विदेशों में बसे भारतीयों के साथ-साथ विदेशी उपभोक्ताओं के बीच भी भारतीय आमों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. कई देशों में भारतीय आमों को प्रीमियम सीजनल फ्रूट के तौर पर देखा जा रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारतीय आमों की मिठास अब दुनिया भर के बाजारों में छा रही है. खाड़ी देशों से लेकर अमेरिका, यूरोप और सिंगापुर तक भारतीय आमों की मांग तेजी से बढ़ रही है. बेहतर लॉजिस्टिक्स, मजबूत कोल्ड-चेन नेटवर्क और प्रीमियम क्वालिटी के चलते भारत का आम निर्यात नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया है. खासतौर पर महाराष्ट्र का अल्फांसो आम अब भी विदेशी बाजारों में सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है.
भारतीय आमों की विदेशों में बढ़ी लोकप्रियता
भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत मानी जाती है. घरेलू खपत अधिक होने के बावजूद हाल के वर्षों में आम के निर्यात में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है. विदेशों में बसे भारतीयों के साथ-साथ विदेशी उपभोक्ताओं के बीच भी भारतीय आमों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. कई देशों में भारतीय आमों को प्रीमियम सीजनल फ्रूट के तौर पर देखा जा रहा है.
एक्सपोर्ट से हुई रिकॉर्ड कमाई
एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (APEDA) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब 29,938 मीट्रिक टन ताजे आमों का निर्यात किया. इससे देश को 470 करोड़ रुपये से अधिक का एक्सपोर्ट रेवेन्यू हासिल हुआ, जो भारतीय आमों की वैश्विक मांग में बढ़ोतरी को दर्शाता है.
सिंगापुर से ओमान तक भारतीय आमों की जबरदस्त मांग
कल यानी 25 मई को भारत में सिंगापुर उच्चायोग की ओर से किए गए एक सोशल मीडिया पोस्ट ने भारतीय आमों की लोकप्रियता को और चर्चा में ला दिया. पोस्ट में कहा गया कि सिंगापुर के सुपरमार्केट्स में भारतीय आम आते ही तेजी से बिक रहे हैं और अलग-अलग राज्यों के आमों को ग्राहक हाथों-हाथ खरीद रहे हैं.
Guys, #indianmango fever has landed in Singapore. Mangoes from all states of India are flying off the shelves. Thanks to @protosphinx for sharing the story with us. HC Wong#mango #mangoexport @AgriGoI #fruit pic.twitter.com/vQWkjR5jN4
— Singapore in India (@SGinIndia) May 25, 2026
वहीं, ओमान में भारत के दूतावास (मस्कट) ने एक्स पर पोस्ट करके बताया कि राजदूत जी.वी. श्रीनिवास ने कल मस्कट स्थित लुलु हाइपरमार्केट में आयोजित ‘मैंगो मेनिया’ फेस्टिवल के 23वें संस्करण का उद्घाटन किया. इस साल के वार्षिक आयोजन में भारत की 50 से अधिक प्रीमियम आम किस्मों के साथ दुनिया भर के चुनिंदा आम प्रदर्शित किए गए. ताजे फलों के अलावा फेस्टिवल में आम से बने ताजे और प्रोसेस्ड उत्पादों की भी बड़ी श्रृंखला पेश की गई। यह आयोजन भारत-ओमान के मजबूत कृषि और FMCG व्यापार साझेदारी का उत्सव माना जा रहा है.
HE @AmbGVSrinivas inaugurated the 23rd edition of the Mango Mania festival at Lulu Hypermarket in Muscat yesterday. This year, the annual event showcased over 50 premium mango varieties from India, alongside selections from across the globe. In addition to fresh fruit, the… pic.twitter.com/it7ijRisan
— India in Oman (Embassy of India, Muscat) (@Indemb_Muscat) May 25, 2026
UAE बना सबसे बड़ा खरीदार
खाड़ी देशों में भारतीय आमों की मांग सबसे ज्यादा बनी हुई है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भारतीय आमों का सबसे बड़ा आयातक बनकर उभरा है. APEDA के मुताबिक, केवल 2024 में भारत ने UAE को 12,000 मीट्रिक टन से अधिक आम निर्यात किए, जिनकी कीमत करीब 20 मिलियन डॉलर रही.
इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, कतर और कुवैत जैसे देशों में भी भारतीय आमों की मांग लगातार बढ़ रही है.
अल्फांसो का जलवा बरकरार
महाराष्ट्र का अल्फांसो आम अपनी खास खुशबू, स्वाद और मखमली बनावट के कारण अब भी विदेशी बाजारों में सबसे लोकप्रिय किस्म बना हुआ है. यही वजह है कि इसे 'आमों का राजा' कहा जाता है. हालांकि अब दूसरी भारतीय किस्मों की भी मांग बढ़ने लगी है. गुजरात का केसर, दक्षिण भारत का तोतापरी और उत्तर भारत के लंगड़ा व चौसा आम भी विदेशी उपभोक्ताओं को खूब पसंद आ रहे हैं.
GI टैग वाले आमों पर बढ़ा फोकस
भारत अब GI-टैग्ड प्रीमियम आमों की अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग पर भी जोर दे रहा है. जुलाई 2025 में अबू धाबी में आयोजित 'इंडियन मैंगो मेनिया 2025' कार्यक्रम के जरिए भारतीय प्रीमियम आमों को वैश्विक बाजार में प्रमोट किया गया. इस तरह के आयोजनों से भारतीय आमों की ब्रांड वैल्यू और पहचान दोनों मजबूत हो रही हैं.
आधुनिक हुआ एक्सपोर्ट सिस्टम
पिछले एक दशक में भारत का आम निर्यात इकोसिस्टम काफी बदल गया है. अब निर्यातक बेहतर पैकेजिंग, आधुनिक पकाने की सुविधाएं और पश्चिमी देशों के सख्त फाइटोसैनिटरी नियमों का पालन कर रहे हैं. कोल्ड-चेन और इरेडिएशन सुविधाओं में सुधार से भी एक्सपोर्ट को बड़ी मदद मिली है.
तेजी से बढ़ती मांग के बावजूद भारतीय आम निर्यातकों के सामने कई चुनौतियां मौजूद हैं. आम का सीमित सीजन, हवाई माल ढुलाई की ऊंची लागत और कुछ देशों के कड़े आयात नियम कारोबार को प्रभावित करते हैं. फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारतीय आमों की वैश्विक मांग और निर्यात दोनों में मजबूत बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने युगांडा और DRC में फैले इबोला प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति (PHEIC) घोषित किया है. इसके बाद भारत ने भी एहतियाती कदम तेज कर दिए हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इबोला वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने हवाई यात्रा से जुड़े नियम सख्त कर दिए हैं. नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने एयरलाइंस को निर्देश दिया है कि युगांडा और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) जैसे इबोला प्रभावित देशों से आने वाले या वहां से ट्रांजिट करने वाले सभी यात्रियों के लिए सेल्फ-डिक्लेरेशन फॉर्म भरना अनिवार्य होगा. सरकार का मकसद संभावित संक्रमण को समय रहते रोकना है.
उड़ान से पहले और बाद में होगी कड़ी निगरानी
DGCA ने एयरलाइंस को निर्देश दिया है कि विमान में यात्रा के दौरान विशेष स्वास्थ्य घोषणाएं की जाएं ताकि इबोला के संभावित मामलों की जल्दी पहचान हो सके. भारत पहुंचने पर यात्रियों और क्रू सदस्यों को सेल्फ-डिक्लेरेशन फॉर्म भरकर इमिग्रेशन या स्वास्थ्य अधिकारियों के पास जमा करना होगा. यह नियम सभी यात्रियों पर लागू होगा, चाहे उनकी राष्ट्रीयता कुछ भी हो.
WHO की चेतावनी के बाद बढ़ी सतर्कता
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने युगांडा और DRC में फैले इबोला प्रकोप को अंतरराष्ट्रीय चिंता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति (PHEIC) घोषित किया है. इसके बाद भारत ने भी एहतियाती कदम तेज कर दिए हैं. DGCA के 22 मई को जारी आदेश में दक्षिण सूडान समेत DRC और युगांडा से जुड़े क्षेत्रों को हाई-रिस्क जोन माना गया है.
इन लक्षणों पर तुरंत देनी होगी जानकारी
यात्रियों को निर्देश दिए गए हैं कि अगर उन्हें बुखार, कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, गले में खराश, उल्टी, त्वचा पर चकत्ते या रक्तस्राव जैसे लक्षण महसूस हों तो वे तुरंत विमान क्रू को सूचित करें. भारत पहुंचने के बाद भी ऐसे लक्षण दिखाई देने पर इमिग्रेशन और मेडिकल अधिकारियों को जानकारी देना जरूरी होगा.
21 दिनों तक स्वास्थ्य पर नजर रखने के निर्देश
DGCA ने एयरलाइंस से कहा है कि यात्रियों को जागरूक किया जाए कि भारत आने के 21 दिनों के भीतर इबोला जैसे लक्षण दिखने पर वे तुरंत निर्धारित अस्पतालों में जांच कराएं और एयरपोर्ट स्वास्थ्य अधिकारियों को सूचित करें.
एयरलाइंस और क्रू के लिए भी विशेष नियम
नई SOP के तहत इबोला प्रभावित क्षेत्रों में उड़ान भरने वाली एयरलाइंस को विमान में एक विशेष केबिन क्रू सदस्य नियुक्त करना होगा, जो केवल संदिग्ध मरीज की देखभाल करेगा. इसके अलावा विमान के लैंड होने के बाद पूरी तरह सैनिटाइजेशन अनिवार्य किया गया है. क्रू सदस्यों को संक्रमण रोकने और सार्वजनिक सुरक्षा उपायों को लेकर विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा.
संक्रमण रोकने पर सरकार का फोकस
सरकार का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के जरिए संक्रमण फैलने का खतरा अधिक रहता है. ऐसे में एयरपोर्ट स्क्रीनिंग, स्वास्थ्य निगरानी और एयरलाइंस प्रोटोकॉल को मजबूत बनाकर किसी भी संभावित खतरे को शुरुआती स्तर पर ही रोकने की कोशिश की जा रही है.
EOW के अनुसार, यह अनिल अंबानी समूह से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ दर्ज दूसरी एफआईआर है. इससे पहले मार्च 2026 में भी इसी तरह के आरोपों को लेकर मामला दर्ज किया गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अनिल धीरुभाई अंबानी ग्रुप (ADAG) से जुड़ी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं. मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने एक्सिस बैंक से जुड़े ₹150 करोड़ के कथित लोन फ्रॉड मामले में समूह की कंपनियों के तत्कालीन निदेशकों और अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. आरोप है कि बैंक से लिया गया लोन तय उद्देश्य के बजाय दूसरी कंपनियों में ट्रांसफर कर दिया गया और बाद में भुगतान में डिफॉल्ट किया गया.
एक्सिस बैंक की शिकायत पर दर्ज हुआ मामला
यह मामला एक्सिस बैंक के उपाध्यक्ष प्रकाश प्रभाकर राव की शिकायत पर मुंबई के कफ परेड पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया है. EOW के अनुसार, यह अनिल अंबानी समूह से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ दर्ज दूसरी एफआईआर है. इससे पहले मार्च 2026 में भी इसी तरह के आरोपों को लेकर मामला दर्ज किया गया था.
किन लोगों पर लगा आरोप?
एफआईआर में रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड (RHFL) के तत्कालीन पूर्णकालिक निदेशकों, ADAG समूह की लाभार्थी कंपनियों के पूर्व निदेशकों और संबंधित कंपनी अधिकारियों को आरोपी बनाया गया है. जांच एजेंसियों का आरोप है कि इन लोगों ने बैंक को गुमराह कर वित्तीय नुकसान पहुंचाने के लिए साजिश रची और फर्जी दस्तावेजों के जरिए लोन हासिल किया.
2010 से 2019 के बीच हुआ कथित घोटाला
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, यह पूरा मामला जनवरी 2010 से नवंबर 2019 के बीच का है. आरोप है कि कंपनियों ने RHFL की वित्तीय स्थिति को लेकर गलत और भ्रामक जानकारी दी ताकि बैंक से बड़ा लोन मंजूर कराया जा सके. जांच में यह भी सामने आया कि लोन की रकम मिलने के बाद उसे समूह से जुड़ी अन्य कंपनियों के खातों में डायवर्ट कर दिया गया.
फर्जी दस्तावेज और लोन डायवर्जन का आरोप
EOW के अनुसार, आरोपियों ने लोन स्वीकृत कराने के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज जमा किए और कंपनी की वित्तीय स्थिति को वास्तविकता से बेहतर दिखाया. इसके बाद लोन राशि का इस्तेमाल मूल उद्देश्य के बजाय अन्य संबद्ध कंपनियों में किया गया. बैंक का दावा है कि इससे उसे भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा.
मार्च में भी दर्ज हुआ था मामला
मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने 12 मार्च 2026 को भी इसी तरह के आरोपों के आधार पर ADAG से जुड़ी कंपनियों और उनके अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था. अब दूसरी एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच का दायरा और बढ़ सकता है.
जांच एजेंसियों की नजर में ADAG
हाल के वर्षों में अनिल अंबानी समूह की कई कंपनियां कर्ज, भुगतान डिफॉल्ट और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर जांच एजेंसियों के रडार पर रही हैं. ताजा मामला समूह की वित्तीय गतिविधियों पर बढ़ती निगरानी को दर्शाता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर की मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अब सिर्फ प्रयोग के स्तर पर नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर डिजिटल टेक्नोलॉजी को अपनाने लगी हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अब ऑटोमेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और स्मार्ट फैक्ट्री टेक्नोलॉजी में तेजी से निवेश बढ़ा रही हैं. बढ़ती लागत, श्रमिकों की कमी और साइबर खतरों के बीच कंपनियां डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए जरूरी मान रही हैं. यह जानकारी रॉकवेल ऑटोमेशन की नई रिपोर्ट में सामने आई है.
डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन अब मजबूरी
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर की मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अब सिर्फ प्रयोग के स्तर पर नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर डिजिटल टेक्नोलॉजी को अपनाने लगी हैं. सर्वे में शामिल 90 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि तेजी से बदलती टेक्नोलॉजी के दौर में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन जरूरी हो गया है. रिपोर्ट 17 बड़े मैन्युफैक्चरिंग देशों के 1,560 निर्णय लेने वाले अधिकारियों के जवाबों पर आधारित है, जिसमें भारत भी शामिल है.
बढ़ती लागत और साइबर खतरे बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले 12 महीनों में ऊर्जा लागत, साइबर सुरक्षा जोखिम और कुशल कर्मचारियों की कमी कंपनियों की ग्रोथ के सामने सबसे बड़ी बाधा बन सकती है. इन चुनौतियों का जिक्र 34 प्रतिशत प्रतिभागियों ने किया. वहीं 33 प्रतिशत कंपनियों ने महंगाई और आर्थिक अस्थिरता को बड़ा खतरा बताया. इसके अलावा सप्लाई चेन में रुकावट और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी चिंता का विषय बने हुए हैं.
भारत में स्मार्ट फैक्ट्री मॉडल को बढ़ावा
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, केमिकल और इंडस्ट्रियल गुड्स जैसे सेक्टर्स में उत्पादन बढ़ाने की कोशिश हो रही है. ऐसे में कंपनियां उत्पादकता बढ़ाने, लागत घटाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए स्मार्ट फैक्ट्री मॉडल की ओर तेजी से बढ़ रही हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियां अब केवल पायलट प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं हैं. लगातार दूसरे साल ऑपरेटिंग बजट का करीब एक-तिहाई हिस्सा इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी अपनाने पर खर्च किया जा रहा है. सिर्फ 18 प्रतिशत कंपनियां अभी शुरुआती परीक्षण चरण में हैं, जबकि 59 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी पहले से उनके ऑपरेशन में सक्रिय रूप से इस्तेमाल हो रही है.
AI बना सबसे बड़ा गेमचेंजर
रिपोर्ट में AI और मशीन लर्निंग को सबसे प्रभावी टेक्नोलॉजी बताया गया है. करीब 48 प्रतिशत प्रतिभागियों ने AI और मशीन लर्निंग को बिजनेस रिजल्ट सुधारने वाला सबसे बड़ा कारक माना. रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल 34 प्रतिशत औद्योगिक ऑपरेशन AI आधारित सिस्टम से जुड़े हुए हैं और 2030 तक यह आंकड़ा बढ़कर 54 प्रतिशत तक पहुंच सकता है.
कंपनियों का कहना है कि AI का इस्तेमाल क्वालिटी सुधारने, साइबर सुरक्षा मजबूत करने और उत्पादन प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने में तेजी से बढ़ रहा है.
क्वालिटी और लागत पर सबसे ज्यादा फोकस
भारतीय कंपनियां घरेलू और निर्यात बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए डिजिटल निवेश को सीधे बिजनेस लक्ष्यों से जोड़ रही हैं. सर्वे में 46 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि उनका सबसे बड़ा लक्ष्य उत्पाद की गुणवत्ता सुधारना है. वहीं 40 प्रतिशत कंपनियां लागत कम करने और 36 प्रतिशत जोखिम घटाने पर फोकस कर रही हैं.
डेटा का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पा रहीं कंपनियां
हालांकि रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कंपनियां डिजिटल निवेश का पूरा फायदा नहीं उठा पा रही हैं. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जुटाए गए डेटा का सिर्फ 43 प्रतिशत हिस्सा ही प्रभावी तरीके से इस्तेमाल हो रहा है. कई कंपनियों को अलग-अलग सिस्टम से आने वाले डेटा को जोड़ने और उसका सही विश्लेषण करने में दिक्कत हो रही है.
साइबर हमलों का खतरा बढ़ा
डिजिटल फैक्ट्रियों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर सुरक्षा भी बड़ी चिंता बनती जा रही है. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक साल में 46 प्रतिशत मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां किसी न किसी साइबर हमले का शिकार हुईं. सबसे ज्यादा खतरा IT सिस्टम, एंटरप्राइज नेटवर्क और IT तथा ऑपरेशनल टेक्नोलॉजी के इंटीग्रेशन पॉइंट्स पर देखा गया.
कर्मचारियों के कौशल में बदलाव
ऑटोमेशन और AI बढ़ने के साथ कंपनियां कर्मचारियों के कौशल को भी नया रूप दे रही हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि 40 प्रतिशत कंपनियों ने पिछले एक साल में कर्मचारियों को नई तकनीक के अनुसार ट्रेनिंग दी या री-स्किल किया. वहीं, 93 प्रतिशत कंपनियों का मानना है कि स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग आने वाले वर्षों में वर्कफोर्स स्ट्रक्चर को पूरी तरह बदल देगी.
इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन में सबसे बड़ा हिस्सा ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर का रहा. इस सेक्टर में कुल 1,459 परियोजनाएं चल रही हैं, जिनकी संशोधित लागत ₹23.34 लाख करोड़ आंकी गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देशभर में चल रहे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की लागत लगातार बढ़ती जा रही है. सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की ताजा फ्लैश रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2026 तक 150 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाले केंद्रीय क्षेत्र के प्रोजेक्ट्स में कुल ₹5.65 लाख करोड़ का कॉस्ट ओवररन दर्ज किया गया है.
1,981 परियोजनाओं की लागत अनुमान से कहीं ज्यादा
रिपोर्ट के अनुसार, देश में 17 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों के तहत कुल 1,981 इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की निगरानी की जा रही है. इन परियोजनाओं की शुरुआती अनुमानित लागत ₹37,12,662 करोड़ थी, जो अब बढ़कर ₹42,78,402 करोड़ हो गई है. अब तक इन प्रोजेक्ट्स पर करीब ₹20.36 लाख करोड़ खर्च किए जा चुके हैं, जो संशोधित लागत का लगभग 47.59 प्रतिशत है. मंत्रालय का कहना है कि परियोजनाओं पर काम लगातार जारी है और कई प्रोजेक्ट्स तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.
40% प्रोजेक्ट्स में 80% से ज्यादा काम पूरा
MoSPI के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 801 परियोजनाओं यानी 40 प्रतिशत प्रोजेक्ट्स में 80 प्रतिशत से अधिक फिजिकल प्रोग्रेस दर्ज की गई है. वहीं 277 परियोजनाएं ऐसी हैं, जिनमें 80 प्रतिशत से ज्यादा वित्तीय कार्य पूरा हो चुका है.
ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर सबसे आगे
इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन में सबसे बड़ा हिस्सा ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर का रहा. इस सेक्टर में कुल 1,459 परियोजनाएं चल रही हैं, जिनकी संशोधित लागत ₹23.34 लाख करोड़ आंकी गई है. इन परियोजनाओं में सड़क, रेलवे, एविएशन, शिपिंग और शहरी परिवहन से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं. इससे साफ है कि सरकार परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने पर लगातार फोकस कर रही है.
ऊर्जा क्षेत्र में भी भारी निवेश
ऊर्जा क्षेत्र दूसरे स्थान पर रहा, जहां 221 परियोजनाओं पर काम चल रहा है. इनकी कुल संशोधित लागत ₹11.30 लाख करोड़ पहुंच गई है. इन प्रोजेक्ट्स में तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और एनर्जी स्टोरेज से जुड़े कार्य शामिल हैं.
सड़क परिवहन मंत्रालय के पास सबसे ज्यादा प्रोजेक्ट
मंत्रालयवार आंकड़ों में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय सबसे आगे रहा. इसके तहत 1,137 परियोजनाएं चल रही हैं, जो कुल प्रोजेक्ट्स का 57 प्रतिशत हिस्सा हैं. इनकी संशोधित लागत ₹10.81 लाख करोड़ बताई गई है. वहीं, रेलवे मंत्रालय 260 परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जिनकी संशोधित लागत ₹8.69 लाख करोड़ है. इसके अलावा कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, बिजली, आवास एवं शहरी मामलों और जल संसाधन मंत्रालयों की भी बड़ी हिस्सेदारी रही.
मंगलवार 26 मई की सुबह 6 बजे से नई कीमतें लागू हो गई हैं. ताजा बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में CNG की कीमत 81.09 रुपये से बढ़कर 83.09 रुपये प्रति किलो हो गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक ऊर्जा कीमतों में लगातार उछाल का असर अब आम लोगों की जेब पर साफ दिखाई देने लगा है. राजधानी दिल्ली समेत कई शहरों में एक बार फिर CNG महंगी कर दी गई है. पिछले 15 दिनों में चौथी बार हुई इस बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में CNG की कीमत 83 रुपये प्रति किलो के पार पहुंच गई है. पेट्रोल-डीजल के बाद अब CNG के दाम बढ़ने से ऑटो, टैक्सी और निजी वाहन चलाने वालों का खर्च और बढ़ सकता है.
दिल्ली में CNG के दाम फिर बढ़े
मंगलवार 26 मई की सुबह 6 बजे से नई कीमतें लागू हो गई हैं. ताजा बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में CNG की कीमत 81.09 रुपये से बढ़कर 83.09 रुपये प्रति किलो हो गई है. इससे पहले 23 मई को 1 रुपये और 15 मई को 2 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी की गई थी. यानी मई महीने में अब तक CNG कुल 6 रुपये प्रति किलो महंगी हो चुकी है.
NCR और मुंबई में भी बढ़े दाम
दिल्ली-एनसीआर के कई शहरों में भी CNG के रेट बढ़ाए गए हैं. नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में अब CNG 88.70 रुपये प्रति किलो मिल रही है. वहीं मुंबई में इसकी कीमत बढ़कर 84 रुपये प्रति किलो पहुंच गई है.
आम लोगों की जेब पर बढ़ेगा असर
CNG महंगी होने का सीधा असर ऑटो, टैक्सी और निजी वाहनों के खर्च पर पड़ेगा. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में किराए और ट्रांसपोर्ट लागत भी बढ़ सकती है, जिससे आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.
पेट्रोल-डीजल भी लगातार हो रहे महंगे
इससे पहले सोमवार को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिली थी. सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल 2.61 रुपये और डीजल 2.71 रुपये प्रति लीटर महंगा कर दिया था. इसके बाद दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है.
सबसे अहम बात यह है कि बीते दो हफ्तों से भी कम समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में यह चौथी बढ़ोतरी रही है. 15 मई से अब तक दोनों ईंधनों के दाम करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ चुके हैं.
नए फ्रेमवर्क के तहत बाजार में इंट्राडे मूवमेंट के दौरान जरूरत पड़ने पर तुरंत नए स्ट्राइक प्राइस जोड़े जा सकेंगे. इससे ट्रेडर्स को तेजी से बदलते बाजार में भी बेहतर ट्रेडिंग और रिस्क मैनेजमेंट का विकल्प मिलेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में बढ़ती अस्थिरता और तेज उतार-चढ़ाव के बीच बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (SEBI) ने ऑप्शंस ट्रेडिंग को ज्यादा व्यवस्थित और सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सेबी ने नए स्ट्राइक प्राइस फ्रेमवर्क का प्रस्ताव दिया है, जिसका मकसद ट्रेडर्स को हर परिस्थिति में बेहतर हेजिंग विकल्प उपलब्ध कराना और ब्रोकर्स पर तकनीकी दबाव कम करना है. इस प्रस्ताव के लागू होने से इक्विटी, कमोडिटी और करंसी ऑप्शंस सेगमेंट में ट्रेडिंग अनुभव पहले से ज्यादा आसान और व्यवस्थित हो सकता है.
क्या है SEBI का नया प्रस्ताव?
सेबी ने ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए स्ट्राइक प्राइस तय करने और उन्हें लगातार मैनेज करने के लिए नया फ्रेमवर्क प्रस्तावित किया है. इसके तहत बाजार में ‘इन-द-मनी’ और ‘आउट-ऑफ-द-मनी’ कॉन्ट्रैक्ट्स की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी.
इसके अलावा मौजूदा बाजार कीमतों के आसपास उपलब्ध स्ट्राइक प्राइस की रोजाना समीक्षा की जाएगी, ताकि ट्रेडर्स को हर समय जरूरी ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट्स मिल सकें. वहीं बाजार स्तर से काफी दूर चले गए स्ट्राइक प्राइस को समय-समय पर हटाने का भी प्रावधान होगा.
बड़े उतार-चढ़ाव में ट्रेडर्स को कैसे मिलेगा फायदा?
सेबी के मुताबिक कई बार बाजार में अचानक तेज उतार-चढ़ाव के कारण कीमतें उपलब्ध स्ट्राइक प्राइस की सीमा से बाहर चली जाती हैं. ऐसी स्थिति में ट्रेडर्स के पास हेजिंग या नई पोजीशन लेने के लिए सही ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध नहीं रहते.
नए फ्रेमवर्क के तहत बाजार में इंट्राडे मूवमेंट के दौरान जरूरत पड़ने पर तुरंत नए स्ट्राइक प्राइस जोड़े जा सकेंगे. इससे ट्रेडर्स को तेजी से बदलते बाजार में भी बेहतर ट्रेडिंग और रिस्क मैनेजमेंट का विकल्प मिलेगा.
ब्रोकर्स और ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म को भी राहत
सेबी ने माना कि स्ट्राइक प्राइस में बार-बार बदलाव होने पर ब्रोकर्स और ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स को लगातार सिस्टम अपडेट करने पड़ते हैं, जिससे तकनीकी खर्च बढ़ जाता है. नए प्रस्ताव में इस बात का ध्यान रखा गया है कि इंट्राडे बदलावों के दौरान ब्रोकर्स के सिस्टम में बड़े तकनीकी बदलाव की जरूरत न पड़े. इससे ऑपरेशनल बोझ और लागत दोनों कम हो सकती हैं.
फिलहाल कैसे काम करता है सिस्टम?
अभी लंबी अवधि के इंडेक्स ऑप्शंस के लिए ही सीमित नियामकीय ढांचा मौजूद है. अलग-अलग स्टॉक एक्सचेंज अपने हिसाब से स्ट्राइक इंटरवल मैनेज करते हैं. स्ट्राइक प्राइस वह कीमत होती है, जिस पर ऑप्शंस ट्रेडर को किसी सिक्योरिटी को खरीदने या बेचने का अधिकार मिलता है. वहीं स्ट्राइक इंटरवल दो स्ट्राइक प्राइस के बीच का अंतर होता है, जिसे बाजार में लिक्विडिटी और प्रोडक्ट उपलब्धता के संतुलन के हिसाब से तय किया जाता है.
Nifty ऑप्शंस में अभी क्या स्थिति है?
उद्योग के जानकारों के मुताबिक मौजूदा स्ट्राइक प्राइस सिस्टम बाजार के बड़े उतार-चढ़ाव को काफी हद तक कवर करता है. उदाहरण के तौर पर NSE Nifty 50 ऑप्शंस सीरीज में 26 मई एक्सपायरी के लिए 20,100 से 27,250 तक कुल 144 स्ट्राइक प्राइस उपलब्ध हैं, जबकि निफ्टी का हालिया बंद स्तर करीब 24,032 था.
हालांकि ट्रेडिंग गतिविधियां मुख्य रूप से ‘एट-द-मनी’ और ‘नियर आउट-ऑफ-द-मनी’ कॉन्ट्रैक्ट्स के आसपास ही केंद्रित रहती हैं. सबसे ज्यादा पुट ओपन इंटरेस्ट 24,000 स्ट्राइक के पास देखा गया, जबकि कॉल साइड पर 24,500 और 25,000 स्ट्राइक पर ज्यादा गतिविधि रही.
सभी ऑप्शन सेगमेंट पर लागू होगा फ्रेमवर्क
सेबी का प्रस्तावित फ्रेमवर्क इक्विटी, करंसी और कमोडिटी समेत सभी ऑप्शन सेगमेंट पर लागू होगा. बाजार में लिक्विडिटी और भागीदारी के स्तर के हिसाब से अलग-अलग कैटेगरी में नियम और फॉर्मूले अलग हो सकते हैं. सेबी ने इस प्रस्ताव पर 15 जून तक बाजार प्रतिभागियों और आम लोगों से सुझाव मांगे हैं.
मंगलवार को BSE सेंसेक्स 1073.61 अंक चढ़कर 76,488.96 पर बंद हुआ था. वहीं NSE निफ्टी 312.40 अंक की बढ़त के साथ 24,031.70 के स्तर पर पहुंच गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में जोरदार रैली देखने को मिली थी. सेंसेक्स 1000 अंकों से ज्यादा उछलकर बंद हुआ, जबकि निफ्टी ने भी 24,000 का अहम स्तर पार किया था. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, अमेरिका-ईरान तनाव कम होने की उम्मीद और मजबूत ग्लोबल संकेतों ने बाजार में खरीदारी को बढ़ावा दिया. अब निवेशकों की नजर 26 मई के कारोबार पर है, जहां तिमाही नतीजे, बड़े कॉर्पोरेट अपडेट्स और ग्लोबल ट्रिगर्स बाजार की दिशा तय कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं आज कौन से शेयर फोकस में रहने वाले हैं.
25 मई को सेंसेक्स-निफ्टी में आई थी बड़ी तेजी
सोमवार को कारोबार शुरू होते ही बाजार में खरीदारी का माहौल बन गया था. दिनभर तेजी कायम रही और अंत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 1073.61 अंक चढ़कर 76,488.96 पर बंद हुआ था. वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 312.40 अंक की बढ़त के साथ 24,031.70 के स्तर पर पहुंच गया था. बाजार में आई इस तेजी से बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप बढ़कर करीब 469 लाख करोड़ रुपये हो गया था. निवेशकों को एक ही दिन में लगभग 6 लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ था.
कच्चे तेल में गिरावट से बाजार को मिली राहत
शेयर बाजार की इस तेजी का सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई बड़ी गिरावट रही थी. 25 मई को सुबह ब्रेंट क्रूड और WTI क्रूड करीब 5 से 6 प्रतिशत तक टूट गए थे. कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड करीब 97.78 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी WTI क्रूड 91.19 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा था. भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में तेल की कीमतों में नरमी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है.
बाजार में तेजी के 5 बड़े कारण
1. अमेरिका-ईरान शांति समझौते की उम्मीद: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए थे कि अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने को लेकर समझौते पर काफी हद तक बातचीत हो चुकी है. इस खबर से वैश्विक बाजारों में सकारात्मक माहौल बना था.
2. ग्लोबल मार्केट्स में शानदार रैली: एशियाई और अमेरिकी बाजारों में भी जोरदार तेजी देखने को मिली थी. जापान का निक्केई इंडेक्स 3 प्रतिशत से ज्यादा उछलकर पहली बार 65,000 के पार पहुंच गया था. वहीं चीन और ताइवान के बाजारों में भी मजबूत खरीदारी देखने को मिली थी. अमेरिकी फ्यूचर्स बाजार में मजबूती ने भी भारतीय निवेशकों का भरोसा बढ़ाया था.
3. रुपये में मजबूती: पिछले सप्ताह रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने के बाद भारतीय रुपया 25 मई को डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ था. रुपया करीब 0.37 प्रतिशत की मजबूती के साथ 95.34 प्रति डॉलर पर खुला था. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और RBI के हस्तक्षेप से रुपये को सहारा मिला था, जिससे विदेशी निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ.
4. बॉन्ड यील्ड में नरमी: अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में गिरावट आने से निवेशकों का रुझान फिर शेयर बाजार की ओर बढ़ा था. 10 साल की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड घटकर 4.558 प्रतिशत पर आ गई थी. विशेषज्ञों के मुताबिक बॉन्ड यील्ड कम होने पर इक्विटी बाजार निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक बन जाता है.
5. घरेलू निवेशकों की मजबूत खरीदारी: घरेलू निवेशकों ने बाजार में लगातार खरीदारी जारी रखी थी, जिससे बाजार को मजबूत सपोर्ट मिला. बैंकिंग, आईटी, ऑटो और मेटल शेयरों में जोरदार खरीदारी देखने को मिली थी.
FIIs की बिकवाली अब भी चिंता
हालांकि बाजार में तेजी रही, लेकिन विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली चिंता का विषय बनी हुई है. जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजिस्ट V. K. Vijayakumar के मुताबिक 23 मई तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की कुल बिकवाली 2.22 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच चुकी थी. यह आंकड़ा पूरे साल 2025 की कुल बिकवाली से भी अधिक है.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी बनी रहती है और वैश्विक तनाव कम होता है, तो भारतीय बाजार में तेजी का सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है. हालांकि विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता अब भी बाजार के लिए बड़े जोखिम बने हुए हैं. मंगलवार के कारोबार में कई बड़े शेयर फोकस में रहने वाले हैं. ONGC, Siemens, IRCTC और Bharat Electronics जैसी कंपनियों के तिमाही नतीजों पर निवेशकों की नजर रहेगी, वहीं Venus Pipes, Marksans Pharma, Morepen Labs, Gujarat Gas, Senco Gold, Timex Group India और Procter & Gamble Health समेत कई कंपनियां भी अपने Q4 रिजल्ट जारी करेंगी. City Union Bank ने 1:3 बोनस शेयर के लिए 12 जून को रिकॉर्ड डेट तय की है, जबकि Bharat Electronics को 608 करोड़ रुपये के नए ऑर्डर मिले हैं. Lemon Tree Hotels ने तमिलनाडु के कुंभकोणम में नया होटल साइन किया है. LG Electronics को महाराष्ट्र सरकार से 882 करोड़ रुपये तक के इंसेंटिव पैकेज का फायदा मिल सकता है. Voltas ने डिविडेंड के लिए 12 जून रिकॉर्ड डेट घोषित की है. वहीं NLC India और NPCIL ने न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट्स के लिए जॉइंट वेंचर बनाने का फैसला किया है. Raymond ने प्रेफरेंशियल इश्यू के जरिए 330 करोड़ रुपये जुटाने की मंजूरी दी है, जबकि Paytm Europe में 9 मिलियन यूरो का अतिरिक्त निवेश करेगी. दूसरी ओर JSW Energy ने QIP के जरिए 4,000 करोड़ रुपये जुटाए हैं, जिसमें SBI Equity Hybrid Fund और GQG Partners जैसे बड़े निवेशकों ने हिस्सा लिया है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने दुनिया के सबसे बड़े डेरिवेटिव एक्सचेंज को रेगुलेट करने के लिए एक और करियर ब्यूरोक्रेट को नियुक्त किया है. जबकि एल्गोरिदम माइक्रोसेकंड में ट्रेड कर रहे हैं. यह इस बात पर गहरे सवाल उठाता है कि क्या भारत की मार्केट संस्थाएं विशेष बाजार विशेषज्ञता की बजाय प्रशासनिक निरंतरता को प्राथमिकता दे रही हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
जब नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने इस महीने संजय शौरी को रेगुलेशन, कंप्लायंस, रिस्क मैनेजमेंट और निवेशक शिकायतों की निगरानी के लिए एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नियुक्त करने की घोषणा की, तब प्रेस रिलीज में “गवर्नेंस” शब्द का सात बार इस्तेमाल हुआ. लेकिन “मार्केट्स” शब्द एक बार भी नहीं आया. यह अनुपस्थिति अपने आप में बहुत कुछ कहती है.
जब भारत के बाजार क्वांटम स्तर की तकनीक की ओर बढ़ रहे हैं, तब देश का सबसे शक्तिशाली एक्सचेंज अब भी सिर्फ वार्षिक अनुपालन रिपोर्ट (ACRs) भरने में उलझा हुआ दिखता है.
वित्तीय बाजार अब केवल मानवीय समझ और बैलेंस शीट गणित से नहीं चलते. अब उन्हें एल्गोरिदमिक एक्जीक्यूशन इंजन, हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग सिस्टम, एक्सपायरी-डे ऑप्शंस स्ट्रक्चर और मशीन आधारित रणनीतियां आकार दे रही हैं, जो इतनी तेज गति से काम करती हैं कि अधिकांश नीति निर्माता उसे समझ भी नहीं सकते.
ऐसे माहौल में निगरानी केवल एक रेगुलेटरी कार्य नहीं रह गई है. यह एक तकनीकी अनुशासन बन चुका है. निगरानी के लिए सिर्फ प्रशासनिक अधिकार नहीं, बल्कि इस बात की गहरी समझ भी चाहिए कि आधुनिक बाजार कैसे व्यवहार करते हैं, जब पूंजी, लीवरेज, तकनीक और इंसेंटिव मिलीसेकंड में टकराते हैं.
फिर भी भारत की वित्तीय संस्थाओं में एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है. सिस्टम बार-बार बाजार विशेषज्ञों की बजाय प्रशासनिक ढांचे की ओर लौटता है, ऐसे ब्यूरोक्रेट्स और बाबुओं की ओर, जो रिटायरमेंट के बाद भी शानदार पदों की तलाश में रहते हैं.
क्षमता से ज्यादा आराम को प्राथमिकता: खुदरा निवेशकों के पैसे के लिए असली खतरा
शौरी की नियुक्ति इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उनके पास योग्यता की कमी है. भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के मानकों के अनुसार उनका अनुभव बेहद मजबूत है. उन्होंने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में वरिष्ठ कानूनी और प्रशासनिक भूमिकाएं निभाई हैं, कई मंत्रालयों में काम किया है और दशकों तक सरकारी ढांचे के भीतर रहे हैं.
लेकिन असली मुद्दा यही है. भारत की सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थाएं अब विशेषज्ञ बाजार पारिस्थितिकी तंत्र की बजाय प्रशासनिक राज्य के विस्तार की तरह संचालित होती दिखाई देती हैं.
इस पद के साथ जुड़ा लगभग 5 करोड़ रुपये वार्षिक वेतन इस प्रतीकवाद को और गहरा करता है. देश की सबसे उन्नत मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाएं अब रिटायर्ड या ट्रांजिशन कर रहे रेगुलेटर्स और ब्यूरोक्रेट्स के लिए बेहद आरामदायक ठिकाने बन चुकी हैं.
नियुक्तियां औपचारिक रूप से मंजूर होती हैं, प्रक्रियागत रूप से वैध होती हैं और संस्थागत रूप से बचाव भी किया जाता है. लेकिन समय के साथ यह पैटर्न खुद बड़े सवाल खड़े करने लगता है.
यह सवाल आज नहीं उठे
ये सवाल शौरी की नियुक्ति से शुरू नहीं हुए. वे पिछले दो दशकों से धीरे-धीरे बनते रहे हैं.
को-लोकेशन घोटाले के सार्वजनिक होने से बहुत पहले और आनंद सुब्रमणियन प्रकरण के NSE को गवर्नेंस विफलता के केस स्टडी में बदलने से भी पहले, भारत के एक्सचेंज एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र में बदल चुके थे, जहां पूर्व रेगुलेटर्स, ब्यूरोक्रेट्स, नीति निर्माता और प्रशासक लगातार एक ही संस्थागत गलियारों में घूमते रहे.
2013 में RBI की डिप्टी गवर्नर पद से रिटायर होने के सात महीने बाद श्यामला गोपीनाथ NSE बोर्ड में शामिल हुईं. तकनीकी रूप से इसमें कुछ गलत नहीं था. उस समय ऐसा कोई नियम नहीं था जो इसे रोकता.
लेकिन इस नियुक्ति ने वित्तीय जगत में गंभीर बहस छेड़ दी. क्योंकि गोपीनाथ सिर्फ वरिष्ठ केंद्रीय बैंकर नहीं थीं. RBI डिप्टी गवर्नर के रूप में वह SEBI बोर्ड में RBI की प्रतिनिधि भी थीं, यानी उन्हीं एक्सचेंजों की निगरानी व्यवस्था का हिस्सा, जिनकी बाद में बोर्ड सदस्य बनीं.
तब समर्थकों ने कहा कि RBI सीधे स्टॉक एक्सचेंजों का रेगुलेटर नहीं है और विशेषज्ञता को रिटायरमेंट के बाद संस्थाओं से दूर नहीं रखा जाना चाहिए.
आलोचकों ने एक असहज सवाल उठाया: अगर रेगुलेटर्स को पता हो कि सार्वजनिक पद छोड़ने के तुरंत बाद एक्सचेंज बोर्ड में आकर्षक पद मिल जाएंगे, तो क्या सख्त निगरानी के लिए जरूरी संस्थागत दूरी पहले ही कमजोर नहीं पड़ने लगती?
उस बहस का कभी समाधान नहीं हुआ. सिस्टम ने उसे आत्मसात किया और आगे बढ़ गया.
धीरे-धीरे गहराता गया नेटवर्क
समय के साथ यह पैटर्न और गहरा होता गया.
पूर्व वित्त सचिव, पूर्व SEBI अधिकारी, पूर्व RBI अधिकारी और रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स लगातार एक्सचेंजों, डिपॉजिटरीज और मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं के बोर्ड में आते रहे.
कुछ कूलिंग-ऑफ अवधि के बाद आए, कुछ लगभग तुरंत. हर नियुक्ति व्यक्तिगत रूप से सही ठहराई जा सकती थी. लेकिन सामूहिक रूप से उन्होंने एक ऐसा रेगुलेटरी इकोसिस्टम बना दिया, जिसमें निगरानी और संस्थागत निर्माण की सीमाएं धुंधली होती गईं.
मुद्दा कभी वैधता का नहीं था. मुद्दा केंद्रीकरण का था.
और इसके परिणाम सबसे स्पष्ट रूप से NSE में दिखाई दिए.
आनंद सुब्रमणियन मामला अपवाद नहीं, संस्कृति था
आनंद सुब्रमणियन प्रकरण को अक्सर उसके अजीब पहलुओं “हिमालयी योगी”, ईमेल्स और विचित्र आंतरिक शक्ति संरचनाओं के लिए याद किया जाता है.
लेकिन असली संस्थागत सबक कहीं और था.
इस घोटाले ने दिखाया कि भारत का सबसे शक्तिशाली एक्सचेंज वास्तविक निगरानी से कितना सुरक्षित हो चुका था. असामान्य नियुक्तियां सामान्य बना दी गई थीं. वेतन संरचनाओं पर सवाल नहीं उठे. संस्थागत प्रतिष्ठा की ढाल के पीछे गवर्नेंस प्रक्रियाएं धीरे-धीरे कमजोर होती गईं.
समस्या सिर्फ एक व्यक्ति या एक प्रबंधन टीम की नहीं थी. समस्या उस संस्कृति की थी, जहां शक्ति के करीब होना, प्रशासनिक परिचय और आंतरिक नेटवर्क, पारदर्शी प्रक्रियाओं और विशेषज्ञ क्षमता से ज्यादा प्रभावशाली दिखाई देते थे.
खुद को खुद ही रेगुलेट करने वाला सिस्टम
आज NSE का बोर्ड एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था के भारी प्रभाव को दर्शाता है. इसके चेयरपर्सन श्रीनिवास इनजेती एक अनुभवी ब्यूरोक्रेट हैं, जिनके पास वित्त, फार्मास्यूटिकल्स और खेल प्रशासन समेत कई क्षेत्रों में दशकों का सरकारी अनुभव है. उनके पूर्ववर्ती गिरीश चंद्र चतुर्वेदी भी इसी व्यापक तंत्र से आए थे. उनके आसपास मौजूद गवर्नेंस संरचना अब तेजी से उस पुरानी संस्थागत संस्कृति जैसी दिखने लगी है, जिसका बचाव NSE को लगातार विवादों के बाद करना पड़ा था, जब उसकी कमजोरियां उजागर हुई थीं.
यह समानता शायद अनजाने में हो. लेकिन इसे नजरअंदाज करना मुश्किल है.
जो सामने आ रहा है, वह सिर्फ व्यक्तियों की कहानी नहीं है. यह संस्थागत प्रवृत्तियों की कहानी है.
भारत की वित्तीय गवर्नेंस संरचना प्रशासनिक निरंतरता पर क्षेत्रीय विशेषज्ञता से ज्यादा भरोसा करती दिखाई देती है. सिस्टम बार-बार उन लोगों की ओर लौटता है, जिन्हें वह सांस्कृतिक और प्रशासनिक रूप से समझता है, बजाय उन पेशेवरों के जो खुद बाजारों के भीतर विकसित हुए हैं.
यह प्रवृत्ति शायद कभी संभाली जा सकती थी. लेकिन अब इसे सही ठहराना मुश्किल होता जा रहा है.
क्योंकि आधुनिक बाजार संस्थागत अज्ञानता को बेहद तेजी से दंडित करते हैं.
जेन स्ट्रीट प्रकरण ने यह दिखाया कि रेगुलेटर्स अब कितनी जटिल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. SEBI के निष्कर्षों के अनुसार, अत्यधिक जटिल ट्रेडिंग संरचनाओं ने कथित तौर पर Bank Nifty से जुड़े इंस्ट्रूमेंट्स में एक्सपायरी डायनेमिक्स को प्रभावित किया, जबकि ऑफसेटिंग डेरिवेटिव पोजिशंस के जरिए भारी मुनाफा कमाया गया. कोई SEBI के आदेश के हर पहलू से सहमत हो या नहीं, लेकिन इस मामले ने एक ऐसी वास्तविकता को रेखांकित किया, जिससे भारत अब बच नहीं सकता: आज बाजार में हेरफेर केवल साधारण ऑपरेटर नेटवर्क के जरिए नहीं होता. यह अत्यधिक जटिल रणनीतियों के जरिए होता है, जो लिक्विडिटी व्यवहार, वोलैटिलिटी पोजिशनिंग, ऑर्डर-फ्लो डायनेमिक्स और माइक्रोस्ट्रक्चरल असमानताओं पर आधारित होती हैं.
और यह संयोग नहीं है कि हाल के समय की सबसे तकनीकी रूप से उन्नत प्रवर्तन कार्रवाइयों में से एक अनंत नारायण के नेतृत्व में सामने आई — जो हाल के वर्षों में वैश्विक बैंकिंग और कैपिटल मार्केट्स में गहरा अनुभव रखने वाले कुछ वरिष्ठ रेगुलेटर्स में से एक थे.
नारायण डेरिवेटिव्स को नीति फाइलों में मौजूद अमूर्त अवधारणाओं की तरह नहीं, बल्कि वास्तविक कार्यरत सिस्टम की तरह समझते थे. इतने जटिल बाजारों की निगरानी पूरी तरह उन अधिकारियों द्वारा नहीं की जा सकती, जो उन्हें बाहर से सीख रहे हों. वह समझते थे कि ट्रेडर्स पोजिशन कैसे बनाते हैं, आर्बिट्राज डेस्क कैसे सोचते हैं, एक्सपायरी के दौरान ऑप्शंस बुक्स कैसे व्यवहार करती हैं और किस तरह हेरफेर वैध दिखने वाले फ्लो के भीतर छिप सकता है.
उनका जाना, और पूरे रेगुलेटरी तंत्र में प्रशासनिक नियुक्तियों को लगातार प्राथमिकता मिलना, एक असहज सवाल खड़ा करता है, जिसे भारत के बाजार अब ज्यादा समय तक टाल नहीं सकते: क्या आधुनिक वित्तीय बाजारों की निगरानी करने वाली संस्थाएं उन लोगों द्वारा चलाई जा रही हैं, जिन्हें इन बाजारों की सबसे गहरी परिचालन समझ हासिल है?
यह सवाल तब और तीखा हो जाता है, जब व्यापक रेगुलेटरी तंत्र की संरचना पर नजर डाली जाए.
नॉर्थ ब्लॉक से NSE बोर्ड तक: वही चेहरे, अलग कुर्सियां
SEBI, एक्सचेंजों और मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं में वही नेटवर्क लगातार दिखाई देते हैं. रिटायर्ड अधिकारी बोर्ड्स में चले जाते हैं. पूर्व रेगुलेटर्स उन्हीं संस्थाओं में दोबारा दिखाई देते हैं, जिनकी वे कभी निगरानी करते थे. सरकारी अनुभवी लोग गवर्नेंस संरचनाओं पर हावी रहते हैं, जबकि बाजार विशेषज्ञ अक्सर सलाहकार बनकर रह जाते हैं, निर्णयकर्ता नहीं. सिस्टम धीरे-धीरे खुद को ही भीतर से वैध ठहराने लगता है.
पिछले दो दशकों में भारत की आधुनिक वित्तीय रेगुलेटरी संरचना को आकार देने वाले कई लोग नॉर्थ ब्लॉक और वित्तीय रेगुलेटरी तंत्र के आपस में जुड़े प्रशासनिक और नीतिगत समूहों से निकले थे. के. पी. कृष्णन जैसे प्रभावशाली ब्यूरोक्रेट्स के आसपास विकसित हुए तंत्र ने केवल नीतिगत ढांचे ही नहीं बनाए, बल्कि एक स्थायी संस्थागत संस्कृति भी तैयार की — जहां वही प्रशासनिक नेटवर्क सरकारों और संकटों के गुजर जाने के बाद भी SEBI, एक्सचेंजों, रेगुलेटरी समितियों और वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर बोर्ड्स में बार-बार दिखाई देते रहे. यह निरंतरता इसलिए उल्लेखनीय नहीं है कि यह किसी समन्वय को साबित करती है, बल्कि इसलिए कि यह दिखाती है कि भारत के बाजारों की गवर्नेंस संरचना धीरे-धीरे कितनी केंद्रीकृत हो गई.
अगर इसी नजरिए से देखा जाए, तो NSE की गवर्नेंस के अलग-अलग चरणों में परिचित प्रशासनिक चेहरों की वापसी अब संयोग कम और संरचनात्मक वास्तविकता ज्यादा लगने लगती है.
यह जरूरी नहीं कि कोई साजिश हो. कुछ मायनों में यह साजिश से भी ज्यादा शक्तिशाली है, क्योंकि इसे किसी समन्वय की जरूरत नहीं पड़ती. यह परिचय, सहजता और संस्थागत आदतों के जरिए काम करता है.
और यही चीज इसे टिकाऊ बनाती है.
भारत के बाजार विकास के महत्वपूर्ण चरणों के दौरान वित्त मंत्रालय, SEBI और प्रमुख वित्तीय संस्थाओं तक फैले व्यापक प्रशासनिक प्रभाव नेटवर्क का प्रतीक कई बाजार चर्चाओं में के. पी. कृष्णन को माना जाने लगा. चाहे नीति निर्माण हो, बोर्ड प्रभाव हो या रेगुलेटरी पोजिशनिंग, एक छोटे प्रशासनिक समूह ने उन संस्थाओं पर असंगत रूप से ज्यादा प्रभाव स्थापित कर लिया, जिन्हें मूल रूप से स्वतंत्र और पेशेवर रूप से विविध गवर्नेंस संरचनाओं के साथ संचालित करने के लिए बनाया गया था.
विडंबना को नजरअंदाज करना मुश्किल है.
NSE को मूल रूप से बॉम्बे की पुराने ब्रोकर-प्रधान एक्सचेंज संस्कृति से अलग एक नई शुरुआत के रूप में बनाया गया था. इसे तकनीकी पारदर्शिता, संस्थागत आधुनिकता और गवर्नेंस सुधार का प्रतीक होना था. लेकिन समय के साथ यह कुछ और ही बन गया: एक ऐसी बाजार संस्था, जहां प्रशासनिक अभिजात वर्ग का प्रभाव इतना गहराई तक समा गया कि रेगुलेटर, निगरानीकर्ता और संस्था के बीच की रेखा अक्सर धुंधली दिखाई देने लगी.
और यही शौरी की नियुक्ति के पीछे की असली कहानी है.
सिर्फ वेतन नहीं. सिर्फ व्यक्ति नहीं. बल्कि वह संस्थागत प्रतीक, जिसका यह प्रतिनिधित्व करती है.
भारत के वित्तीय बाजार अब दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल हैं. लाखों नए खुदरा निवेशक तेजी से जटिल होते डेरिवेटिव बाजारों में प्रवेश कर रहे हैं, जहां दुनिया की सबसे उन्नत ट्रेडिंग फर्म्स मौजूद हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटिटेटिव एक्जीक्यूशन और मशीन-गति वाली लिक्विडिटी खुद ट्रेडिंग की प्रकृति को बदल रही है.
फिर भी इस बदलाव की निगरानी करने वाली गवर्नेंस संरचना अब भी उस नौकरशाही संस्कृति से गहराई से जुड़ी दिखाई देती है, जो प्रशासनिक वरिष्ठता को विशेषज्ञ बाजार समझ से ऊपर रखती है.
इतने तकनीकी रूप से जटिल बाजार की निगरानी केवल संस्थागत परिचय के भरोसे लंबे समय तक नहीं की जा सकती.
आखिरकार क्षमता का अंतर मायने रखने लगता है.
और जब ऐसा होता है, तो खतरा सिर्फ रेगुलेटरी शर्मिंदगी का नहीं होता. खतरा यह होता है कि बाजार की अखंडता की रक्षा के लिए बनाई गई संस्थाएं खुद इतनी सामाजिक और संरचनात्मक रूप से आपस में उलझ जाएं कि समय रहते अपनी कमजोरियों को पहचान ही न पाएं.
आज भारत के बाजार दुनिया के सबसे तकनीकी रूप से उन्नत ट्रेडिंग इकोसिस्टम में शामिल हैं. लेकिन उन्हें संचालित करने वाली संस्थाएं अब भी एक पुरानी प्रशासनिक प्रवृत्ति से प्रभावित दिखाई देती हैं, ऐसी प्रवृत्ति, जो अब भी नौकरशाही निरंतरता को तकनीकी क्षमता समझने की भूल करती है. सामान्य समय में यह अंतर शायद दिखाई न दे. लेकिन संकट, हेरफेर और सिस्टम पर दबाव के दौरान यह बेहद खतरनाक बन जाता है, जब रेगुलेटर्स को उन बाजारों का सामना करना पड़ता है, जो उन्हें नियंत्रित करने वाली संस्थाओं से कहीं तेजी से विकसित हो रहे होते हैं.
NSE को भारतीय वित्तीय व्यवस्था को आधुनिक बनाने और BSE की पुरानी क्लब-आधारित संरचना को तोड़ने के लिए बनाया गया था.
अब असहज सवाल यह है कि क्या उसकी जगह सिर्फ एक दूसरे तरह के क्लब ने ले ली है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
SIDBI के 37वें स्थापना दिवस कार्यक्रम में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात में फ्यूल, फर्टिलाइजर और फॉरेक्स पर विशेष नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने महंगाई और आर्थिक दबाव से निपटने के लिए बड़ा फोकस प्लान तैयार किया है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तेल, उर्वरक और सोना यानी ‘3Fs’(Fuel, Fertilizer और Forex) पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई है. उन्होंने कहा कि वैश्विक संकट के बावजूद भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है और घबराने की जरूरत नहीं है.
क्या है वित्त मंत्री का ‘3Fs’ फॉर्मूला?
मुंबई में स्मॉल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (SIDBI) के 37वें स्थापना दिवस कार्यक्रम में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात में फ्यूल, फर्टिलाइजर और फॉरेक्स पर विशेष नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है. उन्होंने बताया कि बढ़ती तेल कीमतों, महंगे उर्वरकों और विदेशी मुद्रा पर बढ़ते दबाव से अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है. ऐसे में सरकार संतुलित नीतियों के जरिए महंगाई और आर्थिक चुनौतियों से निपटने की तैयारी कर रही है.
कच्चे तेल और फर्टिलाइजर की कीमतों ने बढ़ाई चिंता
वित्त मंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं. इसके साथ ही फर्टिलाइजर की कीमतें भी “अकल्पनीय स्तर” तक पहुंच चुकी हैं. वहीं सोने की ऊंची कीमतों से भी बाहरी आर्थिक क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है. उन्होंने बताया कि पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती करने से सरकार को करीब 1 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ेगा.
PM मोदी की अपील क्यों अहम?
सीतारमण ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईंधन बचाने और फॉरेक्स को सुरक्षित रखने की अपील मौजूदा हालात में बेहद महत्वपूर्ण हो गई है. उन्होंने कहा कि कुछ लोग हालात को जरूरत से ज्यादा नकारात्मक दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भारत की आर्थिक स्थिति अभी भी मजबूत और स्थिर बनी हुई है.
‘डर का माहौल बनाने की जरूरत नहीं’
वित्त मंत्री ने कहा कि देश में भय और भ्रम फैलाने की कोई जरूरत नहीं है. चुनौतियां मुख्य रूप से बाहरी कारणों से पैदा हुई हैं, लेकिन भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था अब भी सकारात्मक स्थिति में है. उन्होंने कहा कि लोगों में भरोसा बनाए रखना जरूरी है और सरकार की नीतियां विकास को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाने पर केंद्रित हैं.
MSME सेक्टर को लेकर भी जताई चिंता
सीतारमण ने MSME सेक्टर के लंबित भुगतानों पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के करीब 8.1 लाख करोड़ रुपये के भुगतान अटके हुए हैं, जिससे उनकी कार्यशील पूंजी और विकास प्रभावित हो रहा है.
वित्त मंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से अपील की कि वे MSME को 45 दिन की तय समय-सीमा के भीतर भुगतान सुनिश्चित करें.
25 मई को पेट्रोल की कीमत में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 2.71 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई. इससे पहले भी मई महीने में तीन बार कीमतें बढ़ चुकी हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बड़ी बढ़ोतरी हुई है. सोमवार को तेल कंपनियों ने 10 दिनों में चौथी बार ईंधन के दाम बढ़ाए, जिसके बाद 15 मई से अब तक पेट्रोल 7.35 रुपये और डीजल 7.82 रुपये प्रति लीटर तक महंगा हो चुका है. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और कमजोर रुपये के कारण आने वाले दिनों में दाम और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.
आज कितनी बढ़ी कीमत?
25 मई को पेट्रोल की कीमत में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 2.71 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई. इससे पहले भी मई महीने में तीन बार कीमतें बढ़ चुकी हैं.
मई में कब-कब बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम?
1. 15 मई, पेट्रोल और डीजल करीब 3 रुपये प्रति लीटर महंगे हुए.
2. 19 मई, दोनों ईंधनों की कीमत में 90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई.
3. 23 मई, पेट्रोल 87 पैसे और डीजल 91 पैसे प्रति लीटर महंगा हुआ.
4. 25 मई, पेट्रोल 2.61 रुपये और डीजल 2.71 रुपये प्रति लीटर बढ़ा.
कच्चे तेल और कमजोर रुपये का असर
तेल कंपनियों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं. इसके साथ ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आने से आयात लागत भी बढ़ गई है. इसी वजह से सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है.
तेल कंपनियों को अब भी भारी घाटा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हालिया बढ़ोतरी के बाद भी तेल कंपनियां भारी अंडर-रिकवरी का सामना कर रही हैं. पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने पहले बताया था कि 15 मई की बढ़ोतरी से नुकसान में करीब 25% कमी आई थी, लेकिन इसके बावजूद सरकारी कंपनियों को रोजाना लगभग 750 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा था.
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) के अनुमान के मुताबिक मौजूदा कीमतों के बाद भी कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 10 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 13 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है.
भारत पेट्रोलियम के एचआर डायरेक्टर राज कुमार दुबे के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की 20% से 50% तक की तेजी को पहले अस्थायी माना जा रहा था, लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि दबाव अभी लंबे समय तक बना रह सकता है.
आगे और महंगा हो सकता है ईंधन
जानकारों का मानना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सिलसिला अभी थमने वाला नहीं है. कच्चे तेल की कीमत लंबे समय से 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई है और रुपये में गिरावट भी जारी है. ऐसे में तेल कंपनियां घाटा कम करने के लिए आगे भी दाम बढ़ा सकती हैं.