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बैंकिंग सिस्टम को RBI का बड़ा सहारा, VRR के जरिए डाले 81,590 करोड़ रुपये

वेरिएबल रेट रेपो (VRR) नीलामी RBI का एक मौद्रिक उपकरण है, जिसका इस्तेमाल बैंकिंग सिस्टम में अल्पकालिक लिक्विडिटी उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 9 hours ago

बैंकिंग सिस्टम में घटती नकदी और बढ़ती मनी मार्केट दरों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बड़ा कदम उठाया है. केंद्रीय बैंक ने तीन-दिवसीय वेरिएबल रेट रेपो (VRR) नीलामी के जरिए 81,590 करोड़ रुपये की अस्थायी लिक्विडिटी सिस्टम में डाली है. विशेषज्ञों का मानना है कि RBI का यह कदम बैंकिंग सिस्टम में नकदी की उपलब्धता बनाए रखने और अल्पकालिक ब्याज दरों को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया है.

क्या है VRR और क्यों जरूरी है यह कदम?

वेरिएबल रेट रेपो (VRR) नीलामी RBI का एक मौद्रिक उपकरण है, जिसका इस्तेमाल बैंकिंग सिस्टम में अल्पकालिक लिक्विडिटी उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है. जब सिस्टम में नकदी कम होने लगती है और बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो जाता है, तब RBI इस तरह की नीलामी के जरिए बैंकों को फंड उपलब्ध कराता है. RBI ने बताया कि यह फंड 5.26% की कट-ऑफ दर पर उपलब्ध कराया गया.

मांग उम्मीद से कम, लेकिन पिछली नीलामी से बेहतर

हालांकि RBI ने 1 लाख करोड़ रुपये तक की राशि उपलब्ध कराने की घोषणा की थी, लेकिन बैंकों की कुल मांग 81,590 करोड़ रुपये तक ही रही. इसके बावजूद, 21 मई को हुई पिछली VRR नीलामी की तुलना में इस बार बैंकों की भागीदारी और मांग अधिक रही, जो बाजार में बढ़ती नकदी जरूरत को दर्शाती है.

तेजी से घटा लिक्विडिटी सरप्लस

RBI के आंकड़ों के मुताबिक, बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी सरप्लस तेजी से घटा है. 20 मई को जहां सिस्टम में करीब 1.51 लाख करोड़ रुपये का सरप्लस था, वहीं 21 मई तक यह घटकर लगभग 58,876.29 करोड़ रुपये रह गया. लिक्विडिटी में इस गिरावट का असर मनी मार्केट पर भी दिखाई दिया है और ओवरनाइट कॉल मनी रेट में तेज उछाल दर्ज किया गया है.

RBI उठा सकता है और कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सिस्टम में नकदी का दबाव बना रहता है, तो RBI आने वाले दिनों में एक और VRR नीलामी की घोषणा कर सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा परिस्थितियों में केंद्रीय बैंक का फोकस बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी बनाए रखने और अल्पकालिक ब्याज दरों को स्थिर रखने पर है.

अर्थव्यवस्था और बाजार पर क्या होगा असर?

विशेषज्ञों का कहना है कि बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त नकदी बनाए रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि इसका सीधा असर कर्ज वितरण, ब्याज दरों और बाजार की स्थिरता पर पड़ता है. अगर लिक्विडिटी की स्थिति ज्यादा कमजोर होती है, तो बैंकों के लिए फंड जुटाने की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर आम ग्राहकों के लिए लोन दरों पर भी पड़ सकता है.
 


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