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68 लाख करोड़ रुपये का एनर्जी प्लान: मोदी के ऐलान में छिपा दलाल स्ट्रीट का सबसे बड़ा दांव
इस बार PM मोदी ने सिर्फ जलवायु की बात नहीं की, बल्कि सौर, परमाणु ऊर्जा, तेल, ग्रिड और मैन्युफैक्चरिंग के जरिए भारत को वैश्विक ऊर्जा दबाव से निकालने का 770 अरब डॉलर का रोडमैप पेश किया.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 hours ago
पलक शाह
शुरुआत आंकड़ों से करते हैं, क्योंकि कहानी इन्हीं आंकड़ों में छिपी है.
सरकार के वित्तीय सेवा विभाग के अनुसार, 2030 तक 500 GW रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता हासिल करने की लागत 33 लाख करोड़ रुपये होगी. इसके बाद TERI ने मई में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया कि 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता के प्रधानमंत्री के लक्ष्य को हासिल करने के लिए 23-25 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी. राष्ट्रीय बिजली योजना ने 2032 तक केवल ट्रांसमिशन के लिए 9.15 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा है. कैबिनेट ने समुद्र मंथन के लिए 84,084 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, जो ऑफशोर तेल और गैस मिशन है. इन चार आंकड़ों को जोड़ें तो करीब 68 लाख करोड़ रुपये यानी लगभग 770 अरब डॉलर की रकम सामने आती है.
यह पूरी केंद्रीय बजट राशि से चार गुना से भी ज्यादा है और इसका इस्तेमाल केवल कागज पर नहीं हो सकता. इससे फोर्जिंग, ट्रांसफॉर्मर, टावर, पैनल, सेल, ड्रिलिंग रिग और कंटेनमेंट वेसल खरीदे जाएंगे. इन चीजों का निर्माण किसी को करना होगा और इनमें से लगभग सभी कंपनियां नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध हैं.
15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने इस खर्च की पूरी रूपरेखा रखी. बाजार पर इसका लगभग कोई असर नहीं हुआ.
बड़ा दांव
पांच सत्र बाद, 20 अगस्त को बाजार ने इस घोषणा पर कैसी प्रतिक्रिया दी, इसे देखिए. जुनिपर ग्रीन 7.5 प्रतिशत चढ़ा. प्राज इंडस्ट्रीज में 5 प्रतिशत की तेजी आई. देश की सबसे बड़ी निजी रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी अडानी ग्रीन में आधा प्रतिशत की बढ़त हुई. टाटा पावर 1 प्रतिशत गिर गया. दूसरे रिन्यूएबल एनर्जी शेयर भी नीचे रहे.
यह किसी बड़े एसेट-एलोकेशन बदलाव के हिसाब से बाजार के दोबारा मूल्यांकन जैसा नहीं है. भारत की दलाल स्ट्रीट इस बदलाव को समझ नहीं पा रही है. जिस बाजार ने इस घोषणा को समझा होता, वह केवल किसी एक छोटे शेयर को खरीदकर बड़ी कंपनियों को नहीं बेचता. वह पूरी सप्लाई चेन का एक साथ दोबारा मूल्यांकन करता, जैसा टेलीकॉम लाइसेंस, PLI योजनाओं या 1991 के बजट के बाद हुआ था. क्योंकि सरकार ने अभी संकेत दिया है कि अगले दो दशकों में वह किन कंपनियों और क्षेत्रों पर खर्च करने वाली है.
बाजार के इस बदलाव को न समझ पाने की एक वजह यह भी है कि प्रधानमंत्री के भाषण को गलत नजरिए से देखा गया. टिप्पणीकारों ने इसे ग्रीन एनर्जी पर केंद्रित भाषण बताया और फिर सवाल किया कि इसमें 84,084 करोड़ रुपये के उस कार्यक्रम की घोषणा क्यों की गई, जिसका इस्तेमाल तेल की खोज के लिए समुद्र में ड्रिलिंग करने में होगा. मोदी ने कहा था कि अतीत की ‘गलत सोच’ के कारण देश की तटरेखा का 99 प्रतिशत हिस्सा ‘नो-गो एरिया’ बना दिया गया था.
लेकिन अगर भाषण को केवल जलवायु नीति के बजाय ऊर्जा सुरक्षा के नजरिए से देखा जाए, तो तस्वीर साफ हो जाती है. मोदी ने शुरुआत में चेतावनी दी थी कि संसाधनों को हथियार बनाया जा रहा है, ‘पेट्रोल, डीजल, उर्वरक, दवाएं, तकनीक, चिप्स’ और शिपिंग लेन भी दबाव बनाने का जरिया बन गई हैं. भारत सिर्फ ग्रीन एनर्जी वाला देश बनने की कोशिश नहीं कर रहा है. वह ऐसा देश बनना चाहता है जिस पर ऊर्जा के लिए कोई दबाव न बना सके. सौर ऊर्जा एक हथियार है. परमाणु ऊर्जा एक हथियार है. घरेलू कच्चा तेल एक हथियार है. महत्वपूर्ण खनिज, बैटरी, ट्रांसमिशन और हाइड्रोजन भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं, जिनका प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उल्लेख किया.
इस रणनीति की जरूरत के पीछे एक बड़ी कीमत भी है. अमेरिका-ईरान तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट और ब्रेंट क्रूड की कीमत 89 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने के बीच भारत ने अप्रैल से जुलाई के दौरान कच्चे तेल पर 63.4 अरब डॉलर खर्च किए. एक साल पहले इसी अवधि में यह खर्च 40.5 अरब डॉलर था. यानी लगभग समान मात्रा में तेल के लिए खर्च 56.5 प्रतिशत बढ़ गया. सिर्फ तेल की कीमत बढ़ने से 23 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च हुए, जबकि घरेलू उत्पादन वास्तव में घट गया. यही ऊर्जा निर्भरता की कीमत है और यही 68 लाख करोड़ रुपये की योजना को सिर्फ एक महत्वाकांक्षा के बजाय राजनीतिक जरूरत बनाती है, जिसके लिए 2029 की समयसीमा भी सामने है.
भारत सिर्फ ग्रीन बनने की कोशिश नहीं कर रहा है. वह ऊर्जा के मामले में किसी बाहरी दबाव के आगे मजबूर नहीं होना चाहता. और इस बदलाव में अडानी समूह का दांव सबसे बड़ा कॉरपोरेट दांव हो सकता है.
यहीं से कहानी का वह हिस्सा सामने आता है, जो सबके सामने होते हुए भी नजरअंदाज हो रहा है.
सबके सामने मौजूद बड़ा दांव
दिलचस्प सवाल यह नहीं है कि रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा देने से किन शेयरों को फायदा होगा. सवाल ज्यादा सीमित और असहज करने वाला है: भारत को जिस व्यवस्था की जरूरत है, उसे बनाने का काम पहले से किसने शुरू कर दिया है?
एक नाम बार-बार सामने आता है. वजह यह नहीं है कि अडानी समूह देश की सबसे बड़ी सोलर कंपनी है. वजह यह है कि वह इस पूरी व्यवस्था के लगभग हर हिस्से में मौजूद है.
अडानी ग्रीन ने FY26 में 5.05 GW की ग्रीनफील्ड क्षमता जोड़ी, जो उस साल दुनिया की किसी भी कंपनी द्वारा एक साल में जोड़ी गई सबसे बड़ी क्षमता थी. कंपनी की ऑपरेशनल क्षमता 20 GW को पार कर चुकी है और उसका लक्ष्य 2030 तक 50 GW तक पहुंचना है. लेकिन दिल्ली की समस्या सिर्फ 500 GW बिजली पैदा करना नहीं है. असली चुनौती कच्छ के रेगिस्तानी इलाकों से 500 GW बिजली को औद्योगिक केंद्रों तक पहुंचाना है. यहीं अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस और उसका निजी ट्रांसमिशन नेटवर्क महत्वपूर्ण हो जाता है.
अडानी पावर उस डिस्पैचेबल क्षमता की आपूर्ति करता है, जिस पर ग्रिड अभी भी निर्भर है, जबकि रिन्यूएबल एनर्जी का विस्तार हो रहा है. वहीं अडानी एंटरप्राइजेज इस पूरी व्यवस्था के पीछे औद्योगिक आधार तैयार कर रहा है, मॉड्यूल, विंड उपकरण और इलेक्ट्रोलाइजर.
इसके बाद आता है समय का संयोग, जो किसी उपन्यास की कहानी जैसा लगता है. 11 अगस्त को भाषण से चार दिन पहले अमेरिका के एक जज ने गौतम अडानी के खिलाफ अमेरिकी न्याय विभाग का रिश्वतखोरी मामला खारिज कर दिया और इस मामले में विभाग के अपने तरीके की भी आलोचना की. पिछले सोमवार को 18 महीने से चला आ रहा कानूनी दबाव खत्म हुआ. शुक्रवार को देश के इतिहास में सबसे बड़े ऊर्जा विस्तार की रूपरेखा सामने आई. इसके बावजूद शेयर करीब 1,300 रुपये पर कारोबार कर रहा है, जबकि उसका 52-सप्ताह का उच्च स्तर 2,091 रुपये है.
इनमें से कोई भी बात इसे सुरक्षित निवेश नहीं बनाती और यह स्पष्ट करना जरूरी है कि क्यों. इतना बड़ा कर्ज रखने वाला, प्रमोटर की हिस्सेदारी में इतना केंद्रित और सरकार की घोषित प्राथमिकताओं से इतनी निकटता रखने वाला समूह एक खास तरह का जोखिम भी लेकर चलता है. नीतिगत नजदीकी तब तक फायदा है, जब तक निवेशक उसी वजह से कंपनी पर छूट देना शुरू न कर दें. अडानी ग्रीन अपने पुराने उच्च स्तर से काफी नीचे है और इसके कारण सिर्फ कानूनी नहीं रहे हैं.
11 से 15 अगस्त के बीच की घटनाएं कोई निवेश सलाह नहीं हैं. लेकिन यह ऐसा सेटअप जरूर है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है.
रिलायंस का दांव
अडानी समूह इस बदलाव का एकमात्र रास्ता नहीं है. इस कहानी का शायद सबसे दिलचस्प हिस्सा किसी और कंपनी से जुड़ा है. भारत की सबसे बड़ी ऑयल रिफाइनरी कंपनी रिलायंस अपने ही मौजूदा कारोबार को भविष्य में कम जरूरी बनाने के लिए 75,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है.
रिलायंस जामनगर में HJT मॉड्यूल बना रही है, 40 GWh की बैटरी गीगाफैक्ट्री तैयार कर रही है और 2032 तक हर साल 30 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन बनाने का लक्ष्य रखती है. यह उसी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का दूसरा हिस्सा है.
NTPC और NTPC Green के पास ऐसी बैलेंस शीट है जिसका मुकाबला करना मुश्किल है. टाटा पावर और JSW Energy भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. घरेलू कंटेंट नियमों से सुरक्षित उपकरण क्षेत्र में Waaree, Premier Energies, Suzlon, Borosil और Inox Wind जैसी कंपनियां मौजूद हैं.
अडानी के अलावा ट्रांसमिशन क्षेत्र में Power Grid, Hitachi Energy India और Siemens Energy India प्रमुख नाम हैं. IREDA, PFC और REC वह वित्तीय आधार हैं, जिसके जरिए इस 68 लाख करोड़ रुपये के निवेश को आगे बढ़ना है. प्राज इंडस्ट्रीज का एथेनॉल और ओलेक्ट्रा का इलेक्ट्रिक बस कारोबार ऊर्जा आयात को कम करने वाले दांव हैं. हर लीटर पेट्रोल या डीजल की जगह घरेलू विकल्प का इस्तेमाल होने का मतलब है कि उतना डॉलर खाड़ी देशों को नहीं भेजना पड़ेगा.
यहां तक कि Websol Energy Systems जैसी मिड-कैप कंपनी भी मार्च 2027 तक अपनी 600 MW Mono-PERC लाइन को TOPCon में बदलने के लिए 270 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. इसके अलावा कंपनी ने 4 GW की ग्रीनफील्ड योजना भी बनाई है. इससे पता चलता है कि कैपेक्स का चक्र सप्लाई चेन के निचले स्तर पर भी शुरू हो चुका है, भले ही शेयर बाजार कुछ और संकेत दे रहा हो.
परमाणु ऊर्जा का बड़ा बदलाव
इस पूरी कहानी में सबसे नई जानकारी परमाणु ऊर्जा से जुड़ी है और यही इस समय बाजार का सबसे कम चर्चा वाला क्षेत्र है. सौर ऊर्जा को लेकर बाजार पहले से उत्साहित है. अडानी ग्रीन की कहानी भी जानी-पहचानी है. रिलायंस के ऊर्जा बदलाव को भी निवेशकों के मॉडल में शामिल किया जा चुका है.
लेकिन SHANTI Act के नियम भाषण से कुछ दिन पहले ही अधिसूचित किए गए हैं. इसके साथ ही सिविल न्यूक्लियर पावर के क्षेत्र में सरकारी एकाधिकार खत्म हो गया है. Elara Securities ने इसे एक बड़ा बदलाव बताया है.
भारत अब निजी परमाणु ऊर्जा सप्लाई चेन को खड़ा करने की तैयारी में है. इसके लिए किसी को रिएक्टर के उपकरण बनाने होंगे, कंटेनमेंट स्ट्रक्चर तैयार करना होगा और EPC का काम संभालना होगा. L&T, BHEL, MTAR Technologies, Walchandnagar और Power Mech ऐसी कंपनियां हैं, जो इस नई सप्लाई चेन के लिए जरूरी उपकरण और सेवाएं उपलब्ध करा सकती हैं. यह ऐसा बाजार है जो अभी पूरी तरह बना भी नहीं है और इसलिए कई कंपनियों के मौजूदा अनुमानों में इसका असर शामिल नहीं है.
Elara की संभावित रिएक्टर ऑपरेटरों की सूची में NTPC, Tata Power और सबसे बड़ी कंपनी के रूप में Adani Power भी शामिल है.
इस पूरे दांव के गलत साबित होने का सबसे आसान रास्ता यह है कि होर्मुज संकट खत्म हो जाए, ब्रेंट क्रूड 65 डॉलर से नीचे आ जाए और सस्ता तेल इस पूरी रणनीति की आर्थिक जरूरत को कमजोर कर दे. शेयरों के मूल्यांकन पहले ही ऊंचे हैं, कर्ज वास्तविक है, परमाणु ऊर्जा से नकदी प्रवाह आने में एक दशक लग सकता है और SHANTI Act को लेकर भी कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि निवेशक इस कहानी से बहुत आगे निकल रहे हैं. पूंजीगत खर्च की योजनाओं में देरी होती है और भारतीय योजनाओं में यह देरी कई बार ज्यादा होती है.
लेकिन अगले पांच साल में भारत का सबसे बड़ा निवेश कार्यक्रम दलाल स्ट्रीट पर तय नहीं होगा. इसका फैसला दिल्ली में होगा. 15 अगस्त को दिल्ली ने बता दिया कि वह किन चीजों पर खर्च करना चाहती है. इसमें लाखों करोड़ रुपये का निवेश शामिल है और रिएक्टर, ग्रिड, फैक्ट्रियां और सोलर प्लांट उन कंपनियों को ही बनाने होंगे, जिनके शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं.
20 अगस्त को बाजार पर इसका बहुत कम असर दिखा.
यह इस दांव का अंत नहीं है. हो सकता है, यह गलत कीमत लगाए गए इस बड़े दांव की शुरुआत हो.
(बाजार विश्लेषण, निवेश सलाह नहीं. कीमतें 20 अगस्त, 2026 तक की हैं.)
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
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