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फैक्ट चेक यूनिट पर रोक बरकरार, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का AIM ने किया स्वागत

संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत यदि सरकार की नामित फैक्ट चेक यूनिट किसी सामग्री को चिह्नित करती, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म को उसे हटाना पड़ सकता था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन (AIM) ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का स्वागत किया है, जिसमें अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है, जिसने सरकार के प्रस्तावित फैक्ट चेक यूनिट (FCU) से जुड़े प्रावधान को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था. AIM इस मामले में याचिकाकर्ताओं में शामिल था और उसने FCU की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल FCU लागू करने पर लगाई रोक

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नोटिस जारी कर दिया है और आगे विस्तृत सुनवाई करेगा, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले पर रोक न लगाकर फिलहाल केंद्र सरकार को प्रस्तावित FCU को लागू करने से रोक दिया गया है. इससे उस व्यवस्था के लागू होने पर विराम लगा है, जिसके तहत केंद्र सरकार को यह तय करने की व्यापक शक्तियां मिल सकती थीं कि उसके कामकाज से जुड़ी कौन-सी जानकारी “फेक”, “झूठी” या “भ्रामक” है.

मीडिया और सिविल सोसाइटी ने जताई थी चिंता

संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत यदि सरकार की नामित फैक्ट चेक यूनिट किसी सामग्री को चिह्नित करती, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म को उसे हटाना पड़ सकता था. ऐसा न करने पर प्लेटफॉर्म अपने “सेफ हार्बर” संरक्षण को खोने के जोखिम में आ सकते थे. इस प्रावधान को लेकर मीडिया और नागरिक समाज में कार्यपालिका के संभावित अतिक्रमण को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गई थीं.

सरकार खुद बन सकती थी शिकायतकर्ता और निर्णायक

इन प्रावधानों को इसलिए भी चिंताजनक माना गया क्योंकि इनमें सरकार को अपने ही कामकाज से जुड़ी रिपोर्टिंग की सत्यता तय करने का अधिकार मिल जाता. “फेक”, “फॉल्स” और “मिसलीडिंग” जैसे शब्दों की स्पष्ट परिभाषा भी नहीं दी गई थी. ऐसे में सरकार एक ही मामले में शिकायतकर्ता और फैसला सुनाने वाली दोनों बन सकती थी.

AIM ने फैसले को बताया प्रेस की आजादी के लिए अहम

AIM के अध्यक्ष और इंडिया टुडे ग्रुप के पब्लिशिंग सीईओ मनोज शर्मा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक बहस की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है. वहीं AIM के पूर्व अध्यक्ष और कारवां मैगज़ीन के संपादक अनंत नाथ ने कहा कि यदि सरकार को अपने कामकाज से जुड़ी रिपोर्टिंग को एकतरफा तरीके से “फेक” या “भ्रामक” बताने की अनुमति मिल जाती, तो इससे पत्रकारिता पर गहरा नकारात्मक असर पड़ सकता था.

इन वकीलों ने की AIM की पैरवी

इस मामले में AIM की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने पैरवी की. उनके साथ अधिवक्ता अपार गुप्ता, वृंदा भंडारी (AoR) और इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने भी इस नियम को चुनौती देने में सहयोग किया.

2023 के IT नियम संशोधन के बाद शुरू हुआ विवाद

यह कानूनी चुनौती तब सामने आई थी जब सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2023 के तहत केंद्र सरकार को फैक्ट चेक यूनिट स्थापित करने का अधिकार देने वाला प्रावधान जोड़ा गया था. इस यूनिट को केंद्र सरकार के कामकाज से जुड़ी जानकारी को “फेक”, “फॉल्स” या “मिसलीडिंग” घोषित करने का अधिकार मिल सकता था.

कई संगठनों और पत्रकारों ने दायर की थी याचिका

इस प्रावधान के संवैधानिक प्रभावों को लेकर चिंतित कई याचिकाकर्ताओं ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था. इनमें एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगज़ीन, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा समेत कई पत्रकार और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल थे. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकार को अपने ही बारे में रिपोर्टिंग की सच्चाई तय करने का अधिकार देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को कमजोर कर सकता है.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2024 में प्रावधान को किया था रद्द

मार्च 2024 में दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने संशोधित आईटी नियमों के उस प्रावधान को रद्द कर दिया था, जिसके तहत फैक्ट चेक यूनिट का गठन किया जाना था. अदालत ने कहा था कि यह प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक संरक्षण का उल्लंघन करता है.

अदालत ने कहा- नियम में पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान नहीं

अदालत ने यह भी पाया कि यह नियम ऑनलाइन अभिव्यक्ति पर मनमाने और असंगत प्रतिबंध लगाता है और इसमें पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय भी नहीं हैं. साथ ही अदालत ने कहा था कि सरकार को अपने ही कामकाज से जुड़ी ऑनलाइन सामग्री को “फेक” या “भ्रामक” घोषित करने की अनुमति देने से पत्रकारिता और सार्वजनिक विमर्श पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.
 


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