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₹8,415 करोड़ के बॉन्ड राइट-ऑफ मामले में YES Bank को सुप्रीम कोर्ट से झटका, शेयरों में लगातार दूसरे दिन गिरावट
यस बैंक AT-1 बॉन्ड मामले का फैसला सिर्फ संबंधित निवेशकों के लिए ही नहीं, बल्कि बैंकिंग सेक्टर के लिए भी अहम है. यह मामला बैंक के संकट के दौरान बॉन्डधारकों के अधिकारों और पुनर्गठन प्रक्रिया में अपनाए जाने वाले कदमों से जुड़ा है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
सुप्रीम कोर्ट ने यस बैंक के ₹8,415 करोड़ के AT-1 बॉन्ड राइट-ऑफ मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और बैंक की अपीलें खारिज कर दी हैं. इस फैसले के बाद यस बैंक के शेयरों में गुरुवार को 20% तक की गिरावट दर्ज की गई. वहीं, आज यानी शुक्रवार को भी खबर लिखे जाने के दौरान शेयर में 2.57 प्रतिशत तक की गिरावट दिखी. तो आइए जानते हैं, आखिर क्या हैं AT-1 बॉन्ड, इन्हें राइट-ऑफ करने का फैसला क्यों विवादों में आया और इसका निवेशकों पर क्या असर पड़ सकता है?
क्या है यस बैंक के ₹8,415 करोड़ के बॉन्ड का पूरा मामला?
यह मामला मार्च 2020 में यस बैंक के वित्तीय संकट के दौरान उसके पुनर्गठन से जुड़ा है. उस समय बैंक की वित्तीय स्थिति को संभालने के लिए ₹8,415 करोड़ के Additional Tier-1 (AT-1) बॉन्ड को राइट-ऑफ कर दिया गया था. इसका मतलब था कि इन बॉन्ड में निवेश करने वालों की रकम पूरी तरह बट्टे खाते में डाल दी गई और निवेशकों को अपना पैसा गंवाना पड़ा.
इन बॉन्ड में संस्थागत निवेशकों, म्यूचुअल फंड और आम निवेशकों ने पैसा लगाया था. बॉन्डधारकों ने इस फैसले को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया और अपने निवेश की रकम वापस दिलाने की मांग की.
जनवरी 2023 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने निवेशकों के पक्ष में फैसला सुनाया था. हाईकोर्ट ने कहा था कि बॉन्ड को राइट-ऑफ करना बैंक की अंतिम पुनर्गठन योजना का हिस्सा नहीं था. कोर्ट के मुताबिक, 13 मार्च 2020 को पुनर्गठन के बाद बैंक के प्रशासक ने बॉन्ड राइट-ऑफ करके अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है. इसके साथ ही केंद्र सरकार, RBI और यस बैंक की अपीलें खारिज हो गई हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस दीपांकर दत्ता की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के बाद कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले में पहले लगाई गई रोक भी हटा दी. फैसले के बाद यस बैंक ने कहा कि वह निर्णय और उसके संभावित प्रभावों की समीक्षा कर रहा है. बैंक ने यह भी बताया कि वह फैसले की विस्तृत प्रति प्राप्त करने की प्रक्रिया में है. इसका अध्ययन करने के बाद ही वह आगे की जानकारी साझा करेगा. शेयरों में तेज गिरावट के बाद बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) ने भी बैंक से स्पष्टीकरण मांगा था.
केंद्र सरकार और RBI ने क्या दलीलें दी थीं?
केंद्र सरकार, RBI और यस बैंक ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. केंद्र सरकार का तर्क था कि AT-1 बॉन्ड को राइट-ऑफ करना कानूनी था और बैंक के दो लाख से अधिक जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए यह कदम जरूरी था.
RBI ने दलील दी थी कि बॉन्ड को संबंधित नियमों और नियामकीय शर्तों के अनुसार राइट-ऑफ किया गया था. उसका कहना था कि बैंक में सरकारी पूंजी और अन्य निवेशकों का पैसा आने से पहले यह कदम उठाया गया, ताकि जमाकर्ताओं के हित सुरक्षित रखे जा सकें.
वहीं, यस बैंक का कहना था कि 2016 के सूचना दस्तावेजों और RBI के नियमों में AT-1 बॉन्ड को स्थायी रूप से राइट-ऑफ करने का प्रावधान था. बैंक के मुताबिक, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और दूसरे निवेशकों से पूंजी मिलने से पहले यह कदम उठाना जरूरी था.
क्या होते हैं AT-1 बॉन्ड और इनमें कितना जोखिम होता है?
AT-1 यानी Additional Tier-1 बॉन्ड बैंकों के लिए पूंजी जुटाने का एक माध्यम हैं. बैंक इन बॉन्ड के जरिए निवेशकों से पैसा जुटाते हैं और इसका इस्तेमाल अपनी पूंजी स्थिति मजबूत करने के लिए करते हैं. ये बॉन्ड बैंक की नियामकीय पूंजी का हिस्सा होते हैं.
हालांकि, AT-1 बॉन्ड सामान्य फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह सुरक्षित निवेश नहीं हैं. इनमें निवेश करने वालों को अधिक जोखिम उठाना पड़ सकता है. बैंक की वित्तीय स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ने पर नियामकीय नियमों और बॉन्ड की शर्तों के तहत इनकी रकम को पूरी तरह राइट-ऑफ किया जा सकता है. ऐसी स्थिति में निवेशक अपनी पूरी निवेश राशि गंवा सकते हैं.
यही जोखिम यस बैंक के मामले में विवाद का मुख्य कारण बना. निवेशकों ने बॉन्ड राइट-ऑफ करने के फैसले को चुनौती दी थी, जबकि बैंक और नियामकों का तर्क था कि यह कदम संकट के समय लागू नियमों के अनुरूप था.
बैंकिंग सेक्टर और निवेशकों पर क्या हो सकता है असर?
यस बैंक AT-1 बॉन्ड मामले का फैसला सिर्फ संबंधित निवेशकों के लिए ही नहीं, बल्कि बैंकिंग सेक्टर के लिए भी अहम है. यह मामला बैंक के संकट के दौरान बॉन्डधारकों के अधिकारों और पुनर्गठन प्रक्रिया में अपनाए जाने वाले कदमों से जुड़ा है.
सरकार और RBI ने अदालत में दलील दी थी कि हाईकोर्ट के फैसले को लागू करने से बैंकिंग सिस्टम और संकटग्रस्त बैंकों के पुनर्गठन की भविष्य की प्रक्रियाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है. वित्त मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार, 31 दिसंबर 2022 तक बैंकों के ₹1,02,466 करोड़ के AT-1 बॉन्ड और ₹1,92,702 करोड़ के टियर-2 बॉन्ड बकाया थे. इनमें सरकारी बैंकों की बड़ी हिस्सेदारी थी.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखने से इस मामले में बॉन्डधारकों के पक्ष को कानूनी समर्थन मिला है. हालांकि, निवेशकों को वास्तविक राहत किस रूप में और किस प्रक्रिया के तहत मिलेगी, यह फैसले के क्रियान्वयन और उससे जुड़े आगे के कदमों पर निर्भर करेगा.
इस मामले ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि AT-1 बॉन्ड में निवेश करने से पहले उसकी शर्तों, राइट-ऑफ के प्रावधानों और जोखिमों को समझना जरूरी है. ऊंचे रिटर्न की संभावना के साथ इनमें मूलधन पूरी तरह डूबने का जोखिम भी जुड़ा होता है.
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