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Rothschild का दोहरा खेल: क्या NSE ब्लूप्रिंट में De La Rue कांड की गूंज?

जब 2025 की फिल्म धुरंधर में फेक करेंसी वॉर की परछाइयों को पर्दे पर जीवित किया गया, उसी समय वास्तविक दुनिया में बोर्डरूम के भीतर वैसी ही गूंज सुनाई दे रही है, जहां Rothschild & Co भारत-पाकिस्तान के वित्तीय फॉल्ट लाइनों के बीच संतुलन साधता नजर आता है, और दांव बेहद ऊंचे हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

पलक शाह

रोथ्सचाइल्ड (Rothschild) परिवार का पाकिस्तान से जुड़ाव गहरा रहा है. वर्ष 1988 में बेनजीर भुट्टो की नव-निर्वाचित सरकार ने ब्रिटिश फर्म एन.एम. रोथ्सचाइल्ड को निजीकरण रणनीति तैयार करने और बिक्री के लिए कंपनियों की सूची बनाने के लिए सलाहकार नियुक्त किया था. मई 1989 की उनकी रिपोर्ट में पाकिस्तान के पूंजी बाजार को विकसित करने के लिए “वाइडस्प्रेड ओनरशिप” मॉडल की सिफारिश की गई और हबीब बैंक सहित कई सरकारी उपक्रमों के विनिवेश का सुझाव दिया गया. हालांकि भुट्टो का कार्यकाल विवादों के बीच समाप्त हो गया, लेकिन उस ब्लूप्रिंट ने बाद के निजीकरण कार्यक्रमों को प्रभावित किया.

2023 में जब पाकिस्तान कर्ज संकट और आईएमएफ से टकराव के बीच संप्रभु डिफॉल्ट के कगार पर था, तब रोथ्सचाइल्ड एंड कंपनी ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व में कर्ज पुनर्गठन पर सलाह देने के लिए फिर से भूमिका निभाई. तीन वर्ष बाद यही फर्म अब भारत के वित्तीय ताज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के लिए स्वतंत्र सलाहकार के रूप में उसके 20,000 करोड़ रुपये से अधिक के आईपीओ की रूपरेखा तैयार कर रही है. रोथ्सचाइल्ड बैंकरों और वकीलों का चयन करेगा, लिस्टिंग की संरचना तय करेगा और शेयर बिक्री की रूपरेखा गढ़ेगा, यानी प्रभाव और नियंत्रण दोनों उसके हाथ में होंगे.

एक तरफ चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के कर्ज पुनर्गठन में सलाहकार की भूमिका, और दूसरी तरफ भारत की वित्तीय व्यवस्था के केंद्र में अहम जिम्मेदारी. दोनों काम कानूनी और पेशेवर हैं, लेकिन साथ-साथ होने से सवाल जरूर खड़े होते हैं.

यह पैटर्न स्वामित्व के संदर्भ में और स्पष्ट होता है. हबीब बैंक, जिसका निजीकरण रोथ्सचाइल्ड की शुरुआती सिफारिशों के बाद चरणबद्ध तरीके से हुआ और जिसका नियंत्रण अंततः आगा खान फंड फॉर इकोनॉमिक डेवलपमेंट के पास गया, उसका एक साझा बड़ा हितधारक भारत के डीसीबी बैंक में भी है, जहां एकेएफईडी की लगभग 15 प्रतिशत हिस्सेदारी है. इस प्रकार की सीमा-पार वित्तीय कड़ियां तब और असहजता बढ़ाती हैं जब एक वैश्विक सलाहकार को दोनों देशों की संवेदनशील वित्तीय संरचनाओं तक पहुंच मिलती है.

भारत यह फिल्म पहले भी देख चुका है

2000 के दशक के मध्य में जब ब्रिटिश करेंसी पेपर सप्लायर De La Rue विभिन्न संवेदनशील देशों में व्यावसायिक रूप से सक्रिय था, तब सब कुछ कागज पर वैध था. लेकिन नकली मुद्रा प्रवाह के आरोपों और बाद की जांचों ने अविश्वास की परत छोड़ दी. कोई निर्णायक न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया जिसने बोर्डरूम और अस्थिरता के बीच किसी बड़ी साजिश को सिद्ध किया हो. फिर भी असहजता बनी रही, क्योंकि रणनीतिक अवसंरचना मुद्रा सीमा-पार व्यावसायिक तटस्थता से जुड़ गई थी.

डे ला रू प्रकरण केवल सैद्धांतिक चिंता नहीं था, बल्कि दशकों तक चलने वाला आर्थिक रिसाव था. आरोप लगे कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने समान सुरक्षा कागज की आपूर्ति का लाभ उठाकर उच्च गुणवत्ता की नकली मुद्रा भारत में प्रवाहित की, जो असली नोटों की 95 प्रतिशत विशेषताओं की नकल करती थी. नेपाल और बांग्लादेश सीमाओं के रास्ते तस्करी किए गए ये नकली 500 और 1000 रुपये के नोट 2016 से पहले काले धन के प्रवाह को बढ़ाते रहे और राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाते रहे. जांच एजेंसियों ने इसे आतंकी वित्तपोषण से भी जोड़ा, जिसमें 2008 के मुंबई हमले और कश्मीर में उग्रवाद शामिल थे. छोटे व्यापारी, रेहड़ी-पटरी वाले और ग्रामीण अर्थव्यवस्था ने इसका सबसे बड़ा भार उठाया.

भारतीय खुफिया एजेंसियों ने डे ला रू की दोहरी आपूर्ति को सक्षम कारक माना, दोषी नहीं. लेकिन सवाल बना रहा, जब विकल्प उपलब्ध थे, तब प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र को सेवा देने वाली फर्म पर निर्भरता क्यों.

आज का संदर्भ: एनएसई का महत्व

एनएसई कोई साधारण कंपनी नहीं है. यह भारत के मूल्य खोज तंत्र का केंद्र है, वही एक्सचेंज जो इक्विटी बाजार, डेरिवेटिव वॉल्यूम, संस्थागत जोखिम ढांचे और खुदरा भागीदारी को दिशा देता है. इसका आईपीओ केवल पूंजी जुटाने की घटना नहीं, बल्कि संस्थागत परिपक्वता का प्रतीक है. ऐसे में नियुक्त सलाहकार को गवर्नेंस संरचना, स्वामित्व इतिहास और मूल्यांकन ढांचे तक व्यापक पहुंच मिलती है. यह केवल औपचारिक भूमिका नहीं, बल्कि स्थापत्य की तरह संरचनात्मक जिम्मेदारी है.

रोथ्सचाइल्ड की दोहरी भूमिकाओं में किसी गलत कार्य का प्रमाण नहीं है. वैश्विक सलाहकार अक्सर उन देशों में काम करते हैं जो एक-दूसरे से सहमत नहीं होते. लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से वित्तीय निर्णय स्मृतिहीन शून्य में नहीं लिए जाते.

रोथ्सचाइल्ड का इतिहास भी सीमा-पार राज्य-परामर्श से भरा है. यूरोप में उसका उदय प्रतिद्वंद्वी शक्तियों की सरकारों को वित्तपोषित करने से जुड़ा रहा. इतिहासकारों ने नेपोलियन काल के दौरान ब्रिटिश युद्ध बांड बाजार में उनकी भूमिका और औपनिवेशिक वित्त संरचनाओं से उनके संबंधों का उल्लेख किया है. यह घोटाला नहीं, इतिहास है. उनका मॉडल वैचारिक नहीं, लेन-देन आधारित रहा है, युद्ध हो या शांति, राज्य को वित्त उपलब्ध कराना.

प्रतीक और संदेश

समर्थकों का कहना है कि विकसित बाजार ऐसे ही काम करते हैं और अंतरराष्ट्रीय सलाहकार वैश्विक अनुभव तथा बेहतर मूल्यांकन दृष्टि लेकर आते हैं. वहीं आलोचकों का मानना है कि रणनीतिक ढांचे से जुड़े मामलों में केवल विशेषज्ञता ही नहीं, बल्कि संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी होती है.

सच यह है कि आधुनिक वित्त में प्रभाव स्वामित्व से नहीं, उपस्थिति से आता है, उन कमरों में जहां सूचनाएं मिलती हैं. सलाहकारी भूमिकाएं सिस्टम की आंतरिक संरचना तक पहुंच देती हैं.

रोथ्सचाइल्ड को भारत और पाकिस्तान के बीच चयन करने की आवश्यकता नहीं. उसका मॉडल सीमाओं से परे रहा है. लेकिन भारत के लिए एनएसई आईपीओ केवल एक सौदा नहीं, बल्कि पूंजी बाजारों का निर्णायक अध्याय है. और जब उस अध्याय की रूपरेखा ऐसी फर्म तैयार करे जिसने हाल में पाकिस्तान को भी सलाह दी हो, तो कथा का भार बढ़ जाता है.

आरोप नहीं, एक विश्लेषण

वैश्विक वित्त सत्ता के समीप रहकर फलता-फूलता है, न कि निष्ठा पर. वही संस्था युद्ध में वित्तपोषण कर सकती है और शांति में अंडरराइटिंग भी. सवाल यह नहीं कि यह अवैध है या नहीं, बल्कि यह कि क्या भारत इसे परिपक्वता मानेगा या इतिहास की पुनरावृत्ति.

क्योंकि इतिहास प्रायः घोटाले के रूप में नहीं, पैटर्न के रूप में लौटता है.

और जब एनएसई अपनी मेगा लिस्टिंग की तैयारी कर रहा है, तब एक सत्य उभरता है, पूंजी के इस बड़े खेल में ब्लूप्रिंट तैयार करने वाले अक्सर सुर्खियों में नहीं दिखते, लेकिन संरचना वही तय करते हैं जो लंबे समय तक कायम रहती है. 

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.

19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)

 
 


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