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आईसी‑814 का दूसरा हाइजैक: अनकही कहानी जो धुरंधर से छूट गई

विमान हवा में हाईजैक हुआ, लेकिन असली अपहरण जमीन पर हुआ, जहां एक प्रभावशाली व्यक्ति की मौजूदगी ने आईसी-814 संकट को अंतरराष्ट्रीय दबाव में बदल दिया और भारत के विकल्प सीमित कर दिए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

पलक शाह

दूसरा अपहरण

1999 में पूरी दुनिया ने देखा कि भारत ने कंधार में आईसी-814 के अपहरणकर्ताओं की मांग मान ली. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पर्दे के पीछे दो अन्य सरकारें भी इस संकट के प्रबंधन को प्रभावित कर रही थीं, एक अमेरिका और दूसरी स्विट्जरलैंड. दोनों के पास भारत के धन और नाजुक वित्तीय प्रणाली पर प्रभाव डालने की क्षमता थी.

आईसी-814 अपहरण की असली कहानी न तो केबिन में चल रही थी और न ही कॉकपिट में, जहां बंदूकधारी आतंकवादियों के दृश्य दिखाए जा रहे थे. इसकी शुरुआत स्विस विदेश मंत्रालय में यात्री सूची पर दर्ज एक नाम की पहचान से हुई, रॉबर्टो जियोरी, जो उस समय डी ला रू जियोरी के मालिक थे, एक ऐसी कंपनी जो उस दौर में दुनिया के अधिकांश मुद्रा-मुद्रण कारोबार को नियंत्रित करती थी. जियोरी काठमांडू से अपनी साथी क्रिस्टीना कैलाब्रेसी के साथ इस उड़ान में सवार हुए थे और इकोनॉमी क्लास में यात्रा कर रहे थे.

24 दिसंबर 1999 को जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट ने आपात बैठक की, तब तक स्विट्ज़रलैंड और अमेरिका दोनों ही बेचैन हो चुके थे. भारत अब पांच नकाबपोश लोगों से बातचीत नहीं कर रहा था. वह वैश्विक वित्त और राष्ट्रीय निर्भरता से बने एक अदृश्य शिकंजे के भीतर बातचीत कर रहा था.

यही आईसी-814 का असली अपहरण था, शांत, बिना खून-खराबे के, लेकिन निर्णायक.

स्विट्जरलैंड ने दबाया पैनिक बटन

आधी रात तक बर्न के संघीय विदेश मामलों के विभाग के भीतर एक विशेष संकट सेल सक्रिय हो चुका था. मंत्रालयों के बीच संदेश तेजी से भेजे जा रहे थे, जिनकी निगरानी खुद विदेश मंत्री जोसेफ डाइस कर रहे थे. आईसी-814 में चार स्विस नागरिक सवार थे, लेकिन बाद की रिपोर्टिंग और टिप्पणियों से स्पष्ट हुआ कि बर्न में जियोरी की मौजूदगी को विशेष रूप से संवेदनशील माना गया.

इस सेल ने सामान्य कांसुलर चैनलों को दरकिनार कर सीधे फेडरल काउंसिल को रिपोर्ट किया. निर्देश साफ थे. भारत के साथ रियल-टाइम संपर्क सुनिश्चित किया जाए, जियोरी की सुरक्षा की गारंटी दी जाए, और यदि आवश्यक हो, अपहरण क्षेत्र में एक प्रतिनिधि भेजा जाए.

26 दिसंबर को डाइस ने व्यक्तिगत रूप से भारत के विदेश मंत्री जसवंत सिंह को फोन किया. स्विस अनुरोध शिष्टाचार में लिपटा था, लेकिन उसमें व्यापारिक सटीकता की ठंडक थी. स्विस नागरिकों विशेषकर श्री जियोरी की सुरक्षा “हर संभव उपाय” से सुनिश्चित की जानी चाहिए.

कुछ दिनों बाद स्विट्जरलैंड ने एक बार फिर परंपरा तोड़ते हुए राजदूत हांस स्टाल्डर को सीधे कंधार, तालिबान के इलाके में भेज दिया. एक तटस्थ देश के लिए यह अकल्पनीय था और इसने उस सच्चाई को उजागर कर दिया, जिसे भारत पहले ही महसूस करने लगा था. काबुल में जो बंधक संकट दिख रहा था, उसे यूरोप में वित्तीय-सुरक्षा आपातकाल के रूप में देखा जा रहा था.

बर्न कोई राजनयिक नहीं भेज रहा था, वह वैश्विक मुद्रा में भरोसे की निरंतरता के लिए बीमा भेज रहा था.

जियोरी वैश्विक वित्त के सबसे ताकतवर लोगों में से एक थे, कोई बैंकर नहीं, बल्कि वह व्यक्ति जिसकी पारिवारिक कंपनी दुनिया की बैंकनोट श्रृंखला के शीर्ष के करीब थी. टाइम मैगज़ीन और अन्य रिपोर्टों में बताया गया कि डी ला रू जियोरी उस समय वैश्विक मुद्रा-मुद्रण कारोबार के लगभग 90 प्रतिशत को नियंत्रित करती थी. इसके विशेष प्रिंटिंग प्रेस, स्याही और वॉटरमार्क रुपये से लेकर डॉलर और फ्रैंक तक के बैंकनोट्स की विश्वसनीयता की नींव थे.

जब बर्न को यह खबर मिली कि जियोरी तालिबान के बंदूकधारियों से घिरे एक भारतीय विमान में बंधकों में शामिल हैं, तो यह अपहरण सिर्फ भारत की समस्या नहीं रहा. यह एक रणनीतिक आपातकाल बन गया, जिसकी लहरें दुनिया की मुद्रा संरचना तक फैल गईं.

दूसरा अपहरण आधिकारिक रूप से शुरू हो चुका था.

वॉशिंगटन ने खतरे को महसूस किया

जब बर्न और अन्य जगहों से खुफिया सारांश वॉशिंगटन पहुंचे, तो जियोरी की मौजूदगी को लेकर चिंता चुपचाप अमेरिकी व्यवस्था में फैल गई. विमान में कोई अमेरिकी नागरिक नहीं था, लेकिन डी ला रू से जुड़ी तकनीक और विशेषज्ञता पश्चिमी बैंकनोट सुरक्षा में गहराई से शामिल थी, जिसमें डॉलर से जुड़े पहलू भी थे. वित्तीय स्थिरता के नजरिये से सोचने वाले अधिकारियों के लिए, प्रेस में “दुनिया की अधिकांश मुद्रा छापने वाले व्यक्ति” के रूप में वर्णित एक आदमी की टीवी पर हत्या की संभावना ने नोट-प्रिंटिंग सप्लाई चेन में भरोसे को लेकर स्पष्ट सवाल खड़े कर दिए. कुछ वित्तीय-सुरक्षा विशेषज्ञों ने ऐसे परिदृश्य को संभावित “विश्वसनीयता झटका” बताया है, एक ऐसा क्षण जब भौतिक मुद्रा की अखंडता पर विश्वास डगमगा सकता था.

इतना काफी था. 48 घंटों के भीतर स्टेट डिपार्टमेंट ने नई दिल्ली के साथ एक सीधा बैक-चैनल खोला, “आर्थिक स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर गहरी चिंता” जताई और एक भारतीय वार्ताकार के अनुसार, अगर संकट नियंत्रण से बाहर गया तो “सहायक परिणामों” की ओर इशारा किया.

यह कूटनीति थी, लेकिन बिना कागज़ी कार्रवाई के दबाव की सीमा तक पहुंचती हुई. भारत ने संदेश समझ लिया. दुनिया का पैसा छापने वाले आदमी को अपने कार्यकाल में मरने मत दो.

घेरे में दिल्ली

साउथ ब्लॉक में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और जसवंत सिंह पहले ही नैतिक अस्वीकार और राजनीतिक अस्तित्व के बीच फंसे हुए थे. अपहरणकर्ताओं ने मसूद अजहर, उमर शेख और मुश्ताक जरगर की रिहाई की मांग की थी, ऐसे नाम जो पाकिस्तान के जिहादी ढांचे से जुड़े थे.

यह कहना गलत होगा कि आईसी-814 उड़ान में रॉबर्टो जियोरी की मौजूदगी ने गणना को प्रभावित नहीं किया. उनकी पहचान ने कूटनीति को तेज कर दिया, जो अन्यथा लंबी खिंच सकती थी. आईसी-814 के अंत की दिशा तय करने वाले संकुचित घंटों में, वैश्विक नकदी आपूर्ति श्रृंखला में एक व्यक्ति की भूमिका भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का एक चर बन गई.

हर बीतता घंटा बढ़ते जोखिम लेकर आ रहा था. एक बंधक की हत्या. टीवी पर तमाशा. एक वित्तीय भूकंप. हर कुछ घंटों में स्विस कॉल आते रहे, शिष्टाचार और सटीकता के बीच झूलते हुए. वॉशिंगटन की आवाज धीमी थी, लेकिन भारी “स्थिरता” की रक्षा होनी थी, “सुरक्षा निहितार्थों” को कम किया जाना था.

भारत के संकट समूह के भीतर एक सिहरन भरी तर्कशीलता प्रवेश करने लगी. कुछ अधिकारियों को बाद में लगा कि जियोरी जैसे व्यक्ति की रक्षा भारतीय जान बचाने के साथ-साथ एक अनकहे समीकरण का हिस्सा बन चुकी थी. उन्हें डर था कि किसी एक को खोने से विदेशी सद्भावना ढह सकती है और चुपचाप आर्थिक प्रतिशोध अनुबंध रद्द होना, तकनीकी ब्लैकलिस्ट, वित्तीय संदेह आ सकता है.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बाद में इसे कड़वाहट से समेटा. “यह राष्ट्रीय फैसला नहीं रहा, जिस पल हमें समझ आया कि हम असल में किसके लिए बातचीत कर रहे हैं.”

दबाव की कूटनीति

पांचवें दिन तक भारत की पीठ दीवार से लग चुकी थी. वाजपेयी की नैतिक मजबूती की छवि आवश्यकता के गठबंधन से टकरा रही थी. स्विस और अमेरिकी जल्दी समाधान चाहते थे. मानवीय भाषा कॉर्पोरेट और प्रणालीगत स्वार्थ को ढक रही थी. साउथ ब्लॉक के भीतर वाजपेयी के करीबी सहयोगियों को अपने करियर की सबसे कठोर गणना का सामना करना पड़ा. अपहरणकर्ताओं की मांगें स्पष्ट थीं. बाहरी दबाव आकारहीन था, लेकिन पूरी तरह वास्तविक.

जसवंत सिंह की टीम ने देखा कि हर घंटे के साथ उनकी पकड़ ढीली होती जा रही है. खुफिया रिपोर्टों ने चेतावनी दी कि तालिबान का धैर्य टूट रहा है. स्विट्ज़रलैंड का दूत शारीरिक रूप से कंधार हवाई अड्डे के कमांड रूम में मौजूद था, भारतीय वार्ताकारों के साथ-साथ चलता हुआ, बर्न और उससे आगे अपडेट भेजता हुआ.

हर कूटनीतिक फुसफुसाहट में वही संदेश था. इसे जल्दी खत्म करो. इसे खून में मत खत्म होने दो. जिन्हें कूटनीति का खेल समझ में नहीं आता, उन्हें यह अनुरोध लगता. किसी भी यथार्थवादी के लिए, यह निर्देश था. रनवे के एक तरफ तालिबान और भारतीय वार्ताकार खड़े थे. दूसरी तरफ मुट्ठी भर पश्चिमी राजनयिक, जिनकी मौजूदगी को कभी सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया.

राजदूत स्टाल्डर सैटेलाइट फोन के जरिए सीधे बर्न के साथ समन्वय कर रहे थे, अपने “रणनीतिक नागरिक” की सुरक्षा पर नजर रखते हुए. कैमरों से ओझल, अमेरिकी पर्यवेक्षक दिल्ली के संकट सेल्स से गुजरने वाले हर संदेश पर नजर रखे हुए थे. सभी अलग-अलग कारणों से समाधान चाहते थे.

इस तरह आधी रात के आत्मसमर्पण का मंच तैयार हुआ. 176 जिंदगियों के बदले तीन कैद आतंकवादी, जिनमें से एक उस व्यक्ति की जिंदगी थी जो दुनिया के भरोसे को छापने वाली मशीनों के पीछे था.

धुरंधर के नाट्य रूपांतरण में कंधार के रनवे पर एक क्षणिक लेकिन प्रभावशाली दृश्य है, भारत के जासूसी प्रमुख अजय सान्याल (अजीत डोभाल का एक पतला आवरण) जसवंत सिंह से अदला-बदली रोकने की गुहार लगाते हैं, अपनी टीम को अपहरणकर्ताओं का हौसला तोड़ने के लिए कुछ और घंटे देने को कहते हैं. सिंह मना कर देते हैं. सौदा हो जाता है.

खून में चुकाई गई कीमत

दुनिया ने धुंधले टीवी फुटेज में अपमान को घटित होते देखा जसवंत सिंह नकाबपोश बंदूकधारियों को आज़ादी की ओर ले जाते हुए. जो नहीं दिखा, वह उनके पीछे दबाव का अदृश्य नक्शा था. बर्न का संकट सेल क्रिसमस की रात जलता हुआ. वॉशिंगटन के विश्लेषक राहत की सांस लेते हुए जब जियोरी स्विस सैन्य जेट में सवार हुए. वाजपेयी की खामोशी, नैतिक वजन में तौली हुई. पश्चिमी राजधानियों में अदृश्य सुकून की सांस. बहुत कम लोगों ने उसे देखा.

कुछ ही महीनों में मसूद अजहर फिर उभरा और जैश-ए-मोहम्मद की स्थापना की, जो भारत के खिलाफ काम करने वाले पाकिस्तान समर्थित सबसे घातक समूहों में से एक बना. 2001 के संसद हमले से लेकर 2019 के पुलवामा तक, उसकी उंगलियों के निशान भारत के आधुनिक आतंक के घावों की श्रृंखला पर दर्ज हैं.

हर धमाका, हर खोई हुई जिंदगी, हर ताबूत, किसी न किसी हिस्से में उस दिसंबर की जबरन खामोशी तक वापस जाता है, जब एक बंधक संकट की गणना को दुनिया की मुद्रा प्रणाली को हिला देने के डर ने फिर से लिख दिया.

संप्रभुता का भ्रम

किसी दस्तावेज में कभी यह नहीं लिखा गया कि अमेरिका या स्विट्ज़रलैंड ने भारत को कार्रवाई का आदेश दिया. जरूरत भी नहीं थी. सत्ता ऐसे खुद को घोषित नहीं करती. वह निर्भरता के जरिए बहती है, विदेशों में एकाधिकार वाली तकनीकों के जरिए, भरोसे की वैश्विक श्रेणी के जरिए.

डी ला रू से जुड़ी तकनीकों का उपयोग दर्जनों केंद्रीय बैंक करते थे. बाद में भारत का रिजर्व बैंक भी उसी नेटवर्क से तत्व लेता रहा. उस संरचना ने विदेशी राज्यों को एक लीवर दिया, अनकहा, लेकिन समझा हुआ.

कंधार में हथियारबंद लोग बंदूकें थामे खड़े थे. वॉशिंगटन और बर्न में नौकरशाहों के पास कुछ और था, जो कहीं ज्यादा दुर्लभ था. बिना एक शब्द कहे किसी दूसरे राज्य की संप्रभुता से समझौता कराने की क्षमता.

जो दुनिया ने कभी नहीं देखा

आईसी-814 की हर पुनर्कथा केबिन के आतंक, पीड़ा और मानसिक टूटन को दिखाती है. लेकिन वह असली कहानी नहीं है. असली कहानी यह है कि कैसे एक तटस्थ देश और एक महाशक्ति ने स्थिरता और आर्थिक जोखिम का हवाला देकर, सबसे कमजोर क्षण में एक लोकतंत्र पर तीव्र लेकिन शांत दबाव डाला और एक ऐसे फैसले को आकार देने में मदद की जिसने दशकों तक भारत के सुरक्षा परिदृश्य को फिर से रेखांकित किया.

आईसी-814 सिर्फ एक अपहरण नहीं था, यह वैश्वीकरण की अंधेरी परत का स्ट्रेस टेस्ट था. इसने दिखाया कि कैसे पैसे की सर्किटरी राष्ट्रों की नियति तय कर सकती है, कैसे आर्थिक निर्भरता भू-राजनीतिक बाध्यता में बदल जाती है, और कैसे एक बैंकर की हत्या का डर दो महाद्वीपों को किसी तीसरे को झुकाने के लिए मजबूर कर सकता है.

अपहरणकर्ताओं को लगा कि उनके पास एक विमान है. लेकिन असल में उनके हाथ आधुनिक अर्थव्यवस्था की नर्वस सिस्टम थी.

और कंधार के उस रनवे पर भारत ने एक ऐसा सबक सीखा, जो आज भी उसकी कूटनीति का पीछा करता है. जब वैश्विक पूंजी आपके संकट में हिस्सेदार होती है, तो संप्रभुता किसी और की सुविधा की कीमत पर आती है.

दूसरे अपहरण की कीमत स्विस फ्रैंक या अमेरिकी डॉलर में नहीं चुकाई गई. यह भारतीय जिंदगियों में अदा की गई.

यही वह कहानी है जो दुनिया ने कभी नहीं सुनी.

यही वह है, जो धुरंधर चूक गया…

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और *The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.

19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)

 

 


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