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टैरिफ युद्ध : मोदी की दीर्घकालिक रणनीति बनाम ट्रंप की दिखावटी राजनीति

ट्रंप का ट्रेड वॉर महज एक दिखावा है, जो उनके समर्थकों को भड़काता है, लेकिन मई 2025 के कोर्ट फैसलों ने उनकी टैरिफ शक्तियों को सीमित कर दिया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पलक शाह

अमेरिका के टैरिफ और धमकियों के पीछे एक गंभीर आर्थिक मुकाबला चल रहा है. इसमें नरेंद्र मोदी का भारत सोच-समझकर लंबी रणनीति के तहत कदम बढ़ा रहा है, जबकि डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका केवल लोकप्रियता बटोरने के लिए दिखावा कर रहा है. 30 जुलाई 2025 को राष्ट्रपति ट्रंप ने 1 अगस्त से भारतीय वस्तुओं पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाने की घोषणा की और साथ ही रूस के साथ भारत के ऊर्जा और रक्षा सौदों को लेकर एक अस्पष्ट "सजा0" भी तय की. यह कदम उनकी घटती अंतरराष्ट्रीय पकड़ को छिपाने की एक दिखावटी कोशिश लगती है. दूसरी ओर, भारत ने 26 प्रतिशत टैरिफ लगाकर साफ संकेत दिया है कि वह मजबूती से खड़ा है. ये टैरिफ अब भारत की आर्थिक और राजनीतिक मजबूती का प्रतीक बन चुके हैं, जो ट्रंप की धमकियों को बेमानी साबित कर रहे हैं.

ट्रंप, हमेशा की तरह एक शोमैन, ने अमेरिकी ट्रेड प्रतिनिधि (USTR) की 2024 की रिपोर्ट को हथियार बनाया, जिसमें भारत की व्यापार नीतियों को “संरक्षणवाद का जहर” बताया गया. उन्होंने सेब, बादाम और तकनीकी हार्डवेयर पर भारत के 26 प्रतिशत शुल्क को $45.8 बिलियन के व्यापार घाटे के लिए जिम्मेदार ठहराया. उनके 'ट्रुथ सोशल' पर भड़कते पोस्ट “भारत के टैरिफ शर्मनाक हैं!” और प्रतिबंधों की धमकियाँ केवल एक तमाशा हैं, जो संयोगवश उस समय आए जब मई में भारत के ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान के भीतर 9 आतंकी ठिकानों पर सटीक हमलों से पूरी दुनिया को चौंका दिया था.

कहा जा रहा है कि भारत का 10 मई को नूर खान एयरबेस पर किया गया मिसाइल हमला, जो पाकिस्तान के स्ट्रैटेजिक प्लान्स डिवीजन के पास स्थित है. संभवतः अमेरिकी-आपूर्ति वाले सैन्य संसाधनों को क्षति पहुँचा सकता है या कैराना हिल्स को झकझोर सकता है, जो पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार का संभावित ठिकाना माना जाता है. यह भू-राजनीतिक झटका ट्रंप को अस्थिर कर गया है, और उनके टैरिफ महज एक बेतहाशा कोशिश हैं अपनी खोई हुई पकड़ को वापस पाने की.

भारत के 26 प्रतिशत टैरिफ उस राष्ट्र की इस्पाती रीढ़ हैं जो आर्थिक श्रेष्ठता की ओर तेज़ी से अग्रसर है, जो चीन की राज्य-प्रायोजित दिग्गज कंपनियों से सोलर पैनल निर्माताओं और ऑटो कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स की रक्षा करते हैं। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, मोदी की “मेक इन इंडिया” पहल ने 2014 से अब तक 1.5 करोड़ नौकरियाँ पैदा की हैं, और 2023 के $28.3 बिलियन के सीमा शुल्क राजस्व ने इंफ्रास्ट्रक्चर और छोटे व्यवसायों को बढ़ावा दिया है. जब ट्रंप की टीम ने 2023 में टैरिफ में कटौती की माँग की, भारत ने पलटवार करते हुए अमेरिकी सेब पर 20 प्रतिशत शुल्क बढ़ा दिया, जिससे निर्यातकों को $1.2 बिलियन का नुकसान हुआ, यूएसडीए डेटा के अनुसार. यह कोई नीति नहीं संप्रभुता है, भारत की $4.5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था पर विदेशी दिग्गजों को हावी न होने देने का संकल्प.

भूराजनैतिक रूप से, भारत तीन-आयामी शतरंज खेलता है जबकि ट्रंप हथौड़ा चलाते हैं. अमेरिका को चीन के इंडो-पैसिफिक प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए क्वाड में भारत की आवश्यकता है, लेकिन ट्रंप स्थिति को ठीक से नहीं समझते. भारत का रूस के साथ व्यापार 2024 में $65.4 बिलियन तक पहुँच गया, और रियायती तेल से सालाना $12 बिलियन की बचत हुई, विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह रणनीतिक बदलाव यह संकेत देता है कि भारत पश्चिमी बाजारों के बिना भी फल-फूल सकता है. ट्रंप की धमकियाँ प्रतिबंधों को सख्त करने या भारत के जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेस (जो 2019 में समाप्त हुआ) को अवरुद्ध करने की, भारत के 1.4 बिलियन उपभोक्ताओं वाले बाज़ार, जो हर साल 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, और मास्को से टोक्यो तक फैले साझेदारों के सामने बेअसर हैं. उनके X (पूर्व ट्विटर) पर भड़कने वाले बयान भारत के $30 बिलियन के ASEAN व्यापार वृद्धि (2024) के सामने एक तमाशा भर हैं.

देश में, मोदी राजनीतिक संतुलन के रस्सी पर चल रहे हैं

टैरिफ में कटौती करने से किसानों और श्रमिक यूनियनों में असंतोष पैदा हो सकता है, क्योंकि वे इन शुल्कों को अपनी आजीविका का सुरक्षा कवच मानते हैं. *इंडिया टुडे* के अनुसार, 2024 में पंजाब में हुए विरोध प्रदर्शन में 2 लाख लोग शामिल हुए, जिन्होंने अमेरिकी मक्का आयात के कारण स्थानीय किसानों की $2 बिलियन की आय पर खतरे को देखते हुए टैरिफ बढ़ाने की माँग की. वहीं, Centre for Monitoring Indian Economy के अनुसार, ऑटो कंपोनेंट सेक्टर में 3.7 मिलियन लोग कार्यरत हैं, और अगर टैरिफ घटाए गए तो 2027 तक करीब 5 लाख नौकरियाँ खतरे में पड़ सकती हैं. यह क्षेत्र एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है.

मोदी, एक राष्ट्रवादी कुशल रणनीतिकार, जानते हैं कि ट्रंप के आगे झुकना उनके “आत्मनिर्भर भारत” ब्रांड को धूमिल कर देगा. जुलाई 2025 में अमेरिकी सोयाबीन पर टैरिफ बढ़ाना, जिससे अमेरिकी किसानों को $600 मिलियन का नुकसान हुआ, 2029 के चुनाव के लिए उनके समर्थन आधार को फिर से जोड़ने वाला कदम साबित हुआ.

वैश्विक स्तर पर, IMF के अनुमानों के अनुसार 2025 में भारत की 6.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि अमेरिका की 2.1 प्रतिशत वृद्धि से कहीं अधिक है. उसके WTO-अनुरूप टैरिफ ट्रंप के आरोपों से उसे सुरक्षा प्रदान करते हैं, जबकि अमेरिका के स्टील (25 प्रतिशत) और एल्युमीनियम (10 प्रतिशत) टैरिफ, जिससे भारत को 2024 में $2.3 बिलियन का नुकसान हुआ, ट्रंप की दोहरी नीति को उजागर करते हैं. भारत के वार्ताकार, जो दशकों से व्यापार युद्धों से परिपक्व हो चुके हैं, समय की ताकत पर भरोसा करते हैं; $14.6 बिलियन के स्मार्टफोन निर्यात ट्रंप के टैरिफ से अब तक बचते रहे हैं. 25 अगस्त को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल के आगमन की संभावना है, लेकिन वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का रुख “हम अपने राष्ट्रीय हित की रक्षा करेंगे” किसी भी प्रकार की पीछे हटने की संभावना को नकारता है.

जो कुछ पक रहा है, वह तख्तापलट नहीं बल्कि एक लगातार चलने वाली रणनीति है. ट्रंप का ट्रेड वॉर सिर्फ एक नाटकीय प्रदर्शन है 'ट्रुथ सोशल' पर भड़काऊ बयान और टैरिफ की धमकियाँ जो उनके समर्थकों को तो उत्साहित करती हैं, लेकिन मई 2025 के अमेरिकी अदालत के फैसलों के बाद उनकी टैरिफ लगाने की शक्तियों पर लगाम लग गई है. मोदी का भारत, एक ग्रैंडमास्टर की तरह, टैरिफ को आर्थिक आवश्यकता, भू-राजनीतिक साहस और घरेलू मजबूती के किले के रूप में इस्तेमाल करता है. जब ट्रंप अपनी शोबाज़ी में लगे हैं, भारत अमेरिकी दबाव को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है, और उसकी $4.5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था वैश्विक नियमों को फिर से परिभाषित कर रही है. ट्रंप के टैरिफ सर्कस का पर्दा गिर रहा है, और मोदी की दीर्घकालिक रणनीति अब तेज़ी से गर्म हो रही है.
 


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