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क्रिटिकल मिनरल मिशन से बदलेगा खेल, आयात से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा भारत

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2030 तक भारत में क्रिटिकल मिनरल्स की मांग में तेज बढ़ोतरी का अनुमान है. यह बढ़ोतरी इलेक्ट्रिक वाहनों, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा विनिर्माण के विस्तार से प्रेरित होगी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 6 months ago

भारतीय उद्योग परिसंघ (FICCI) ने डेलॉयट (Deloitte India) के सहयोग से एक नई रिपोर्ट जारी की है, जिसमें क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) के रणनीतिक महत्व को रेखांकित किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने में इन खनिजों की भूमिका बेहद अहम है. भारत जब 2030 तक 500 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, 30 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहन (EV) हिस्सेदारी और 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, तब लिथियम, निकेल, कोबाल्ट, ग्रेफाइट, तांबा और रेयर अर्थ एलिमेंट्स की उपलब्धता इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए केंद्रीय भूमिका निभाएगी.

भारत की मांग और आपूर्ति की स्थिति

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2030 तक भारत में क्रिटिकल मिनरल्स की मांग में तेज बढ़ोतरी का अनुमान है. यह बढ़ोतरी इलेक्ट्रिक वाहनों, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा विनिर्माण के विस्तार से प्रेरित होगी.

हालांकि, इन खनिजों के मामले में भारत की आयात निर्भरता काफी अधिक है. लिथियम, कोबाल्ट और निकेल के लिए 100 प्रतिशत आयात पर निर्भरता है. तांबे के लिए यह निर्भरता 90 प्रतिशत से अधिक है, जबकि प्राकृतिक ग्रेफाइट के लिए लगभग 60 प्रतिशत आयात पर निर्भरता बनी हुई है. भारी रेयर अर्थ एलिमेंट्स की उपलब्धता सीमित है और डाउनस्ट्रीम प्रोसेसिंग क्षमता भी बाधित है. भूवैज्ञानिक संभावनाओं के बावजूद, घरेलू उत्पादन और प्रसंस्करण क्षमता अनुमानित मांग को पूरा करने के लिए अभी पर्याप्त नहीं है.

विकास की बढ़ती खनिज-आधारित निर्भरता

डिकार्बोनाइजेशन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, बैटरी स्टोरेज और उन्नत विनिर्माण के चलते आर्थिक विकास अब अधिक खनिज-आधारित होता जा रहा है. वैश्विक स्तर पर लिथियम, ग्रेफाइट और निकेल की मांग में सबसे तेज वृद्धि देखी जा रही है, जिसका प्रमुख कारण ईवी और ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण का विस्तार है. यह प्रवृत्ति भारत के लिए अवसर भी है और चुनौती भी, क्योंकि बढ़ती मांग के साथ आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक होगा.

आपूर्ति श्रृंखला में एकाग्रता और जोखिम

रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक खनन कुछ चुनिंदा देशों में केंद्रित है, जबकि रिफाइनिंग और मिडस्ट्रीम प्रोसेसिंग और भी सीमित भौगोलिक क्षेत्रों में सिमटी हुई है. यह असंतुलन निर्यात नियंत्रण, भू-राजनीतिक जोखिम और कीमतों में अस्थिरता के खतरे को बढ़ाता है.

भारत के लिए मुख्य चुनौती मिडस्ट्रीम प्रोसेसिंग में है, खासकर बैटरी-ग्रेड केमिकल्स, मैग्नेट मटेरियल्स और उच्च-शुद्धता वाले रेयर अर्थ पृथक्करण में. व्यावसायिक स्तर की रिफाइनिंग क्षमता सीमित होने के कारण मूल्य संवर्धन का लाभ बाहर चला जाता है और बाहरी निर्भरता बनी रहती है.

रेयर अर्थ मिनरल्स का रणनीतिक महत्व

नियोडिमियम और प्रसीओडिमियम जैसे रेयर अर्थ एलिमेंट्स ईवी मोटर्स और पवन टरबाइन में उपयोग होने वाले स्थायी मैग्नेट के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. लगभग 80 प्रतिशत REE खपत स्थायी मैग्नेट से जुड़ी है. हालांकि भारत में REE के भंडार मौजूद हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर पृथक्करण, रिफाइनिंग और मैग्नेट निर्माण क्षमता सीमित है, जिससे आयात पर निर्भरता बढ़ती है.

आगे की राह

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि खनिजों की खोज में तेजी लाई जाए, घरेलू प्रसंस्करण हब का विस्तार किया जाए, विदेशों में रणनीतिक संपत्तियों का अधिग्रहण किया जाए और रीसाइक्लिंग को बढ़ावा दिया जाए. साथ ही मजबूत पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासनिक (ESG) मानकों को अपनाने की जरूरत है.

नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन के तहत केंद्रित और प्रभावी क्रियान्वयन से भारत आयात निर्भरता से आगे बढ़कर वैश्विक स्वच्छ प्रौद्योगिकी आपूर्ति श्रृंखलाओं में मजबूत और मूल्य-संवर्धित भागीदारी सुनिश्चित कर सकता है.
 


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