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सरकारी टकसाल SPMCIL की चांदी नीलामी रद्द करने पर विवाद, कीमतों में तेज उछाल के बीच मचा बवंडर

क्या यह प्रशासनिक चूक थी या प्रक्रिया के नाम पर बाजार की किसी नाराजगी का नतीजा?

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

पलक शाह

जो एक सामान्य सरकारी बुलियन नीलामी के रूप में शुरू हुआ था, वह अब एक बड़े विवाद में बदल चुका है, जिसने पारदर्शिता, अनुबंधों की पवित्रता और इस सवाल को सामने ला दिया है कि क्या कीमतों के लालच ने प्रक्रिया पर भारी पड़ गया.

इस विवाद के केंद्र में है सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SPMCIL) और उसकी हैदराबाद टकसाल, जिस पर चांदी की कीमतों में तेज उछाल आने के कुछ ही दिनों बाद एक पूरी हो चुकी चांदी की नीलामी को अचानक रद्द करने का आरोप है.

सौदा हुआ, फिर पलटा फैसला

17 दिसंबर 2025 को, SPMCIL की इंडिया गवर्नमेंट मिंट, हैदराबाद ने परिष्कृत चांदी की छड़ों (शुद्धता 995 से 998.4 तक) की नीलामी MSTC लिमिटेड के माध्यम से की, जो सरकारी परिसंपत्तियों की ई-नीलामी के लिए जिम्मेदार एक पीएसयू है.

बोलीदाताओं में से कुल मिलाकर 900 किलोग्राम से अधिक चांदी के साथ ऑगमोंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड तीन बड़े लॉट्स के लिए सफल बोलीदाता बनकर उभरी.

बोलियां प्रतिस्पर्धी थीं, कागजी कार्रवाई साफ थी और भुगतान वास्तविक था:

1. अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट (₹1.16 करोड़) 16 दिसंबर को जमा
2. बैलेंस सिक्योरिटी डिपॉजिट (₹1.42 करोड़) 18 दिसंबर को जमा
3. MSTC द्वारा 19 दिसंबर को बोली स्वीकृति और स्वीकृति पत्र जारी

सभी पारंपरिक नीलामी मानकों के अनुसार, बिक्री पूरी हो चुकी थी. डिलीवरी और अंतिम भुगतान 27 दिसंबर तक निर्धारित थे.

फिर अचानक यू-टर्न आया

“प्रशासनिक कारण” या बाजार में घबराहट?

22 दिसंबर को, औपचारिक स्वीकृति के महज तीन दिन बाद, MSTC ने विजेता बोलीदाता को एक संक्षिप्त ईमेल भेजकर चौंका दिया: लॉट संख्या 01, 08 और 09 को रद्द कर दिया गया. कारण बताया गया, “प्रशासनिक कारण”, जो जितना अस्पष्ट था, उतना ही व्यापक भी. सभी पूर्व दस्तावेजों को शून्य और अमान्य घोषित कर दिया गया.

इसके तुरंत बाद, SPMCIL के हैदराबाद अधिकारी दुर्गेश देशमुख ने कथित तौर पर रिफंड की प्रक्रिया के लिए बैंक विवरण मांगे.

लेकिन तब तक, चांदी की कीमतें अपनी कहानी खुद बयां कर चुकी थीं.

नीलामी की तारीख और रद्दीकरण के बीच चांदी की कीमतें तेजी से बढ़ीं, करीब ₹1.64 लाख प्रति किलो से बढ़कर ₹2 लाख प्रति किलो से ऊपर पहुंच गईं. यह उछाल वैश्विक स्तर पर औद्योगिक मांग, सीमित आपूर्ति और सट्टेबाज़ी के जोर से आया. सालाना आधार पर चांदी पहले ही लगभग 94% ऊपर थी.

ऑगमोंट के लिए, समय को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन था.

मुख्य आरोप: जो कीमत पसंद न आए, उसे रद्द नहीं किया जा सकता

9 जनवरी 2026 को पीएमओ में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई. जोकि इंडियन बुलियन एंड ज्वेलरी एसोसिएशन ने अपने सदस्य ऑगमोंट की ओर से दायर की थी. इसमें स्पष्ट आरोप लगाया गया है कि SPMCIL और MSTC ने एक कानूनी रूप से पूरी हो चुकी नीलामी को कथित तौर पर इसलिए रद्द किया, क्योंकि सरकार को अचानक एहसास हुआ कि चांदी बहुत सस्ते में बेच दी गई थी.

शिकायत में तर्क दिया गया है कि एक बार बोलियां स्वीकार हो जाएं, भुगतान मिल जाए और पुष्टि पत्र जारी हो जाएं, तो नीलामी नियम एकतरफा रद्दीकरण की अनुमति नहीं देते, खासतौर पर तब नहीं, जब बाजार की कीमतें विक्रेता के खिलाफ चली जाएं. संबंधित चांदी का कुल मूल्य ₹17.6 करोड़ से अधिक था, और ऑगमोंट रिफंड नहीं, बल्कि बिक्री को लागू करने की मांग कर रहा है.

अधिकारियों की चुप्पी

इस विवाद को और भड़काने वाली बात यह है कि अब तक क्या नहीं हुआ है. फिलहाल, न तो SPMCIL और न ही MSTC की ओर से कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण, कोई नीति स्पष्टता या कोई पारदर्शिता नोट जारी किया गया है, जो यह बताए:

1. कौन सा सटीक “प्रशासनिक कारण” केवल कुछ चुनिंदा लॉट्स को रद्द करने के लिए पर्याप्त था
2. कीमत तय हो जाने, स्वीकृति और जमा राशि के बाद रद्दीकरण क्यों किया गया
3. क्या अब भविष्य की सरकारी नीलामियों को भी, जब बाजार सरकारी खजाने के खिलाफ जाए, पिछली तारीख से पलटा जा सकता है

बुलियन ट्रेडिंग की सख्त नियामक दुनिया में, यह चुप्पी बेहद शोर मचाने वाली है.

सरकारी नीलामियों पर बड़े सवाल

इसका असर सिर्फ एक चांदी की नीलामी तक सीमित नहीं है.

अगर कोई सरकारी पीएसयू भुगतान स्वीकार करने के बाद केवल इस आधार पर पूरी हो चुकी बिक्री को रद्द कर सकता है, कि कमोडिटी की कीमतें बढ़ गई हैं, तो बोलीदाता स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठाने को मजबूर हैं:

क्या सरकारी नीलामियां बाध्यकारी अनुबंध हैं, या सिर्फ वैकल्पिक कीमतों पर दांव?

बाजार सहभागियों के लिए, यह घटना सार्वजनिक परिसंपत्ति निपटान प्रणालियों की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है. SPMCIL और MSTC के लिए, यह चांदी की छड़ों से आगे जाकर, शासन, नियमों के पालन और संस्थागत ईमानदारी तक जांच के दरवाजे खोलती है.

और बाजार के लिए, संदेश सिहरन पैदा करने वाला है: आज ईमानदारी से जीतिए, कल कीमतें बहुत तेजी से बढ़ गईं तो सब कुछ गंवा दीजिए.

जैसे-जैसे चांदी अपनी लगातार चढ़ान जारी रखे हुए है, अब मिंट रोड और मिंट स्ट्रीट, दोनों पर एक सवाल भारी होकर लटका है:
क्या यह एक प्रशासनिक चूक थी या प्रक्रिया के भेष में छिपा बाजार का पछतावा? 

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.

19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)

 

 

 

 

 


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