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Privatisation की राह में मंत्रालय ही अटका रहे रोड़ा, 176 CPSEs पर लटका फैसला!
सार्वजनिक उद्यम विभाग (DPE) और नीति आयोग ने गैर-रणनीतिक क्षेत्रों की 176 CPSEs में कुछ को बंद करने और कुछ को निजी हाथों में सौंपने की सिफारिश की थी.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
मोदी सरकार (Modi Government) के एजेंडे में सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपना सबसे ऊपर है. सरकार कई मौकों पर यह स्पष्ट भी कर चुकी है. हालांकि, अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव सहित कई ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से सरकार प्राइवेटाइजेशन की राह पर फुल स्पीड से नहीं दौड़ पा रही है. उदाहरण के तौर पर बजट FY22 में घोषणा की गई थी कि गैर-रणनीतिक क्षेत्रों के 176 केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (CPSEs) का निजीकरण किया जाएगा या फिर उन्हें बंद कर दिया जाएगा, लेकिन इस पर अब तक कोई फैसला नहीं लिया जा सका है.
अभी नहीं बदलेगी स्थिति
एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 176 CPSEs के मुद्दे पर सरकार के भीतर ही गतिरोध है, इस वजह से अब तक कोई फैसला नहीं लिया जा सका है. मामले से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि 2024 के आम चुनाव से पहले स्थिति में बदलाव की कोई उम्मीद नहीं है. विनिवेश यानी Disinvestment के लिए शुरुआत में 176 में से 60 कंपनियों को चिन्हित किया गया था, इनमें से स्टील सेक्टर की कंपनियों को छोड़कर बाकी के मामले में किसी तरह की प्रगति नहीं हुई है.
DPE ने की थी सिफारिश
रिपोर्ट बताती है कि रसायन और उर्वरक मंत्रालय (Fertiliser Ministry) सहित कुछ मंत्रालयों ने अपने अंतर्गत आने वाले CPSEs के निजीकरण का विरोध किया है. जबकि कुछ दूसरे मंत्रालय इस मामले में ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहे हैं. सार्वजनिक उद्यम विभाग (DPE) और नीति आयोग ने गैर-रणनीतिक क्षेत्रों की 176 CPSEs में कुछ को बंद करने और कुछ को निजी हाथों में सौंपने की सिफारिश की थी. साथ ही 8 कंपनियों को सार्वजनिक क्षेत्र में ही बने रहने की सिफारिश की गई थी. रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि उर्वरक मंत्रालय ने अपने अंतर्गत आने वालीं सीपीएसई के निजीकरण का विरोध किया है. वहीं, अन्य मंत्रालय कंपनियों के निजीकरण या बंद करने से पहले प्रक्रियाओं का पालन नहीं कर रहे हैं.
ये है सरकार की योजना
मद्रास फर्टिलाइजर्स और नेशनल फर्टिलाइजर्स सहित फर्टिलाइजर मिनिस्ट्री के तहत आने वाले सभी नौ सीपीएसई के निजीकरण की सिफारिश की गई थी. बता दें कि बड़े पैमाने पर उर्वरक आयात को देखते हुए, सरकार हाल के वर्षों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ाने की कोशिश कर रही है और उसका मानना है कि ये कंपनियां निजी सेक्टर को आकर्षित कर सकती हैं. लेकिन मंत्रालयों के गतिरोध के चलते उसकी ये योजना परवान नहीं चढ़ पा रही है. माना जा रहा है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सरकार भी अब इस मामले में ज्यादा दखलंदाजी के मूड में नहीं है. चुनाव बाद ही इस पर कोई फैसला लिया जाएगा.
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