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Reliance Jio हासिल करने जा रहा है ये उपलब्धि, जानते हैं क्‍या बदल जाएगा इसके बाद? 

इसकी कई खास बातों में ये भी है कि कई बार ये वायर्ड इंटरनेट से भी तेज इंटरनेट प्रदान करता है. इसके इस्‍तेमाल के लिए उपभोक्‍ताओं को एक छोटा सा डिश और मॉडेम मिलता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

रिलायंस जियो देश में सैटेलाइट बेस इंटरनेट सुविधा देने के मकसद की ओर तेजी से बढ़ रही है. रिलायंस जियो को इसके लिए जो क्रिटिकल अप्रूवल चाहिए वो इसके काफी नजदीक पहुंच गई है. इसका अप्रूवल  कई मंत्रालयों की समिति देती है जिसमें इस क्षेत्र से जुड़े एक्‍सपर्ट शामिल होते हैं. इस क्षेत्र में रिलायंस जियो की टक्‍कर स्‍टारलिंक, टाटा जैसे बड़े प्‍लेयरों से है. माना जा रहा है कि रिलायंस जियो को इसका अप्रूवल जल्‍द ही मिल सकता है. 

अगर अनुमति मिली तो रिलायंस को क्‍या होगा फायदा? 
दरअसल रिलायंस देश में अपनी सैटेलाइट आधारित गीगाबिट सेवाओं को शुरू करना चाहती है. इसके लिए उसे भारत सरकार की इस मामले को लेकर गठित हुई उच्‍च स्‍तरीय कमिटी के अप्रूवल की जरूरत है. इस मामले में कई मंत्रालयों के साथ भारतीय राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केन्‍द्र (IN-SPACE) से अप्रूवल मिलना है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार,  कंपनी को जल्‍द ही IN-SPACE से अप्रूवल मिल सकता है. इसमें कई तरह के सुरक्षा अप्रूवल के साथ कई मंत्रालयों की अनुमति की आवश्‍यकता होती है. 

जियो ने इस कंपनी के साथ किया है समझौता 
इन सुविधाओं को देने के लिए जियो ने लक्‍जमबर्ग स्थित उपग्रह संचार खिलाड़ी SES के साथ समझौता किया है. दोनों के बीच 51:49 की रेसियो में समझौता हुआ था. जियो के इस कदम ने भारती के समर्थन वाली यूटेलसैट वनवेब, एलन मस्‍क की स्‍टारलिंक, अमेजन और टाटा की बराबरी में पहुंचा दिया है. यही नहीं जियो की सैटेलाइट शाखा ने दूरसंचार विभाग से भी इस मामले में जरूरी अप्रूवल ले लिया है. अब उसे INSPACE का अप्रूवल मिलना बाकी है. मौजूदा समय में भारती समूह के सपोर्ट वाला यूटेलसैट वनवैब अकेला ऐसा ग्रुप है जो जियो एसईएस गठबंधन INSPACE से अनुमति पाने वाला समूह है. इस मामले में यूटेलसैट वनवेब और जियो-एसईएस भारत के तेजी से बढ रहे सैटकॉम बाजार में फायदे के लिए दौड़ लगा रहे हैं. 

2033 तक यहां पहुंच जाएगी इंडस्‍ट्री 
In Space ने हाल ही में अनुमान जताया था कि 2033 तक भारत की अंतरिक्ष अर्थव्‍यवस्‍था संभावित रूप से 44 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगी. मौजूदा समय में ग्‍लोबल लेवल पर इस इंडस्‍ट्री में भारत की हिस्‍सेदारी 2 प्रतिशत है जो 2033 तक 8 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्‍मीद जताई जा रही है. इस सुविधा के जो सबसे बड़े फायदे हैं उनमें सबसे बड़ा ये है कि इससे देश के दूरस्‍थ इलाकों में भी इंटरनेट को पहुंचाया जा सकता है. जहां टॉवर से इंटरनेट पहुंचाना संभव नहीं होता है. दूसरा इसका सबसे बड़ा फायदा ये भी है कि सैटेलाइट इंटरनेट वैश्विक कवरेज प्रदान करता है. 

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