Sembcorp Green Infra ने IPO के लिए दाखिल किए दस्तावेज, जुटाएगी 3,750 करोड़ रुपये

कंपनी ने बताया कि IPO से मिलने वाली राशि में से करीब 3,000 करोड़ रुपये का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए किया जाएगा.

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Thursday, 27 August, 2026
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सेम्बकॉर्प इंडस्ट्रीज (Sembcorp Industries) के नवीकरणीय ऊर्जा कारोबार Sembcorp Green Infra ने मुंबई में प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) के जरिए 3,750 करोड़ रुपये तक जुटाने के लिए मसौदा दस्तावेज दाखिल किए हैं. बुधवार को दाखिल किए गए दस्तावेजों के अनुसार, प्रस्तावित IPO पूरी तरह नए शेयर जारी करने पर आधारित होगा.

कर्ज चुकाने में इस्तेमाल होंगे 3,000 करोड़ रुपये

कंपनी ने बताया कि IPO से मिलने वाली राशि में से करीब 3,000 करोड़ रुपये का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए किया जाएगा. प्रस्तावित निर्गम में Sembcorp Industries अपने मौजूदा शेयरों में से कोई हिस्सेदारी बिक्री के लिए पेश नहीं करेगी.

यह Sembcorp की भारतीय ऊर्जा कारोबार को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने की दूसरी कोशिश है. इससे पहले कंपनी ने Sembcorp Energy India के नाम से 2018 में IPO के लिए मसौदा दस्तावेज दाखिल किए थे. हालांकि, अगले वर्ष कंपनी ने इस योजना को वापस ले लिया था, क्योंकि उसने कारोबार में नई इक्विटी पूंजी डालने का फैसला किया था.

Temasek के समर्थन वाली कंपनी है Sembcorp Green Infra

Sembcorp Green Infra, Sembcorp Industries की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है. Sembcorp Industries को सिंगापुर की सरकारी निवेश कंपनी Temasek का समर्थन प्राप्त है. भारत में स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ने और बिजली उत्पादन में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़ाने के प्रयासों के बीच Sembcorp Green Infra ने अपने नवीकरणीय ऊर्जा पोर्टफोलियो का विस्तार किया है.

इन कंपनियों को मिली IPO की जिम्मेदारी

IPO के लिए Axis Capital, Citigroup, CLSA, HSBC, ICICI Securities, IIFL Capital Services और Kotak Mahindra Capital को बुक-रनिंग लीड मैनेजर नियुक्त किया गया है. प्रस्तावित IPO के जरिए कंपनी की योजना भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ कर्ज का बोझ कम करने की है.
 

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एचडीएफसी बैंक पर अमेरिका में क्लास एक्शन मुकदमा, MSRDC भुगतान को लेकर गंभीर आरोप

निवेशक ने बैंक और दो वरिष्ठ अधिकारियों पर दायर किया मुकदमा, आरोप है कि राज्य एजेंसी को किए गए अतिरिक्त ब्याज भुगतान को मार्केटिंग खर्च के तौर पर दर्ज किया गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 27 August, 2026
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Thursday, 27 August, 2026
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एचडीएफसी बैक (HDFC Bank) और उसके दो वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ अमेरिका में संघीय प्रतिभूति क्लास एक्शन मुकदमा दायर किया गया है. मामले में आरोप लगाया गया है कि बैंक ने एक राज्य सरकारी एजेंसी को किए गए अधिक ब्याज भुगतान को छिपाने के लिए उसे मार्केटिंग खर्च के रूप में दर्ज किया. यह शिकायत निवेशक ज्वालंत नटवरलाल सोनेजी ने न्यूयॉर्क के दक्षिणी जिले की अमेरिकी जिला अदालत में दायर की है. मामले में एचडीएफसी बैक के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) शशिधर जगदीशन और मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) श्रीनिवास वैद्यनाथन को भी प्रतिवादी बनाया गया है.

किन निवेशकों को मामले में शामिल किया गया

शिकायत में उन निवेशकों को शामिल किया गया है, जिन्होंने 17 जुलाई 2023 से 26 मई 2026 के बीच एचडीएफसी बैक के अमेरिकी डिपॉजिटरी शेयर (ADS) खरीदे थे. याचिकाकर्ता का आरोप है कि बैंक की ओर से अमेरिकी निवेशकों को दी गई कुछ जानकारियां भ्रामक थीं और इससे निवेशकों को वित्तीय नुकसान हुआ.

MSRDC को अतिरिक्त ब्याज देने का आरोप

मामले का केंद्र महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम (MSRDC) के बैंक में जमा फंड से जुड़े लेनदेन हैं. शिकायत के अनुसार, एचडीएफसी बैक ने एमएसआरडीसी की जमा राशि पर 6.01 फीसदी ब्याज दर की पेशकश की थी, जबकि सामान्य बचत खाते की ब्याज दर 3.5 फीसदी थी. इस तरह दोनों दरों के बीच 2.51 प्रतिशत अंक का अंतर था.

मुकदमे में आरोप लगाया गया है कि 2023 से 2025 के बीच करीब 45 करोड़ रुपये यानी 47 लाख डॉलर का अतिरिक्त ब्याज भुगतान तीसरे पक्ष के विक्रेताओं के जरिए एमएसआरडीसी तक पहुंचाया गया. आरोप है कि इन भुगतानों को ब्याज खर्च के रूप में दर्ज करने के बजाय सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान से जुड़े मार्केटिंग खर्च के तौर पर वर्गीकृत किया गया.

बैंकिंग नियमों के उल्लंघन का आरोप

वादी पक्ष का आरोप है कि यह व्यवस्था बैंकों द्वारा तयशुदा रिटर्न से संबंधित नियमों के साथ-साथ एचडीएफसी बैक की आंतरिक रिश्वत-विरोधी नीतियों का भी उल्लंघन करती है. शिकायत में बैंक की एक कथित आंतरिक सतर्कता जांच का भी हवाला दिया गया है, जिसमें इस व्यवस्था को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मास्टर डायरेक्शंस के अनुरूप नहीं बताया गया था.

शिकायतकर्ता का दावा है कि इन घटनाक्रमों के कारण अमेरिकी निवेशकों के लिए बैंक की ओर से किए गए खुलासे महत्वपूर्ण रूप से भ्रामक थे. इसमें वित्त वर्ष 2024 और वित्त वर्ष 2025 की एचडीएफसी बैक की Form 20-F वार्षिक रिपोर्ट का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, जिसमें वित्तीय रिपोर्टिंग पर बैंक के आंतरिक नियंत्रण को प्रभावी बताया गया था.

पूर्व चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती के इस्तीफे का भी जिक्र

मुकदमे में एचडीएफसी बैक के पूर्व चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती के इस्तीफे और उसके बाद शेयर बाजार में आई प्रतिक्रिया का भी उल्लेख किया गया है. चक्रवर्ती ने 18 मार्च को इस्तीफा दिया था. उन्होंने अपने इस्तीफे के पीछे बैंक में अपनाई जा रही कुछ ऐसी प्रथाओं का हवाला दिया था, जो उनके व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिक मानकों के अनुरूप नहीं थीं.

इसके बाद अमेरिका में कारोबार करने वाले एचडीएफसी बैक के शेयर 7.28 फीसदी गिरकर 26.62 डॉलर पर बंद हुए. इस दौरान कारोबार की मात्रा सामान्य से काफी अधिक रही. 27 मई को मीडिया में बैंक की एमएसआरडीसी भुगतान से जुड़ी आंतरिक जांच की जानकारी सामने आई थी.

निवेशकों ने मांगा हर्जाना

वादी पक्ष ने अमेरिकी प्रतिभूति विनिमय अधिनियम, 1934 की धारा 10(b) और 20(a) के उल्लंघन का आरोप लगाया है. निवेशकों ने मामले को क्लास एक्शन के रूप में प्रमाणित करने, मुआवजा दिलाने और जूरी ट्रायल की मांग की है. उनका आरोप है कि बैंक और उसके अधिकारियों ने कथित गतिविधियों के संबंध में सच्चाई की अनदेखी की और इससे उन निवेशकों को नुकसान हुआ, जिन्होंने मामले के सार्वजनिक होने से पहले बैंक की प्रतिभूतियां खरीदी थीं. हालांकि, ये सभी आरोप मुकदमे में लगाए गए दावे हैं और किसी अदालत ने इन्हें अभी तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया है. मामले में अब अमेरिकी कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे की कार्रवाई होगी.
 


डॉ. अनुराग बत्रा: मीडिया से उद्यमिता तक, रिश्तों और विश्वास से बनी एक प्रेरक यात्रा

डॉ. अनुराग बत्रा की यात्रा बताती है कि मजबूत मीडिया संस्थान केवल सामग्री और पूंजी से नहीं, बल्कि समुदाय, विश्वास और लगातार खुद को नए सिरे से गढ़ने के साहस से बनते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 27 August, 2026
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Thursday, 27 August, 2026
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आमतौर पर कारोबारी यात्राओं की कहानी अधिग्रहण, राजस्व, बाजार विस्तार और संस्थानों के निर्माण के आधार पर बताई जाती है. इस पैमाने पर देखें तो डॉ. अनुराग बत्रा की कहानी बेहद प्रभावशाली है. वह पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं, जिन्होंने exchange4media की स्थापना की और बाद में BW Businessworld की जिम्मेदारी संभाली. उन्होंने दोनों संस्थानों को सामग्री, आयोजनों और पेशेवर समुदायों के प्रभावशाली नेटवर्क में विस्तार दिया, लेकिन यह उनकी कहानी का केवल एक पहलू है. दूसरा पहलू उन रिश्तों, सद्भावना और उन तमाम लोगों से जुड़ा है, जिनके पेशेवर सफर को उन्होंने किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है.

54 वर्ष की उम्र में भी डॉ. बत्रा उस चिंतनशील दौर में नहीं पहुंचे हैं, जहां सफलता के बाद व्यक्ति ठहराव महसूस करने लगता है. उनका ध्यान अक्सर अगले मंच, साझेदारी, बातचीत या अवसर पर रहता है. उनके साथ काम करने वाले लोग इस बेचैनी को अच्छी तरह पहचानते हैं. उनके पास विचार तेजी से आते हैं, अपेक्षाएं ऊंची रहती हैं और वर्तमान अक्सर भविष्य की संभावनाओं से प्रभावित होता रहता है.

डॉ. बत्रा के लिए यह लगातार आगे बढ़ते रहने की प्रवृत्ति महज सार्वजनिक छवि नहीं, बल्कि उनके काम करने का तरीका है.

मीडिया क्षेत्र में अलग तरह की शुरुआत

मीडिया क्षेत्र में उनकी उद्यमशीलता की नींव पारंपरिक नहीं थी. कंप्यूटर विज्ञान की डिग्री और एमडीआई गुरुग्राम से प्रबंधन की शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने पहली पीढ़ी के उद्यमी के तौर पर कारोबार की दुनिया में कदम रखा. जब exchange4media की शुरुआत हुई, उस समय भारत में विज्ञापन, विपणन और मीडिया क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहे थे. हालांकि, उद्योग में ऐसा मजबूत दैनिक मंच नहीं था, जो इन क्षेत्रों से जुड़े लोगों, कारोबार और बदलती शक्ति संरचनाओं पर केंद्रित हो. डॉ. बत्रा ने केवल सूचना की कमी को नहीं पहचाना, बल्कि पेशेवर समुदाय के बीच संवाद की कमी को भी समझा.

exchange4media ने दोनों जरूरतों को पूरा करते हुए विस्तार किया. इस मंच ने उद्योग से जुड़ी खबरें देने के साथ-साथ उसके अलग-अलग हिस्सों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम भी किया. IMPACT, PITCH और समाचार4मीडिया जैसे मंचों के अलावा सम्मेलनों, पुरस्कारों और नेतृत्व से जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से एजेंसियों, विज्ञापनदाताओं, प्रसारकों, प्रकाशकों, डिजिटल कंपनियों और उभरते पेशेवरों को साझा संवाद का अवसर मिला.

इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारोबारी सोच थी कि विशेषज्ञ मीडिया तब ज्यादा मूल्यवान बनता है, जब उसके दर्शकों और पाठकों को केवल पाठक समूह नहीं, बल्कि एक जीवंत पेशेवर समुदाय के रूप में देखा जाए.

BW Businessworld को नई दिशा

2013 में BW Businessworld का अधिग्रहण उनके लिए एक अलग तरह की उद्यमशील चुनौती थी. उस समय दुनियाभर में प्रिंट प्रकाशन तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहे थे. पाठकों का ध्यान कम हो रहा था और दर्शक तेजी से डिजिटल मंचों की ओर बढ़ रहे थे.

डॉ. बत्रा ने BW Businessworld को उसके अतीत की स्थिर विरासत के रूप में बनाए रखने के बजाय उसे डिजिटल मीडिया, आयोजनों और विशेषज्ञ कारोबारी समुदायों तक विस्तार दिया. शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आतिथ्य, प्रौद्योगिकी, स्थिरता और भारत के विकास को प्रभावित करने वाले कई अन्य क्षेत्रों को इसके दायरे में शामिल किया गया.

यह बदलाव दो विरोधाभासी दिखने वाले विचारों को साथ लेकर चलने की क्षमता को दर्शाता है. एक ओर विरासत में मिले संस्थान की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा का सम्मान करना और दूसरी ओर इतिहास के प्रति सम्मान को बदलाव के रास्ते में बाधा न बनने देना.

तेज फैसले और लोगों तक आसान पहुंच

उनकी नेतृत्व शैली भी इसी सोच को दर्शाती है. डॉ. बत्रा धीमी गति से निर्णय लेने वाले व्यक्ति नहीं हैं. वह अधीर, सख्त और मांग करने वाले हो सकते हैं, क्योंकि कई बार उन्हें कोई अवसर उस समय दिखाई दे जाता है, जब उनके आसपास की व्यवस्था उसे अपनाने के लिए अभी तैयार नहीं होती. उनकी गति टीमों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है, लेकिन यही गति संस्थानों को बीती उपलब्धियों में बहुत अधिक सहज होने से भी रोकती है. हालांकि, इस तीव्रता को उनकी सहज उपलब्धता संतुलित करती है. पेशेवर नेटवर्क कितना भी बड़ा क्यों न हो, लोगों तक पहुंच में पद और हैसियत हमेशा निर्णायक नहीं होती. कोई युवा पत्रकार, पहली बार कारोबार शुरू करने वाला उद्यमी या करियर को लेकर अनिश्चितता का सामना कर रहा व्यक्ति भी उनसे उसी तरह संवाद कर सकता है, जैसे उद्योग का कोई वरिष्ठ नेता. इसीलिए उन्हें केवल एक नेटवर्क बनाने वाले व्यक्ति के रूप में देखना उनकी शख्सियत को सीमित कर देना होगा. डॉ. बत्रा रिश्तों को निजी पूंजी की तरह सुरक्षित रखने के बजाय उन्हें साझा करने और आगे बढ़ाने में विश्वास रखते हैं. एक मुलाकात परिचय में, परिचय अवसर में और अवसर किसी व्यक्ति के करियर के निर्णायक क्षण में बदल सकता है.

लोगों के प्रति उदारता

उनके करीबी लोग उनकी उस उदारता का भी उल्लेख करते हैं, जिसका वह कभी सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करते. यह उनके द्वारा दिए गए समय, लोगों पर जताए गए भरोसे और मुश्किल समय में दिए गए सहयोग में दिखाई देती है. उन्होंने कई बार ऐसे लोगों का समर्थन किया है, जिनकी क्षमता उस समय हर किसी को स्पष्ट नजर नहीं आती थी. ये छोटे-बड़े सहयोग शायद किसी कॉरपोरेट इतिहास का हिस्सा न बनें, लेकिन यही उनकी विभिन्न पीढ़ियों और उद्योगों में बनी मजबूत विश्वसनीयता और निष्ठा को समझने में मदद करते हैं.

आस्था से मिलती है गति को दिशा

उनकी तेज रफ्तार जिंदगी में आस्था एक संतुलन का काम करती है. डॉ. बत्रा गहरे धार्मिक हैं और आध्यात्मिकता उनके जीवन में केवल औपचारिक हिस्सा नहीं है. उनके करीबी लोगों के अनुसार, आस्था उन्हें कृतज्ञता, विनम्रता और सेवा की भावना देती है. गति और महत्वाकांक्षा से भरे पेशेवर जीवन में यही आस्था उन्हें ठहराव और व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करती है.

मेंटॉरशिप में उनका विश्वास भी इसी सोच से जुड़ा है. डॉ. बत्रा अक्सर ‘रिवर्स मेंटरिंग’ की बात करते हैं. इसका अर्थ है कि अनुभवी नेताओं को युवा उद्यमियों और पेशेवरों से सीखने के लिए भी तैयार रहना चाहिए. यह उनके नेतृत्व का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने लाता है. वह वरिष्ठता को ज्ञान पर एकाधिकार नहीं मानते.

पत्रकारिता से जुड़ाव बरकरार

डॉ. बत्रा खुद को केवल संस्थान के मालिक या उद्यमी तक सीमित नहीं रखते. वह पत्रकार, साक्षात्कारकर्ता और टिप्पणीकार के रूप में भी मीडिया से जुड़े हुए हैं. उनकी बातचीत उद्यमिता, नीतियों, प्रौद्योगिकी और नेतृत्व जैसे विषयों तक फैली हुई है. इन संवादों के पीछे जिज्ञासा और स्थापित धारणाओं को चुनौती देने की इच्छा दिखाई देती है.

54 वर्ष की उम्र में डॉ. अनुराग बत्रा की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है. exchange4media और BW Businessworld का पुनर्निर्माण उनकी संस्थागत विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा. हालांकि, उनका व्यापक योगदान शायद इस बात में है कि उन्होंने यह दिखाया कि कारोबार तब टिकाऊ बनते हैं, जब लोगों को लगता है कि वे किसी कंपनी से बड़ी चीज का हिस्सा हैं.

उन्होंने ब्रांड और मंच बनाए हैं. इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने विचारों, संस्थानों और सबसे बढ़कर लोगों में विश्वास पैदा किया है.

आज डॉ. अनुराग बत्रा का जन्मदिन हैं, इस खास अवसर पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं. ईश्वर उन्हें स्वस्थ, सफल और ऊर्जावान जीवन प्रदान करें और उनकी नई यात्राएं नई उपलब्धियों के साथ आगे बढ़ती रहें.


एनसीएलटी ने सुभाष चंद्रा की 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना को दी मंजूरी

सुभाष चंद्रा 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत लेनदार दावों के मुकाबले 6.5 करोड़ रुपये का भुगतान करेंगे, जिससे लेनदारों को करीब 0.03 फीसदी की वसूली होगी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 27 August, 2026
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Thursday, 27 August, 2026
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राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) ने जी ग्रुप (Zee Group) के संस्थापक और चेयरमैन सुभाष चंद्रा की संशोधित पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दे दी है. इसके तहत सुभाष चंद्रा 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत लेनदार दावों के मुकाबले 6.5 करोड़ रुपये का भुगतान करेंगे. यह राशि कुल स्वीकृत बकाया का करीब 0.03 फीसदी है, यानी इस योजना के तहत कर्जदाताओं को करीब 99.97 फीसदी का हेयरकट स्वीकार करना होगा.

इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस की याचिका से शुरू हुई थी कार्यवाही

यह मामला सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत दिवालिया कार्यवाही से जुड़ा है, जिसे Indiabulls Housing Finance की ओर से शुरू किया गया था. चंद्रा इस मामले में व्यक्तिगत गारंटर थे. एनसीएलटी की दो सदस्यीय मूल पीठ ने इस मामले में अलग-अलग राय वाला फैसला दिया था. इसके बाद मतभेद दूर करने के लिए निलेश शर्मा को तीसरे सदस्य के तौर पर नियुक्त किया गया.

लेनदारों की सूची दोबारा तैयार होगी

निलेश शर्मा ने रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल को कुछ दावों को हटाने के बाद लेनदारों की संशोधित और अंतिम सूची तैयार करने तथा पात्र बचे हुए लेनदारों के बीच मंजूर पुनर्भुगतान राशि का दोबारा आवंटन करने का निर्देश दिया है. पुनर्भुगतान योजना को 80.81 फीसदी वोटिंग शेयर रखने वाले लेनदारों का समर्थन मिला था, जबकि इसका विरोध करने वाले लेनदारों की कुल हिस्सेदारी 20 फीसदी से कम थी.

अब यह मामला आगे के आदेश के लिए मूल दो सदस्यीय पीठ के पास जाएगा. बहुमत की राय के अनुरूप आदेश पारित किया जाएगा. औपचारिक आदेश कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 419(5) के तहत जारी किया जाएगा.

योजना की व्यवहार्यता पर उठे थे सवाल

न्यायाधिकरण के समक्ष पुनर्भुगतान योजना तैयार करने और इसकी प्रक्रिया में कथित गंभीर अनियमितताओं को लेकर भी आपत्तियां दर्ज की गई थीं. असहमति जताने वाले लेनदारों की अगुवाई LIC Housing Finance ने की थी. उसने प्रस्तावित भुगतान को “अव्यवहारिक और गैरकानूनी” बताया था.

योजना खारिज करने के पर्याप्त आधार नहीं

न्यायाधिकरण ने कहा कि अनिल कुमार, सुनीस जैन और उनके प्रतिनिधित्व वाले व्यक्तियों से जुड़े दावों को स्वीकार करने में हुई प्रक्रियात्मक अनियमितताएं अपने आप में पुनर्भुगतान योजना को खारिज करने का आधार नहीं बनतीं. एनसीएलटी ने कहा कि लेनदारों की आपत्तियां उसके समक्ष रखी गई थीं और उनकी स्वतंत्र रूप से योग्यता के आधार पर जांच की गई.

न्यायाधिकरण के अनुसार, किसी कथित अनियमितता के आधार पर धारा 114(1) के तहत योजना तभी खारिज की जा सकती है, जब उससे पुनर्भुगतान योजना IBC के प्रावधानों के विपरीत हो या लेनदारों को महत्वपूर्ण नुकसान पहुंचे. निलेश शर्मा ने निष्कर्ष निकाला कि कोई अन्य स्थापित गंभीर अनियमितता या लागू प्रावधानों का उल्लंघन सामने नहीं आया.

व्यक्तिगत संपत्ति का मूल्य कर्ज से काफी कम

एनसीएलटी ने यह भी कहा कि सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति का मूल्य पुनर्भुगतान योजना के तहत प्रस्तावित राशि से काफी कम है. न्यायाधिकरण के मुताबिक, योजना को खारिज करने पर असहमति जताने वाले लेनदारों के लिए अधिक राशि की वसूली की संभावना नहीं होगी, क्योंकि ऐसी स्थिति में सुभाष चंद्रा को दिवालिया घोषित किया जा सकता है. न्यायाधिकरण ने कहा कि उनकी व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया का समाधान होने से मुख्य कर्जदारों से बकाया वसूलने की लेनदारों की संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं.

सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगी योजना

एनसीएलटी ने स्पष्ट किया कि उसकी भूमिका लेनदारों के कारोबारी फैसले की जगह अपना फैसला रखना या यह तय करना नहीं है कि समझौते के तहत दी जा रही राशि पर्याप्त है या नहीं. न्यायाधिकरण ने कहा कि मंजूर की गई पुनर्भुगतान योजना IBC की धारा 115 के तहत सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगी, जिसमें वे लेनदार भी शामिल हैं जिन्होंने योजना के खिलाफ मतदान किया था.

न्यायाधिकरण ने कहा कि असहमति जताने वाले लेनदारों को मंजूर योजना से बाहर जाकर अपनी पूरी मूल बकाया राशि की वसूली की अनुमति देना दिवालिया कानून के वैधानिक ढांचे को कमजोर करेगा और लेनदारों के बीच असमान व्यवहार को बढ़ावा देगा.
 


भारत का ऑफिस मार्केट 6% बढ़कर 90.11 करोड़ वर्ग फुट पहुंचा, बेंगलुरु सबसे आगे

नाइट फ्रैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में देश का ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक पहली बार 90 करोड़ वर्ग फुट के पार पहुंचा. पुणे और हैदराबाद में भी तेज वृद्धि दर्ज की गई.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 26 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
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भारत के ऑफिस रियल एस्टेट बाजार में 2026 की पहली छमाही में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है. नाइट फ्रैंक इंडिया के मुताबिक, 30 जून 2026 तक देश का ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक 6 फीसदी सालाना बढ़कर 901.1 मिलियन वर्ग फुट यानी करीब 90.11 करोड़ वर्ग फुट पहुंच गया. यह पहली बार है जब देश में ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक 900 मिलियन वर्ग फुट के आंकड़े को पार कर गया है. 2025 की पहली छमाही में यह आंकड़ा 847 मिलियन वर्ग फुट था. वहीं, देश का कुल ऑफिस स्टॉक 1.05 अरब वर्ग फुट रहा.

नाइट फ्रैंक के अनुसार, देश के आठ प्रमुख ऑफिस बाजारों में कंपनियों के विस्तार और मजबूत ऑक्यूपायर सेंटीमेंट से मांग को समर्थन मिला है. ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) के विस्तार के साथ घरेलू कंपनियां भी अपने ऑफिस स्पेस का विस्तार कर रही हैं.

बेंगलुरु सबसे बड़ा ऑफिस बाजार

बेंगलुरु भारत के सबसे बड़े ऑफिस बाजार के रूप में अपनी स्थिति बनाए हुए है. शहर में ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक 2025 की पहली छमाही के 205.4 मिलियन वर्ग फुट से बढ़कर 2026 की पहली छमाही में 222.4 मिलियन वर्ग फुट हो गया. इस तरह शहर में सालाना आधार पर 8 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी NCR 178.1 मिलियन वर्ग फुट के ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक के साथ देश का दूसरा सबसे बड़ा बाजार रहा. इसमें सालाना आधार पर 2 फीसदी की वृद्धि हुई. मुंबई में ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक 5 फीसदी बढ़कर 146.6 मिलियन वर्ग फुट पहुंच गया.

हैदराबाद और पुणे में तेज ग्रोथ

हैदराबाद में ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक 8 फीसदी बढ़कर 114.3 मिलियन वर्ग फुट हो गया. वहीं, पुणे सबसे तेजी से बढ़ने वाले ऑफिस बाजारों में शामिल रहा. यहां ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक 10 फीसदी बढ़कर 98.8 मिलियन वर्ग फुट पहुंच गया. नाइट फ्रैंक के मुताबिक, पुणे अब 100 मिलियन वर्ग फुट के आंकड़े को पार करने के बेहद करीब है.

चेन्नई में ऑफिस स्टॉक 6 फीसदी बढ़कर 88.9 मिलियन वर्ग फुट रहा. वहीं, अहमदाबाद ने ट्रैक किए गए बाजारों में सबसे अधिक प्रतिशत वृद्धि दर्ज की. यहां ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक 9 फीसदी बढ़कर 27.5 मिलियन वर्ग फुट पहुंच गया. कोलकाता में ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक 6 फीसदी बढ़कर 24.4 मिलियन वर्ग फुट रहा.

GCC के विस्तार से बढ़ रही ऑफिस की मांग

नाइट फ्रैंक इंडिया में इंटरनेशनल पार्टनर और सीनियर एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, ऑक्यूपायर स्ट्रैटेजी सॉल्यूशंस, इंडस्ट्रियल एंड लॉजिस्टिक्स, कैपिटल मार्केट्स एंड रिटेल, विरल देसाई ने कहा कि GCC और घरेलू कंपनियों के विस्तार से ऑफिस स्पेस की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है.

उन्होंने कहा कि GCC का विस्तार और घरेलू कंपनियों के बढ़ते ऑफिस फुटप्रिंट ऑफिस की मांग को मजबूती दे रहे हैं. कंपनियां तेजी से ऐसे स्थापित बाजारों को प्राथमिकता दे रही हैं, जहां उन्हें कुशल प्रतिभाओं, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और बड़े पैमाने पर संचालन की सुविधा मिल सके.

प्रमुख शहरों में जारी है ऑफिस विस्तार

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारत के स्थापित और उभरते दोनों तरह के ऑफिस बाजारों में विस्तार जारी है. बेंगलुरु सबसे बड़े ऑक्यूपाइड ऑफिस स्टॉक के मामले में आगे है, जबकि 2026 की पहली छमाही में नाइट फ्रैंक द्वारा ट्रैक किए गए आठ प्रमुख बाजारों में पुणे ने सबसे तेज वृद्धि दर्ज की है.
 

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इंजीनियरिंग निर्यात में 18% की जोरदार बढ़ोतरी, जुलाई में 12.24 अरब डॉलर पर पहुंचा आंकड़ा

लगातार चौथे महीने 10 अरब डॉलर से ऊपर रहा इंजीनियरिंग निर्यात, अमेरिका सबसे बड़ा बाजार; चीन को निर्यात में 32% की बढ़ोतरी

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 26 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
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भारत के इंजीनियरिंग सामान के निर्यात में जुलाई में मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (EEPC India) के मुताबिक, जुलाई 2026 में इंजीनियरिंग उत्पादों का निर्यात सालाना आधार पर 18 फीसदी बढ़कर 12.24 अरब डॉलर पहुंच गया. यह देश के कुल वस्तु निर्यात में दर्ज 17 फीसदी की वृद्धि से अधिक है.

इंजीनियरिंग उत्पादों का निर्यात वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती चार महीनों में लगातार 10 अरब डॉलर के स्तर से ऊपर बना हुआ है. अप्रैल-जुलाई के दौरान इंजीनियरिंग निर्यात 18.21 फीसदी बढ़कर 46.38 अरब डॉलर हो गया, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 39.24 अरब डॉलर था. इस अवधि में भारत के कुल वस्तु निर्यात में इंजीनियरिंग सामान की हिस्सेदारी 26.7 फीसदी रही.

अमेरिका सबसे बड़ा बाजार

अप्रैल-जुलाई के दौरान अमेरिका भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों का सबसे बड़ा निर्यात बाजार बना रहा. इस अवधि में अमेरिका को 7.78 अरब डॉलर के इंजीनियरिंग सामान का निर्यात किया गया, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 11.8 फीसदी अधिक है. अकेले जुलाई में अमेरिका को इंजीनियरिंग निर्यात 20 फीसदी बढ़कर 2.18 अरब डॉलर रहा.

चीन को भी इंजीनियरिंग सामान के निर्यात में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई. जुलाई में चीन को निर्यात सालाना आधार पर 32 फीसदी बढ़कर 349 मिलियन डॉलर हो गया. वहीं, अप्रैल-जुलाई के दौरान जर्मनी, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे कई प्रमुख बाजारों में भी इंजीनियरिंग निर्यात बढ़ा. हालांकि, सऊदी अरब को निर्यात में गिरावट आई. EEPC India के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास पैदा हुई बाधाओं से लॉजिस्टिक्स प्रभावित हुआ है. इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का क्षेत्र में परियोजना आधारित इंजीनियरिंग मांग पर भी असर पड़ा है.

34 में से 27 इंजीनियरिंग श्रेणियों में बढ़ोतरी

जुलाई में इंजीनियरिंग निर्यात की वृद्धि व्यापक स्तर पर देखने को मिली. कुल 34 इंजीनियरिंग उत्पाद श्रेणियों में से 27 में सालाना आधार पर निर्यात बढ़ा, जबकि सात श्रेणियों में गिरावट दर्ज की गई. जिन प्रमुख श्रेणियों में निर्यात घटा, उनमें लोहा और इस्पात तथा उनसे बने उत्पाद, सीसा और उसके उत्पाद, मशीन टूल्स, विमान एवं अंतरिक्ष यान तथा उनके कलपुर्जे, क्रेन, लिफ्ट और विंच तथा कार्यालय उपकरण शामिल हैं.

सरकार के त्वरित अनुमानों के अनुसार, जुलाई में भारत के कुल वस्तु निर्यात में इंजीनियरिंग सामान की हिस्सेदारी 27.7 फीसदी रही. इससे देश के कुल वस्तु निर्यात में इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण योगदान का पता चलता है.

निर्यातकों के सामने बढ़ी लागत की चुनौती

EEPC India के चेयरमैन पंकज चड्ढा ने कहा कि निर्यातकों को बढ़ती ऊर्जा और शिपिंग लागत, भू-राजनीतिक तनाव, संरक्षणवादी उपायों और लगातार कड़े होते तकनीकी एवं नियामकीय मानकों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

EEPC India ने संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास (UNCTAD) के पहले के आकलन का हवाला देते हुए कहा कि तकनीकी नियमों, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा मानकों और प्रमाणन प्रक्रियाओं जैसे गैर-टैरिफ उपायों से विदेशी बाजारों तक पहुंच की लागत बढ़ रही है. इसका असर खासतौर पर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है.

पंकज चड्ढा के मुताबिक, निर्यात की मौजूदा रफ्तार को बनाए रखने के लिए प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने, उत्पादन का पैमाना बढ़ाने, तकनीकी उन्नयन, अनुपालन क्षमता मजबूत करने और नए बाजारों में विविधीकरण की जरूरत है. उन्होंने निर्यात वृद्धि को टिकाऊ बनाए रखने में सरकार के सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया.

FY27 में इंजीनियरिंग निर्यात की मजबूत शुरुआत

वित्त वर्ष 2026-27 के पहले चार महीनों का प्रदर्शन इंजीनियरिंग निर्यातकों के लिए मजबूत शुरुआत का संकेत देता है. अप्रैल-जुलाई के दौरान इंजीनियरिंग निर्यात पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 7.14 अरब डॉलर बढ़ा है.

प्रमुख व्यापार मार्गों में व्यवधान और कुछ बाजारों में निर्यात घटने के बावजूद इंजीनियरिंग क्षेत्र ने अपनी वृद्धि की रफ्तार बनाए रखी है. अमेरिका सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है, जबकि चीन और कई अन्य प्रमुख बाजारों में निर्यात बढ़ने से शुरुआती महीनों में क्षेत्र का प्रदर्शन व्यापक आधार पर मजबूत रहा है.
 


भारत-कनाडा संबंधों को मिलेगी नई आर्थिक धार, वित्त मंत्री ने गिनाए निवेश के बड़े मौके

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा- भारत की तेज आर्थिक वृद्धि और कनाडा की लंबी अवधि की पूंजी व विशेषज्ञता मिलकर दोनों देशों के वित्तीय संबंधों को नई दिशा दे सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 26 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
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भारत और कनाडा के बीच आर्थिक और वित्तीय संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में नई संभावनाएं उभर रही हैं. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को टोरंटो में भारतीय समुदाय और कारोबारी जगत को संबोधित करते हुए कहा कि दोनों देशों के पास एक मजबूत और व्यापक वित्तीय साझेदारी विकसित करने का बड़ा अवसर है. उन्होंने भारत की तेज आर्थिक वृद्धि, बड़े बाजार और निवेश के अवसरों को कनाडा की दीर्घकालिक पूंजी, संस्थागत विशेषज्ञता और मजबूत नियामकीय अनुभव से जोड़ने पर जोर दिया.

सीतारमण ने कहा कि भारत-कनाडा सहयोग को केवल व्यापार और निवेश तक सीमित रखने के बजाय इंफ्रास्ट्रक्चर, वित्तीय सेवाओं, फिनटेक, स्वच्छ ऊर्जा, इनोवेशन और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों तक विस्तार दिया जा सकता है.

भारत में कनाडाई निवेशकों की मजबूत मौजूदगी

वित्त मंत्री ने भारत में कनाडाई पेंशन फंडों की लंबे समय से मौजूदगी का उल्लेख किया. ये फंड इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स, रिन्यूएबल एनर्जी और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में निवेश कर रहे हैं. इसके अलावा कनाडा की वित्तीय संस्थाएं भी भारत में अपनी गतिविधियों का विस्तार कर रही हैं, खासकर कॉरपोरेट और कमर्शियल बैंकिंग के क्षेत्र में. उन्होंने कहा कि दोनों देशों के संबंध अब केवल पूंजी के आवागमन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि संस्थागत स्तर पर भी सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है.

UPI से डिजिटल फाइनेंस तक सहयोग की संभावना

सीतारमण ने भारत के डिजिटल वित्तीय ढांचे और खासतौर पर यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI की क्षमता का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि कनाडा के बैंक, फिनटेक कंपनियां और नियामक भारत के साथ मिलकर डिजिटल वित्तीय व्यवस्था की अगली पीढ़ी तैयार करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग को डिजिटल भुगतान से आगे बढ़ाकर भविष्य की डिजिटल वित्तीय सेवाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास तक ले जाया जा सकता है.

GIFT City बनेगा विदेशी पूंजी का गेटवे

वित्त मंत्री ने गुजरात स्थित GIFT City को अंतरराष्ट्रीय पूंजी के लिए महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म बताया. उन्होंने कहा कि भारत का इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के लिए एक नए गेटवे के रूप में उभर रहा है.

GIFT City में सीमा-पार वित्तीय गतिविधियों के लिए विशेष नियामकीय और कर व्यवस्था उपलब्ध है. इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों को भारत में निवेश के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक वित्तीय गतिविधियों के लिए भी अवसर मिलते हैं.

बीमा, पेंशन और एसेट मैनेजमेंट में भी अवसर

सीतारमण ने कहा कि भारत ने बीमा, एसेट मैनेजमेंट और पेंशन जैसे क्षेत्रों में विदेशी भागीदारी के लिए लगातार रास्ते खोले हैं. इसके साथ भारतीय पूंजी बाजार भी पहले की तुलना में अधिक गहरे और विकसित हुए हैं. उन्होंने कहा कि भारत की तेज आर्थिक वृद्धि, बड़ी युवा आबादी, बढ़ती खपत और मजबूत होते पूंजी बाजार कनाडा के दीर्घकालिक संस्थागत निवेशकों के लिए आकर्षक अवसर पेश करते हैं.

भारतीय प्रवासी समुदाय को बताया अहम कड़ी

वित्त मंत्री ने कनाडा में रह रहे भारतीय मूल के लोगों को दोनों देशों के आर्थिक संबंधों की महत्वपूर्ण ताकत बताया. उन्होंने कहा कि भारतीय समुदाय केवल दोनों देशों के बीच संपर्क का माध्यम नहीं है, बल्कि आर्थिक साझेदारी की मजबूत नींव भी है.

सीतारमण ने कनाडा के वित्तीय क्षेत्र में भारतीय मूल के पोर्टफोलियो मैनेजर, उद्यमी, बैंकर, जोखिम विशेषज्ञ और अन्य पेशेवरों की मौजूदगी का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मानव संसाधन दोनों देशों के लिए रणनीतिक लाभ है.

द्विपक्षीय रिश्तों को नई दिशा देने पर जोर

सीतारमण ने कहा कि हाल के समय में भारत और कनाडा के द्विपक्षीय संबंधों में महत्वपूर्ण बदलाव आया है. उन्होंने जून 2025 में G7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की मुलाकात का उल्लेख किया. दोनों नेताओं ने संबंधों को नए सिरे से आगे बढ़ाने और भविष्य पर केंद्रित रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने पर सहमति जताई थी.

उन्होंने कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की इस साल भारत यात्रा का भी जिक्र किया. इस दौरान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी CEPA पर बातचीत औपचारिक रूप से शुरू हुई. इसके अलावा Cameco के साथ 2.6 अरब कनाडाई डॉलर के यूरेनियम समझौते और 2030 तक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को 70 अरब कनाडाई डॉलर से अधिक करने के लक्ष्य का भी उल्लेख किया गया.

साझा मूल्यों को बताया रिश्तों की मजबूत नींव

वित्त मंत्री ने भारत और कनाडा को स्वाभाविक साझेदार बताते हुए दोनों देशों के लोकतांत्रिक मूल्यों, संसदीय परंपराओं, संयुक्त राष्ट्र आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था और विविधता के प्रति सम्मान को रिश्तों की मजबूत नींव बताया. उन्होंने कहा कि दोनों देश बहुसांस्कृतिक समाज हैं और विविधता को महत्व देते हैं. यह समानता व्यापार समझौतों से आगे जाकर दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत आधार देती है.

7.6% GDP ग्रोथ का किया उल्लेख

सीतारमण ने वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि भारत का बड़ा बाजार, युवा आबादी, बढ़ती खपत और विकसित होते पूंजी बाजार लंबी अवधि के निवेशकों के लिए बड़े अवसर पैदा कर रहे हैं.

वित्त मंत्री ने कहा कि टोरंटो की उनकी यात्रा अभी शुरुआत है और आने वाले समय में दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं तथा संस्थानों के बीच समझ को और मजबूत करने के लिए बातचीत जारी रहेगी. उन्होंने भरोसा जताया कि भारत और कनाडा मिलकर अपने संबंधों को पहले से अधिक गहरा, व्यापक और महत्वाकांक्षी बना सकते हैं.
 


चीनी की कीमतों में 40% उछाल, अब D-Mart से Blinkit तक खरीद पर लगी लिमिट

त्योहारी सीजन से पहले सप्लाई संकट का असर, कई रिटेलर्स और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर ग्राहकों के लिए 3 से 5 किलो तक की सीमा

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 26 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
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देश में चीनी की बढ़ती कीमतों और सप्लाई में कमी का असर अब रिटेल बाजार पर भी दिखाई देने लगा है. त्योहारी सीजन से पहले मांग बढ़ने की आशंका के बीच D-Mart, BigBasket, Blinkit और Swiggy Instamart जैसे रिटेलर्स और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ने ग्राहकों के लिए चीनी की खरीद की मात्रा सीमित कर दी है. कुछ प्लेटफॉर्म पर प्रति ग्राहक 3 किलो, जबकि कुछ जगहों पर 5 किलो तक चीनी खरीदने की सीमा तय की गई है.

पिछले दो महीनों में चीनी की खुदरा कीमतों में करीब 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. देश के कई हिस्सों में इसके दाम 70 रुपये प्रति किलो से भी ऊपर पहुंच गए हैं. सप्लाई की कमी और बढ़ती कीमतों के बीच रिटेलर्स ने राशनिंग का सहारा लिया है, ताकि सीमित स्टॉक को अधिक से अधिक ग्राहकों तक पहुंचाया जा सके.

क्यों बढ़े चीनी के दाम?

चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे शुरुआती अनुमानों से कम उत्पादन, 8 लाख टन चीनी का निर्यात और कुछ बिचौलियों द्वारा कथित जमाखोरी को प्रमुख वजह माना जा रहा है. इसके अलावा, इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) सहित विभिन्न उद्योग संगठनों के उत्पादन अनुमानों में अंतर ने भी स्थिति को प्रभावित किया है.

कीमतों में तेजी का असर पैकेज्ड फूड कंपनियों पर भी पड़ रहा है. चीनी के साथ-साथ खाद्य तेल की लागत बढ़ने से कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ रहा है. ऐसे में कई निर्माता अपने उत्पादों की कीमतों में 5-6 फीसदी तक बढ़ोतरी की तैयारी कर रहे हैं. एक प्रमुख स्नैक फूड कंपनी के प्रमुख ने कहा कि कीमतों में करीब 5 फीसदी बढ़ोतरी करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है.

D-Mart, Blinkit और BigBasket पर कितनी खरीद की सीमा?

सप्लाई को देखते हुए कई रिटेल और ई-कॉमर्स कंपनियों ने चीनी की खरीद को सीमित करना शुरू कर दिया है. कुछ कंपनियां ग्राहकों को 1-1 किलो के दो या तीन पैक, जबकि कुछ 5 किलो का एक पैक खरीदने की अनुमति दे रही हैं. AWL एग्रीबिजनेस के एग्जीक्यूटिव डिप्टी चेयरमैन अंगशु मल्लिक के मुताबिक, कई रिटेल चेन ने प्रति ग्राहक चीनी के पाउच की संख्या पर सीमा तय की है, ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्राहक उनकी दुकानों से चीनी खरीद सकें.

दिल्ली-एनसीआर में Blinkit ने मावाना प्रीमियम क्रिस्टल शुगर और धामपुर क्रिस्टल व्हाइट शुगर जैसे ब्रांडों के लिए प्रति ट्रांजैक्शन 5 किलो के एक पैक तक खरीद सीमित कर दी है. प्लेटफॉर्म पर ग्राहकों को यह भी बताया जा रहा है कि इस उत्पाद की मात्रा सीमित है. पुणे में Blinkit ग्राहकों को शॉपिंग कार्ट में 1-1 किलो के अधिकतम तीन पैक जोड़ने की अनुमति दे रहा है. वहीं, BigBasket ने कुछ खास ब्रांडों के लिए 1-1 किलो के पांच पैक तक खरीदने की सीमा तय की है.

दिल्ली-एनसीआर में Swiggy Instamart पर Supreme Harvest Crystal Sugar और Madhur Sugar के लिए 1-1 किलो के दो-दो पैक की सीमा तय की गई थी. वहीं, पुणे स्थित D-Mart के एक स्टोर में लगाए गए बोर्ड पर ग्राहकों को बताया गया कि वे एक बिल पर अधिकतम 5 किलो चीनी खरीद सकते हैं.

सरकार ने 10 लाख टन चीनी आयात को दी मंजूरी

घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने और सप्लाई बढ़ाने के लिए सरकार ने पिछले सप्ताह 10 लाख टन चीनी के आयात को मंजूरी दी थी. इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों पर दबाव कम करना है.

पहले 20 लाख टन निर्यात की थी अनुमति

भारत ने घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक रहने की उम्मीद में कुल 20 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी थी. इसमें नवंबर में 15 लाख टन और फरवरी में 5 लाख टन चीनी का निर्यात किया जाना था. हालांकि, घरेलू बाजार में कीमतों में तेजी आने के बाद सरकार ने मई में चीनी के निर्यात पर रोक लगा दी. मिल स्तर पर चीनी की कीमत जून के पहले सप्ताह में 41 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थी. सरकारी कदमों के बाद इस सप्ताह कीमत घटकर करीब 58 रुपये प्रति किलो रह गई.

अब रक्षाबंधन जैसे प्रमुख त्योहारों से पहले मांग बढ़ने की संभावना के बीच पैकेज्ड फूड कंपनियों पर लागत का दबाव और बढ़ गया है. ऐसे में कंपनियां बढ़ी हुई चीनी की लागत का कुछ हिस्सा उत्पादों की कीमत बढ़ाकर ग्राहकों पर डालने की तैयारी में हैं.
 


भारत के वैकल्पिक परिसंपत्ति बाजार में गाजा कैपिटल ने रचा इतिहास

गोपाल जैन ने कहा, हमने 1 लाख रुपये से शुरुआत की थी. आईपीओ के बाद हमारी कीमत 1 लाख करोड़ रुपये होगी.

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Published - Wednesday, 26 August, 2026
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Wednesday, 26 August, 2026
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उर्वी श्रीवास्तव

गाजा कैपिटल ब्रांड के तहत काम करने वाली गाजा अल्टरनेटिव एसेट मैनेजमेंट ने बुधवार को शेयर बाजार में पदार्पण किया. इसके साथ ही यह भारत की पहली सूचीबद्ध वैकल्पिक परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी बन गई और देश के तेजी से विस्तार कर रहे निजी पूंजी उद्योग में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई.

यह लिस्टिंग गाजा कैपिटल द्वारा भारतीय कारोबारों में निवेश शुरू करने के दो दशक से अधिक समय बाद और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) के लिए औपचारिक नियामकीय ढांचा तैयार किए जाने के एक दशक से अधिक समय बाद हुई है.

गाजा कैपिटल की एनएसई लिस्टिंग के दौरान औपचारिक दीप प्रज्वलन

कंपनी ने 550 करोड़ रुपये के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम के बाद सार्वजनिक बाजार में प्रवेश किया. इसमें 450 करोड़ रुपये का नया निर्गम और 100 करोड़ रुपये की बिक्री पेशकश शामिल थी. आईपीओ का मूल्य दायरा 152-160 रुपये प्रति शेयर तय किया गया था. यह आईपीओ 19 अगस्त को अभिदान के लिए खुला और 21 अगस्त को बंद हुआ. बोली प्रक्रिया के अंत तक इसे 31.33 गुना अभिदान मिला.

इस पदार्पण का महत्व केवल निर्गम के आकार से कहीं अधिक है. जहां कई म्यूचुअल फंड से जुड़ी और पारंपरिक वित्तीय सेवा कंपनियां भारत के शेयर बाजारों में सूचीबद्ध हो चुकी हैं, वहीं यह लिस्टिंग देश के वैकल्पिक परिसंपत्ति प्रबंधन उद्योग में सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली एक नई खिड़की खोलती है.

गाजा कैपिटल ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) पर अपनी ऐतिहासिक लिस्टिंग दर्ज की

आईआईएफएल कैपिटल सर्विसेज में कॉरपोरेट फाइनेंस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और प्रमुख पिनाक भट्टाचार्य ने कहा, “कई म्यूचुअल फंड सूचीबद्ध हैं, लेकिन यह स्पष्ट रूप से अपनी तरह की पहली सूचीबद्ध कंपनी है. यह पूरी तरह से घरेलू कंपनी है. टीम ने बड़े स्तर पर लाभप्रदता विकसित की है और कंपनी में शासन तथा बोर्ड की कार्यप्रणालियों का स्तर इसे अलग पहचान देता है.”

एआईएफ नियमों से 13.5 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा पारिस्थितिकी तंत्र

गाजा कैपिटल की लिस्टिंग भारत के वैकल्पिक निवेश परिदृश्य में आए बदलाव की पृष्ठभूमि में हुई है. सेबी ने 2012 में वैकल्पिक निवेश कोष विनियम पेश किए थे, जिसके तहत निजी इक्विटी, वेंचर कैपिटल और अन्य निजी तौर पर जुटाए गए निवेश माध्यमों को एक निर्धारित नियामकीय ढांचे के तहत लाया गया.

इसके बाद से इस उद्योग का तेजी से विस्तार हुआ है. भारत के एआईएफ उद्योग में प्रतिबद्धताएं 13.5 लाख करोड़ रुपये को पार कर गई हैं. इससे वैकल्पिक निवेश भारतीय वित्तीय क्षेत्र के अपेक्षाकृत छोटे खंड से बढ़कर पूंजी के एक महत्वपूर्ण स्रोत में बदल गया है.

गाजा अल्टरनेटिव एसेट मैनेजमेंट के गैर-कार्यकारी चेयरमैन और सेबी के पूर्व चेयरमैन यू.के. सिन्हा ने कहा, “गाजा दो दशक से अधिक समय से चुपचाप काम कर रहा है. मेरे लिए यह व्यक्तिगत रूप से संतोषजनक है क्योंकि 2012 में, जब मैं सेबी में काम कर रहा था, तब हमने एआईएफ विनियम तैयार किए थे. इससे पहले वैकल्पिक निवेशों से जुड़े नियम स्पष्ट नहीं थे. आज प्रतिबद्धताओं की राशि 13.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक है. यह कोई सामान्य लिस्टिंग नहीं है. वित्तीय कंपनियों की लिस्टिंग के मामले में भारत अब विकसित दुनिया के साथ कदम मिला चुका है. आज यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के विकास का परिणाम है.”

इस तरह यह लिस्टिंग दो यात्राओं के मिलन को दर्शाती है—एक ओर घरेलू निजी इक्विटी फर्म के रूप में गाजा कैपिटल का एक सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी में बदलना और दूसरी ओर वैकल्पिक निवेश का भारत की वित्तीय व्यवस्था के एक स्थापित हिस्से के रूप में उभरना.

आईपीओ को मिली मजबूत मांग ने इस प्रस्ताव में निवेशकों की रुचि को भी रेखांकित किया. 550 करोड़ रुपये के इस निर्गम के लिए पेश किए गए शेयरों की तुलना में कई गुना अधिक बोलियां मिलीं और यह 31 गुना से अधिक अभिदान के साथ बंद हुआ.

‘सबसे अच्छी निजी इक्विटी फर्म भारतीय होगी’

गाजा कैपिटल के लिए शेयर बाजार में पदार्पण भारत की उद्यमशील अर्थव्यवस्था के अगले चरण पर भी एक दांव है. खासतौर पर उन कारोबारों के साथ घरेलू पूंजी को जोड़ने का अवसर, जिन्हें विस्तार के लिए वित्त की जरूरत है.

गाजा अल्टरनेटिव एसेट मैनेजमेंट के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी गोपाल जैन ने कहा, “भारत में पूंजी के बिना प्रतिभा है और प्रतिभा के बिना पूंजी है. हमने पिछले 22 वर्षों में पहली समस्या पर काम किया है. अब हम दूसरी समस्या पर काम कर रहे हैं. हमने भारत को एक उद्यमशील अर्थव्यवस्था बनते देखा है. हमारी लिस्टिंग पूंजी तक पहुंच की कमी को दूर करती है.”

भारत के निजी इक्विटी पारिस्थितिकी तंत्र के परिपक्व होने के साथ कंपनी का स्वतंत्र और घरेलू होने पर जोर और महत्वपूर्ण हो जाता है. वैश्विक निजी इक्विटी कंपनियों ने ऐतिहासिक रूप से देश के संस्थागत वैकल्पिक निवेश परिदृश्य में बड़ी भूमिका निभाई है, जबकि भारतीय प्रबंधकों ने धीरे-धीरे बड़े पूंजीगत कोष और निवेश का ट्रैक रिकॉर्ड तैयार किया है.

जैन ने कहा, “हम स्वतंत्र हैं, हम घरेलू हैं. हमारे पास विदेशी उद्योग का हिस्सा बनने के कई अवसर थे. आज से 20 साल बाद सबसे अच्छी निजी इक्विटी फर्म एक भारतीय फर्म होगी.”

यह लिस्टिंग गाजा को खुद भी कारोबारों में निवेश करने वाली कंपनी से बदलकर ऐसा कारोबार बनाती है, जिसमें शेयर बाजार के निवेशक हिस्सेदारी ले सकते हैं. इससे उस उद्योग तक पहुंच व्यापक होती है, जो पारंपरिक रूप से मुख्य रूप से संस्थागत और संपन्न निवेशकों के लिए उपलब्ध रहा है.

दो दशक से अधिक समय पहले मामूली पूंजी से शुरुआत करने वाली कंपनी के लिए यह अवसर प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण रहा. जैन ने कहा, “हमने 1 लाख रुपये से शुरुआत की थी. आईपीओ के बाद हमारी कीमत 1 लाख करोड़ रुपये होगी.”

आखिरकार यह पदार्पण दलाल स्ट्रीट पर एक और आईपीओ आने से कहीं अधिक है. इसने पहली बार एक घरेलू वैकल्पिक परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी को भारत के सार्वजनिक बाजार में जगह दी है और इस तरह ऐसी कंपनी, जिसका कारोबार दूसरी कंपनियों में निवेश करने पर आधारित है, खुद सूचीबद्ध कंपनियों की दुनिया का हिस्सा बन गई है.

उर्वी श्रीवास्तव, BW रिपोर्टर्स

(उर्वी श्रीवास्तव बीडब्ल्यू बिजनेसवर्ल्ड में सहायक संपादक हैं, जहां वह शेयर बाजार, सार्वजनिक बाजार, ऊर्जा, सौर ऊर्जा और बुनियादी ढांचे से जुड़ी खबरें लिखती हैं. उनका काम भारत के आर्थिक और औद्योगिक बदलाव को आगे बढ़ाने वाली गतिविधियों पर केंद्रित है. वह पूंजी प्रवाह, नीतिगत बदलाव और टिकाऊ विकास से जुड़े रुझानों पर नजर रखती हैं.)
 


दूरदर्शन से सैटेलाइट टीवी तक, मार्कंड अधिकारी ने ऐसे बदली भारतीय टेलीविजन की तस्वीर

70 साल के हुए मीडिया दिग्गज मार्कंड अधिकारी, चार दशकों के करियर में टीवी के प्रारूप, अर्थशास्त्र और कारोबार को दिया नया आकार

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 26 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
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भारतीय टेलीविजन के विकास की कहानी कई मायनों में मार्कंड अधिकारी के सफर से भी जुड़ी हुई है. ऐसे दौर में जब भारत में टेलीविजन का मतलब मुख्य रूप से दूरदर्शन था, मार्कंड अधिकारी ने कार्यक्रमों के निर्माण, वित्तपोषण और दर्शकों तक उनकी पहुंच के नए तरीकों पर प्रयोग शुरू कर दिए थे.

26 अगस्त को 70 वर्ष के हुए मार्कंड अधिकारी ने चार दशक से अधिक लंबे अपने करियर में भारतीय टेलीविजन के कई महत्वपूर्ण बदलावों को करीब से देखा और उनमें योगदान दिया. दूरदर्शन के दौर से लेकर सैटेलाइट टेलीविजन, विशेष चैनलों और डिजिटल कंटेंट तक, उन्होंने मीडिया कारोबार में आने वाले बदलावों को मुख्यधारा में आने से पहले पहचानने की क्षमता दिखाई.

अपने दिवंगत भाई गौतम अधिकारी के साथ उन्होंने श्री अधिकारी ब्रदर्स की स्थापना की, जिसे बाद में एसएबी ग्रुप के नाम से जाना गया. परिवार द्वारा संचालित प्रोडक्शन कारोबार से शुरू हुआ यह समूह आगे चलकर टेलीविजन निर्माण, प्रसारण, फिल्मों, वितरण, डिजिटल कंटेंट, विजुअल इफेक्ट्स, प्रकाशन और समाचार एवं समसामयिक मामलों तक फैल गया.

इस विस्तार के केंद्र में दर्शकों की पसंद, कार्यक्रमों के प्रारूप और रचनात्मक कारोबार को टिकाऊ बनाने वाली व्यावसायिक व्यवस्था को समझने की उनकी क्षमता रही.

टेलीविजन के अर्थशास्त्र में बदलाव

मार्कंड अधिकारी के शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक दूरदर्शन के दौर में देखने को मिला. 1980 के दशक में श्री अधिकारी ब्रदर्स उन शुरुआती स्वतंत्र प्रोडक्शन हाउस में शामिल था, जिसने सार्वजनिक प्रसारक के लिए व्यावसायिक कार्यक्रम और धारावाहिक तैयार किए.

मार्कंड अधिकारी को भारतीय टेलीविजन पर प्रायोजन आधारित कार्यक्रमों को शुरू करने और लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका के लिए जाना जाता है. उस समय टेलीविजन कार्यक्रमों के निर्माण और वित्तपोषण का मॉडल अभी विकसित हो रहा था. ऐसे में इस मॉडल ने विज्ञापनदाताओं को सीधे कार्यक्रम निर्माण की व्यवस्था से जोड़ दिया.

यह केवल विज्ञापन के क्षेत्र में बदलाव नहीं था. इससे स्वतंत्र रूप से बनाए जाने वाले टेलीविजन कंटेंट के लिए व्यावसायिक आधार तैयार हुआ और प्रोडक्शन हाउस के लिए कंटेंट के बौद्धिक संपदा अधिकारों को बनाए रखना संभव हुआ. आगे चलकर यह मॉडल भारतीय प्रसारण उद्योग के अर्थशास्त्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया.

सैटेलाइट टीवी के दौर को पहचाना

मार्कंड अधिकारी और उनके भाई ने यह भी जल्दी समझ लिया था कि टेलीविजन दर्शक आगे चलकर अधिक विविधता की मांग करेंगे. निजी सैटेलाइट प्रसारण के विस्तार के साथ श्री अधिकारी ब्रदर्स शुरुआती प्रोडक्शन हाउस में शामिल रहा, जिसने जी टीवी के लिए फिक्शन और मनोरंजन कार्यक्रम तैयार किए.

इन शुरुआती सफल कार्यक्रमों में ‘कमांडर’ शामिल था, जिसे दर्शकों के बीच काफी लोकप्रियता मिली. कंपनी ने ‘फिलिप्स टॉप 10’ भी बनाया, जिसमें संगीत की उलटी गिनती को कॉमेडी और प्रदर्शन के साथ जोड़ा गया था. इसकी अलग प्रस्तुति ने इसे पारंपरिक संगीत कार्यक्रमों से अलग पहचान दी.

यादगार टेलीविजन प्रारूपों का निर्माण

दूरदर्शन के डीडी मेट्रो के विस्तार ने भी श्री अधिकारी ब्रदर्स के लिए नए अवसर पैदा किए. कंपनी ने 1990 के दशक में भारतीय टेलीविजन के कई लोकप्रिय कार्यक्रमों का निर्माण किया. इनमें ‘श्रीमान श्रीमती’, ‘ऑल द बेस्ट’ और बाद में ‘हैलो इंस्पेक्टर’ जैसे कार्यक्रम शामिल रहे.

इनमें ‘श्रीमान श्रीमती’ उस दौर के सबसे यादगार हास्य धारावाहिकों में शामिल रहा. इसके किरदार और परिस्थितिजन्य हास्य ने लंबे समय तक दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाए रखी. इसने दिखाया कि मजबूत टेलीविजन बौद्धिक संपदा लंबे समय तक दर्शकों के बीच लोकप्रिय रह सकती है.

श्री अधिकारी ब्रदर्स ने नियमित धारावाहिकों से आगे भी प्रयोग किए. करीब तीन दशक पहले कंपनी ने मधू और अयूब खान अभिनीत ‘चेहरा’ का निर्माण किया था. यह टेलीविजन के लिए तैयार की गई मूल फीचर फिल्म थी. यह प्रयोग बाद में टेलीविजन नेटवर्क और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर घर बैठे दर्शकों के लिए फिल्में तैयार करने की व्यापक प्रवृत्ति से पहले का कदम था.

विदेशों में भी बनाया कंटेंट

कंपनी का लक्ष्य केवल भारतीय बाजार तक सीमित नहीं था. श्री अधिकारी ब्रदर्स शुरुआती भारतीय प्रोडक्शन हाउस में शामिल था, जिसने ब्रिटेन और अमेरिका में टीवी एशिया के लिए मूल फिक्शन कंटेंट तैयार किया. यह उस समय की बात है जब भारतीय प्रवासी दर्शकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंटेंट वितरण अभी सामान्य व्यावसायिक मॉडल नहीं बना था.

1995 में कंपनी ने एक महत्वपूर्ण कॉरपोरेट उपलब्धि हासिल की और भारत की पहली सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध टेलीविजन प्रोडक्शन कंपनी बनी. बीएसई और एनएसई पर इसकी लिस्टिंग ने यह संकेत दिया कि टेलीविजन प्रोडक्शन को केवल रचनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि विस्तार योग्य और निवेश योग्य कारोबार के रूप में भी देखा जा सकता है.

कॉमेडी के दम पर बनाया अलग चैनल

साल 2000 में एसएबी टीवी की शुरुआत के साथ समूह ने केवल कार्यक्रम बनाने और बेचने से आगे बढ़कर अपना टेलीविजन चैनल संचालित करने की दिशा में कदम बढ़ाया.

उस समय हिंदी सामान्य मनोरंजन टेलीविजन पर पारिवारिक धारावाहिकों और तेजी से लोकप्रिय हो रहे ‘सास-बहू’ प्रारूप का दबदबा था. इसके विपरीत एसएबी टीवी ने हास्य और हल्के-फुल्के मनोरंजन को अपनी पहचान बनाया.

‘ऑफिस ऑफिस’ और ‘यस बॉस’ जैसे कार्यक्रमों ने चैनल को अलग पहचान दिलाई. कॉमेडी पर केंद्रित यह रणनीति इस सोच को दर्शाती थी कि नए चैनल के लिए बड़े खिलाड़ियों की नकल करना जरूरी नहीं है. वह किसी खास विधा और दर्शकों के भावनात्मक जुड़ाव वाले क्षेत्र पर अपनी पकड़ बनाकर भी मजबूत दर्शक आधार तैयार कर सकता है.

2005 में सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन ने एसएबी टीवी का अधिग्रहण कर लिया. इसके बावजूद कॉमेडी और पारिवारिक मनोरंजन के साथ चैनल की पहचान आज भी उस मूल रणनीति की सफलता को दर्शाती है.

विशेष दर्शकों के लिए चैनलों पर जोर

मार्कंड अधिकारी ने विशेष प्रसारण मॉडल पर भी प्रयोग जारी रखे. 2006 में शुरू हुआ जनमत एक इंटरैक्टिव और चर्चा आधारित समाचार एवं समसामयिक मामलों का चैनल था.

इसके बाद समूह ने क्षेत्रीय और लक्षित दर्शकों के लिए मी मराठी, मस्ती, दबंग, धमाल और दिल्लगी जैसे उपक्रमों के जरिए प्रसारण कारोबार का विस्तार किया.

इन सभी प्रयासों में एक समान रणनीति दिखाई देती है—ऐसे दर्शक वर्ग या विधा की पहचान करना, जिसकी जरूरत पर्याप्त रूप से पूरी नहीं हो रही थी और फिर उसके लिए स्पष्ट पहचान वाला मंच तैयार करना.

5,000 घंटे से अधिक का कंटेंट संग्रह

समय के साथ श्री अधिकारी ब्रदर्स ने 5,000 घंटे से अधिक का कंटेंट संग्रह तैयार किया. डिजिटल सिंडिकेशन और स्ट्रीमिंग के दौर में पुराने कंटेंट और अभिलेखागार की बढ़ती अहमियत को देखते हुए यह संग्रह सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ दीर्घकालिक व्यावसायिक संपत्ति भी है.

अगस्त 2024 में मार्कंड अधिकारी ने श्री अधिकारी ब्रदर्स टेलीविजन नेटवर्क के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक के पद से हटकर चेयरमैन एमेरिटस की जिम्मेदारी संभाली. यह उनके लंबे करियर के बाद परिचालन जिम्मेदारी के औपचारिक हस्तांतरण का महत्वपूर्ण पड़ाव था.

कार्यक्रमों और चैनलों से कहीं बड़ी है विरासत

मार्कंड अधिकारी की विरासत केवल उनके बनाए कार्यक्रमों या लॉन्च किए गए चैनलों तक सीमित नहीं है. उनका योगदान उन कारोबारी मॉडलों में भी दिखाई देता है, जिन्हें उन्होंने आगे बढ़ाया. इनमें प्रायोजन आधारित कार्यक्रम, कंटेंट अधिकारों का स्वामित्व, विधा आधारित प्रसारण, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंटेंट निर्माण और टेलीविजन प्रोडक्शन को एक संगठित कॉरपोरेट कारोबार के रूप में स्थापित करना शामिल है.

70 वर्ष की उम्र में मार्कंड अधिकारी उस पीढ़ी का हिस्सा हैं, जिसने केवल भारतीय टेलीविजन के विकास में भाग नहीं लिया, बल्कि उस उद्योग की कई बुनियादी संरचनाओं को आकार देने में भी भूमिका निभाई.

दूरदर्शन से सैटेलाइट प्रसारण और सामान्य मनोरंजन से विशेष चैनलों तक, उनके करियर की सबसे बड़ी खासियत नए अवसरों को दूसरों से पहले पहचानने की रही है.

तकनीक से लगातार बदलते मीडिया उद्योग में, जहां कहानियां आज भी कारोबार की बुनियाद हैं, बदलाव को समय से पहले पहचानने की यही क्षमता मार्कंड अधिकारी की सबसे स्थायी विरासत मानी जा सकती है.
 


भारत में तेजी से बढ़ रहा डेटा सेंटर बाजार, 2030 तक 101 मिलियन वर्ग फुट होगा फुटप्रिंट: रिपोर्ट

भारत में डेटा सेंटर उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है. Anarock Capital की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में डेटा सेंटर का कुल फुटप्रिंट 2030 तक 101 मिलियन वर्ग फुट से अधिक पहुंच सकता है. वहीं, अगले चरण के विस्तार के लिए 300 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धताएं सामने आई हैं. 

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 26 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
BWHindia

भारत का डेटा सेंटर उद्योग अब केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनता जा रहा है. देश में डेटा की खपत और उत्पादन बढ़ने के साथ डेटा सेंटर की मांग भी तेजी से बढ़ रही है. Anarock Capital की रिपोर्ट ‘डेटा सेंटर: द ब्लूप्रिंट ऑफ द डिजिटल फोर्ट्रेस इन इंडिया’ के अनुसार, भारत में डेटा सेंटर का कुल फुटप्रिंट 2030 तक 101 मिलियन वर्ग फुट से अधिक हो सकता है. 2007 में यह महज 0.6 मिलियन वर्ग फुट था, जो H1 2026 तक बढ़कर करीब 27 मिलियन वर्ग फुट हो गया है. आगामी आपूर्ति और विस्तार को 300 अरब डॉलर से अधिक की निवेश प्रतिबद्धताओं से समर्थन मिलने की उम्मीद है.

H1 2026 तक डेटा सेंटर क्षमता 1.8 गीगावाट से अधिक

रिपोर्ट के मुताबिक, H1 2026 तक भारत में डेटा सेंटर की आईटी क्षमता 1.8 गीगावाट से अधिक हो चुकी है. अगले चार वर्षों में विकासाधीन परियोजनाओं के कारण यह क्षमता 6.7 गीगावाट से अधिक हो सकती है, यानी मौजूदा स्तर के मुकाबले करीब तीन गुना वृद्धि की संभावना है.

Anarock Capital के सीईओ शोभित अग्रवाल के अनुसार, 101 मिलियन वर्ग फुट का अनुमानित डेटा सेंटर फुटप्रिंट रियल एस्टेट क्षेत्र में बड़े अवसर को दर्शाता है. डेटा सेंटर सामान्य कार्यालय या औद्योगिक परियोजनाओं से अलग होते हैं, क्योंकि इनके लिए बड़े भूखंड, पर्याप्त बिजली क्षमता, आधुनिक कूलिंग सिस्टम, मजबूत कनेक्टिविटी और उच्च स्तर की परिचालन क्षमता जरूरी होती है.

उन्होंने कहा कि डेटा सेंटर का विस्तार केवल अतिरिक्त निर्मित क्षेत्र की मांग नहीं पैदा करेगा, बल्कि यह रियल एस्टेट, तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर के संगम पर स्थित एक विशेष एसेट क्लास के रूप में विकसित होगा. इसके साथ रणनीतिक स्थानों पर जमीन, बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर, नवीकरणीय ऊर्जा, इंजीनियरिंग एवं निर्माण सेवाओं, फाइबर कनेक्टिविटी और विशेष कूलिंग समाधानों की मांग भी बढ़ेगी.

मुंबई-एमएमआर सबसे बड़ा डेटा सेंटर हब

भारत में मुंबई-एमएमआर डेटा सेंटर का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है. क्षेत्र में 54 परिचालन डेटा सेंटर हैं, जिनकी आईटी क्षमता 812 मेगावाट है. इसके बाद चेन्नई का स्थान है, जहां 25 डेटा सेंटर और 298 मेगावाट की क्षमता है.

दिल्ली-एनसीआर और बेंगलुरु में 18-18 परिचालन डेटा सेंटर हैं. इनकी आईटी क्षमता क्रमशः 179 मेगावाट और 137 मेगावाट है. वहीं, हैदराबाद में 12 डेटा सेंटर हैं, जिनकी आईटी क्षमता 178 मेगावाट है. 

इन डेटा सेंटर क्लस्टर्स के विकास में जमीन और बिजली की उपलब्धता, नेटवर्क कनेक्टिविटी, नवीकरणीय ऊर्जा तक पहुंच और प्रमुख मांग केंद्रों से नजदीकी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. इससे स्थापित डेटा सेंटर हब के अलावा अन्य शहरों में भी रियल एस्टेट विकास के नए अवसर पैदा हो रहे हैं. 

एआई बढ़ाएगा डेटा सेंटर की मांग

रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को डेटा सेंटर की मौजूदा और भविष्य की मांग के प्रमुख कारकों में से एक बताया गया है. एआई मॉडल को पारंपरिक डिजिटल एप्लीकेशन की तुलना में कहीं अधिक कंप्यूटिंग पावर, स्टोरेज क्षमता और ऊर्जा की जरूरत होती है. ऐसे में एआई के बढ़ते इस्तेमाल के साथ डेटा सेंटर की डिजाइन और इंजीनियरिंग जरूरतें भी बदलेंगी. 

पावर, जमीन और कनेक्टिविटी सबसे बड़ी जरूरत

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में डेटा सेंटर उद्योग के अगले चरण की वृद्धि मुख्य रूप से बिजली, जमीन और कनेक्टिविटी पर निर्भर करेगी. विश्वसनीय बिजली आपूर्ति, उपयुक्त जमीन, तेज कनेक्टिविटी और नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता यह तय करेगी कि भविष्य में डेटा सेंटर क्षमता कहां विकसित की जाएगी. 

इस विस्तार का असर केवल डेटा सेंटर उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा. रिपोर्ट के अनुसार, इससे भारत के प्रमुख डिजिटल बाजारों में जमीन के इस्तेमाल के तरीके, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और पूरे कमर्शियल रियल एस्टेट परिदृश्य में भी बदलाव आने की संभावना है. 
 

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