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विदेशी कर्ज जुटाना हुआ आसान, RBI ने ECB नियमों में किया बड़ा बदलाव

आरबीआई का यह कदम भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र को वैश्विक पूंजी बाजार से जोड़ने और निवेश को गति देने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

भारतीय कंपनियों के लिए विदेश से पूंजी जुटाने का रास्ता अब पहले से ज्यादा आसान हो गया है. रिजर्व बैंक ने बाहरी वाणिज्यिक उधारी (ECB) के नियमों में व्यापक ढील देते हुए उधारी सीमा बढ़ा दी है, परिपक्वता (मैच्योरिटी) से जुड़े प्रावधान सरल किए हैं और कुछ श्रेणियों में कुल लागत (ऑल-इन-कॉस्ट) की अधिकतम सीमा हटा दी गई है. बाजार जानकारों का मानना है कि इससे विदेशी फंडिंग में तेजी आ सकती है और कंपनियों को विस्तार योजनाओं के लिए नई ताकत मिलेगी.

क्या बदला नए ढांचे में?

संशोधित व्यवस्था के तहत अब ज्यादा कंपनियां और अधिक मान्यता प्राप्त विदेशी ऋणदाता ECB के जरिए उधार ले सकेंगे.

1. उधारी सीमा में बढ़ोतरी : कंपनियां अब अधिकतम 1 अरब डॉलर तक या अपनी शुद्ध संपत्ति (नेटवर्थ) के 300% तक विदेशी कर्ज उठा सकेंगी.
2. ब्याज दर पर लचीलापन : लंबी अवधि की उधारी पर ब्याज दर की ऊपरी सीमा हटाई गई है, जिससे कंपनियां बाजार स्थितियों के अनुसार दर तय कर सकेंगी.
3. मैच्योरिटी नियमों में सहजता : न्यूनतम औसत परिपक्वता अवधि के नियमों को तर्कसंगत बनाया गया है.
4. फंड उपयोग का विस्तार : ECB से जुटाई गई राशि का उपयोग पुराने कर्ज के पुनर्वित्त (रीफाइनेंसिंग) और विस्तार योजनाओं में किया जा सकेगा.

इन कदमों का उद्देश्य व्यवस्था को अधिक लचीला बनाना और वैश्विक वित्तीय हालात के अनुरूप ढालना है.

विशेषज्ञों के अनुसार, नए ECB नियम तंत्र को खोलने की दिशा में बड़ा कदम हैं. उन्होंने कहा कि पहले फंड के उपयोग पर कई तरह की पाबंदियां थीं, लेकिन अब दायरा बढ़ने से उधारी की मात्रा और निर्गम की संख्या दोनों में वृद्धि संभव है. हालांकि, उनका मानना है कि विदेशी बाजार से कर्ज उठाने की वास्तविक मांग देश में नकदी की उपलब्धता और निवेश की जरूरत पर निर्भर करेगी. यदि घरेलू बाजार में पर्याप्त तरलता है, तो कंपनियां केवल बड़े विस्तार या अधिग्रहण के समय ही विदेशी बाजार का रुख करेंगी.

आंकड़े क्या कहते हैं?

आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच कुल 27.5 अरब डॉलर की ECB जुटाई गई. दिसंबर 2025 में भारतीय कंपनियों, जिनमें गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFC) भी शामिल हैं, ने ECB और विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड (FCCB) के माध्यम से 4.43 अरब डॉलर जुटाने के प्रस्ताव दाखिल किए. यह वित्त वर्ष 2025-26 का अब तक का सबसे बड़ा मासिक आंकड़ा है.

प्रमुख प्रस्तावों में Indian Railway Finance Corporation Limited भी शामिल रही, जिसने बुनियादी ढांचा विकास के लिए लगभग 29.95 करोड़ डॉलर जुटाने की योजना पेश की.

एमएंडए और एलबीओ बाजार को मिलेगा बढ़ावा?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारतीय विलय एवं अधिग्रहण (M&A) बाजार के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है. खेतान ऐंड कंपनी के पार्टनर अश्विन बिश्नोई ने इसे 1991 जैसा क्षण करार देते हुए कहा कि इससे लीवरेज्ड बायआउट (LBO) जैसे सौदों को बढ़ावा मिल सकता है, जहां कंपनियां अपने पूंजी निवेश के बजाय कर्ज लेकर अधिग्रहण करती हैं. नए नियमों के तहत अधिग्रहण फंडिंग के लिए भी ECB का उपयोग संभव होगा और ब्याज दर बाजार-आधारित होने से सौदों को अंतिम रूप देना आसान होगा.

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक ब्याज दरों में नरमी आती है, तो भारतीय कंपनियां महंगे घरेलू कर्ज की जगह सस्ते विदेशी कर्ज को प्राथमिकता दे सकती हैं.

 


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