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क्या महंगा होने वाला है पेट्रोल-डीजल? ओपेक के इस कदम से बढ़ी आशंका

पेट्रोल के साथ-साथ कंपनियों ने डीजल के दाम भी बेतहाशा बढ़ाएं हैं, जिसके चलते महंगाई आसमान पर जा बैठी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

पेट्रोल-डीजल की कीमतें पिछले कुछ समय से स्थिर हैं. जबकि क्रूड ऑयल के दामों में नरमी देखने को मिली है. जब भी कच्चा तेल महंगा होता है कंपनियां उसका हवाला देकर दाम बढ़ा देती हैं. लेकिन सस्ता होने पर उसका फायदा आम आदमी को देने से बचती रहती हैं और सरकार को भी इससे कोई परेशानी नहीं होती. यही वजह है कि पेट्रोल 100 रुपए से ऊपर निकल चुका है. इस बीच, तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक और उसके सहयोगियों (OPEC+) की तरफ से आई खबर ने पेट्रोल-डीजल के दामों में इजाफे की आशंका बढ़ा दी है. 

दुनिया के लिए बड़ा झटका
ओपेक प्लस ने कीमतों में तेजी लाने के लिए कच्चे तेल के उत्पादन में बड़ी कटौती का फैसला लिया है. यह कदम पहले से ही महंगाई और मंदी की आशंका से जूझ रही वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है. वियना में हुई एक बैठक में उत्पादन में प्रतिदिन 20 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती करने का फैसला किया गया है. इसे कोरोना महामारी के बाद की सबसे बड़ी कटौती माना जा रहा है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस समय ज्यादातर देश आर्थिक मोर्चे पर परेशानी और महंगाई का सामना कर रहे हैं. ऐसे में इस कटौती से तेल के दामों में होने वाला इजाफा उनके लिए दोहरी मार के समान होगा.

क्या है ओपेक का कहना?
हालांकि, ओपेक प्लस का कहना है कि उत्पादन में कटौती से कच्चे तेल के दाम और पेट्रोल की कीमत पर खास असर नहीं पड़ेगा. क्योंकि ओपेक प्लस के सदस्य पहले ही समूह द्वारा तय किए गए ‘कोटा’ को पूरा नहीं कर पा रहे हैं. संगठन का कहना है कि यह फैसला वैश्विक आर्थिक और कच्चे तेल के बाजार परिदृश्य में अनिश्चितता को देखते हुए लिया गया है. वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस फैसले की आलोचना की है. उन्होंने इसे रूस को रियायत देने के लिए उठाया गया कदम करार दिया है.

क्यों हो रही है कटौती?
एक रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था के कमजोर पड़ने से तेल की कीमतों में पिछले कुछ महीनों में भारी गिरावट देखी गई है. तेल उत्पादक देश कच्चे तेल की सप्लाई को कम करके कीमतों को ऊपर लाना चाहते हैं, ताकि उन्हें अच्छा मुनाफा हो सके. यही कारण है कि ओपेक प्लस तेल उत्पादन में 20 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती का फैसला लिया है. कीमतें बढ़ने का राज डिमांड और सप्लाई में ही छिपा होता है. जब डिमांड ज्यादा हो जाती है और आपूर्ति कम, तो अपने आप दाम बढ़ जाते हैं. ओपेक देश भी यही करना चाहते हैं. 

नरमी का नहीं दिया फायदा
इस समय क्रूड ऑयल डब्ल्यूटीआई और ब्रेंट क्रूड क्रमश: 86.5 डॉलर प्रति बैरल और 92 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेंड कर रहे हैं. इस कटौती के बाद इसके काफी ऊपर पहुंचने की आशंका है. ऐसे में घरेलू तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दामों में इजाफा कर सकती हैं. सरकार और कंपनियां यदि चाहती तो कच्चे तेल में नरमी का फायदा जनता को दे सकती थीं. पेट्रोल के साथ-साथ कंपनियों ने डीजल के दाम भी बेतहाशा बढ़ाएं हैं, जिसके चलते महंगाई आसमान पर जा बैठी है. इसके बावजूद न तो कंपनियों ने क्रूड ऑयल सस्ता होने पर दाम घटाए और न ही सरकार ने उन पर ऐसा करने के लिए दबाव डाला. मोदी सरकार ने खामोश रहकर तेल कंपनियों को भी खामोश रहने की आजादी दे दी.  

करीब 60% होता है आयात 
एक रिपोर्ट बताती है कि भारत ने इस साल की शुरुआत के बाद से कच्चे तेल के आयात के लिए तेल निर्यात देशों के समूह OPEC पर निर्भरता कम की है. 16 सालों के न्यूनतम स्तर 59.8 प्रतिशत पर आ गई है. लेकिन फिर भी ये आंकड़ा इतना ज्यादा है कि ओपेक के फैसले का असर भारत में पड़ेगा ही.  भारत अभी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है. अगस्त में भारत ने सऊदी अरब से 8,63,950 बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात किया था, जो जुलाई के मुकाबले 4.8 प्रतिशत अधिक रहा. वहीं, रूस का भारत को कच्चे तेल का निर्यात अगस्त में 2.4 प्रतिशत गिरकर 8,55,950 बैरल प्रतिदिन रहा था.


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