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भारत के निर्यात विस्तार की सफलता राज्यों की तैयारी पर टिकी: रिपोर्ट

नीति आयोग की रिपोर्ट साफ करती है कि भारत के निर्यात लक्ष्य केवल राष्ट्रीय स्तर की नीतियों पर निर्भर नहीं हैं. राज्यों और जिलों की तैयारी, उनके इन्फ्रास्ट्रक्चर, शासन, कारोबारी माहौल और जिला-स्तरीय क्रियान्वयन की क्षमता ही देश के निर्यात विस्तार की दिशा तय करती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

भारत को वैश्विक निर्यात महाशक्ति बनाने की महत्वाकांक्षा राज्यों की तैयारी पर निर्भर करेगी. नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब तक राज्य इन्फ्रास्ट्रक्चर, शासन और जिला-स्तरीय क्रियान्वयन में मौजूद गहरी खामियों को दूर नहीं करते, तब तक निर्यात वृद्धि असमान और बाहरी झटकों के प्रति कमजोर बनी रहेगी.

एक्सपोर्ट प्रिपेयर्डनेस इंडेक्स 2024 के प्रमुख निष्कर्ष

नीति आयोग द्वारा जारी एक्सपोर्ट प्रिपेयर्डनेस इंडेक्स (EPI) 2024 में बताया गया है कि कुछ राज्यों ने अपेक्षाकृत मजबूत निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया है, लेकिन कई राज्य अब भी लॉजिस्टिक्स, नियामकीय क्षमता, वित्त तक पहुंच और कुशल मानव संसाधन जैसी बुनियादी सुविधाओं में पीछे हैं. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि राज्य-स्तरीय लक्षित सुधारों के बिना 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट का लक्ष्य असमान और अस्थिर रहेगा.

चार स्तंभों पर राज्यों का आकलन

EPI 2024 में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का मूल्यांकन चार प्रमुख स्तंभों पर किया गया है.

1. निर्यात इन्फ्रास्ट्रक्चर
2. कारोबारी पारिस्थितिकी तंत्र
3. नीति और शासन
4. निर्यात प्रदर्शन

70 संकेतकों के आधार पर राज्यों को लीडर्स, चैलेंजर्स और एस्पायरर्स की श्रेणियों में रखा गया है. रिपोर्ट रेखांकित करती है कि भारत में निर्यात प्रतिस्पर्धा अब राष्ट्रीय नीतियों से ज्यादा उप-राष्ट्रीय (राज्य और जिला) स्तर पर तय हो रही है.

लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी बड़ी बाधा

रिपोर्ट के अनुसार, कई क्षेत्रों में निर्यात इन्फ्रास्ट्रक्चर अब भी एक बड़ी बाधा बना हुआ है. खासकर लॉजिस्टिक्स, लास्ट-माइल कनेक्टिविटी और यूटिलिटी सेवाओं की विश्वसनीयता में कमी से लागत बढ़ती है और प्रतिस्पर्धा घटती है. बंदरगाहों, एयर कार्गो सुविधाओं और कोल्ड-चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर तक सीमित पहुंच के कारण औद्योगिक हब से बाहर के निर्यातकों को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है. बेहतर लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और राष्ट्रीय फ्रेट कॉरिडोर से जुड़े राज्य निर्यात तैयारी में कहीं बेहतर प्रदर्शन करते हैं.

MSME के लिए वित्त और कौशल की चुनौती

कारोबारी पारिस्थितिकी तंत्र के मोर्चे पर भी राज्यों के बीच असमानता साफ दिखती है. लागत प्रतिस्पर्धा, कुशल श्रम की उपलब्धता और वित्त तक पहुंच खासकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) के लिए, अब भी बड़ी चुनौती है. रिपोर्ट कहती है कि कई राज्यों में प्रभावी निर्यात वित्त योजनाएं, क्रेडिट इंश्योरेंस और MSME क्लस्टरों के लिए लक्षित समर्थन का अभाव है. इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में बिजली और पानी की ऊंची औद्योगिक लागत निर्यात मार्जिन को और कमजोर करती है.

नीति और शासन में भी गहरी खाई

नीति और शासन के स्तर पर भी राज्यों के बीच बड़ा अंतर है. जहां कुछ राज्यों ने निर्यात-विशिष्ट नीतियां अपनाई हैं, प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण किया है और सिंगल-विंडो क्लीयरेंस लागू किए हैं, वहीं कई राज्य अब भी बिखरी हुई संस्थागत संरचनाओं और जिला स्तर पर कमजोर समन्वय से जूझ रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार, जहां जिला निर्यात संवर्धन समितियों को सशक्त किया गया है और उन्हें स्पष्ट कार्ययोजनाओं से जोड़ा गया है, वहां निर्यात परिणाम कहीं बेहतर रहे हैं.

जिलों को बनाया गया निर्यात प्रतिस्पर्धा की धुरी

EPI 2024 का एक अहम बदलाव जिलों पर विशेष जोर है. रिपोर्ट कहती है कि जिला-स्तरीय क्षमताओं, इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमियों और सेक्टोरल विशेषज्ञता की मैपिंग के बिना राष्ट्रीय निर्यात लक्ष्य जमीन पर नहीं उतर सकते. कमजोर जिला क्रियान्वयन के चलते राज्य-स्तरीय रणनीतियां अक्सर केवल आकांक्षात्मक बनकर रह जाती हैं.

निर्यात विविधीकरण की जरूरत

रिपोर्ट पारंपरिक निर्यात उत्पादों और सीमित बाजारों पर अत्यधिक निर्भरता को भी जोखिम भरा बताती है. हालांकि भारत का निर्यात प्रोफाइल धीरे-धीरे उच्च-मूल्य विनिर्माण, डिजिटल सेवाओं और ग्रीन टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ रहा है, लेकिन कई राज्य अब भी सीमित उत्पादों और बाजारों पर निर्भर हैं. इससे वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव के दौरान जोखिम बढ़ जाता है.

अस्थिर वैश्विक माहौल में राज्यों की भूमिका अहम

रिपोर्ट भारत की निर्यात चुनौती को वैश्विक महंगाई, भू-राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय व्यापार की ओर बढ़ते रुझान के संदर्भ में रखती है. इसमें कहा गया है कि राज्य स्तर पर मजबूत, विविध और नवाचार-आधारित निर्यात क्षमताएं ही सतत विकास, बेहतर रोजगार और वैश्विक वैल्यू चेन में भारत की मजबूत भागीदारी की कुंजी हैं.

रैंकिंग नहीं, सुधार का औजार

नीति आयोग ने कहा कि EPI केवल रैंकिंग अभ्यास नहीं, बल्कि सुधारों, संसाधन आवंटन और राज्यों के बीच आपसी सीख को बढ़ावा देने का एक नीतिगत औजार है. यह आकलन डेलॉइट को नॉलेज पार्टनर बनाकर तैयार किया गया है और इसमें केंद्र व राज्य सरकारों तथा आधिकारिक एजेंसियों के आंकड़ों का उपयोग किया गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है, "भारत को एक वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी, निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्था बनाने के लिए राज्य-स्तरीय उत्कृष्टता और समन्वित नीति कार्रवाई अनिवार्य है. निर्यात तैयारी को अल्पकालिक प्रदर्शन के बजाय दीर्घकालिक शासन प्राथमिकता के रूप में देखा जाना चाहिए."

 


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