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रेपो रेट पर आरबीआई का फैसला: लोन सस्ता होगा या महंगा?

रेपो रेट स्थिर रखने का फैसला यह संकेत देता है कि RBI मौजूदा आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियों से संतुष्ट है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला किया है. आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक के बाद इसकी जानकारी दी. यह फरवरी 2026 की पहली MPC बैठक थी, जो हाल में आए केंद्रीय बजट और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर महत्वपूर्ण मानी जा रही थी. रेपो रेट में कोई बदलाव न होने का मतलब है कि लोन की दरों पर फिलहाल कोई असर नहीं होगा.

एमपीसी बैठक और पिछले फैसले

आरबीआई की तीन दिन की MPC बैठक 4 फरवरी को शुरू हुई थी और इसकी अध्यक्षता गवर्नर संजय मल्होत्रा ने की. दिसंबर 2025 में रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती की गई थी, जिससे यह 5.25% पर आ गया था. पिछले एक साल में कुल 125 बेसिस पॉइंट की कटौती हुई है, जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना और वित्तीय स्थिरता बनाए रखना है.

क्यों महत्वपूर्ण थी यह बैठक

फरवरी 2026 की MPC बैठक ऐसे समय हुई जब हाल ही में केंद्रीय बजट पेश हुआ और भारत-अमेरिका के बीच बड़ा व्यापार समझौता भी हुआ. ये दोनों कारक महंगाई और आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकते हैं. इस वजह से बाजार विशेषज्ञों ने सिर्फ रेपो रेट पर ही नहीं, बल्कि रिजर्व बैंक की लिक्विडिटी प्रबंधन नीति और महंगाई-विकास संतुलन पर भी ध्यान रखा.

रेपो रेट क्या है?

रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों को पैसा उधार देता है. जब रेपो रेट कम होता है, तो बैंकों से लोन लेना ग्राहकों और कंपनियों के लिए सस्ता हो जाता है. MPC द्वारा दरों को स्थिर रखना यह दर्शाता है कि रिजर्व बैंक मौजूदा महंगाई और विकास की स्थिति से संतुष्ट है और पहले की गई कटौतियों के असर को देखना चाहता है.

पिछले कटौती का असर

दिसंबर 2025 में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती के बाद रेपो रेट 5.25% पर स्थिर हुआ. पूरे 2025 में कुल 100 बेसिस पॉइंट की कटौती की गई थी. इस दौरान महंगाई नियंत्रित रही और विकास दर संतोषजनक रही, जिससे RBI को वित्तीय नीतियों को आसान बनाए रखने का मौका मिला.

बैंकों और कर्ज पर प्रभाव

हालांकि पॉलिसी रेट कम हुआ है, लेकिन बैंकों की कर्ज दरों पर इसका असर धीरे-धीरे दिख रहा है. सरकारी बॉन्ड यील्ड स्थिर बनी हुई है, जिससे वित्तीय बाज़ार में संतुलन बना हुआ है. RBI ने इसे अर्थव्यवस्था के 'गोल्डीलॉक्स फेज' के रूप में वर्णित किया है, यानी न बहुत गर्म और न बहुत ठंडी, बल्कि सही संतुलित स्थिति.

 


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