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SBI ने AT-1 बॉन्ड से जुटाए ₹4,691 करोड़, निवेशकों के भरोसे से मजबूत हुई पूंजी
SBI ने इस AT-1 बॉन्ड इश्यू का बेस साइज 3,000 करोड़ रुपये रखा था, जबकि कुल इश्यू साइज 5,000 करोड़ रुपये था.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 50 minutes ago
देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने वित्त वर्ष 2027 का पहला बैंकिंग सेक्टर AT-1 बॉन्ड इश्यू सफलतापूर्वक पूरा करते हुए 4,691 करोड़ रुपये जुटाए हैं. बैंक को इस इश्यू में बेस साइज से दोगुने से अधिक बोलियां मिलीं, जो निवेशकों के बीच SBI की मजबूत वित्तीय स्थिति और भरोसे को दर्शाता है. बॉन्ड 7.75 फीसदी की कूपन दर पर जारी किए गए हैं.
SBI के AT-1 बॉन्ड इश्यू को मिला जोरदार रिस्पॉन्स
बैंक ने बुधवार को जानकारी दी है कि उन्होंने अतिरिक्त टियर-1 (AT-1) बॉन्ड के जरिए 4,691 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई है. यह वित्त वर्ष 2027 में किसी बैंक की ओर से जारी किया गया पहला परपेचुअल (स्थायी) बॉन्ड इश्यू है. इस बॉन्ड इश्यू पर बैंक ने 7.75 फीसदी की कट-ऑफ यील्ड तय की है. इन बॉन्ड पर पांच साल बाद कॉल ऑप्शन उपलब्ध होगा और इसके बाद हर साल बैंक को इन्हें वापस खरीदने का विकल्प मिलेगा.
5,000 करोड़ रुपये के इश्यू में मिलीं 89 बोलियां
SBI ने इस AT-1 बॉन्ड इश्यू का बेस साइज 3,000 करोड़ रुपये रखा था, जबकि कुल इश्यू साइज 5,000 करोड़ रुपये था. बैंक को बेस इश्यू के मुकाबले दोगुने से अधिक बोलियां प्राप्त हुईं, जिसके बाद उसने 4,691 करोड़ रुपये स्वीकार किए. बैंक के मुताबिक, इस इश्यू में कुल 89 बोलियां मिलीं. इसमें भविष्य निधि (PF), पेंशन फंड, म्यूचुअल फंड और अन्य बैंकों समेत कई संस्थागत निवेशकों ने हिस्सा लिया.
निवेशकों का भरोसा मजबूत: SBI चेयरमैन
SBI के चेयरमैन सी. एस. शेट्टी ने कहा कि अलग-अलग श्रेणी के निवेशकों की व्यापक भागीदारी और विभिन्न प्रकार की बोलियां यह दिखाती हैं कि देश के सबसे बड़े बैंक में निवेशकों का भरोसा कायम है. उन्होंने कहा कि यह बॉन्ड इश्यू बैंक के लिए अहम है, क्योंकि इससे फंडिंग स्रोतों में विविधता आएगी और लंबी अवधि की गैर-इक्विटी नियामकीय पूंजी जुटाने में मदद मिलेगी.
क्या होते हैं AT-1 बॉन्ड?
AT-1 यानी अतिरिक्त टियर-1 बॉन्ड ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट होते हैं, जिन्हें बैंक अपनी पूंजी मजबूत करने के लिए जारी करते हैं. इन्हें बेसल-III मानकों के तहत बैंक की अतिरिक्त टियर-1 पूंजी का हिस्सा माना जाता है. इन बॉन्ड की कोई निश्चित परिपक्वता अवधि नहीं होती. हालांकि, नियामकीय मंजूरी के बाद बैंक आमतौर पर पांच साल बाद इन्हें वापस खरीदने का विकल्प रखते हैं. वित्तीय संकट की स्थिति में नुकसान को समायोजित करने की क्षमता के कारण AT-1 बॉन्ड को सामान्य बॉन्ड की तुलना में अधिक जोखिम वाला निवेश माना जाता है.
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