नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने दुनिया के सबसे बड़े डेरिवेटिव एक्सचेंज को रेगुलेट करने के लिए एक और करियर ब्यूरोक्रेट को नियुक्त किया है. जबकि एल्गोरिदम माइक्रोसेकंड में ट्रेड कर रहे हैं. यह इस बात पर गहरे सवाल उठाता है कि क्या भारत की मार्केट संस्थाएं विशेष बाजार विशेषज्ञता की बजाय प्रशासनिक निरंतरता को प्राथमिकता दे रही हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
जब नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने इस महीने संजय शौरी को रेगुलेशन, कंप्लायंस, रिस्क मैनेजमेंट और निवेशक शिकायतों की निगरानी के लिए एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नियुक्त करने की घोषणा की, तब प्रेस रिलीज में “गवर्नेंस” शब्द का सात बार इस्तेमाल हुआ. लेकिन “मार्केट्स” शब्द एक बार भी नहीं आया. यह अनुपस्थिति अपने आप में बहुत कुछ कहती है.
जब भारत के बाजार क्वांटम स्तर की तकनीक की ओर बढ़ रहे हैं, तब देश का सबसे शक्तिशाली एक्सचेंज अब भी सिर्फ वार्षिक अनुपालन रिपोर्ट (ACRs) भरने में उलझा हुआ दिखता है.
वित्तीय बाजार अब केवल मानवीय समझ और बैलेंस शीट गणित से नहीं चलते. अब उन्हें एल्गोरिदमिक एक्जीक्यूशन इंजन, हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग सिस्टम, एक्सपायरी-डे ऑप्शंस स्ट्रक्चर और मशीन आधारित रणनीतियां आकार दे रही हैं, जो इतनी तेज गति से काम करती हैं कि अधिकांश नीति निर्माता उसे समझ भी नहीं सकते.
ऐसे माहौल में निगरानी केवल एक रेगुलेटरी कार्य नहीं रह गई है. यह एक तकनीकी अनुशासन बन चुका है. निगरानी के लिए सिर्फ प्रशासनिक अधिकार नहीं, बल्कि इस बात की गहरी समझ भी चाहिए कि आधुनिक बाजार कैसे व्यवहार करते हैं, जब पूंजी, लीवरेज, तकनीक और इंसेंटिव मिलीसेकंड में टकराते हैं.
फिर भी भारत की वित्तीय संस्थाओं में एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है. सिस्टम बार-बार बाजार विशेषज्ञों की बजाय प्रशासनिक ढांचे की ओर लौटता है, ऐसे ब्यूरोक्रेट्स और बाबुओं की ओर, जो रिटायरमेंट के बाद भी शानदार पदों की तलाश में रहते हैं.
क्षमता से ज्यादा आराम को प्राथमिकता: खुदरा निवेशकों के पैसे के लिए असली खतरा
शौरी की नियुक्ति इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उनके पास योग्यता की कमी है. भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के मानकों के अनुसार उनका अनुभव बेहद मजबूत है. उन्होंने कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में वरिष्ठ कानूनी और प्रशासनिक भूमिकाएं निभाई हैं, कई मंत्रालयों में काम किया है और दशकों तक सरकारी ढांचे के भीतर रहे हैं.
लेकिन असली मुद्दा यही है. भारत की सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थाएं अब विशेषज्ञ बाजार पारिस्थितिकी तंत्र की बजाय प्रशासनिक राज्य के विस्तार की तरह संचालित होती दिखाई देती हैं.
इस पद के साथ जुड़ा लगभग 5 करोड़ रुपये वार्षिक वेतन इस प्रतीकवाद को और गहरा करता है. देश की सबसे उन्नत मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाएं अब रिटायर्ड या ट्रांजिशन कर रहे रेगुलेटर्स और ब्यूरोक्रेट्स के लिए बेहद आरामदायक ठिकाने बन चुकी हैं.
नियुक्तियां औपचारिक रूप से मंजूर होती हैं, प्रक्रियागत रूप से वैध होती हैं और संस्थागत रूप से बचाव भी किया जाता है. लेकिन समय के साथ यह पैटर्न खुद बड़े सवाल खड़े करने लगता है.
यह सवाल आज नहीं उठे
ये सवाल शौरी की नियुक्ति से शुरू नहीं हुए. वे पिछले दो दशकों से धीरे-धीरे बनते रहे हैं.
को-लोकेशन घोटाले के सार्वजनिक होने से बहुत पहले और आनंद सुब्रमणियन प्रकरण के NSE को गवर्नेंस विफलता के केस स्टडी में बदलने से भी पहले, भारत के एक्सचेंज एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र में बदल चुके थे, जहां पूर्व रेगुलेटर्स, ब्यूरोक्रेट्स, नीति निर्माता और प्रशासक लगातार एक ही संस्थागत गलियारों में घूमते रहे.
2013 में RBI की डिप्टी गवर्नर पद से रिटायर होने के सात महीने बाद श्यामला गोपीनाथ NSE बोर्ड में शामिल हुईं. तकनीकी रूप से इसमें कुछ गलत नहीं था. उस समय ऐसा कोई नियम नहीं था जो इसे रोकता.
लेकिन इस नियुक्ति ने वित्तीय जगत में गंभीर बहस छेड़ दी. क्योंकि गोपीनाथ सिर्फ वरिष्ठ केंद्रीय बैंकर नहीं थीं. RBI डिप्टी गवर्नर के रूप में वह SEBI बोर्ड में RBI की प्रतिनिधि भी थीं, यानी उन्हीं एक्सचेंजों की निगरानी व्यवस्था का हिस्सा, जिनकी बाद में बोर्ड सदस्य बनीं.
तब समर्थकों ने कहा कि RBI सीधे स्टॉक एक्सचेंजों का रेगुलेटर नहीं है और विशेषज्ञता को रिटायरमेंट के बाद संस्थाओं से दूर नहीं रखा जाना चाहिए.
आलोचकों ने एक असहज सवाल उठाया: अगर रेगुलेटर्स को पता हो कि सार्वजनिक पद छोड़ने के तुरंत बाद एक्सचेंज बोर्ड में आकर्षक पद मिल जाएंगे, तो क्या सख्त निगरानी के लिए जरूरी संस्थागत दूरी पहले ही कमजोर नहीं पड़ने लगती?
उस बहस का कभी समाधान नहीं हुआ. सिस्टम ने उसे आत्मसात किया और आगे बढ़ गया.
धीरे-धीरे गहराता गया नेटवर्क
समय के साथ यह पैटर्न और गहरा होता गया.
पूर्व वित्त सचिव, पूर्व SEBI अधिकारी, पूर्व RBI अधिकारी और रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स लगातार एक्सचेंजों, डिपॉजिटरीज और मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं के बोर्ड में आते रहे.
कुछ कूलिंग-ऑफ अवधि के बाद आए, कुछ लगभग तुरंत. हर नियुक्ति व्यक्तिगत रूप से सही ठहराई जा सकती थी. लेकिन सामूहिक रूप से उन्होंने एक ऐसा रेगुलेटरी इकोसिस्टम बना दिया, जिसमें निगरानी और संस्थागत निर्माण की सीमाएं धुंधली होती गईं.
मुद्दा कभी वैधता का नहीं था. मुद्दा केंद्रीकरण का था.
और इसके परिणाम सबसे स्पष्ट रूप से NSE में दिखाई दिए.
आनंद सुब्रमणियन मामला अपवाद नहीं, संस्कृति था
आनंद सुब्रमणियन प्रकरण को अक्सर उसके अजीब पहलुओं “हिमालयी योगी”, ईमेल्स और विचित्र आंतरिक शक्ति संरचनाओं के लिए याद किया जाता है.
लेकिन असली संस्थागत सबक कहीं और था.
इस घोटाले ने दिखाया कि भारत का सबसे शक्तिशाली एक्सचेंज वास्तविक निगरानी से कितना सुरक्षित हो चुका था. असामान्य नियुक्तियां सामान्य बना दी गई थीं. वेतन संरचनाओं पर सवाल नहीं उठे. संस्थागत प्रतिष्ठा की ढाल के पीछे गवर्नेंस प्रक्रियाएं धीरे-धीरे कमजोर होती गईं.
समस्या सिर्फ एक व्यक्ति या एक प्रबंधन टीम की नहीं थी. समस्या उस संस्कृति की थी, जहां शक्ति के करीब होना, प्रशासनिक परिचय और आंतरिक नेटवर्क, पारदर्शी प्रक्रियाओं और विशेषज्ञ क्षमता से ज्यादा प्रभावशाली दिखाई देते थे.
खुद को खुद ही रेगुलेट करने वाला सिस्टम
आज NSE का बोर्ड एक बार फिर प्रशासनिक व्यवस्था के भारी प्रभाव को दर्शाता है. इसके चेयरपर्सन श्रीनिवास इनजेती एक अनुभवी ब्यूरोक्रेट हैं, जिनके पास वित्त, फार्मास्यूटिकल्स और खेल प्रशासन समेत कई क्षेत्रों में दशकों का सरकारी अनुभव है. उनके पूर्ववर्ती गिरीश चंद्र चतुर्वेदी भी इसी व्यापक तंत्र से आए थे. उनके आसपास मौजूद गवर्नेंस संरचना अब तेजी से उस पुरानी संस्थागत संस्कृति जैसी दिखने लगी है, जिसका बचाव NSE को लगातार विवादों के बाद करना पड़ा था, जब उसकी कमजोरियां उजागर हुई थीं.
यह समानता शायद अनजाने में हो. लेकिन इसे नजरअंदाज करना मुश्किल है.
जो सामने आ रहा है, वह सिर्फ व्यक्तियों की कहानी नहीं है. यह संस्थागत प्रवृत्तियों की कहानी है.
भारत की वित्तीय गवर्नेंस संरचना प्रशासनिक निरंतरता पर क्षेत्रीय विशेषज्ञता से ज्यादा भरोसा करती दिखाई देती है. सिस्टम बार-बार उन लोगों की ओर लौटता है, जिन्हें वह सांस्कृतिक और प्रशासनिक रूप से समझता है, बजाय उन पेशेवरों के जो खुद बाजारों के भीतर विकसित हुए हैं.
यह प्रवृत्ति शायद कभी संभाली जा सकती थी. लेकिन अब इसे सही ठहराना मुश्किल होता जा रहा है.
क्योंकि आधुनिक बाजार संस्थागत अज्ञानता को बेहद तेजी से दंडित करते हैं.
जेन स्ट्रीट प्रकरण ने यह दिखाया कि रेगुलेटर्स अब कितनी जटिल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. SEBI के निष्कर्षों के अनुसार, अत्यधिक जटिल ट्रेडिंग संरचनाओं ने कथित तौर पर Bank Nifty से जुड़े इंस्ट्रूमेंट्स में एक्सपायरी डायनेमिक्स को प्रभावित किया, जबकि ऑफसेटिंग डेरिवेटिव पोजिशंस के जरिए भारी मुनाफा कमाया गया. कोई SEBI के आदेश के हर पहलू से सहमत हो या नहीं, लेकिन इस मामले ने एक ऐसी वास्तविकता को रेखांकित किया, जिससे भारत अब बच नहीं सकता: आज बाजार में हेरफेर केवल साधारण ऑपरेटर नेटवर्क के जरिए नहीं होता. यह अत्यधिक जटिल रणनीतियों के जरिए होता है, जो लिक्विडिटी व्यवहार, वोलैटिलिटी पोजिशनिंग, ऑर्डर-फ्लो डायनेमिक्स और माइक्रोस्ट्रक्चरल असमानताओं पर आधारित होती हैं.
और यह संयोग नहीं है कि हाल के समय की सबसे तकनीकी रूप से उन्नत प्रवर्तन कार्रवाइयों में से एक अनंत नारायण के नेतृत्व में सामने आई — जो हाल के वर्षों में वैश्विक बैंकिंग और कैपिटल मार्केट्स में गहरा अनुभव रखने वाले कुछ वरिष्ठ रेगुलेटर्स में से एक थे.
नारायण डेरिवेटिव्स को नीति फाइलों में मौजूद अमूर्त अवधारणाओं की तरह नहीं, बल्कि वास्तविक कार्यरत सिस्टम की तरह समझते थे. इतने जटिल बाजारों की निगरानी पूरी तरह उन अधिकारियों द्वारा नहीं की जा सकती, जो उन्हें बाहर से सीख रहे हों. वह समझते थे कि ट्रेडर्स पोजिशन कैसे बनाते हैं, आर्बिट्राज डेस्क कैसे सोचते हैं, एक्सपायरी के दौरान ऑप्शंस बुक्स कैसे व्यवहार करती हैं और किस तरह हेरफेर वैध दिखने वाले फ्लो के भीतर छिप सकता है.
उनका जाना, और पूरे रेगुलेटरी तंत्र में प्रशासनिक नियुक्तियों को लगातार प्राथमिकता मिलना, एक असहज सवाल खड़ा करता है, जिसे भारत के बाजार अब ज्यादा समय तक टाल नहीं सकते: क्या आधुनिक वित्तीय बाजारों की निगरानी करने वाली संस्थाएं उन लोगों द्वारा चलाई जा रही हैं, जिन्हें इन बाजारों की सबसे गहरी परिचालन समझ हासिल है?
यह सवाल तब और तीखा हो जाता है, जब व्यापक रेगुलेटरी तंत्र की संरचना पर नजर डाली जाए.
नॉर्थ ब्लॉक से NSE बोर्ड तक: वही चेहरे, अलग कुर्सियां
SEBI, एक्सचेंजों और मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं में वही नेटवर्क लगातार दिखाई देते हैं. रिटायर्ड अधिकारी बोर्ड्स में चले जाते हैं. पूर्व रेगुलेटर्स उन्हीं संस्थाओं में दोबारा दिखाई देते हैं, जिनकी वे कभी निगरानी करते थे. सरकारी अनुभवी लोग गवर्नेंस संरचनाओं पर हावी रहते हैं, जबकि बाजार विशेषज्ञ अक्सर सलाहकार बनकर रह जाते हैं, निर्णयकर्ता नहीं. सिस्टम धीरे-धीरे खुद को ही भीतर से वैध ठहराने लगता है.
पिछले दो दशकों में भारत की आधुनिक वित्तीय रेगुलेटरी संरचना को आकार देने वाले कई लोग नॉर्थ ब्लॉक और वित्तीय रेगुलेटरी तंत्र के आपस में जुड़े प्रशासनिक और नीतिगत समूहों से निकले थे. के. पी. कृष्णन जैसे प्रभावशाली ब्यूरोक्रेट्स के आसपास विकसित हुए तंत्र ने केवल नीतिगत ढांचे ही नहीं बनाए, बल्कि एक स्थायी संस्थागत संस्कृति भी तैयार की — जहां वही प्रशासनिक नेटवर्क सरकारों और संकटों के गुजर जाने के बाद भी SEBI, एक्सचेंजों, रेगुलेटरी समितियों और वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर बोर्ड्स में बार-बार दिखाई देते रहे. यह निरंतरता इसलिए उल्लेखनीय नहीं है कि यह किसी समन्वय को साबित करती है, बल्कि इसलिए कि यह दिखाती है कि भारत के बाजारों की गवर्नेंस संरचना धीरे-धीरे कितनी केंद्रीकृत हो गई.
अगर इसी नजरिए से देखा जाए, तो NSE की गवर्नेंस के अलग-अलग चरणों में परिचित प्रशासनिक चेहरों की वापसी अब संयोग कम और संरचनात्मक वास्तविकता ज्यादा लगने लगती है.
यह जरूरी नहीं कि कोई साजिश हो. कुछ मायनों में यह साजिश से भी ज्यादा शक्तिशाली है, क्योंकि इसे किसी समन्वय की जरूरत नहीं पड़ती. यह परिचय, सहजता और संस्थागत आदतों के जरिए काम करता है.
और यही चीज इसे टिकाऊ बनाती है.
भारत के बाजार विकास के महत्वपूर्ण चरणों के दौरान वित्त मंत्रालय, SEBI और प्रमुख वित्तीय संस्थाओं तक फैले व्यापक प्रशासनिक प्रभाव नेटवर्क का प्रतीक कई बाजार चर्चाओं में के. पी. कृष्णन को माना जाने लगा. चाहे नीति निर्माण हो, बोर्ड प्रभाव हो या रेगुलेटरी पोजिशनिंग, एक छोटे प्रशासनिक समूह ने उन संस्थाओं पर असंगत रूप से ज्यादा प्रभाव स्थापित कर लिया, जिन्हें मूल रूप से स्वतंत्र और पेशेवर रूप से विविध गवर्नेंस संरचनाओं के साथ संचालित करने के लिए बनाया गया था.
विडंबना को नजरअंदाज करना मुश्किल है.
NSE को मूल रूप से बॉम्बे की पुराने ब्रोकर-प्रधान एक्सचेंज संस्कृति से अलग एक नई शुरुआत के रूप में बनाया गया था. इसे तकनीकी पारदर्शिता, संस्थागत आधुनिकता और गवर्नेंस सुधार का प्रतीक होना था. लेकिन समय के साथ यह कुछ और ही बन गया: एक ऐसी बाजार संस्था, जहां प्रशासनिक अभिजात वर्ग का प्रभाव इतना गहराई तक समा गया कि रेगुलेटर, निगरानीकर्ता और संस्था के बीच की रेखा अक्सर धुंधली दिखाई देने लगी.
और यही शौरी की नियुक्ति के पीछे की असली कहानी है.
सिर्फ वेतन नहीं. सिर्फ व्यक्ति नहीं. बल्कि वह संस्थागत प्रतीक, जिसका यह प्रतिनिधित्व करती है.
भारत के वित्तीय बाजार अब दुनिया के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल हैं. लाखों नए खुदरा निवेशक तेजी से जटिल होते डेरिवेटिव बाजारों में प्रवेश कर रहे हैं, जहां दुनिया की सबसे उन्नत ट्रेडिंग फर्म्स मौजूद हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटिटेटिव एक्जीक्यूशन और मशीन-गति वाली लिक्विडिटी खुद ट्रेडिंग की प्रकृति को बदल रही है.
फिर भी इस बदलाव की निगरानी करने वाली गवर्नेंस संरचना अब भी उस नौकरशाही संस्कृति से गहराई से जुड़ी दिखाई देती है, जो प्रशासनिक वरिष्ठता को विशेषज्ञ बाजार समझ से ऊपर रखती है.
इतने तकनीकी रूप से जटिल बाजार की निगरानी केवल संस्थागत परिचय के भरोसे लंबे समय तक नहीं की जा सकती.
आखिरकार क्षमता का अंतर मायने रखने लगता है.
और जब ऐसा होता है, तो खतरा सिर्फ रेगुलेटरी शर्मिंदगी का नहीं होता. खतरा यह होता है कि बाजार की अखंडता की रक्षा के लिए बनाई गई संस्थाएं खुद इतनी सामाजिक और संरचनात्मक रूप से आपस में उलझ जाएं कि समय रहते अपनी कमजोरियों को पहचान ही न पाएं.
आज भारत के बाजार दुनिया के सबसे तकनीकी रूप से उन्नत ट्रेडिंग इकोसिस्टम में शामिल हैं. लेकिन उन्हें संचालित करने वाली संस्थाएं अब भी एक पुरानी प्रशासनिक प्रवृत्ति से प्रभावित दिखाई देती हैं, ऐसी प्रवृत्ति, जो अब भी नौकरशाही निरंतरता को तकनीकी क्षमता समझने की भूल करती है. सामान्य समय में यह अंतर शायद दिखाई न दे. लेकिन संकट, हेरफेर और सिस्टम पर दबाव के दौरान यह बेहद खतरनाक बन जाता है, जब रेगुलेटर्स को उन बाजारों का सामना करना पड़ता है, जो उन्हें नियंत्रित करने वाली संस्थाओं से कहीं तेजी से विकसित हो रहे होते हैं.
NSE को भारतीय वित्तीय व्यवस्था को आधुनिक बनाने और BSE की पुरानी क्लब-आधारित संरचना को तोड़ने के लिए बनाया गया था.
अब असहज सवाल यह है कि क्या उसकी जगह सिर्फ एक दूसरे तरह के क्लब ने ले ली है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
SIDBI के 37वें स्थापना दिवस कार्यक्रम में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात में फ्यूल, फर्टिलाइजर और फॉरेक्स पर विशेष नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने महंगाई और आर्थिक दबाव से निपटने के लिए बड़ा फोकस प्लान तैयार किया है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तेल, उर्वरक और सोना यानी ‘3Fs’(Fuel, Fertilizer और Forex) पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई है. उन्होंने कहा कि वैश्विक संकट के बावजूद भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है और घबराने की जरूरत नहीं है.
क्या है वित्त मंत्री का ‘3Fs’ फॉर्मूला?
मुंबई में स्मॉल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (SIDBI) के 37वें स्थापना दिवस कार्यक्रम में बोलते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात में फ्यूल, फर्टिलाइजर और फॉरेक्स पर विशेष नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है. उन्होंने बताया कि बढ़ती तेल कीमतों, महंगे उर्वरकों और विदेशी मुद्रा पर बढ़ते दबाव से अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है. ऐसे में सरकार संतुलित नीतियों के जरिए महंगाई और आर्थिक चुनौतियों से निपटने की तैयारी कर रही है.
कच्चे तेल और फर्टिलाइजर की कीमतों ने बढ़ाई चिंता
वित्त मंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं. इसके साथ ही फर्टिलाइजर की कीमतें भी “अकल्पनीय स्तर” तक पहुंच चुकी हैं. वहीं सोने की ऊंची कीमतों से भी बाहरी आर्थिक क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है. उन्होंने बताया कि पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती करने से सरकार को करीब 1 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ेगा.
PM मोदी की अपील क्यों अहम?
सीतारमण ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईंधन बचाने और फॉरेक्स को सुरक्षित रखने की अपील मौजूदा हालात में बेहद महत्वपूर्ण हो गई है. उन्होंने कहा कि कुछ लोग हालात को जरूरत से ज्यादा नकारात्मक दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भारत की आर्थिक स्थिति अभी भी मजबूत और स्थिर बनी हुई है.
‘डर का माहौल बनाने की जरूरत नहीं’
वित्त मंत्री ने कहा कि देश में भय और भ्रम फैलाने की कोई जरूरत नहीं है. चुनौतियां मुख्य रूप से बाहरी कारणों से पैदा हुई हैं, लेकिन भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था अब भी सकारात्मक स्थिति में है. उन्होंने कहा कि लोगों में भरोसा बनाए रखना जरूरी है और सरकार की नीतियां विकास को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाने पर केंद्रित हैं.
MSME सेक्टर को लेकर भी जताई चिंता
सीतारमण ने MSME सेक्टर के लंबित भुगतानों पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के करीब 8.1 लाख करोड़ रुपये के भुगतान अटके हुए हैं, जिससे उनकी कार्यशील पूंजी और विकास प्रभावित हो रहा है.
वित्त मंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से अपील की कि वे MSME को 45 दिन की तय समय-सीमा के भीतर भुगतान सुनिश्चित करें.
25 मई को पेट्रोल की कीमत में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 2.71 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई. इससे पहले भी मई महीने में तीन बार कीमतें बढ़ चुकी हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बड़ी बढ़ोतरी हुई है. सोमवार को तेल कंपनियों ने 10 दिनों में चौथी बार ईंधन के दाम बढ़ाए, जिसके बाद 15 मई से अब तक पेट्रोल 7.35 रुपये और डीजल 7.82 रुपये प्रति लीटर तक महंगा हो चुका है. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और कमजोर रुपये के कारण आने वाले दिनों में दाम और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.
आज कितनी बढ़ी कीमत?
25 मई को पेट्रोल की कीमत में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 2.71 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई. इससे पहले भी मई महीने में तीन बार कीमतें बढ़ चुकी हैं.
मई में कब-कब बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम?
1. 15 मई, पेट्रोल और डीजल करीब 3 रुपये प्रति लीटर महंगे हुए.
2. 19 मई, दोनों ईंधनों की कीमत में 90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई.
3. 23 मई, पेट्रोल 87 पैसे और डीजल 91 पैसे प्रति लीटर महंगा हुआ.
4. 25 मई, पेट्रोल 2.61 रुपये और डीजल 2.71 रुपये प्रति लीटर बढ़ा.
कच्चे तेल और कमजोर रुपये का असर
तेल कंपनियों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं. इसके साथ ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आने से आयात लागत भी बढ़ गई है. इसी वजह से सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है.
तेल कंपनियों को अब भी भारी घाटा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हालिया बढ़ोतरी के बाद भी तेल कंपनियां भारी अंडर-रिकवरी का सामना कर रही हैं. पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने पहले बताया था कि 15 मई की बढ़ोतरी से नुकसान में करीब 25% कमी आई थी, लेकिन इसके बावजूद सरकारी कंपनियों को रोजाना लगभग 750 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा था.
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) के अनुमान के मुताबिक मौजूदा कीमतों के बाद भी कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 10 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 13 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है.
भारत पेट्रोलियम के एचआर डायरेक्टर राज कुमार दुबे के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की 20% से 50% तक की तेजी को पहले अस्थायी माना जा रहा था, लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि दबाव अभी लंबे समय तक बना रह सकता है.
आगे और महंगा हो सकता है ईंधन
जानकारों का मानना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सिलसिला अभी थमने वाला नहीं है. कच्चे तेल की कीमत लंबे समय से 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई है और रुपये में गिरावट भी जारी है. ऐसे में तेल कंपनियां घाटा कम करने के लिए आगे भी दाम बढ़ा सकती हैं.
तेल कीमतों में गिरावट की बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान रहा. ट्रंप ने कहा कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच तनाव कम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने को लेकर समझौते पर काफी हद तक बातचीत हो चुकी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की उम्मीदों ने वैश्विक तेल बाजार में बड़ी गिरावट ला दी है. सोमवार को कच्चे तेल की कीमतें करीब दो सप्ताह के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गईं. हालांकि पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता अब भी बनी हुई है.
ब्रेंट और WTI दोनों में बड़ी गिरावट
ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 4.71 डॉलर यानी 4.55% गिरकर 98.83 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI क्रूड 4.57 डॉलर यानी 4.73% टूटकर 92.03 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. कारोबार के दौरान दोनों बेंचमार्क 7 मई के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए.
ट्रंप के बयान से बाजार में उम्मीद
तेल कीमतों में गिरावट की बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान रहा. ट्रंप ने कहा कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच तनाव कम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने को लेकर समझौते पर काफी हद तक बातचीत हो चुकी है.
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों अहम?
होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा व्यापार का बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है. दुनिया के करीब 20% तेल और LNG शिपमेंट इसी रास्ते से गुजरते हैं. पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद यहां आपूर्ति प्रभावित हुई थी, जिससे वैश्विक बाजार में चिंता बढ़ गई थी.
समझौते पर अब भी संशय
हालांकि बाद में ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्होंने अमेरिकी वार्ताकारों को किसी जल्दबाजी में समझौता न करने के निर्देश दिए हैं. इससे साफ है कि दोनों देशों के बीच अब भी कई अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई है.
आपूर्ति संकट तुरंत खत्म नहीं होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर औपचारिक समझौता हो भी जाता है, तब भी तेल आपूर्ति सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं. जलडमरूमध्य में शिपिंग गतिविधियां पूरी तरह बहाल करने और क्षतिग्रस्त तेल-गैस इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करने में समय लगेगा.
बाजार में अभी भी अनिश्चितता
फिलहाल बाजार कूटनीतिक संकेतों को ज्यादा महत्व दे रहा है, जिसकी वजह से तेल कीमतों में गिरावट आई है. लेकिन पश्चिम एशिया में जारी तनाव और आपूर्ति जोखिम के चलते ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है.
विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने अधिसूचना जारी कर बताया कि अमेरिका को 8,606 MTRV (मैट्रिक टन रॉ वैल्यू) कच्ची गन्ना चीनी निर्यात की अनुमति दी गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सरकार ने घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए जारी निर्यात प्रतिबंध के बीच अमेरिका को 8,606 मीट्रिक टन कच्ची गन्ना चीनी निर्यात करने की अनुमति दी है. यह मंजूरी टैरिफ रेट कोटा (TRQ) व्यवस्था के तहत दी गई है.
DGFT ने जारी की अधिसूचना
विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने अधिसूचना जारी कर बताया कि अमेरिका को 8,606 MTRV (मैट्रिक टन रॉ वैल्यू) कच्ची गन्ना चीनी निर्यात की अनुमति दी गई है. यह निर्यात 1 अक्टूबर 2025 से 30 सितंबर 2026 के बीच किया जाएगा.
चीनी निर्यात पर अब भी जारी है रोक
भारत सरकार ने घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और महंगाई पर नियंत्रण रखने के लिए 30 सितंबर 2026 तक चीनी निर्यात पर व्यापक प्रतिबंध लगा रखा है. सरकार का मानना है कि वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है.
अमेरिका को राहत क्यों?
अधिकारियों के मुताबिक अमेरिका को दी गई यह अनुमति मौजूदा व्यापार समझौतों के तहत सीमित छूट का हिस्सा है. यानी भारत ने अमेरिका के साथ विशेष व्यापार व्यवस्था के तहत यह कोटा आवंटित किया है, जबकि बाकी देशों के लिए निर्यात प्रतिबंध जारी रहेगा.
घरेलू बाजार को प्राथमिकता
सरकार फिलहाल घरेलू चीनी आपूर्ति और कीमतों को स्थिर रखने पर फोकस कर रही है. इसी वजह से बड़े स्तर पर चीनी निर्यात की अनुमति नहीं दी जा रही है ताकि देश में कीमतों पर दबाव न बढ़े.
पश्चिम एशिया तनाव का भी असर
सरकार का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक सप्लाई चेन में अनिश्चितता के चलते खाद्य वस्तुओं के दाम प्रभावित हो सकते हैं. ऐसे में चीनी जैसी जरूरी वस्तुओं की घरेलू उपलब्धता बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता बनी हुई है.
स्टरलाइट टेक्नोलॉजीज ने स्टॉक एक्सचेंज को दी जानकारी में बताया कि उसकी सब्सिडियरी यूनिट को एक वैश्विक ‘हाइपरस्केल’ पार्टनर से ऑप्टिकल कनेक्टिविटी प्रोडक्ट्स की सप्लाई का बड़ा ऑर्डर मिला है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में टेलीकॉम और टेक सेक्टर की बड़ी कंपनी स्टेरलाइट टेक्नोलॉजी (Sterlite Technologies) ने निवेशकों को जबरदस्त रिटर्न देकर चौंका दिया है. अमेरिका की एक दिग्गज कंपनी से ₹10,622 करोड़ का बड़ा मल्टी-ईयर ऑर्डर मिलने के बाद कंपनी के शेयरों में जोरदार उछाल देखने को मिला. खबर आते ही स्टॉक 5% के अपर सर्किट के साथ रिकॉर्ड हाई ₹463.20 तक पहुंच गया. पिछले एक साल में यह शेयर 550% से ज्यादा चढ़ चुका है.
अमेरिका की बड़ी कंपनी से मिला अरबों का ऑर्डर
स्टरलाइट टेक्नोलॉजीज ने स्टॉक एक्सचेंज को दी जानकारी में बताया कि उसकी सब्सिडियरी यूनिट को एक वैश्विक ‘हाइपरस्केल’ पार्टनर से ऑप्टिकल कनेक्टिविटी प्रोडक्ट्स की सप्लाई का बड़ा ऑर्डर मिला है. यह डील करीब 1.1 बिलियन डॉलर यानी लगभग ₹10,622 करोड़ की है. हालांकि, कारोबारी शर्तों और गोपनीयता के कारण कंपनी ने ग्राहक का नाम सार्वजनिक नहीं किया है. यह मल्टी-ईयर समझौता आने वाले कई वर्षों तक कंपनी की कमाई और कारोबार को मजबूत करेगा.
AI डेटा सेंटर सेक्टर से जुड़ा है बड़ा सौदा
दुनियाभर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का विस्तार तेजी से हो रहा है. इसी बढ़ती मांग को देखते हुए यह ऑर्डर AI डेटा सेंटर इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ा माना जा रहा है. कंपनी के मुताबिक, उसके ऑप्टिकल कनेक्टिविटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर AI डेटा सेंटर नेटवर्क तैयार करने में किया जाएगा. कंपनी अमेरिका में हाई-स्पीड डेटा ट्रांसमिशन और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने का काम करेगी.
स्टरलाइट टेक ने हाल ही में अपनी नई ‘Celesta IBR Cable Series’ भी लॉन्च की है. इसमें 6,912 फाइबर तक वाली हाई-कैपेसिटी केबल्स शामिल हैं, जिन्हें खास तौर पर डेटा सेंटर और AI नेटवर्क की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.
शेयर बाजार में मची खरीदारी
बड़े ऑर्डर की खबर सामने आते ही निवेशकों ने कंपनी के शेयरों में जमकर खरीदारी की. खबर लिखे जाने के दौरान यह शेयर 5% के अपर सर्किट के साथ ₹463.20 के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया. इससे पहले शुक्रवार को भी स्टॉक ₹441.15 पर बंद हुआ था, जबकि उससे पहले इसका भाव ₹420.15 था. लगातार तेजी के चलते यह शेयर बाजार में चर्चा का केंद्र बना हुआ है.
1 साल में 550% से ज्यादा का रिटर्न
अगर रिटर्न की बात करें तो स्टरलाइट टेक का शेयर निवेशकों के लिए मल्टीबैगर साबित हुआ है.
1. पिछले 1 महीने में शेयर करीब 56% उछला.
2. साल 2026 में अब तक लगभग 330% की तेजी दर्ज की.
3. पिछले 1 साल में स्टॉक 550% से ज्यादा चढ़ चुका है.
यानी, जिन निवेशकों ने एक साल पहले इस शेयर में पैसा लगाया था, उनकी पूंजी अब 5 गुना से ज्यादा हो चुकी है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
मसौदा नियमों के अनुसार राज्यों को मिलने वाला ग्रामीण रोजगार फंड अब केवल आबादी या जरूरत के आधार पर तय नहीं होगा. इसमें प्रदर्शन आधारित मानकों को भी शामिल किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने जा रही है. सरकार ने मनरेगा की जगह विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-GRAM) अधिनियम 2025 लागू करने की तैयारी शुरू कर दी है. नए सिस्टम में राज्यों को फंड का आवंटन उनके प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा. समय पर मजदूरी भुगतान, सामाजिक ऑडिट और काम पूरा करने जैसी शर्तों पर राज्यों की रैंकिंग तय होगी. यह नया कानून 1 जुलाई 2026 से पूरे देश में लागू किया जाएगा.
2026 से लागू होगा नया ग्रामीण रोजगार कानून
केंद्र सरकार ने शनिवार को VB-GRAM अधिनियम 2025 के मसौदा नियम सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए जारी किए. यह नया कानून महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MNREGAमनरेगा) की जगह लेगा. सरकार ने कहा है कि 21 जून 2026 तक लोग इस मसौदे पर अपनी राय दे सकते हैं.
राज्यों को प्रदर्शन के आधार पर मिलेगा फंड
मसौदा नियमों के अनुसार राज्यों को मिलने वाला ग्रामीण रोजगार फंड अब केवल आबादी या जरूरत के आधार पर तय नहीं होगा. इसमें प्रदर्शन आधारित मानकों को भी शामिल किया जाएगा.
इन मानकों में शामिल होंगे.
1. मजदूरी का समय पर भुगतान
2. सामाजिक ऑडिट का पालन
3. तय समय में कार्यों की पूर्णता
4. केंद्र द्वारा तय अन्य प्रदर्शन संकेतक
सरकार का मानना है कि इससे योजनाओं में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी.
16वें वित्त आयोग के फॉर्मूले का होगा इस्तेमाल
केंद्र सरकार ने कहा है कि राज्यों को “मानक फंड आवंटन” देने के लिए 16वें वित्त आयोग के क्षैतिज हस्तांतरण फॉर्मूले का इस्तेमाल किया जाएगा, यानी राज्यों की आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए राशि तय की जाएगी.
केंद्र और राज्यों के बीच ऐसे बंटेगा खर्च
मसौदे के अनुसार अधिकांश राज्यों में केंद्र और राज्य के बीच फंड शेयरिंग का अनुपात 60:40 रहेगा. वहीं उत्तर-पूर्व और पहाड़ी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 तय किया गया है.
सिविल सोसायटी समूहों ने उठाए सवाल
नई व्यवस्था को लेकर कुछ सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई है. उनका कहना है कि प्रदर्शन आधारित मॉडल से केंद्र सरकार को राज्यों के फंड पर ज्यादा नियंत्रण मिल जाएगा. इससे जरूरतमंद राज्यों में कर्मचारियों के दिनों की संख्या कम हो सकती है और मनरेगा की मांग आधारित मूल भावना प्रभावित होगी.
सरकार ने आलोचनाओं को किया खारिज
केंद्र सरकार ने FAQ जारी कर इन आरोपों को खारिज किया है. सरकार का कहना है कि नया मॉडल बजट प्रबंधन को अधिक व्यवस्थित बनाएगा और रोजगार गारंटी पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा. सरकार के मुताबिक पूरी तरह मांग आधारित मॉडल से बजट आवंटन में असंतुलन और वित्तीय दबाव पैदा हो सकता है.
ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बड़ा बदलाव माना जा रहा फैसला
विशेषज्ञों का मानना है कि VB-GRAM अधिनियम ग्रामीण रोजगार योजनाओं के संचालन का तरीका पूरी तरह बदल सकता है. अब राज्यों को ज्यादा फंड पाने के लिए बेहतर प्रदर्शन दिखाना होगा. इससे योजनाओं में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है, लेकिन कमजोर राज्यों पर दबाव भी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.
इस समझौते से व्यापार, निवेश, टेक्नोलॉजी, सप्लाई चेन और रणनीतिक सहयोग के नए अवसर खुल सकते हैं. साथ ही दोनों देशों के बीच कारोबारी माहौल और निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होने की उम्मीद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापारिक बातचीत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने संकेत दिए हैं कि दोनों देश जल्द ही एक बड़ी ट्रेड डील को अंतिम रूप दे सकते हैं. नई दिल्ली में विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बैठक के बाद रूबियो ने कहा कि प्रस्तावित समझौता दोनों देशों के लिए फायदेमंद और लंबे समय तक टिकाऊ साबित होगा. हालांकि दूसरी ओर टैरिफ विवाद और अमेरिकी व्यापार नियमों में बदलाव को लेकर 500 बिलियन डॉलर के संभावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर सवाल भी उठने लगे हैं. बता दें, इन दिनों रूबियो भारत दौरे पर आए हैं और रविवार को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की.
रविवार को रूबियो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की.
व्यापार से लेकर रक्षा तक कई मुद्दों पर चर्चा
नई दिल्ली में हुई बैठक के दौरान भारत और अमेरिका के बीच व्यापार, ऊर्जा, रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज और रणनीतिक साझेदारी जैसे कई अहम मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई. रूबियो ने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत में “जबरदस्त प्रगति” हुई है और अब ऐसा समझौता तैयार करने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है, जो दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों को मजबूत करेगा.
जल्द भारत आएगा अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल
अमेरिकी विदेश मंत्री ने जानकारी दी कि बहुत जल्द एक अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल भारत का दौरा करेगा. इस दौरान प्रस्तावित ट्रेड डील को आगे बढ़ाने और अंतिम रूप देने पर चर्चा होगी. इस बयान को दोनों देशों के बीच तेज होती बातचीत और समझौते की दिशा में सकारात्मक संकेत माना जा रहा है.
भारत को बताया अहम व्यापारिक साझेदार
रूबियो ने भारत को अमेरिका का बड़ा और बेहद महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार बताया. उन्होंने कहा कि भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था के साथ मजबूत और संतुलित व्यापारिक संबंध बनाना अमेरिका की प्राथमिकताओं में शामिल है. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ऐसे ट्रेड एग्रीमेंट चाहता है, जिनसे दोनों देशों को समान रूप से लाभ मिले.
500 बिलियन डॉलर ट्रेड डील पर नई बहस
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित 500 बिलियन डॉलर के ट्रेड और खरीद समझौते को लेकर अब नई बहस शुरू हो गई है. रूबियो ने दावा किया कि भारत अगले पांच वर्षों में अमेरिका से ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खरीदारी कर सकता है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि भारत ने अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर के सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है. यह खरीद मुख्य रूप से ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और एग्रीकल्चर सेक्टर पर केंद्रित हो सकती है.
टैरिफ विवाद से बढ़ी चिंता
हालांकि ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने इस प्रस्तावित समझौते को लेकर चिंता जताई है. संस्था का कहना है कि अमेरिकी टैरिफ नियमों में हालिया बदलाव के बाद इस डील की बुनियाद कमजोर पड़ सकती है. विशेषज्ञों के मुताबिक अगर दोनों देशों के बीच टैरिफ और बाजार पहुंच को लेकर सहमति नहीं बनती, तो प्रस्तावित समझौते को लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
ट्रंप प्रशासन की नीति पर क्या बोले रूबियो?
संयुक्त प्रेस वार्ता में रूबियो ने साफ कहा कि अमेरिका की ट्रेड पॉलिसी किसी एक देश को निशाना बनाने के लिए नहीं है. उन्होंने कहा कि अमेरिका अपनी व्यापार व्यवस्था को फिर से संतुलित करना चाहता है ताकि उसकी अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक फायदा मिल सके. रूबियो ने कहा कि अमेरिका दुनिया के कई देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को नए तरीके से मजबूत और संतुलित करने की दिशा में काम कर रहा है.
क्या हो सकता है ट्रेड डील का असर?
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर भारत और अमेरिका के बीच यह संभावित ट्रेड डील सफल होती है, तो इससे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को बड़ा बढ़ावा मिल सकता है. इस समझौते से व्यापार, निवेश, टेक्नोलॉजी, सप्लाई चेन और रणनीतिक सहयोग के नए अवसर खुल सकते हैं. साथ ही दोनों देशों के बीच कारोबारी माहौल और निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होने की उम्मीद है.
आवास और शहरी कार्य मंत्रालय के कहा है कि नई दिल्ली के सफदरजंग रोड स्थित 27.3 एकड़ भूमि को मूल रूप से सामाजिक और खेल गतिविधियों के लिए क्लब चलाने हेतु लीज पर दिया गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा ढांचे को मजबूत करने और सार्वजनिक हित का हवाला देते हुए राजधानी दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित जिमखाना क्लब (Delhi Gymkhana Club) की जमीन को अपने कब्जे में लेने का बड़ा फैसला किया है. सरकार ने क्लब को 5 जून 2026 तक परिसर खाली कर शांतिपूर्ण तरीके से कब्जा सौंपने का निर्देश दिया है. यह क्लब दशकों से देश के सबसे प्रभावशाली और विशिष्ट क्लबों में गिना जाता रहा है.
27.3 एकड़ जमीन पर केंद्र का कब्जा
आवास और शहरी कार्य मंत्रालय ने 22 मई 2026 को जारी आधिकारिक आदेश में कहा कि नई दिल्ली के सफदरजंग रोड स्थित 27.3 एकड़ भूमि को मूल रूप से सामाजिक और खेल गतिविधियों के लिए क्लब चलाने हेतु लीज पर दिया गया था.
सरकार के मुताबिक यह इलाका राष्ट्रीय राजधानी का “अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र” है, जहां अब रक्षा ढांचे को मजबूत करने, सार्वजनिक सुरक्षा और अन्य जरूरी प्रशासनिक परियोजनाओं के लिए जमीन की आवश्यकता है.
लीज की शर्तों का दिया हवाला
केंद्र सरकार ने लीज डीड की धारा 4 का हवाला देते हुए कहा कि यदि भूमि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जरूरी हो तो सरकार को दोबारा कब्जा लेने का कानूनी अधिकार है. इसी आधार पर भारत के राष्ट्रपति की ओर से लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) ने क्लब की लीज समाप्त करने और तत्काल प्रभाव से जमीन पर दोबारा कब्जा लेने का आदेश जारी किया है.
भवन, लॉन और संरचनाएं भी होंगी सरकार के अधीन
सरकारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि दोबारा कब्जा लेने के बाद पूरी जमीन, भवन, संरचनाएं, लॉन और परिसर में मौजूद सभी फिटिंग्स सरकार के अधिकार में आ जाएंगी. क्लब प्रबंधन को निर्देश दिया गया है कि वह 5 जून 2026 तक परिसर का शांतिपूर्ण कब्जा सरकार को सौंप दे. ऐसा नहीं करने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है.
दशकों से अभिजात्य क्लब के रूप में रही पहचान
दिल्ली जिमखाना क्लब लंबे समय से देश के सबसे प्रतिष्ठित और विशिष्ट क्लबों में माना जाता रहा है. वर्षों से ऐसे क्लबों को ऐसे स्थानों के रूप में देखा जाता रहा है, जहां पहुंच और प्रभाव को योग्यता से अधिक महत्व मिलता रहा. सरकार के इस फैसले को इस संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक जरूरतें और सार्वजनिक हित किसी भी विशेषाधिकार से ऊपर हैं.
शुक्रवार को सेंसेक्स 231.99 अंक यानी 0.31 फीसदी की तेजी के साथ 75,415.35 अंक पर बंद हुआ था. वहीं निफ्टी 64.60 अंक यानी 0.27 फीसदी चढ़कर 23,719.30 अंक पर बंद हुआ था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शुक्रवार 22 मई को घरेलू शेयर बाजार मजबूती के साथ बंद हुआ था. बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयरों में खरीदारी तथा रुपये में मजबूती के चलते बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी में भी बढ़त दर्ज हुई. हालांकि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई थी. अब आज, 25 मई को बाजार की नजर ग्लोबल संकेतों, GIFT Nifty, एशियाई बाजारों की तेजी, Q4 नतीजों और बड़े इंडेक्स बदलावों पर रहेगी, जिससे बाजार में दमदार शुरुआत की उम्मीद जताई जा रही है.
शुक्रवार को सेंसेक्स और निफ्टी में रही तेजी
शुक्रवार के कारोबारी सत्र के अंत में बीएसई सेंसेक्स 231.99 अंक यानी 0.31 फीसदी की तेजी के साथ 75,415.35 अंक पर बंद हुआ था. वहीं एनएसई निफ्टी 64.60 अंक यानी 0.27 फीसदी चढ़कर 23,719.30 अंक पर पहुंच गया था.
कारोबार के दौरान सेंसेक्स 500 अंकों से ज्यादा उछला था, जबकि निफ्टी 23,800 के करीब पहुंच गया था. दिनभर के उतार-चढ़ाव के बावजूद बैंकिंग और वित्तीय शेयरों ने बाजार को मजबूती दी.
रुपये में आई मजबूती
भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार दूसरे दिन मजबूत हुआ था. रुपया 0.54 फीसदी की मजबूती के साथ 95.68 के स्तर पर बंद हुआ. रुपये में मजबूती से विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ा और इसका सकारात्मक असर शेयर बाजार में देखने को मिला.
बैंकिंग शेयरों ने दिखाई ताकत
सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 17 बढ़त के साथ बंद हुए थे. ट्रेंट में सबसे ज्यादा 3 फीसदी से अधिक तेजी दर्ज की गई थी. इसके अलावा एक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एशियन पेंट्स, कोटक महिंद्रा बैंक और बजाज फिनसर्व के शेयरों में भी एक फीसदी से ज्यादा मजबूती देखने को मिली थी. निफ्टी में ट्रेंट, श्रीराम फाइनेंस और एक्सिस बैंक टॉप गेनर्स रहे थे.
इन शेयरों में रही गिरावट
बाजार में तेजी के बावजूद सन फार्मा, आईटीसी, पावरग्रिड, बीईएल, भारती एयरटेल, इन्फोसिस और महिंद्रा एंड महिंद्रा के शेयर दबाव में रहे थे. वहीं निफ्टी फार्मा, हेल्थकेयर और मीडिया इंडेक्स में कमजोरी दर्ज की गई थी.
अब सोमवार को बाजार का क्या रहेगा मूड?
सोमवार, 25 मई को भारतीय शेयर बाजार में मजबूत शुरुआत की उम्मीद जताई जा रही है. सुबह GIFT Nifty 272 अंकों की तेजी के साथ 24,016 के स्तर पर कारोबार करता दिखा, जिससे संकेत मिल रहे हैं कि बाजार हरे निशान में खुल सकता है. एशियाई बाजारों में भी शानदार तेजी देखने को मिली. जापान का Nikkei पहली बार 65,000 के पार पहुंच गया. Strait of Hormuz दोबारा खुलने की संभावनाओं और अमेरिका-ईरान वार्ता में प्रगति के संकेतों से कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आई, जिससे निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है.
आज इन शेयरों और खबरों पर रहेगी नजर
आज TVS Motor Company, Adani Enterprises, One 97 Communications और Ashok Leyland जैसे शेयर इंडेक्स बदलावों के चलते फोकस में रहेंगे. इसके अलावा Suzlon Energy, Rail Vikas Nigam Limited, NBCC (India) और Aditya Birla Fashion and Retail समेत कई कंपनियां अपने मार्च तिमाही के नतीजे जारी करेंगी. वहीं JSW Cement, Adani Energy Solutions, Lupin, Aurobindo Pharma, RBL Bank और Paytm में ब्लॉक डील्स, रेगुलेटरी अपडेट्स और ओपन ऑफर जैसी खबरों पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
विप्रो ने नियामकीय फाइलिंग में बताया कि 2 रुपये फेस वैल्यू वाले 60 करोड़ तक इक्विटी शेयरों को वापस खरीदने के प्रस्ताव को कंपनी के बोर्ड और शेयरधारकों दोनों की मंजूरी मिल चुकी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की प्रमुख आईटी कंपनी विप्रो (Wipro) ने अपने 15,000 करोड़ रुपये के शेयर बायबैक कार्यक्रम के लिए 5 जून 2026 को रिकॉर्ड डेट तय कर दी है. इस तारीख तक जिन निवेशकों के पास कंपनी के शेयर होंगे, वही इस बायबैक योजना में हिस्सा लेने के पात्र होंगे. कंपनी ने अप्रैल में इस बायबैक का ऐलान किया था.
60 करोड़ शेयर खरीदेगी कंपनी
बेंगलुरु मुख्यालय वाली विप्रो ने 16 अप्रैल 2026 को बायबैक योजना की घोषणा की थी. कंपनी के बोर्ड ने टेंडर ऑफर के जरिए 60 करोड़ तक पूरी तरह चुकता इक्विटी शेयर वापस खरीदने को मंजूरी दी थी. यह कंपनी की कुल इक्विटी पूंजी का 5 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है. कंपनी प्रति शेयर 250 रुपये की कीमत पर शेयर वापस खरीदेगी. इस पूरी प्रक्रिया पर अधिकतम 15,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.
करीब तीन साल बाद कर रही है बायबैक
यह लगभग तीन साल बाद विप्रो का पहला शेयर बायबैक होगा. इससे पहले कंपनी ने जून 2023 में 12,000 करोड़ रुपये का बायबैक किया था. उस दौरान 22 जून से 30 जून 2023 के बीच कंपनी ने 26.96 करोड़ इक्विटी शेयर वापस खरीदे थे. उस समय कंपनी ने अपनी कुल इक्विटी का करीब 4.91 प्रतिशत हिस्सा 445 रुपये प्रति शेयर के भाव पर खरीदा था. हालांकि दिसंबर 2024 में घोषित 1:1 बोनस इश्यू के बाद इस कीमत को समायोजित नहीं किया गया है.
बोर्ड और शेयरधारकों से मिली मंजूरी
विप्रो ने नियामकीय फाइलिंग में बताया कि 2 रुपये फेस वैल्यू वाले 60 करोड़ तक इक्विटी शेयरों को वापस खरीदने के प्रस्ताव को कंपनी के बोर्ड और शेयरधारकों दोनों की मंजूरी मिल चुकी है. कंपनी ने यह भी कहा कि प्रमोटर और प्रमोटर समूह के सदस्य भी इस बायबैक में हिस्सा लेने का इरादा रखते हैं.
क्या होता है शेयर बायबैक
शेयर बायबैक को आमतौर पर कंपनी द्वारा अतिरिक्त नकदी को शेयरधारकों को लौटाने का तरीका माना जाता है. इससे बाजार में उपलब्ध शेयरों की संख्या घटती है, जिससे प्रति शेयर आय यानी EPS बेहतर हो सकती है और निवेशकों का भरोसा मजबूत होता है.
शेयर में दिखी तेजी
बायबैक रिकॉर्ड डेट की घोषणा के बाद शुक्रवार को Wipro के शेयरों में तेजी देखने को मिली. NSE पर कंपनी का शेयर 1.62 प्रतिशत बढ़कर 202.97 रुपये पर बंद हुआ.