाओं के लिए करीब ₹1.10 लाख करोड़ की रक्षा खरीद योजनाओं को आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) दी गई. खास बात यह है कि इन प्रस्तावों में करीब 98 फीसदी खरीद भारतीय उद्योग से की जाएगी. इससे एक ओर सेना की परिचालन क्षमता बढ़ेगी, वहीं घरेलू रक्षा विनिर्माण को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा.
बैठक में थल सेना, नौसेना और वायु सेना के लिए कई आधुनिक सैन्य प्रणालियों और उपकरणों की खरीद के प्रस्तावों को मंजूरी दी गई. इनमें सीबीआरएन टोही वाहन, हाई मोबिलिटी वाहन, एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर, रडार, जैमर, ब्रिज सिस्टम और अन्य रक्षा उपकरण शामिल हैं.
थल सेना के लिए सीबीआरएन टोही वाहन और हाई मोबिलिटी वाहन
भारतीय थल सेना के लिए रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (CBRN) खतरों की पहचान करने वाले टोही वाहन खरीदे जाएंगे. ये वाहन संवेदनशील या प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, निगरानी और उन्हें चिह्नित करने में मदद करेंगे. इसके अलावा हाई मोबिलिटी वाहनों की खरीद को भी मंजूरी दी गई है. इनकी मदद से कठिन और दुर्गम इलाकों में सैनिकों तथा जरूरी सैन्य सामान की आवाजाही बेहतर होगी. इससे सेना की अभियान क्षमता और लॉजिस्टिक सपोर्ट मजबूत होने की उम्मीद है. सेना के लिए खुद चलने वाली मैकेनिकल माइन लेयर भी खरीदी जाएगी. इन मशीनों के जरिए मुश्किल इलाकों में तेजी से बारूदी सुरंग बिछाने की क्षमता बढ़ेगी.
हेलीकॉप्टर और ब्रिज सिस्टम से बढ़ेगी अभियान क्षमता
थल सेना और वायु सेना के लिए एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH) की खरीद के प्रस्ताव को भी मंजूरी मिली है. ये हेलीकॉप्टर अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में सैन्य अभियानों को अंजाम देने में उपयोगी होंगे. इसके अलावा थल सेना के लिए ट्रॉल टैंक और सर्वत्र ब्रिज सिस्टम की खरीद को मंजूरी दी गई है. इन प्रणालियों की मदद से दुर्गम इलाकों में सैनिकों और सैन्य वाहनों की आवाजाही के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया जा सकेगा.
नौसेना को मिलेंगे नए अरुध्रा रडार
भारतीय नौसेना की निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए अरुध्रा रडार की खरीद को मंजूरी दी गई है. ये रडार नौसेना के विभिन्न हवाई ठिकानों पर मौजूद पुराने एयर रूट सर्विलांस रडार की जगह लगाए जाएंगे. इसके साथ ही मरीन गैस टर्बाइन के डिजाइन और विकास तथा बाद में इसकी खरीद के प्रस्ताव को भी स्वीकृति दी गई है. मरीन गैस टर्बाइन युद्धपोतों की प्रणोदन प्रणाली का अहम हिस्सा होती है. देश में इसके विकास से भविष्य में इस क्षेत्र में विदेशी निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है.
वायु सेना की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता होगी मजबूत
वायु सेना के लड़ाकू विमानों, परिवहन विमानों और हेलीकॉप्टरों की युद्धक क्षमता बढ़ाने से जुड़े कई प्रस्तावों को भी मंजूरी मिली है. इसके अलावा जमीन पर तैनात किए जाने वाले मल्टी-पर्पज जैमर की खरीद को भी स्वीकृति दी गई है. ये जैमर दुश्मन के रडार और संचार प्रणालियों को बाधित करने में मदद कर सकते हैं. इससे भारतीय वायु सेना की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता को मजबूती मिलेगी.
कागजी पास की जगह स्मार्ट कार्ड
तीनों सेनाओं में डिफेंस फोर्सेज सिक्योर एक्सेस कार्ड (DEFSAC) सिस्टम लागू करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई है. इसके तहत मौजूदा कागजी पहचान पत्र, पास और परमिट की जगह रेडियो फ्रीक्वेंसी पहचान तकनीक से लैस स्मार्ट कार्ड जारी किए जाएंगे.
इस व्यवस्था का उद्देश्य सैन्य प्रतिष्ठानों में प्रवेश और पहचान की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और तकनीक आधारित बनाना है. कुल मिलाकर, DAC के इन फैसलों से तीनों सेनाओं की परिचालन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू रक्षा उद्योग को भी बड़े स्तर पर ऑर्डर मिलने की उम्मीद है.
MCX अब भारत का सबसे तेजी से बढ़ता जुआघर है और सेबी इसे जल्द ही को-लोकेशन की सुविधा देने जा रहा है. लाखों रिटेल ट्रेडर्स को ऐसे बाजार में धकेला जा रहा है, जिस पर विकल्पों का दबदबा है, जहां टैक्स इक्विटी के मुकाबले बहुत कम है और नियामक ने एक बार भी यह प्रकाशित नहीं किया है कि वे कितना नुकसान उठा रहे हैं. जेन स्ट्रीट जैसी शार्क पहले ही दरवाजे पर खड़ी हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
भारत में कहीं एक ट्रेडर है, जिसके खाते में ₹5,000 हैं. उसके पास कोई रिफाइनरी नहीं है, वह कच्चा तेल आयात नहीं करता, उसने वेस्ट टैक्सेस इंटरमीडिएट (WTI) का एक बैरल कभी देखा नहीं है और न ही कभी देखेगा. उसके पास एक ऐप, एक स्क्रीन और एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट है, जो एक खास दोपहर को समाप्त हो जाता है. उसे लगता है कि उसने तेल बाजार का एक हिस्सा खरीदा है. लेकिन ऐसा नहीं है. और भारत के कमोडिटी एक्सचेंज MCX पर उसके जैसे 20.9 लाख ट्रेडर्स हैं, जो एक साल पहले 13 लाख थे.
जब मोदी सरकार ने इक्विटी F&O पर टैक्स बढ़ाया था, तो इसका आधार रिटेल निवेशकों को "इक्विटी कैसीनो" में अपनी जीवनभर की बचत गंवाने से बचाना था. यही वह आधार है, जिस पर मौजूदा सेबी प्रमुख तुहिन कांता पांडे ने अपना नेतृत्व खड़ा किया है और सही भी है. लेकिन अधिकारियों के कदमों ने लाखों अनजान रिटेल ट्रेडर्स का एक बड़े और खतरनाक तरीके से तेजी से बढ़ते कमोडिटी सट्टे की ओर पलायन करा दिया है.
कमोडिटी बाजारों में टैक्स स्टॉक मार्केट के शुल्क का एक अंश है और इक्विटी के विपरीत सेबी ने एक बार भी यह प्रकाशित नहीं किया है कि रिटेल निवेशक MCX पर कितना नुकसान उठा रहे हैं. और जिन वैश्विक शार्क ने भारत के इक्विटी बाजार में रिटेल ट्रेडर्स के दूसरी तरफ रहकर अरबों डॉलर कमाए, उनमें जेन स्ट्रीट भी शामिल है, अब उन्हें कमोडिटी कैसीनो की चाबियां दी जा रही हैं, क्योंकि सेबी MCX के अंदर को-लोकेशन सर्वर रैक को मंजूरी देने की तैयारी कर रहा है.
को-लोकेशन किसी कंपनी को कतार में सबसे आगे पहुंचने के लिए पैसे खर्च करने की सुविधा देता है, उसकी मशीनें एक्सचेंज के अंदर बैठती हैं, ऑर्डर मिलाने वाले इंजन से केबल के जरिए जुड़ी होती हैं और राजकोट में कहीं बैठे व्यक्ति से कुछ मिलियनवें सेकंड पहले हर कीमत को देख और उस पर कार्रवाई कर सकती हैं.
दूसरी ओर, MCX पहले ही यह रुख अपना चुका है कि उसे FPIs को ट्रेड करने की अनुमति देने के लिए सेबी की मंजूरी की जरूरत नहीं है.
इक्विटी से कमोडिटी: एक मुसीबत से निकलकर दूसरी में
इक्विटी डेरिवेटिव्स पर दबाव वास्तविक और जानबूझकर बनाया गया था. Securities Transaction Tax अक्टूबर 2024 में और फिर अप्रैल 2026 से बढ़ाया गया, जिससे इक्विटी फ्यूचर्स पर 0.05 प्रतिशत और Options पर 0.15 प्रतिशत टैक्स हो गया. सरकार ने खुले तौर पर कहा कि इसका उद्देश्य अल्पकालिक सट्टेबाजी वाले कारोबार को हतोत्साहित करना था. सेबी ने लॉट साइज और कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू बढ़ाई, एक्सपायरी घटाई और नियम कड़े किए. कुल मिलाकर इक्विटी F&O पर पूरी तरह दबाव बनाया गया.
यह काम कर गया. पिछले साल इक्विटी डेरिवेटिव्स में व्यक्तिगत ट्रेडर्स की संख्या करीब 20 प्रतिशत घटी, नए ट्रेडर्स की संख्या करीब 40 प्रतिशत कम हुई और SEBI ने इस गिरावट को सफलता के रूप में दर्ज किया.
गल वाले कमरे पर नजर डालिए
Commodities Transaction Tax 2013 से नहीं बदला है, फ्यूचर्स पर 0.01 प्रतिशत और Options पर प्रीमियम का 0.05 प्रतिशत. तेरह साल तक इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ, जबकि डेरिवेटिव्स में भारतीयों के जुआ खेलने को रोकने के लिए दो बार टैक्स नीति बनाई गई. अब Nifty पर दांव लगाने पर MCX पर Gold पर दांव लगाने की तुलना में टैक्स तीन गुना अधिक लगता है. एक स्टॉक Future की लागत Crude से पांच गुना ज्यादा है. लॉट साइज भी यही कहानी बताते हैं: इक्विटी में इन्हें बढ़ाकर छोटे ट्रेडर को बाहर करने की कोशिश की गई, जबकि MCX पर इन्हें लागत के एक अंश पर ही रखा गया. क्या यह जानबूझकर किया गया, सेबी ? MCX के शेयर की कीमत कौन बढ़ते देखना चाहता है?
इसे किसने तैयार किया?
इन्हीं 12 महीनों के दौरान MCX पर ट्रेडर्स की संख्या 13 लाख से बढ़कर 20.9 लाख हो गई, जिनमें ज्यादातर रिटेल ग्राहक हैं. केवल जून तिमाही में ही 13.72 लाख लोगों ने ट्रेड किया, जबकि एक साल पहले यह संख्या 7.03 लाख थी.
आप एक कमरे में दांव की कीमत बढ़ाते हैं, अगले कमरे में उसी दांव को बिना बदलाव के छोड़ देते हैं, दोनों कमरों के बीच का दरवाजा खुला रखते हैं और फिर भीड़ के दूसरे कमरे में चले जाने पर हैरानी जताते हैं. इसमें से कुछ भी चोरी-छिपे नहीं हुआ. इनमें से हर कदम दिन के उजाले में उन लोगों ने लिया, जिन्हें अच्छी तरह पता था कि दूसरे कमरे में कितना शुल्क लिया जा रहा है. यह नियमन नहीं है. यह कमोडिटी सट्टे में तेजी लाने की इंजीनियरिंग है.
SEBI, क्या यह एक बड़ी सफलता है?
तेजी
MCX के FY26 के नतीजों में एक आंकड़ा है, जिसे सेबी मुख्यालय में नियामकीय समीक्षा शुरू करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए था. ऐसा नहीं हुआ.
Options में औसत दैनिक कारोबार 146 प्रतिशत बढ़कर ₹4.71 लाख करोड़ हो गया. फ्यूचर्स का कारोबार ₹64,407 करोड़ था. गणना करने पर पता चलता है कि भारत के कमोडिटी एक्सचेंज पर अब कारोबार किए जाने वाले हर एक रुपये में करीब 87 पैसे एक Option हैं, कीमत पर लगाया गया एक दांव, जिसका निपटान नकद में होता है, जिसमें न कुछ खरीदा जाता है, न बेचा जाता है, न स्टोर किया जाता है और न डिलीवरी की जाती है.
Bullion का कारोबार एक ही साल में 496 प्रतिशत बढ़ गया. ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि भारत ने अपने सोने के आयात की हेजिंग शुरू कर दी, बल्कि इसलिए कि सोना तेजी से ऊपर गया और लाखों लोगों ने पाया कि वे ₹40 में उस पर पोजीशन ले सकते हैं. Crude भी यही कहानी बताता है.
Options में जुआ
Options किसी भी एक्सचेंज पर सट्टेबाजी का सबसे खुला रूप हैं. MCX पर वे इससे भी बदतर हैं, एक अत्यधिक लीवरेज वाला डेथ ट्रैप, एक डेरिवेटिव का डेरिवेटिव, जहां राजकोट में बैठा व्यक्ति किसी कमोडिटी पर बिल्कुल भी दांव नहीं लगा रहा, बल्कि उस कमोडिटी के Futures Contract की कीमत पर दांव लगा रहा है. यह एक गणितीय भ्रम है और इसे इस तरह तैयार किया गया है कि छोटे ट्रेडर की पूंजी खत्म हो जाए.
क्योंकि MCX पर किसी Option का underlying कमोडिटी नहीं है. वह एक फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट है. अगर उसका Option मनी में खत्म होता है, तो उसे कोई बैरल नहीं मिलता; एक्सचेंज की अपनी भाषा में वह क्रूड ऑयल फ्यूचर्स में एक पोजीशन में बदल जाता है.
और MCX के क्रूड ऑयल फ्यूचर्स का निपटान नकद में होता है. उस छोर पर भी कोई बैरल नहीं है. कॉन्ट्रैक्ट को New York Mercantile Exchange पर West Texas Intermediate (WTI) की कीमत के आधार पर रुपये में बंद किया जाता है.
इसलिए यह श्रृंखला एक Option से Futures Contract, फिर कैश सेटलमेंट और उसके बाद न्यूयॉर्क में तय होने वाली एक संख्या तक जाती है और इसमें किसी भी बिंदु पर तेल शामिल नहीं होता. किसी भारतीय रिफाइनरी ने कभी MCX से क्रूड की डिलीवरी नहीं ली है, क्योंकि सामान्य कारण यह है कि MCX क्रूड की डिलीवरी करता ही नहीं है. आयातक और तेल कंपनियां अपनी हेजिंग विदेशों में, डॉलर में, उन एक्सचेंजों पर करती हैं जहां वास्तव में बैरल मौजूद होते हैं.
राजकोट में बैठा व्यक्ति न तो उस बैरल को देखता है, न उसका मालिक होता है और न ही उसे ऐसा करने की जरूरत है. उसे सिर्फ इतना चाहिए कि उसके पैसे खत्म होने से पहले संख्या में बदलाव आ जाए.
अपनी इन्वेंट्री की हेजिंग करने वाला ज्वैलर वह नहीं कर रहा है, जो यह व्यक्ति कर रहा है, और न ही वह एयरलाइन जो ईंधन की कीमत पहले से तय कर रही है. ये ऐसे कारोबार हैं जो वास्तविक आर्थिक जोखिम से बचाव कर रहे हैं और डेरिवेटिव्स वास्तव में इन्हीं के लिए बनाए गए थे. ₹5,000 वाले ट्रेडर के पास न तेल है, न रिफाइनरी, न कार्गो और न ही बचाने के लिए कोई चीज. वह किसी कीमत को लेकर एक राय बना रहा है और समय खत्म होने से पहले उसे बेचने की उम्मीद कर रहा है. यह सट्टेबाजी है और किसी मान्यता प्राप्त एक्सचेंज पर सट्टा लगाना अपने आप में अवैध नहीं है. क्या यह केवल सट्टेबाजी तक सीमित रहता है, यह कानून का सवाल है और यह इस जांच के अगले हिस्से का विषय है.
इस बीच एक्सचेंज को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कैसा प्रदर्शन करता है. जब वह हारता है तो MCX नहीं हारता और जब वह जीतता है तो MCX नहीं जीतता; वह ट्रेड करने पर शुल्क लेता है, दूसरी तरफ मौजूद व्यक्ति के ट्रेड करने पर भी शुल्क लेता है और यह शुल्क चाहे पोजीशन हेज हो, दांव हो या गलती, हर स्थिति में लिया जाता है. उसका उत्पाद टर्नओवर है और उस टर्नओवर के परिणामस्वरूप कभी कोई बैरल हाथ बदलता है या नहीं, यह किसी और की समस्या है.
यहां पूंजी निर्माण कहां है? निवेश कहां है? आखिर यह बाजार खुद के अलावा किस चीज को वित्तपोषित कर रहा है?
कौन पहले पहुंचता है
को-लोकेशन किसी कंपनी को अपनी मशीनें एक्सचेंज की इमारत के अंदर लगाने की सुविधा देता है. ये मशीनें ऑर्डर मिलाने वाले इंजन से सीधे केबल के जरिए जुड़ी होती हैं, जिससे ऐसी कतार में, जहां क्रम पूरी तरह पहुंचने के समय से तय होता है, उसके ऑर्डर शहर पार करने के बजाय एक कमरे को पार करते हैं.
भौतिक अर्थव्यवस्था में किसी को कभी इसलिए बर्बाद नहीं होना पड़ा कि किसी हेज को तीन मिलीसेकंड की बजाय तीन सौ माइक्रोसेकंड लगे. ज्वैलर को इसकी जरूरत नहीं है. रिफाइनर को इसकी जरूरत नहीं है. केवल एक तरह की कंपनी है, जिसके लिए ये माइक्रोसेकंड गंभीर रकम के बराबर हैं और वह ऐसी कंपनी नहीं है जिसने कभी किसी चीज की डिलीवरी ली हो.
तो MCX में को-लोकेशन - किस खुशी के लिए? किसके फायदे के लिए?
हमारे पास इसका रिकॉर्ड है. 3 जुलाई 2025 को सेबी ने आरोप लगाया कि जेन स्ट्रीट ने एक्सपायरी वाले दिनों में इंडेक्स के स्तरों में हेरफेर किया और ₹4,844 करोड़ जब्त किए, यह भारत के इतिहास में इस तरह का सबसे बड़ा आदेश था और दर्ज किया कि कंपनी ने जनवरी 2023 से मार्च 2025 के बीच भारत में इंडेक्स Options से ₹44,358 करोड़ कमाए थे. उसी बाजार में पिछले साल सेबी के अपने आंकड़ों के अनुसार, प्रॉपराइटरी डेस्क और विदेशी निवेशकों ने करीब ₹58,000 करोड़ का सकल मुनाफा कमाया, जिसमें 99 प्रतिशत हिस्सा एल्गोरिदम का था और 87.7 प्रतिशत व्यक्तिगत ट्रेडर्स को नुकसान हुआ.
यह अपने आप में MCX में को-लोकेशन के खिलाफ पूरा मामला होना चाहिए, और इसे नियामक ने खुद लिखा है.
आज भारतीय कमोडिटी डेरिवेटिव्स में को-लोकेशन पर प्रतिबंध है और यह प्रतिबंध किसी चूक की बजाय एक निशान है. National Stock Exchange में प्राथमिकता वाले सर्वर एक्सेस और डार्क फाइबर भारतीय वित्तीय क्षेत्र के सबसे बड़े तकनीकी घोटाले की पहचान बन गए थे. जून 2025 में NSE ने ₹1,388 करोड़ देकर मामला निपटाया, पूर्व अधिकारियों के खिलाफ मिलीभगत के सबूत न मिलने के कारण आरोप हटा दिए गए और किसी को किसी भी अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया. यही मिसाल है. यही वह कीमत है, जो इस देश ने "दक्षता" के लिए चुकाई.
MCX की भी अपनी एक फाइल है. T R Chadha & Co LLP द्वारा किए गए फोरेंसिक ऑडिट और 1 फरवरी 2019 की एक आंतरिक ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया कि 2016 में एक शैक्षणिक संस्थान के साथ हुए समझौते के तहत उपलब्ध कराया गया डेटा, जिस पर उसकी ओर से सुजान थोमस ने हस्ताक्षर किए थे, वह ऐतिहासिक सामग्री नहीं थी, जिसकी वास्तविक शोध के लिए जरूरत होती है, बल्कि हर सुबह करीब नौ बजे, बाजार खुलने से ठीक पहले लिया गया लाइव टिक-बाय-टिक फीड था. इसमें अन्य चीजों के अलावा वह अंतर भी शामिल था, जो एक ट्रेडर द्वारा प्रदर्शित मात्रा और उसके पास वास्तव में मौजूद मात्रा के बीच था. सेबी का जवाब एक पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर को नोटिस भेजना था. न कोई आपराधिक जांच, न कोई सार्वजनिक आदेश, न बोर्ड की जवाबदेही. फाइल शांत हो गई और अब तक शांत है.
अब इस इतिहास को इस तथ्य के साथ रखिए: अक्टूबर 2018 में सेबी ने NSE और MCX के विलय की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. बैंकर पहले ही नियुक्त किए जा चुके थे, लेकिन विशेष रूप से इसलिए क्योंकि को-लोकेशन का मामला अनसुलझा था. कभी को-लोकेशन ही वह कारण था जिसकी वजह से MCX को छुआ नहीं जा सकता था. मई 2025 से SEBI की एक समिति MCX को खुद को-लोकेशन देने पर चर्चा कर रही है.
जरूरत क्या है, सेबी? शार्क को रिटेल ट्रेडर्स के और करीब लाने की?
स्पीड पर ट्रेड करने वाली कंपनियों ने स्थिति को पहले ही समझ लिया है. जब NCDEX ने अगस्त 2025 में ₹500 करोड़ से अधिक जुटाए, तो निवेशकों की सूची में दो नाम Citadel Securities के ₹17 करोड़ और Tower Research के ₹34 करोड़ थे, हाई-फ्रीक्वेंसी कंपनियां किसी एक सर्वर रैक के लगाए जाने से पहले ही भारतीय कमोडिटी एक्सचेंज में निवेश कर रही थीं. कोई भी व्यक्ति टेबल के नियम बनते हुए देखे बिना उस घर में निवेश नहीं करता.
विदेशी पैसा भी सामने के दरवाजे से अंदर लाया जा रहा है. 11 अगस्त 2026 को सेबी ने भारतीय कमोडिटी कॉन्ट्रैक्ट्स क्रूड, गैस, गोल्ड, सिल्वर, बेस मेटल्स को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए व्यापक रूप से खोलने का प्रस्ताव दिया. क्योंकि ये निवेशक कानूनी रूप से डिलीवरी नहीं ले सकते, इसलिए प्रस्ताव में ऐसी व्यवस्था बनाई गई है जिससे यह सुनिश्चित हो कि उन्हें कभी डिलीवरी न लेनी पड़े: डिलीवरी विंडो से तीन दिन पहले बाहर निकलना या रोल करना, एक दिन पहले भारतीय सदस्य को स्वतः हस्तांतरण और उस पोजीशन को विरासत में लेने वाले व्यक्ति के लिए शुल्क. कुछ भी खरीदा नहीं जाता, किसी चीज को वित्तपोषित नहीं किया जाता, किसी उत्पादक का जोखिम कम नहीं होता.
FPI में "I" का कोई काम ही नहीं रह गया है. जिसे बुलाया जा रहा है, वह पूंजी नहीं है. यह सिर्फ MCX के शेयर की कीमत बढ़ाने के लिए वॉल्यूम है और भारत के रिटेल निवेशकों को इसका कोई लाभ नहीं है.
₹5,000 वाला ट्रेडर भी उसी कतार में है. वह बस कतार में सबसे आगे से बहुत दूर है.
बोर्डरूम में नियामक
इनमें से हर फैसला को-लोकेशन, विदेशी पैसा, नए कॉन्ट्रैक्ट, अप्रैल 2026 में सेबी द्वारा MCX को जिस कोयला एक्सचेंज को शामिल करने की मंजूरी दी गई और जिसमें ₹100 करोड़ की प्रतिबद्धता है, आज सेबी की फाइल में मौजूद है. इनमें से हर फैसला एक सूचीबद्ध कंपनी के लिए वास्तविक धन के लिहाज से महत्वपूर्ण है.
और 28 मई 2026 को MCX ने अपने बोर्ड में सेबी के एक व्यक्ति को शामिल किया.
संतोष कुमार मोहंती को एक्सचेंज का Public Interest Director नियुक्त किया गया, यह कोई सामान्य डायरेक्टर पद नहीं है, बल्कि नियमों में मौजूद वह सीट है, जिसका एक उद्देश्य है: एक्सचेंज के अपने व्यावसायिक हितों के खिलाफ जनता का प्रतिनिधित्व करना.
उनके सीवी की तुलना इस पद से कीजिए. मोहंती जून 2018 से जून 2023 तक सेबी के पूर्णकालिक सदस्य रहे. इससे पहले सितंबर 2015 से वह सेबी में कार्यकारी निदेशक थे, ठीक उसी महीने जब वायदा बाजार आयोग का विलय हुआ और कमोडिटी एक्सचेंज सेबी के अधिकार क्षेत्र में आए. इससे पहले वह स्वयं वायदा बाजार आयोग में निदेशक थे, जो एमसीएक्स का मूल नियामक था. सेबी में उनके अधीन जिन विभागों की जिम्मेदारी थी, उनमें बाजार नियमन, निगरानी और जांच शामिल थे. यही वे कार्य थे, जिनके पास इस एक्सचेंज की आंकड़ा फाइल और कमोडिटी में सट्टेबाजी की अधिकता से जुड़े सभी सवाल होने चाहिए थे.
जनहित निदेशकों का चयन केवल एक्सचेंज नहीं करते. उनकी नियुक्ति सेबी की मंजूरी से होती है. इसलिए नियामक ने अपने ही पूर्व पूर्णकालिक सदस्य को उस कुर्सी पर मंजूरी दी, जिसका उद्देश्य इसी एक्सचेंज से जनता के हितों की रक्षा करना है.
इस घर का जनहित निदेशक वह व्यक्ति है, जो कभी लाइसेंस अपने हाथ में रखता था.
यह कोई तकनीकी उल्लंघन नहीं है और यहां यह आरोप भी नहीं है कि मोहंती ने अपने पद पर रहते हुए कुछ अनुचित किया. समस्या संरचनात्मक है और संरचनात्मक होने के कारण और भी गंभीर है. नियामक की स्वतंत्रता किसी के अच्छे इरादों का मामला नहीं है; यह इस बात का मामला है कि इमारत के अंदर मौजूद लोग बाहर अपने लिए क्या अवसर इंतजार करते देख सकते हैं. एमसीएक्स की किसी फाइल पर काम कर रहा हर अधिकारी अब जानता है कि ₹81,000 करोड़ के सूचीबद्ध एक्सचेंज में निदेशक मंडल की एक सीट मौजूद है और यह भी जानता है कि पिछली सीट किसे मिली.
अगर सेबी को लगता है कि यह उचित है, तो उसे वह कारण सार्वजनिक करना चाहिए जिसके आधार पर उसने इस नियुक्ति को मंजूरी दी. जनहित की निगरानी कहां खत्म होती है और एक्सचेंज की अर्थव्यवस्था कहां शुरू होती है?
कोई गिनती नहीं कर रहा
सेबी जानता है कि भारतीय Nifty Options में ट्रेडिंग करते हुए कितना पैसा गंवाते हैं. वह हर साल यह आंकड़ा प्रकाशित करता है. उसने इसी आंकड़े का इस्तेमाल टैक्स, प्रतिबंधों और चेतावनियों को उचित ठहराने के लिए किया, FY22 और FY24 के बीच 93 प्रतिशत व्यक्तिगत ट्रेडर्स को नुकसान हुआ, करीब ₹1.8 लाख करोड़; FY25 में करीब 91 प्रतिशत; और पिछले साल 87.7 प्रतिशत, 12 महीनों में ₹91,685 करोड़.
लेकिन जब वही रिटेल भीड़ कमोडिटी Options में चली जाती है, तो हिसाब-किताब गायब हो जाता है.
नुकसान का आंकड़ा कहां है?
ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है. कमोडिटी नियमन के 11 साल, 20.9 लाख ग्राहक, जून तिमाही में ₹10.5 लाख करोड़ का दैनिक कारोबार और एक भी प्रकाशित आंकड़ा नहीं. न क्रूड के लिए, न बुलियन के लिए, न एक साल के लिए.
इसके केवल दो स्पष्टीकरण हो सकते हैं और दोनों ही बचाव योग्य नहीं हैं.
अगर सेबी के पास यह आंकड़ा नहीं है, तो वह ऐसे बाजार की निगरानी कर रहा है, जिसे वह माप नहीं सकता, 20.9 लाख ग्राहकों वाला एक एक्सचेंज इस तरह चल रहा है कि नियामक को यह तक पता नहीं कि इसके अंदर कौन बर्बाद हो रहा है.
अगर सेबी के पास यह आंकड़ा है और उसने जनता को नहीं बताया है, तो सवाल बिल्कुल अलग है. क्यों?
क्या सेबी का रुख यह है कि MCX पर रिटेल भागीदारी महत्वपूर्ण नहीं है? तो उसे इसे लिखित रूप में कहना चाहिए और इसे उस एक्सचेंज के साथ जोड़कर देखना चाहिए, जो Crude Oil Mini और Silver Micro जैसे कॉन्ट्रैक्ट चला रहा है, जिन्हें इस तरह आकार दिया गया है कि ₹5,000 वाला व्यक्ति भी Brent पर पोजीशन ले सके.
जो नियामक एक बाजार में रिटेल निवेशकों की तबाही के आंकड़े प्रकाशित करता है और दूसरे बाजार पर चुप रहता है, वह सावधानी नहीं बरत रहा. वह चयनात्मक रवैया अपना रहा है. और जानकारी देने में चयनात्मकता खुद एक तरह का प्रचार है.
यह आंकड़ा इस कहानी में एकमात्र ऐसी चीज है, जिस पर बहस नहीं की जा सकती. इसे प्रकाशित कर दीजिए और बाकी हर फाइल टैक्स का अंतर, सर्वर, विदेशी पैसा, बोर्ड की सीट को इसी के सामने जवाब देना होगा. शायद यही वजह है कि 11 साल में किसी ने इसकी तलाश नहीं की.
MCX के शेयर की कीमत का खेल
जब कोई गिनती नहीं कर रहा था, तब एक्सचेंज ने अपने जीवन का सबसे अच्छा साल देखा. MCX की आय दोगुनी होकर ₹2,429 करोड़ हो गई और 73 प्रतिशत ऑपरेटिंग मार्जिन पर मुनाफा 138 प्रतिशत बढ़कर ₹1,332 करोड़ हो गया. ऐसे साल में स्टॉक 102 प्रतिशत ऊपर है, जब Nifty गिरा, और 12 महीनों में बाजार मूल्य ₹40,500 करोड़ बढ़कर ₹81,021 करोड़ हो गया.
निवेशक प्रस्तुति में इनमें से हर आंकड़ा एक उपलब्धि है. इनमें से हर आंकड़ा इस बात का भी माप है कि उस बाजार में कितना पैसा हाथ बदला, जहां लगभग कोई भी कमोडिटी नहीं चाहता.
तुहिन कांता पांडे ने मार्च 2025 में सेबी के चेयरमैन का पद संभाला. उनका नियामक हर साल इस देश को रुपये तक का हिसाब बताता है कि भारतीय शेयरों पर दांव लगाते हुए कितना पैसा गंवाते हैं. तेल के मामले में उसने कभी एक भी आंकड़ा प्रकाशित नहीं किया और किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि क्यों.
राजकोट में कहीं, ₹5,000 वाला व्यक्ति अब भी उस संख्या को देख रहा है.
यह संख्या हजारों मील दूर तय हुई थी, उसके जागने से पहले. उसका कॉन्ट्रैक्ट कभी किसी चीज का एक बैरल पैदा नहीं करेगा. उसका टैक्स बिल उस टैक्स का पांचवां हिस्सा है, जो उसे इक्विटी इंडेक्स पर यही दांव लगाने पर देना पड़ता. और किसी ने कभी उसे यह नहीं बताया कि उसके जैसे ट्रेडर्स सामूहिक रूप से इस एक्सचेंज पर कितना नुकसान उठाते हैं.
ट्रेडर को MCX में ट्रेड करने के लिए लाया जा रहा है. शार्क को MCX में और तेजी से ट्रेड करने के लिए लाया जा रहा है. और उनके ऊपर कहीं कोई शायद सिर्फ एक संख्या देख रहा है: MCX के शेयर की कीमत.
इस एक्सचेंज पर कीमतें वास्तव में कहां से आती हैं, यहां वास्तव में कौन हेजिंग करता है और इसके डिलीवरी के आंकड़े वास्तव में क्या दिखाते हैं, यह इस कहानी का दूसरा हिस्सा है. इसकी रिपोर्टिंग की जा रही है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
OPEC+ के मुताबिक, सातों देश हर महीने वैश्विक तेल बाजार की स्थिति और भविष्य की मांग का आकलन करते रहेंगे. अगली बैठक 4 अक्टूबर को प्रस्तावित है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC+ ने अक्टूबर 2026 के लिए कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने से इनकार कर दिया है. रविवार को हुई बैठक में सात प्रमुख देशों ने सितंबर के उत्पादन स्तर को ही अक्टूबर में जारी रखने का फैसला किया. इस फैसले के बाद सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई और ब्रेंट क्रूड 98 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया. भारत के लिए यह फैसला चिंता बढ़ाने वाला है, क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है.
अक्टूबर में नहीं बढ़ेगा तेल उत्पादन
OPEC+ की 6 सितंबर को हुई वर्चुअल बैठक में सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, कजाकिस्तान, अल्जीरिया और ओमान ने हिस्सा लिया. बैठक में इन देशों ने अक्टूबर के लिए सितंबर 2026 के निर्धारित उत्पादन स्तर को बनाए रखने पर सहमति जताई. OPEC+ के मुताबिक, सातों देश हर महीने वैश्विक तेल बाजार की स्थिति और भविष्य की मांग का आकलन करते रहेंगे. अगली बैठक 4 अक्टूबर को प्रस्तावित है.
किस देश का कितना उत्पादन?
अक्टूबर के उत्पादन कार्यक्रम के तहत रूस का उत्पादन लक्ष्य 99.49 लाख बैरल प्रतिदिन और सऊदी अरब का 104.78 लाख बैरल प्रतिदिन रहेगा. अन्य देशों के उत्पादन लक्ष्य इस प्रकार हैं:
1. इराक: 44.31 लाख बैरल प्रतिदिन
2. कुवैत: 26.76 लाख बैरल प्रतिदिन
3. कजाकिस्तान: 16.28 लाख बैरल प्रतिदिन
4. अल्जीरिया: 10.07 लाख बैरल प्रतिदिन
5. ओमान: 8.41 लाख बैरल प्रतिदिन
मुआवजा उत्पादन को छोड़कर इन सात देशों का संयुक्त अक्टूबर उत्पादन लक्ष्य करीब 3.101 करोड़ बैरल प्रतिदिन रहेगा.
होर्मुज संकट के बीच फैसला
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, OPEC+ का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका ने वैश्विक बाजार की चिंता बढ़ा दी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के प्रमुख तेल शिपिंग मार्गों में शामिल है. यहां किसी भी तरह की लंबी रुकावट से वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है. ऐसे माहौल में OPEC+ की ओर से उत्पादन बढ़ाने से इनकार ने बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता और बढ़ा दी है.
सितंबर में बढ़ाया था उत्पादन
इससे पहले OPEC+ ने अगस्त में सितंबर के लिए तेल उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया था. इसके साथ समूह ने 2023 में लागू की गई 16.5 लाख बैरल प्रतिदिन की अतिरिक्त उत्पादन कटौती को चरणबद्ध तरीके से वापस लेने की प्रक्रिया पूरी कर ली थी. हालांकि, OPEC+ के 21 सदस्य देशों में से ज्यादातर के लिए 2026 के अंत तक एक और उत्पादन कटौती लागू है. इन कटौतियों को वापस लेने से पहले समूह को सदस्य देशों की वास्तविक उत्पादन क्षमता का आकलन करना होगा. इसके बाद 2027 के लिए नए उत्पादन बेसलाइन तय किए जाएंगे और इन्हीं के आधार पर अगले साल देशों के उत्पादन कोटा निर्धारित होंगे.
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है. ऐसे में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने से देश का आयात बिल बढ़ सकता है. महंगे कच्चे तेल का असर व्यापार घाटे और चालू खाता घाटे पर भी पड़ सकता है. इसके अलावा पेट्रोल, डीजल और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से घरेलू अर्थव्यवस्था में महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका है.
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
OPEC+ के फैसले के बाद सोमवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली. सुबह करीब 11:30 बजे ब्रेंट क्रूड 1.47 फीसदी की बढ़त के साथ 97.70 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. वहीं, WTI क्रूड 1.49 फीसदी उछलकर 92.84 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आगे भी बनी रहती है, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था, रुपये और महंगाई के मोर्चे पर देखने को मिल सकता है.
कंपनी ने कीमतें बढ़ाने की वजह इनपुट कॉस्ट में लगातार हो रही बढ़ोतरी को बताया है. कच्चे माल और अन्य लागत में इजाफे से वाहनों के उत्पादन की कुल लागत बढ़ी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की प्रमुख कार निर्माता मारुति सुजुकी ने ग्राहकों को बड़ा झटका दिया है. कंपनी ने सितंबर 2026 से अपनी चुनिंदा कारों की कीमतों में ₹20,000 तक बढ़ोतरी करने का ऐलान किया है. कंपनी के मुताबिक, इनपुट कॉस्ट यानी उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और अन्य लागत में बढ़ोतरी के कारण कीमतें बढ़ाने का फैसला किया गया है. हालांकि, कंपनी ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि किन मॉडल और वेरिएंट की कीमत कितनी बढ़ेगी.
सितंबर से लागू होंगी नई कीमतें
मारुति सुजुकी ने सोमवार, 7 सितंबर को बताया कि चुनिंदा मॉडल की कीमतों में अधिकतम ₹20,000 तक की बढ़ोतरी की जाएगी. नई कीमतें सितंबर 2026 से लागू होंगी. हालांकि, कंपनी ने कीमतों में बढ़ोतरी की सटीक तारीख और अलग-अलग मॉडल पर होने वाली बढ़ोतरी की जानकारी फिलहाल साझा नहीं की है.
किन कारों पर पड़ेगा असर?
मारुति सुजुकी के पोर्टफोलियो में ऑल्टो K10, वैगनआर, स्विफ्ट, डिजायर, बलेनो, फ्रॉन्क्स, ब्रेजा, अर्टिगा और ग्रैंड विटारा समेत कई लोकप्रिय मॉडल शामिल हैं. हालांकि, कंपनी ने अभी यह सूची जारी नहीं की है कि इनमें से किन कारों की कीमतें बढ़ाई जाएंगी. इसलिए ग्राहकों को नई कीमतों का इंतजार करना होगा. कीमतों में बढ़ोतरी अलग-अलग मॉडल और वेरिएंट के हिसाब से अलग हो सकती है.
लागत बढ़ने से कंपनी पर दबाव
कंपनी ने कीमतें बढ़ाने की वजह इनपुट कॉस्ट में लगातार हो रही बढ़ोतरी को बताया है. कच्चे माल और अन्य लागत में इजाफे से वाहनों के उत्पादन की कुल लागत बढ़ी है. मारुति सुजुकी ने लागत को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन बढ़ती लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालने का फैसला किया गया है.
शेयर बाजार में मारुति के शेयर मजबूत
कारों की कीमतों में बढ़ोतरी के ऐलान के बीच मारुति सुजुकी के शेयरों में मामूली तेजी देखने को मिली. दोपहर करीब 2 बजे एनएसई पर कंपनी का शेयर लगभग 0.58 फीसदी की बढ़त के साथ ₹12,768.00 पर कारोबार कर रहा था. इस तेजी के साथ कंपनी का बाजार पूंजीकरण ₹4 लाख करोड़ के पार पहुंच गया.
NSE में सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के पास है. LIC के पास एक्सचेंज के करीब 10.72 प्रतिशत शेयर यानी 265.28 मिलियन शेयर हैं. हालांकि, LIC प्रस्तावित आईपीओ में अपनी हिस्सेदारी का कोई भी शेयर बेचने नहीं जा रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का बहुप्रतीक्षित आईपीओ देश की पांच सरकारी बीमा कंपनियों के लिए बड़ी वित्तीय राहत लेकर आ सकता है. ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस के मुताबिक, ये कंपनियां आईपीओ में करीब 4 करोड़ शेयर बेचने की तैयारी में हैं. अगर शेयर का संभावित भाव ₹1,800 रहता है, तो इनकी हिस्सेदारी बिक्री से करीब ₹7,200 करोड़ जुट सकते हैं. इससे वित्तीय दबाव झेल रही सरकारी बीमा कंपनियों की स्थिति मजबूत होने और उनके सॉल्वेंसी रेशियो में सुधार की उम्मीद है.
1994 में मामूली निवेश, अब हजारों करोड़ की हिस्सेदारी
जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (GIC Re), न्यू इंडिया एश्योरेंस, नेशनल इंश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस और ओरिएंटल इंश्योरेंस NSE के शुरुआती निवेशकों में शामिल थीं. एक्सचेंज की शुरुआत 1994 में हुई थी और उस समय इन कंपनियों ने इसमें मामूली निवेश किया था. अब NSE के प्रस्तावित आईपीओ के जरिए ये पांचों सरकारी बीमा कंपनियां करीब 40 मिलियन यानी 4 करोड़ शेयर बेच सकती हैं.
शेयरों की बिक्री के बाद इन कंपनियों की संयुक्त हिस्सेदारी 6.7 प्रतिशत से घटकर करीब 5.1 प्रतिशत रह जाएगी. चूंकि NSE का यह आईपीओ पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) है, इसलिए शेयरों की बिक्री से मिलने वाली रकम NSE के पास नहीं जाएगी, बल्कि मौजूदा शेयरधारकों को मिलेगी.
LIC नहीं बेचेगी NSE में अपनी हिस्सेदारी
NSE में सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के पास है. LIC के पास एक्सचेंज के करीब 10.72 प्रतिशत शेयर यानी 265.28 मिलियन शेयर हैं. हालांकि, LIC प्रस्तावित आईपीओ में अपनी हिस्सेदारी का कोई भी शेयर बेचने नहीं जा रही है.
LIC को NSE के गवर्निंग बोर्ड में एक निदेशक नामित करने का अधिकार भी हासिल है. वहीं, निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों में HDFC Life और SBI Life भी अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना में शामिल नहीं हैं. दूसरी ओर, ICICI Lombard अपने करीब 2.35 मिलियन शेयर बेचकर लगभग ₹383 करोड़ का मुनाफा बुक कर सकती है.
घाटे में चल रही सरकारी बीमा कंपनियों को बड़ी राहत
NSE IPO से मिलने वाली रकम सरकारी जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के लिए काफी अहम हो सकती है. खासकर उन कंपनियों के लिए जिनका सॉल्वेंसी रेशियो दबाव में है. मार्च 2025 तक ओरिएंटल इंश्योरेंस का सॉल्वेंसी रेशियो माइनस 1.03, नेशनल इंश्योरेंस का माइनस 0.67 और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस का माइनस 0.65 दर्ज किया गया था.
शेयरों की बिक्री से मिलने वाली पूंजी इन कंपनियों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद कर सकती है. अनुमान है कि इससे इनके सॉल्वेंसी रेशियो में करीब 100 बेसिस पॉइंट तक सुधार हो सकता है.
शेयर बेचने के बाद भी बचेंगे हजारों करोड़ के शेयर
आईपीओ में हिस्सेदारी बेचने के बावजूद सरकारी बीमा कंपनियों के पास NSE के बड़ी संख्या में शेयर बने रहेंगे. नेशनल इंश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस और ओरिएंटल इंश्योरेंस करीब 17 मिलियन शेयर बेचने के बाद भी लगभग 73 मिलियन शेयर अपने पास रख सकती हैं.
यदि NSE के शेयर का भाव ₹1,800 माना जाए, तो बची हुई हिस्सेदारी की कीमत करीब ₹13,100 करोड़ बैठती है. NSE की लिस्टिंग के बाद शेयर की कीमत बढ़ने पर इन कंपनियों को मार्क-टू-मार्केट लाभ भी मिल सकता है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति को आगे भी सहारा मिलेगा.
अंतिम कमाई NSE के IPO प्राइस पर निर्भर
हालांकि, सरकारी बीमा कंपनियों को वास्तव में कितनी रकम मिलेगी, यह NSE के आईपीओ के अंतिम ऑफर प्राइस पर निर्भर करेगा. फिलहाल ₹1,800 प्रति शेयर का भाव संभावित कीमत के तौर पर माना जा रहा है. ऐसे में करीब 4 करोड़ शेयरों की बिक्री से लगभग ₹7,200 करोड़ जुटाने का अनुमान है. अंतिम कीमत और आईपीओ की शर्तें तय होने के बाद ही इन कंपनियों की वास्तविक कमाई स्पष्ट होगी.
गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा अंशदान की गणना के तरीके पर सरकार कर रही विचार; कारोबार या कामगारों को किए गए भुगतान के आधार पर तय हो सकता है अंशदान
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा का लाभ देने के लिए सरकार नियमों में बदलाव की तैयारी कर रही है. श्रम एवं रोजगार मंत्रालय एग्रीगेटर कंपनियों से लिए जाने वाले सामाजिक सुरक्षा अंशदान की गणना के फॉर्मूले पर विचार कर रहा है. इसमें यह तय किया जाना है कि कंपनियों से अंशदान उनके सालाना कारोबार के आधार पर लिया जाए या कामगारों को किए जाने वाले भुगतान के आधार पर.
इस बदलाव का असर ओला (Ola), उबर (Uber) जैसी कैब और राइड-हेलिंग कंपनियों के साथ-साथ ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले गिग वर्कर्स पर पड़ सकता है. खासतौर पर भुगतान आधारित व्यवस्था लागू होने पर ज्यादा लेनदेन वाले प्लेटफॉर्म पर कंपनियों की लागत बढ़ने की संभावना है.
दो मॉडल पर विचार
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार सामाजिक सुरक्षा अंशदान तय करने के लिए दो विकल्पों पर विचार कर रही है. पहला मॉडल एग्रीगेटर कंपनी के सालाना कारोबार के आधार पर अंशदान तय करने का है, जबकि दूसरे मॉडल में कामगारों को किए गए भुगतान या प्रति लेनदेन को आधार बनाया जा सकता है.
भुगतान आधारित मॉडल का असर उन कारोबारों पर ज्यादा पड़ सकता है, जहां लेनदेन की संख्या बहुत अधिक होती है, लेकिन हर लेनदेन का मूल्य अपेक्षाकृत कम होता है. राइड-हेलिंग कंपनियां इसी श्रेणी में आती हैं, क्योंकि कैब, ऑटो और बाइक सेवाओं में बड़ी संख्या में रोजाना ट्रांजैक्शन होते हैं.
क्या कहती है सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020?
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत एग्रीगेटर कंपनियों के लिए गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के सामाजिक सुरक्षा कोष में अंशदान करना अनिवार्य किया गया है. नियमों के मुताबिक, किसी एक एग्रीगेटर के साथ वित्त वर्ष में कम से कम 90 दिन काम करने वाला गिग वर्कर या एक से अधिक एग्रीगेटर के साथ कुल 120 दिन काम करने वाला वर्कर योजना के तहत लाभ पाने का पात्र हो सकता है.
एग्रीगेटर कंपनियों को अपने सालाना अंशदान का आकलन कर उसे सामाजिक सुरक्षा कोष में जमा करना होता है. अब सरकार इस अंशदान की गणना और भुगतान के लिए तकनीकी व्यवस्था को अंतिम रूप देने पर विचार कर रही है.
कारोबार का 1-2% तक हो सकता है अंशदान
सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 114(4) के तहत एग्रीगेटर कंपनियों को अपने सालाना कारोबार का 1 से 2 प्रतिशत तक सामाजिक सुरक्षा अंशदान करना होगा. हालांकि, यह अंशदान गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को किए गए कुल भुगतान के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता.
सरकार इस व्यवस्था के विकल्प के तौर पर सीधे कामगारों को किए जाने वाले भुगतान को आधार बनाने पर भी विचार कर रही है. इस मॉडल में भुगतान का 5 प्रतिशत तक अंशदान लिया जा सकता है.
Ola-Uber जैसी कंपनियों पर बढ़ सकता है खर्च
विश्लेषकों का मानना है कि अगर भुगतान आधारित व्यवस्था लागू होती है तो राइड-हेलिंग कंपनियों पर इसका वित्तीय असर ज्यादा हो सकता है. कैब, ऑटो और बाइक प्लेटफॉर्म पर रोजाना बड़ी संख्या में ट्रांजैक्शन होते हैं, इसलिए कामगारों को किए जाने वाले भुगतान के आधार पर अंशदान तय होने पर कंपनियों की लागत बढ़ सकती है. वहीं, कारोबार आधारित मॉडल में अंशदान कंपनी के कुल सालाना कारोबार से जुड़ा होगा. ऐसे में अलग-अलग बिजनेस मॉडल वाली एग्रीगेटर कंपनियों पर दोनों व्यवस्थाओं का वित्तीय प्रभाव अलग-अलग हो सकता है.
गिग वर्कर्स को मिलेगा सामाजिक सुरक्षा का लाभ
प्रस्तावित व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना है. अंशदान का फॉर्मूला तय होने के बाद सामाजिक सुरक्षा कोष के संचालन और पात्र कामगारों को योजनाओं का लाभ देने की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट किया जा सकेगा. इसका लाभ कैब ड्राइवर, डिलीवरी पार्टनर और अन्य प्लेटफॉर्म आधारित कामगारों को मिल सकता है, जो पारंपरिक रोजगार व्यवस्था से अलग तरीके से काम करते हैं.
इस फंडिंग राउंड में पिक्सल के मौजूदा निवेशक Radical Ventures और growX Ventures ने भी हिस्सा लिया. वहीं, 360 ONE Asset और IMM Investment नए निवेशकों के तौर पर कंपनी से जुड़े हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बेंगलुरु स्थित स्पेसटेक स्टार्टअप पिक्सल ने सीरीज सी फंडिंग राउंड में 100 मिलियन डॉलर जुटाए हैं. इस राउंड की अगुवाई सिंगापुर के सरकारी निवेशक टेमासेक और ब्रिटेन की स्पेस-टेक वेंचर कैपिटल फर्म सेराफिम ने की. इस फंडिंग के साथ पिक्सल की कुल जुटाई गई पूंजी 195 मिलियन डॉलर हो गई है. कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल अपने अर्थ-इंटेलिजेंस और सैटेलाइट कारोबार को विस्तार देने के लिए करेगी.
मौजूदा और नए निवेशकों ने भी लिया हिस्सा
इस फंडिंग राउंड में पिक्सल के मौजूदा निवेशक Radical Ventures और growX Ventures ने भी हिस्सा लिया. वहीं, 360 ONE Asset और IMM Investment नए निवेशकों के तौर पर कंपनी से जुड़े हैं. भारत में सरकार की ओर से अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने वाले सुधारों के बाद स्पेस सेक्टर में निवेशकों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है.
हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट से शुरू हुआ सफर
पिक्सल की स्थापना आवैस अहमद ने की है. कंपनी ने शुरुआत हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट्स पर फोकस के साथ की थी. ये सैटेलाइट्स पारंपरिक अर्थ-इमेजिंग सैटेलाइट्स की तुलना में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक जानकारी की ज्यादा व्यापक रेंज को कैप्चर करते हैं. इससे पृथ्वी की सतह पर होने वाले बदलावों और विभिन्न विशेषताओं की पहचान करने में मदद मिलती है.
सैटेलाइट इमेजिंग से अर्थ इंटेलिजेंस तक विस्तार
समय के साथ पिक्सल ने सैटेलाइट इमेजिंग से आगे बढ़ते हुए अपने Aurora प्लेटफॉर्म के जरिए Earth Intelligence Software और व्यावसायिक व संप्रभु मिशनों के लिए सैटेलाइट सिस्टम विकसित किए हैं. गूगल समर्थित यह स्टार्टअप सेंसर, सॉफ्टवेयर और सैटेलाइट सिस्टम को एकीकृत कर ऐसा प्लैनेटरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना चाहता है, जिससे सरकारें, कंपनियां और संस्थान अर्थ-ऑब्जर्वेशन डेटा से उपयोगी जानकारी हासिल कर सकें.
अब सैटेलाइट से नियमित कमाई पर फोकस
पिक्सल के लिए नई फंडिंग ऐसे समय में आई है जब कंपनी सैटेलाइट तैनाती और बड़े पूंजीगत खर्च के चरण से आगे बढ़कर अपने सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन से नियमित राजस्व हासिल करने की दिशा में बढ़ रही है. कंपनी के संस्थापक आवैस अहमद ने इस साल BW Businessworld को बताया था कि पैमाना बढ़ने के साथ पिक्सल के डेटा कारोबार का सकल मार्जिन 70 से 90 फीसदी के बीच रह सकता है.
छह सैटेलाइट्स पर बड़ा खर्च पहले ही पूरा
अहमद के मुताबिक, कंपनी छह सैटेलाइट्स को लॉन्च करने से जुड़ा बड़ा पूंजीगत खर्च पहले ही कर चुकी है. उन्होंने मई में कहा था कि सैटेलाइट लॉन्च करना कंपनी के लिए सबसे बड़ा खर्च था और छह सैटेलाइट्स के लिए यह पूंजीगत खर्च पूरा किया जा चुका है. इन सैटेलाइट्स को सात साल के परिचालन जीवन के लिए डिजाइन किया गया है, जबकि कई पारंपरिक सैटेलाइट्स की परिचालन अवधि करीब तीन साल होती है.
2026 में EBITDA पॉजिटिव होने की उम्मीद
कंपनी को उम्मीद है कि वह 2026 में EBITDA के स्तर पर मुनाफे में आ जाएगी. वहीं, 2027 के अंत या अधिकतम 2028 की शुरुआत तक कंपनी के कैश फ्लो पॉजिटिव होने की उम्मीद है. पिक्सल का मानना है कि सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन से उसके पूरे परिचालन जीवन के दौरान राजस्व आता रहेगा, जबकि ग्राउंड स्टेशन, क्लाउड स्टोरेज और कर्मचारियों जैसे नियमित खर्च कॉन्ट्रैक्ट्स की वैल्यू की तुलना में अपेक्षाकृत कम रहेंगे.
भारत के स्पेस सेक्टर में बढ़ रहा निजी निवेश
सरकार की ओर से अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने और विभिन्न सुधारों के बाद भारत के स्पेस सेक्टर में निजी निवेश बढ़ा है. स्टार्टअप्स सैटेलाइट निर्माण, लॉन्च सेवाओं, अर्थ ऑब्जर्वेशन और स्पेस आधारित कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में अपनी क्षमताएं विकसित कर रहे हैं.
कृषि से रक्षा तक बढ़ रही सैटेलाइट डेटा की मांग
पिक्सल उन स्पेसटेक स्टार्टअप्स में शामिल है जो सैटेलाइट डेटा और सेवाओं को व्यावसायिक रूप देने पर काम कर रहे हैं. कृषि, रक्षा, जलवायु निगरानी और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में अर्थ-ऑब्जर्वेशन डेटा की मांग बढ़ने से इस कारोबार में आगे विकास की संभावनाएं बनी हुई हैं.
शुक्रवार को सेंसेक्स 362.57 अंक चढ़कर 76,515.43 और निफ्टी 24.25 अंक बढ़कर 23,897.70 पर बंद हुआ था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार ने शुक्रवार को तेजी के साथ सप्ताह का अंत किया था, लेकिन सोमवार को कारोबार की शुरुआत से पहले बाजार पर दबाव के संकेत मिल रहे हैं. शुक्रवार को सेंसेक्स 362.57 अंक चढ़कर 76,515.43 और निफ्टी 24.25 अंक बढ़कर 23,897.70 पर बंद हुआ था. टाटा स्टील, रिलायंस इंडस्ट्रीज और एचडीएफसी बैंक जैसे दिग्गज शेयरों में खरीदारी से बाजार को सहारा मिला. हालांकि, सोमवार सुबह GIFT Nifty करीब 71 अंक फिसलकर 23,978 के आसपास कारोबार करता दिखा. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, अमेरिका-ईरान तनाव और अमेरिकी बाजारों में कमजोरी से निवेशकों की चिंता बढ़ी है. इस बीच Tata Motors, RVNL, Lupin, JSW Steel, Gland Pharma और Swiggy समेत कई शेयर आज कारोबारी अपडेट के चलते फोकस में रह सकते हैं.
शुक्रवार को कैसा रहा बाजार
शुक्रवार को 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 362.57 अंक यानी 0.48 फीसदी की बढ़त के साथ 76,515.43 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 24.25 अंक यानी 0.10 फीसदी चढ़कर 23,897.70 के स्तर पर पहुंच गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 20 में तेजी और 10 में गिरावट रही. टाटा स्टील 2.91 फीसदी चढ़कर सबसे ज्यादा बढ़ने वाला शेयर रहा. रिलायंस इंडस्ट्रीज में 1.61 फीसदी, बजाज फाइनेंस में 1.47 फीसदी, ट्रेंट में 1.34 फीसदी, अडानी पोर्ट्स में 1.33 फीसदी और एचडीएफसी बैंक में 1.30 फीसदी की तेजी रही. दूसरी ओर भारती एयरटेल और एचसीएल टेक 1.24 फीसदी, जबकि इटरनल 1.09 फीसदी नीचे बंद हुआ.
आज कमजोर शुरुआत के संकेत
सोमवार को भारतीय बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत हैं. GIFT Nifty करीब 71 अंक की गिरावट के साथ 23,978 के आसपास कारोबार करता दिखा. हालांकि, एशिया के प्रमुख बाजारों में मजबूती रही. जापान का Nikkei 225 करीब 2.23 फीसदी और दक्षिण कोरिया का Kospi करीब 3.04 फीसदी ऊपर कारोबार कर रहा था. इसके विपरीत अमेरिकी बाजार शुक्रवार को गिरावट के साथ बंद हुए. Dow Jones 0.51 फीसदी, S&P 500 0.38 फीसदी और Nasdaq Composite 0.29 फीसदी गिरा.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें बनी चिंता
बाजार के लिए सबसे बड़ी चिंता इस समय कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा स्ट्रेट ऑफ हार्मुज में टैंकरों से जुड़ी घटनाओं के बीच ब्रेंट क्रूड
करीब 96.73 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, ऐसे में तेल की कीमतों में लगातार तेजी से महंगाई, आयात बिल और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, Tata Motors की सब्सिडियरी TML CV Holdings ने Iveco Group के अधिग्रहण के लिए 14.1 यूरो प्रति शेयर के नकद ऑफर की घोषणा की है. RVNL को SJVN Thermal से करीब 903 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिला है. JSW Steel का अगस्त में कंसोलिडेटेड क्रूड स्टील उत्पादन सालाना आधार पर 3 फीसदी बढ़कर 24.65 लाख टन रहा. Lupin को अमेरिका में Modafinil Tablets की मंजूरी मिली है. Gland Pharma के प्रमोटर Fosun Pharma ने कंपनी में 4.5 फीसदी हिस्सेदारी करीब 2,121.5 करोड़ रुपये में बेची है. वहीं, Swiggy में BNP Paribas और Goldman Sachs ने मिलकर करीब 1,041 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे हैं. इसके अलावा Lemon Tree Hotels, Mazagon Dock Shipbuilders, Larsen & Toubro, TVS Holdings, Cohance Lifesciences, CARE Ratings और Tata Technologies से जुड़े अपडेट भी आज संबंधित शेयरों में हलचल बढ़ा सकते हैं.
बाजार की दिशा के लिए इन संकेतों पर नजर
कुल मिलाकर, शुक्रवार की मजबूत क्लोजिंग के बाद सोमवार को बाजार के सामने कई चुनौतियां हैं. एशियाई बाजारों की तेजी से कुछ सपोर्ट मिल सकता है, लेकिन GIFT Nifty में कमजोरी, अमेरिकी बाजारों की गिरावट और करीब 97 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा Brent Crude बाजार की धारणा पर दबाव डाल सकता है. निवेशकों की नजर आज वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिका-ईरान तनाव और कंपनियों से जुड़े कारोबारी अपडेट पर रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
आईसीआईसीआई बैंक ने 5 सितंबर को नियामकीय फाइलिंग के जरिए RBI की मंजूरी की जानकारी दी. इसके तहत LIC बैंक की चुकता शेयर पूंजी या वोटिंग अधिकारों में कुल मिलाकर 9.99 प्रतिशत तक हिस्सेदारी हासिल कर सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) को निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंक ICICI Bank में 9.99 प्रतिशत तक हिस्सेदारी खरीदने की मंजूरी दे दी है. इस मंजूरी के बाद देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी के पास बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए नियामकीय मंजूरी उपलब्ध हो गई है.
ICICI Bank ने 5 सितंबर को नियामकीय फाइलिंग के जरिए RBI की मंजूरी की जानकारी दी. इसके तहत LIC बैंक की चुकता शेयर पूंजी या वोटिंग अधिकारों में कुल मिलाकर 9.99 प्रतिशत तक हिस्सेदारी हासिल कर सकती है. हालांकि, इसके लिए उसे सभी लागू नियामकीय और वैधानिक नियमों का पालन करना होगा.
यह कदम ऐसे समय में आया है जब बड़े संस्थागत निवेशक भारत के वित्तीय सेवा क्षेत्र में अपना निवेश बढ़ा रहे हैं. वहीं, बैंकों में किसी एक निवेशक की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी की सीमा नियामकीय मंजूरियों के जरिए तय होती है.
बैंकिंग क्षेत्र में LIC का बढ़ेगा एक्सपोजर
RBI की मंजूरी से LIC को ICICI Bank में अपना निवेश बढ़ाने की अधिक गुंजाइश मिल गई है. हालांकि, मंजूरी का यह मतलब नहीं है कि LIC तुरंत अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 9.99 प्रतिशत कर देगी. LIC देश के सबसे बड़े संस्थागत निवेशकों में शामिल है और वित्तीय सेवा क्षेत्र में उसका पहले से बड़ा निवेश है. ICICI Bank में हिस्सेदारी बढ़ने से देश के प्रमुख निजी बैंकों में से एक के प्रति LIC का एक्सपोजर और बढ़ जाएगा. हिस्सेदारी खरीद से जुड़े लेनदेन में LIC को बैंकिंग, प्रतिभूति बाजार, विदेशी मुद्रा और अन्य लागू नियमों का पालन करना होगा. RBI की मंजूरी के साथ जुड़ी शर्तों का पालन करते हुए ही LIC अतिरिक्त हिस्सेदारी हासिल कर सकेगी.
एक साल के भीतर पूरी करनी होगी खरीद
RBI ने कहा है कि मंजूर की गई हिस्सेदारी खरीद की प्रक्रिया मंजूरी की तारीख से एक वर्ष के भीतर पूरी करनी होगी. नियामकीय खुलासे के अनुसार, यदि LIC निर्धारित अवधि के भीतर अधिग्रहण पूरा नहीं करती है, तो यह मंजूरी रद्द मानी जाएगी. केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि ICICI Bank में LIC की कुल हिस्सेदारी 9.99 प्रतिशत की स्वीकृत सीमा के भीतर ही रहनी चाहिए. यह मंजूरी LIC को बैंकिंग क्षेत्र में अतिरिक्त पूंजी लगाने की सुविधा देती है, जबकि निजी बैंकों में बड़ी हिस्सेदारी रखने से जुड़े नियामकीय सुरक्षा उपाय भी लागू रहेंगे.
ICICI Bank के लिए भी इस कदम से संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी मजबूत हो सकती है. हालांकि, LIC वास्तव में कितनी अतिरिक्त हिस्सेदारी खरीदेगी, यह उसके निवेश संबंधी फैसलों और बाजार की मौजूदा परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.