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RBI सख्त: बैंकों के ‘डार्क पैटर्न’ पर लगाम, जुलाई 2026 तक हटाने का निर्देश

आरबीआई ने साफ किया है कि बैंकों को अपने ऐप, वेबसाइट और अन्य डिजिटल इंटरफेस से ऐसे सभी भ्रामक डिजाइन, छिपे शुल्क और भ्रम पैदा करने वाली प्रक्रियाएं हटानी होंगी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

डिजिटल बैंकिंग के तेजी से बढ़ते दायरे के बीच ग्राहकों की शिकायतें भी बढ़ी हैं. ऑनलाइन बैंकिंग प्लेटफॉर्म पर छिपे शुल्क, जबरन सेवाएं और भ्रामक डिजाइन जैसे ‘डार्क पैटर्न’ अब नियामक की नजर में आ गए हैं. Reserve Bank of India ने बैंकों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे जुलाई 2026 तक अपने सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म को ‘डार्क पैटर्न मुक्त’ बनाएं और ग्राहक की पारदर्शी सहमति के बिना किसी भी तरह का शुल्क या सेवा न जोड़ें.

क्या हैं ‘डार्क पैटर्न’ और क्यों बढ़ी चिंता

LocalCircles के हालिया सर्वे में सामने आया कि ग्राहकों ने ऑनलाइन बैंकिंग में 8 तरह के भ्रामक तरीकों की शिकायत की है. इनमें तीन सबसे आम पैटर्न सामने आए—

1. ड्रिप प्राइसिंग : शुरुआत में कम शुल्क दिखाकर अंत में अतिरिक्त चार्ज जोड़ देना.
2. बास्केट स्नीकिंग : ग्राहक की जानकारी के बिना अतिरिक्त प्रोडक्ट या सर्विस शामिल कर देना.
3. फोर्स्ड एक्शन : एक जरूरी सेवा लेने के लिए दूसरी सेवा को अनिवार्य बनाना, जैसे एफडी के साथ क्रेडिट कार्ड लेना.

सर्वे में हर दो में से एक ग्राहक ने माना कि उसे इनमें से किसी न किसी तरीके का सामना करना पड़ा है.

छिपे चार्ज और भ्रामक भाषा का असर

सर्वे के मुताबिक 22% ग्राहकों ने कहा कि उन्हें अक्सर छिपे हुए चार्ज का सामना करना पड़ा, जबकि 42% ने इसे कभी-कभी होने वाली समस्या बताया. 13% ग्राहकों ने स्वीकार किया कि वे बार-बार गुमराह करने वाली भाषा का शिकार हुए.

ग्राहकों की सबसे बड़ी परेशानियों में छिपे शुल्क (64%), बिना सहमति के अतिरिक्त चार्ज (57%), जबरन दूसरी सेवा लेना (51%) और बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन (46%) शामिल हैं. यह संकेत देता है कि डिजिटल डिजाइन और यूजर इंटरफेस में पारदर्शिता की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी है.

RBI का सख्त रुख: पारदर्शिता अनिवार्य

आरबीआई का मानना है कि डिजिटल बैंकिंग में निष्पक्षता और स्पष्ट सहमति सर्वोपरि है. नियामक ने साफ किया है कि बैंकों को अपने ऐप, वेबसाइट और अन्य डिजिटल इंटरफेस से ऐसे सभी भ्रामक डिजाइन, छिपे शुल्क और भ्रम पैदा करने वाली प्रक्रियाएं हटानी होंगी.

जुलाई 2026 की तय समयसीमा तक अनुपालन न करने वाले बैंकों पर सख्त कार्रवाई भी संभव है. यह कदम डिजिटल फाइनेंशियल इकोसिस्टम में भरोसा बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

ग्राहकों के लिए क्या मायने

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला ग्राहकों को अनावश्यक वित्तीय बोझ से बचाएगा और डिजिटल बैंकिंग को ज्यादा पारदर्शी बनाएगा. हालांकि, अभी भी कई बैंक पुराने सिस्टम और जटिल इंटरफेस पर काम कर रहे हैं, जहां यूजर एक्सपीरियंस सुधारने की जरूरत है.

आने वाले महीनों में बैंकों को अपनी डिजिटल रणनीति, प्राइसिंग स्ट्रक्चर और सहमति प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाना होगा. इससे न सिर्फ ग्राहकों का भरोसा बढ़ेगा बल्कि डिजिटल बैंकिंग सेक्टर की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी.
 


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