RAINMUMBAI एक वेदर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट है, जिसमें निवेशक या कंपनियां बारिश की अनिश्चितता से होने वाले आर्थिक जोखिम को हेज कर सकेंगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत अब मौसम आधारित फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स के नए दौर में प्रवेश करने जा रहा है. NCDEX 1 जून 2026 से देश का पहला एक्सचेंज-ट्रेडेड वेदर डेरिवेटिव “RAINMUMBAI” लॉन्च करने जा रहा है. यह ऐसा वित्तीय कॉन्ट्रैक्ट होगा, जो मुंबई में होने वाली बारिश के आंकड़ों से जुड़ा रहेगा और कंपनियों को मानसून से जुड़े जोखिमों से बचाव का मौका देगा.
क्या है RAINMUMBAI?
RAINMUMBAI एक वेदर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट है, जिसमें निवेशक या कंपनियां बारिश की अनिश्चितता से होने वाले आर्थिक जोखिम को हेज कर सकेंगी. आसान शब्दों में समझें तो अगर किसी कंपनी को डर है कि कम या ज्यादा बारिश से उसके कारोबार पर असर पड़ सकता है, तो वह इस कॉन्ट्रैक्ट में पोजिशन लेकर संभावित नुकसान की भरपाई कर सकती है.
बारिश के आंकड़ों पर होगा पूरा खेल
यह कॉन्ट्रैक्ट मुंबई में मानसून के दौरान दर्ज होने वाली बारिश पर आधारित होगा. इसमें “क्यूम्युलेटिव डेविएशन रेनफॉल” यानी CDR को ट्रैक किया जाएगा, जो यह बताएगा कि वास्तविक बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) से कितनी ज्यादा या कम रही. इसका भुगतान फसल या संपत्ति के नुकसान के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक बारिश के आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा.
IMD के डेटा का होगा इस्तेमाल
RAINMUMBAI कॉन्ट्रैक्ट के लिए भारतीय मौसम विभाग के मुंबई स्थित सांताक्रूज और कोलाबा वेधशालाओं के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाएगा. LPA का निर्धारण 1991 से 2020 तक के 30 साल के ऐतिहासिक डेटा के आधार पर किया गया है, ताकि सिस्टम में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे.
IIT बॉम्बे के सहयोग से तैयार हुआ प्रोडक्ट
NCDEX ने इस वेदर डेरिवेटिव को IIT बॉम्बे के सहयोग से विकसित किया है. एक्सचेंज का कहना है कि यह प्रोडक्ट विज्ञान और वित्तीय बाजारों के मेल का उदाहरण है, जो मौसम से जुड़े जोखिमों को मापने और प्रबंधित करने में मदद करेगा.
किसानों के साथ कई सेक्टरों को होगा फायदा
यह प्रोडक्ट सिर्फ किसानों के लिए नहीं बनाया गया है. बिजली कंपनियां, निर्माण कंपनियां, इंफ्रास्ट्रक्चर फर्म, लॉजिस्टिक्स कंपनियां और कृषि क्षेत्र को कर्ज देने वाले बैंक भी इसका इस्तेमाल कर सकेंगे. मानसून पर निर्भर किसी भी कारोबार को इससे जोखिम प्रबंधन में मदद मिल सकती है.
बीमा से कैसे अलग है यह सिस्टम?
पारंपरिक बीमा में नुकसान का आकलन करने और सर्वे के बाद भुगतान किया जाता है. लेकिन RAINMUMBAI एक कैश-सेटल्ड डेरिवेटिव होगा, जिसमें सेटलमेंट सीधे बारिश के आंकड़ों के आधार पर होगा. इससे भुगतान प्रक्रिया तेज होगी और विवाद की संभावना कम रहेगी.
क्या होंगी कॉन्ट्रैक्ट की प्रमुख शर्तें?
NCDEX के मुताबिक इस कॉन्ट्रैक्ट की कुछ अहम शर्तें होंगी:
1. टिक साइज: 1 मिमी वर्षा
2. लॉट मल्टीप्लायर: प्रति मिमी 50 रुपये
3. अधिकतम ऑर्डर साइज: 50 लॉट
4. दैनिक मूल्य सीमा: 9%
5. ट्रेडिंग समय: सोमवार से शुक्रवार, सुबह 10 बजे से
मौसम जोखिम को मिलेगा नया वित्तीय रूप
विशेषज्ञों का मानना है कि वेदर डेरिवेटिव्स भविष्य में भारत के लिए बड़ा बाजार बन सकते हैं. जलवायु परिवर्तन और मौसम की बढ़ती अनिश्चितता के दौर में ऐसे प्रोडक्ट कंपनियों को जोखिम प्रबंधन का नया विकल्प देंगे. इससे मौसम से जुड़े आर्थिक झटकों को कम करने में मदद मिल सकती है.
NCDEX ने क्या कहा?
NCDEX के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO अरुण रस्ते ने कहा कि भारत सदियों से मानसून की अनिश्चितता के साथ जीता आया है और RAINMUMBAI सभी हितधारकों को इससे निपटने के लिए वैज्ञानिक और रेगुलेटेड साधन देगा. वहीं, IMD के अधिकारी बिक्रम सिंह ने इसे “रेगुलेटेड मार्केटप्लेस में साइंस और फाइनेंस का संगम” बताया.
कंपनी ने गुरुवार को रेगुलेटरी फाइलिंग में बताया कि उसने जयप्रकाश पावर वेंचर्स में जयप्रकाश एसोसिएट्स की 24 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए शेयर परचेज एग्रीमेंट किया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी पावर (Adani Power) ने ऊर्जा क्षेत्र में बड़ा दांव खेलते हुए जेपी पावर वेंचर (Jaiprakash Power Ventures) में 24 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने और चुनिंदा थर्मल पावर एसेट्स अधिग्रहित करने का फैसला किया है. करीब 4,194 करोड़ रुपये की इस डील को जय प्रकाश एसोसिएट्स (Jaiprakash Associates) के दिवाला समाधान योजना का हिस्सा माना जा रहा है.
24% हिस्सेदारी खरीदने के लिए हुआ समझौता
कंपनी ने गुरुवार को रेगुलेटरी फाइलिंग में बताया कि उसने जयप्रकाश पावर वेंचर्स में जयप्रकाश एसोसिएट्स की 24 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने के लिए शेयर परचेज एग्रीमेंट किया है. इस सौदे की कुल कीमत करीब 2,993.60 करोड़ रुपये तय की गई है.
यूपी के थर्मल पावर प्लांट का भी अधिग्रहण
अडानी पावर ने उत्तर प्रदेश के चुरक स्थित 180 मेगावाट थर्मल पावर प्लांट और उससे जुड़े एसेट्स खरीदने के लिए बिजनेस ट्रांसफर एग्रीमेंट भी किया है. इसके साथ ही जयप्रकाश एसोसिएट्स की प्रयागराज पावर जेनरेशन कंपनी में 11.49 फीसदी हिस्सेदारी भी अडानी पावर को ट्रांसफर की जाएगी. इन एसेट्स के लिए करीब 1,200 करोड़ रुपये का सौदा तय किया गया है.
दिवाला समाधान योजना का हिस्सा है डील
यह अधिग्रहण ऐसे समय में हुआ है जब मार्च में अडानी पावर ने स्टॉक एक्सचेंज को जानकारी दी थी कि वह नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा मंजूर जयप्रकाश एसोसिएट्स की समाधान योजना में इम्प्लीमेंटिंग एंटिटी बनने में रुचि रखती है. कंपनी के मुताबिक मौजूदा समझौते उसी मंजूर समाधान योजना को लागू करने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं.
पावर सेक्टर में और मजबूत होगी अडानी की पकड़
विशेषज्ञों का मानना है कि इस अधिग्रहण से अडानी पावर की थर्मल पावर क्षमता और बाजार में मौजूदगी दोनों मजबूत होंगी. साथ ही कर्ज में डूबी जयप्रकाश एसोसिएट्स के एसेट्स के पुनर्गठन को भी इससे गति मिलने की उम्मीद है.
यह डील इस बात का संकेत है कि भारतीय बैंकिंग सिस्टम अब तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहन सेक्टर पर बड़ा दांव लगा रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के इलेक्ट्रिक वाहन बाजार में प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है. इसी बीच जेएसडब्ल्यू मोटर्स (JSW Motors) ने बड़ा कदम उठाते हुए भारतीय स्टेट बैंक से करीब 8,000 करोड़ रुपये की फंडिंग हासिल की है. इस रकम का इस्तेमाल महाराष्ट्र में नई EV मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी लगाने और नई एनर्जी गाड़ियों के उत्पादन को बढ़ाने में किया जाएगा.
महाराष्ट्र में बनेगा नया EV मैन्युफैक्चरिंग प्लांट
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने जेएसडब्ल्यू मोटर्स को 10 साल से ज्यादा अवधि के लिए यह लोन सुविधा दी है. कंपनी इस फंड का इस्तेमाल महाराष्ट्र में ग्रीनफील्ड मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी तैयार करने में करेगी. यह प्लांट नई एनर्जी वाली पैसेंजर गाड़ियों के उत्पादन पर फोकस करेगा. माना जा रहा है कि यह प्रोजेक्ट भारत के EV सेक्टर को नई दिशा दे सकता है.
सेकेंडरी लोन मार्केट में भी बढ़ सकती है हलचल
जानकारों के मुताबिक अगर सेकेंडरी लोन मार्केट में मांग मजबूत रहती है, तो SBI इस लोन का कुछ हिस्सा दूसरे बैंकों और वित्तीय संस्थानों को ट्रांसफर कर सकता है. इससे देश के क्रेडिट मार्केट में गतिविधियां बढ़ने और ऑटो सेक्टर में निवेश को नया बल मिलने की उम्मीद है.
EV सेक्टर पर बढ़ा बैंकों का भरोसा
यह डील इस बात का संकेत है कि भारतीय बैंकिंग सिस्टम अब तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक वाहन सेक्टर पर बड़ा दांव लगा रहा है. सरकारी प्रोत्साहन, पर्यावरण को लेकर बढ़ती जागरूकता और ग्राहकों की बदलती पसंद की वजह से भारत में EV बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. CareEdge Ratings के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में देश में क्रेडिट ग्रोथ 13% से 14.5% तक पहुंच सकती है, जबकि जमा वृद्धि दर 11% से 12% रहने का अनुमान है.
ऑटो सेक्टर में मजबूत पहचान बनाने की तैयारी
JSW समूह पहले से स्टील, सीमेंट और पावर सेक्टर में मजबूत मौजूदगी रखता है. कंपनी की चीन की SAIC Motor के साथ JSW MG Motor India में साझेदारी भी है. इसके अलावा नई एनर्जी गाड़ियों के लिए Chery Automobile के साथ भी सहयोग किया गया है. कंपनी का लक्ष्य भारत के नई एनर्जी पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में मजबूत पहचान बनाना है. आने वाले समय में कंपनी अपने नए मॉडल्स और लॉन्च टाइमलाइन की जानकारी साझा कर सकती है.
भारत के EV बाजार को मिल सकती है नई रफ्तार
विशेषज्ञों का मानना है कि JSW Motors का यह निवेश भारत के इलेक्ट्रिक वाहन बाजार में प्रतिस्पर्धा को और तेज कर सकता है. नई मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ने से घरेलू उत्पादन मजबूत होगा और भारत को EV हब बनाने की दिशा में भी मदद मिल सकती है.
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि AT1 बॉन्ड को राइट-ऑफ करना बैंक को बचाने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
यस बैंक (Yes Bank) के AT1 बॉन्ड विवाद में नया मोड़ आ गया है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 8,415 करोड़ रुपये के AT1 बॉन्ड को बट्टे खाते में डालने के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि 2020 के बैंक पुनर्गठन के दौरान जमाकर्ताओं के हितों और वित्तीय स्थिरता को बचाने के लिए यह कदम जरूरी था.
सरकार ने क्यों बताया फैसला जरूरी?
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि AT1 बॉन्ड को राइट-ऑफ करना बैंक को बचाने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा था. सरकार के मुताबिक उस समय बैंक गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रहा था और अगर यह कदम नहीं उठाया जाता, तो जमाकर्ताओं और पूरे बैंकिंग सिस्टम पर बड़ा खतरा पैदा हो सकता था.
क्या होते हैं AT1 बॉन्ड?
AT1 यानी Additional Tier-1 बॉन्ड ऐसे वित्तीय साधन होते हैं, जिन्हें बैंकों की पूंजी मजबूत करने के लिए जारी किया जाता है. इन बॉन्ड्स पर निवेशकों को सामान्य निवेश विकल्पों के मुकाबले ज्यादा ब्याज मिलता है, लेकिन संकट की स्थिति में इन्हें बट्टे खाते में डाला जा सकता है. सरकार ने अदालत में कहा कि यही इन बॉन्ड्स की मूल संरचना और जोखिम का हिस्सा है.
निवेशकों को मिलता था 9% से ज्यादा रिटर्न
सरकार ने अदालत को बताया कि हर AT1 बॉन्ड का अंकित मूल्य 10 लाख रुपये था और इन पर 9 फीसदी से ज्यादा रिटर्न मिलता था. उच्च रिटर्न की वजह से ये बॉन्ड निवेशकों के बीच काफी लोकप्रिय थे, लेकिन इनके साथ जोखिम भी जुड़ा हुआ था कि बैंक संकट की स्थिति में इन्हें राइट-ऑफ किया जा सकता है.
एसबीआई और RBI ने भी सरकार का समर्थन किया
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय स्टेट बैंक ने भी सरकार के पक्ष का समर्थन किया. सरकार ने कहा कि भारतीय स्टेट बैंक ने यस बैंक के पुनर्गठन के दौरान करीब 8,000 करोड़ रुपये का निवेश इस भरोसे पर किया था कि AT1 बॉन्ड को बट्टे खाते में डाला जाएगा.
साथ ही यह भी कहा गया कि देश के बैंक अब तक 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के AT1 बॉन्ड जारी कर चुके हैं. ऐसे में अगर संकट के समय इन्हें राइट-ऑफ करने की अनुमति नहीं दी गई तो बैंकिंग सिस्टम पर गंभीर जोखिम पैदा हो सकता है.
हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
यह मामला उस फैसले से जुड़ा है जिसमें 2023 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने AT1 बॉन्ड राइट-ऑफ को रद्द कर दिया था. इसके खिलाफ यस बैंक और RBI ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी. जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी और बॉन्डधारकों को नोटिस जारी किया था.
छोटे निवेशकों को लेकर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बैंक और RBI से कानूनी प्रावधानों पर और स्पष्ट जानकारी मांगी. साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ताओं को निवेश के आधार पर बॉन्डधारकों का विस्तृत वर्गीकरण देने का निर्देश दिया ताकि छोटे निवेशकों पर पड़ने वाले असर का सही आकलन किया जा सके. अदालत ने सभी पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपनी लिखित दलीलें जमा करने को कहा है. मामले की अगली सुनवाई जुलाई में होगी.
मई में मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 54.3 पर आ गया, जो अप्रैल में 54.7 था. इसका मतलब है कि फैक्टरी गतिविधियां बढ़ रही हैं, लेकिन उनकी रफ्तार पहले के मुकाबले कमजोर हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की आर्थिक गतिविधियों में मई के दौरान मजबूती बरकरार रही, हालांकि कंपोजिट PMI में हल्की गिरावट दर्ज की गई. सेवा क्षेत्र की मजबूत ग्रोथ ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आई सुस्ती की भरपाई कर दी. वहीं बढ़ती इनपुट लागत और कमजोर निर्यात मांग ने कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है.
मई में 58.1 पर आया कंपोजिट PMI
HSBC फ्लैश इंडिया कंपोजिट PMI मई में 58.1 पर रहा, जो अप्रैल में 58.2 था. हालांकि इसमें मामूली गिरावट आई है, लेकिन 50 से ऊपर का स्तर आर्थिक गतिविधियों में विस्तार का संकेत देता है. S&P Global के आंकड़ों के मुताबिक भारत के निजी क्षेत्र में कारोबार की स्थिति अब भी मजबूत बनी हुई है.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार पड़ी धीमी
मई में मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 54.3 पर आ गया, जो अप्रैल में 54.7 था. इसका मतलब है कि फैक्टरी गतिविधियां बढ़ रही हैं, लेकिन उनकी रफ्तार पहले के मुकाबले कमजोर हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक नए निर्यात ऑर्डर की ग्रोथ पिछले 19 महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कमजोर मांग का असर भारतीय कंपनियों पर साफ दिखाई दिया.
सेवा क्षेत्र ने संभाला मोर्चा
मैन्युफैक्चरिंग में सुस्ती के बावजूद सेवा क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को मजबूती दी. घरेलू मांग और सर्विस गतिविधियों में तेजी की वजह से कंपोजिट PMI मजबूत बना रहा. हालांकि कंपनियों ने माना कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा, यात्रा में रुकावटें और पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर कारोबार पर पड़ा है.
बढ़ती लागत से कंपनियों पर दबाव
मई के दौरान कंपनियों की लागत में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई. ऊर्जा, ईंधन, गैस, धातु, प्लास्टिक, रबर और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी लागत बढ़ने से मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर दबाव बढ़ा. इनपुट कीमतों में जुलाई 2022 के बाद सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि कंपनियों ने ग्राहकों पर पूरा बोझ डालने से परहेज किया और बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी सीमित रखी.
स्टॉक बढ़ाने में जुटीं कंपनियां
रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियों ने तैयार माल और कच्चे माल का स्टॉक लगातार बढ़ाया है. कच्चे माल की खरीद पिछले तीन महीनों की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ी. विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां भविष्य की मांग को देखते हुए पहले से तैयारी कर रही हैं.
रोजगार और कारोबारी भरोसा मजबूत
निजी क्षेत्र में भर्ती का माहौल सकारात्मक बना हुआ है. सेवा क्षेत्र में रोजगार लगभग एक साल की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ा, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी नौकरियों में इजाफा हुआ.
हालांकि कारोबारी भरोसे में हल्की नरमी आई है, लेकिन कंपनियां भविष्य को लेकर अब भी आशावादी नजर आ रही हैं. उन्हें उम्मीद है कि आने वाले महीनों में बाजार की स्थिति और बेहतर हो सकती है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक स्पेसएक्स करीब 2 ट्रिलियन डॉलर के वैल्यूएशन पर 75 अरब डॉलर जुटाने की तैयारी में है. भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब ₹7.25 लाख करोड़ बैठती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलॉन मस्क अब शेयर बाजार में एक नया इतिहास रचने की तैयारी में हैं. दरअसल, एलन मस्क की स्पेस कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) ने IPO के लिए अमेरिकी रेगुलेटर के पास आवेदन दाखिल कर दिया है. अगर यह इश्यू तय आकार में आता है, तो यह दुनिया का सबसे बड़ा IPO बन सकता है और सऊदी अरामको का रिकॉर्ड टूट जाएगा.
नैस्डैक पर लिस्ट होगी स्पेसएक्स
स्पेस एक्सप्लोरेशन टेक्नोलॉजीज कॉर्प नाम वाली कंपनी ने औपचारिक रूप से अमेरिकी बाजार नियामक SEC के पास दस्तावेज दाखिल किए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक कंपनी नैस्डैक पर “SPCX” सिंबल के तहत लिस्ट हो सकती है. इससे पहले ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया था कि कंपनी गोपनीय तरीके से IPO की तैयारी कर रही थी.
कितना बड़ा होगा स्पेसएक्स का IPO?
रिपोर्ट्स के मुताबिक स्पेसएक्स करीब 2 ट्रिलियन डॉलर के वैल्यूएशन पर 75 अरब डॉलर जुटाने की तैयारी में है. भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब ₹7.25 लाख करोड़ बैठती है. अगर ऐसा होता है तो यह दुनिया का सबसे बड़ा IPO होगा. अभी यह रिकॉर्ड सऊदी अरामको के नाम है, जिसने 2019 में करीब 29.4 अरब डॉलर जुटाए थे.
क्यों खास है स्पेसएक्स?
स्पेस ट्रांसपोर्टेशन इंडस्ट्री में स्पेसएक्स का दबदबा लगातार बढ़ता गया है. कंपनी नासा और अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन को रॉकेट लॉन्च सेवाएं देती है. इसके अलावा कंपनी का स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट बिजनेस भी तेजी से बढ़ रहा है, जिससे अरबों डॉलर का रेवेन्यू आता है. यही वजह है कि निजी बाजार में स्पेसएक्स दुनिया की सबसे मूल्यवान प्राइवेट कंपनियों में शामिल हो चुकी है.
xAI और X डील से बढ़ी ताकत
इस साल एलॉन मस्क के AI स्टार्टअप xAI के साथ हुए अधिग्रहण ने स्पेसएक्स की वैल्यूएशन को और मजबूती दी है. इस डील में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X भी शामिल है, जिसे मस्क ने 2022 में खरीदा था. विश्लेषकों का मानना है कि IPO के बाद मस्क की कुल संपत्ति में भी जबरदस्त उछाल देखने को मिल सकता है.
टेस्ला समेत कई दिग्गज कंपनियां रह जाएंगी पीछे
2 ट्रिलियन डॉलर की संभावित वैल्यूएशन स्पेसएक्स को दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों की कतार में खड़ा कर सकती है. यह आंकड़ा S&P 500 इंडेक्स की ज्यादातर कंपनियों से बड़ा होगा. यहां तक कि मस्क की इलेक्ट्रिक कार कंपनी टेस्ला भी वैल्यूएशन के मामले में पीछे छूट सकती है.
जून में सामने आ सकती हैं बड़ी डिटेल्स
रिपोर्ट्स के मुताबिक IPO से जुड़ी ज्यादा जानकारी 4 जून के बाद सामने आ सकती है. वहीं 11 जून तक इसके प्राइस बैंड और अन्य अहम विवरण जारी किए जा सकते हैं. ग्लोबल निवेशकों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या स्पेसएक्स सच में दुनिया के सबसे बड़े IPO का रिकॉर्ड अपने नाम कर पाएगी.
सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक कंपनियां अपने कर्मचारियों की सैलरी से तय रकम काटकर सीधे उनके म्युचुअल फंड खाते में निवेश कर सकेंगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अब म्यूचुअल फंड में निवेश करना पहले से ज्यादा आसान हो सकता है. बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ऐसे नए नियमों पर काम कर रहा है, जिनके तहत कंपनियां कर्मचारियों की सैलरी से सीधे पैसा काटकर म्युचुअल फंड (Mutual Fund ) में निवेश कर सकेंगी. इसके अलावा एजेंटों को कमीशन के बदले MF यूनिट्स देने और सामाजिक कार्यों के लिए निवेश का हिस्सा दान करने जैसे प्रस्ताव भी सामने आए हैं.
निवेश के नियमों में बड़ा बदलाव संभव
अभी तक म्यूचुअल फंड में निवेश के लिए पैसा केवल निवेशक के अपने बैंक खाते से ही भेजा जा सकता है. यह भुगतान आरबीआई से मान्यता प्राप्त पेमेंट गेटवे या सेबी द्वारा अधिकृत संस्थानों के जरिए ही स्वीकार किया जाता है. लेकिन अब सेबी कुछ खास परिस्थितियों में “थर्ड पार्टी पेमेंट” की अनुमति देने पर विचार कर रहा है. यानी निवेशक की ओर से कोई दूसरी संस्था या व्यक्ति भी निवेश राशि जमा कर सकेगा.
कंपनियां कर्मचारियों की सैलरी से कर सकेंगी निवेश
सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक कंपनियां अपने कर्मचारियों की सैलरी से तय रकम काटकर सीधे उनके म्युचुअल फंड खाते में निवेश कर सकेंगी. इस कदम का मकसद SIP और लॉन्ग टर्म निवेश को बढ़ावा देना है. माना जा रहा है कि इससे नौकरीपेशा लोगों के लिए नियमित निवेश करना आसान होगा और बचत की आदत मजबूत होगी.
एजेंटों को कैश नहीं, MF यूनिट्स देने का सुझाव
सेबी ने एक और अहम प्रस्ताव रखा है. इसके तहत म्यूचुअल फंड कंपनियां अपने एजेंटों को कमीशन के बदले नकद भुगतान करने की जगह म्युचुअल फंड यूनिट्स दे सकेंगी. रेगुलेटर का मानना है कि इससे एजेंट खुद भी निवेश की तरफ आकर्षित होंगे और लंबी अवधि की बचत को बढ़ावा मिलेगा.
सामाजिक कार्यों के लिए भी इस्तेमाल हो सकेगा निवेश
नए प्रस्तावों में निवेशकों को अपने निवेश या उससे मिलने वाले मुनाफे का एक हिस्सा सामाजिक कार्यों के लिए दान करने की सुविधा देने की बात भी शामिल है. इसके लिए एक पारदर्शी और सुरक्षित सिस्टम तैयार किया जाएगा ताकि निवेशकों का पैसा सही तरीके से इस्तेमाल हो सके.
सुरक्षा और पारदर्शिता पर रहेगा पूरा फोकस
सेबी ने साफ किया है कि निवेश प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए कड़े नियम लागू किए जाएंगे.
1. पैसा देने वाले और निवेश पाने वाले दोनों के लिए KYC अनिवार्य होगा
2. सभी लेन-देन का इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड रखा जाएगा
3. म्युचुअल फंड कंपनियों को पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करनी होगी
4. निवेशक जब चाहें अपनी यूनिट्स बेचकर पैसा निकाल सकेंगे
10 जून तक मांगे गए सुझाव
सेबी ने इन प्रस्तावों पर आम लोगों और बाजार से जुड़े पक्षों से 10 जून तक सुझाव मांगे हैं. सुझावों के बाद नियमों को अंतिम रूप दिया जा सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये बदलाव लागू होते हैं तो भारत में म्युचुअल फंड निवेश का दायरा तेजी से बढ़ सकता है और नौकरीपेशा लोगों के बीच SIP संस्कृति को नया बल मिलेगा.
ICRA की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक FY27 में भारतीय दोपहिया उद्योग में सालाना 3-5 फीसदी की ग्रोथ दर्ज हो सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय दोपहिया वाहन बाजार में आने वाले वित्त वर्ष FY27 के दौरान स्थिर लेकिन मजबूत ग्रोथ देखने को मिल सकती है. क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA ने अनुमान जताया है कि घरेलू टू-व्हीलर इंडस्ट्री 3 से 5 फीसदी की दर से बढ़ सकती है. हालांकि कमजोर मानसून और हाई बेस इफेक्ट जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर की बढ़ती मांग, ग्रामीण बाजार में सुधार और निर्यात में तेज उछाल सेक्टर को नई रफ्तार दे रहे हैं.
FY27 में कैसी रहेगी दोपहिया बाजार की चाल
ICRA की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक FY27 में भारतीय दोपहिया उद्योग में सालाना 3-5 फीसदी की ग्रोथ दर्ज हो सकती है. एजेंसी का कहना है कि बाजार में मांग बनी हुई है, लेकिन पिछले सालों की तेज बिक्री के कारण तुलना का आधार काफी ऊंचा हो गया है. इसके अलावा कमजोर मानसून की आशंका भी बाजार की रफ्तार पर असर डाल सकती है.
मांग को सपोर्ट कर रहे हैं ये बड़े फैक्टर्स
रिपोर्ट के अनुसार रेगुलेटरी सुधार, रिप्लेसमेंट डिमांड और स्थिर उपभोक्ता मांग जैसे कई स्ट्रक्चरल फैक्टर्स दोपहिया बाजार को मजबूती दे रहे हैं. ग्रामीण इलाकों में आय में स्थिरता और कृषि क्षेत्र से बेहतर नकदी प्रवाह भी बिक्री को सहारा दे रहे हैं.
अप्रैल 2026 में बिक्री ने पकड़ी रफ्तार
नए वित्त वर्ष की शुरुआत टू-व्हीलर इंडस्ट्री के लिए शानदार रही. अप्रैल 2026 में घरेलू थोक बिक्री में 29 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई और बिक्री बढ़कर 1.9 मिलियन यूनिट तक पहुंच गई. ICRA के मुताबिक GST 2.0 सुधारों के बाद वाहनों की कीमतें अपेक्षाकृत किफायती होने से मांग में तेजी आई. वहीं खुदरा बिक्री में भी 13 फीसदी की ग्रोथ दर्ज हुई. शादी सीजन, सीमित कीमत बढ़ोतरी और ग्रामीण मांग में सुधार ने बाजार को सपोर्ट किया.
इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर बना सबसे बड़ा ग्रोथ ड्राइवर
देश में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर यानी e2W सेगमेंट तेजी से बढ़ रहा है. अप्रैल 2026 में इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की खुदरा बिक्री 68 फीसदी बढ़कर 1.54 लाख यूनिट से ज्यादा पहुंच गई. अब कुल टू-व्हीलर बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़कर 8 फीसदी हो गई है.
ICRA का कहना है कि बेहतर रेंज, नए मॉडल और कम ऑपरेटिंग कॉस्ट की वजह से ग्राहकों का रुझान तेजी से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ रहा है. पेट्रोल वाहनों की तुलना में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर अब ज्यादा किफायती विकल्प बनते जा रहे हैं.
निर्यात बाजार से भी मिला बड़ा सहारा
घरेलू मांग के साथ-साथ निर्यात बाजार में भी भारतीय कंपनियों को मजबूत बढ़त मिली है. अप्रैल 2026 में टू-व्हीलर एक्सपोर्ट में 38 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई. इससे पहले पूरे FY26 में निर्यात 23 फीसदी बढ़ा था.
वैश्विक बाजारों में किफायती और फ्यूल एफिशिएंट वाहनों की मांग बढ़ने से भारतीय कंपनियों को फायदा मिल रहा है. कई विदेशी बाजारों में भारतीय ब्रांड अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं.
कमजोर मानसून और महंगे कच्चे माल की चिंता
हालांकि ICRA ने कुछ जोखिमों को लेकर भी चेतावनी दी है. मौसम विभाग की ओर से अल नीनो के असर के चलते कमजोर मानसून की आशंका जताई गई है. अगर ग्रामीण क्षेत्रों में बारिश कमजोर रहती है तो दोपहिया वाहनों की मांग प्रभावित हो सकती है. इसके अलावा कच्चे माल की बढ़ती कीमतें कंपनियों की लागत बढ़ा सकती हैं, जिससे मुनाफे पर दबाव आने का खतरा बना रहेगा.
पश्चिम एशिया तनाव बढ़ा सकता है दबाव
रिपोर्ट में पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव को भी बड़ा जोखिम बताया गया है. अगर यह तनाव लंबा खिंचता है तो सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है. इसका सीधा असर वाहन कंपनियों की लागत और निर्यात कारोबार पर पड़ सकता है.
बुधवार को BSE सेंसेक्स 117.54 अंक की तेजी के साथ 75,318.39 अंक पर बंद हुआ था, NSE निफ्टी 41 अंक चढ़कर 23,659 के स्तर पर पहुंच गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
20 मई को भारतीय शेयर बाजार में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखने को मिला था. शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 600 अंक से ज्यादा टूट गया था, लेकिन बाद में रिलायंस इंडस्ट्रीज, हिंडाल्को और बजाज ऑटो जैसे दिग्गज शेयरों में खरीदारी लौटने से बाजार शानदार रिकवरी करते हुए हरे निशान में बंद हुआ. अब निवेशकों की नजर 21 मई के कारोबार पर है, जहां वैश्विक संकेतों, पश्चिम एशिया तनाव, रुपये की कमजोरी और कंपनियों के तिमाही नतीजों के बीच बाजार की दिशा तय होगी.
कल कैसी रही बाजार की चाल
बुधवार के कारोबारी सत्र में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 117.54 अंक की तेजी के साथ 75,318.39 अंक पर बंद हुआ था, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 41 अंक चढ़कर 23,659 के स्तर पर पहुंच गया था. कारोबार के दौरान बाजार में भारी गिरावट भी देखने को मिली, लेकिन दिन के दूसरे हिस्से में खरीदारी बढ़ने से माहौल बदल गया.
रिलायंस और हिंडाल्को से बाजार को उम्मीद
पिछले सत्र में रिलायंस इंडस्ट्रीज और हिंडाल्को इंडस्ट्रीज ने बाजार की रिकवरी में अहम भूमिका निभाई थी. आज भी निवेशकों की नजर इन दिग्गज शेयरों पर रहेगी, क्योंकि इनकी चाल पूरे बाजार की दिशा तय करने में अहम मानी जा रही है.
वैश्विक संकेत और पश्चिम एशिया तनाव अहम फैक्टर
विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और महंगाई की आशंकाएं आज भी बाजार पर असर डाल सकती हैं. इसके अलावा एशियाई बाजारों की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी निवेशकों के लिए अहम संकेत रहेंगी.
रुपये और सेक्टोरल ट्रेंड पर भी नजर
डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले सत्र में कमजोर होकर 96.96 के स्तर पर पहुंच गया था. अगर रुपये में दबाव बना रहता है तो आईटी और आयात आधारित सेक्टर्स पर असर पड़ सकता है. वहीं ऑटो, ऑयल एंड गैस और मिडकैप शेयरों में खरीदारी का ट्रेंड जारी रह सकता है.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि शेयर बाजार में गुरुवार को कई बड़े स्टॉक्स निवेशकों के रडार पर रहने वाले हैं. तिमाही नतीजों, नए ऑर्डर्स, डिविडेंड घोषणाओं और कारोबारी अपडेट्स के चलते Vodafone Idea, RVNL, Whirlpool, Glenmark Pharma, Bosch India और Apollo Hospitals समेत 18 कंपनियों के शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है. Vodafone Idea ने हरित ऊर्जा क्षेत्र में निवेश का ऐलान किया है, जबकि RVNL को रेलवे प्रोजेक्ट में बड़ा ऑर्डर मिला है. वहीं BSNL से 264 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिलने के बाद Pace Digitek भी फोकस में रहेगा. दूसरी ओर Whirlpool, JK Lakshmi Cement और Garware Technical Fibres जैसी कंपनियों के नतीजों में दबाव देखने को मिला, जबकि GPT Infraprojects, Metro Brands, Bosch India, TeamLease Services और Apollo Hospitals ने मजबूत तिमाही प्रदर्शन दर्ज किया है. इसके अलावा Sammaan Capital के भारी घाटे, Glenmark Pharma के कैंसर रिसर्च प्रोग्राम और JK Cement को मिले बड़े माइनिंग प्रोजेक्ट पर भी बाजार की नजर रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
इस डील को बंगाल प्रो टी20 लीग के बढ़ते व्यावसायिक महत्व के रूप में भी देखा जा रहा है. हाल के वर्षों में क्षेत्रीय टी20 लीगों में कॉरपोरेट निवेश तेजी से बढ़ा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मार्केटिंग और कम्युनिकेशन कंपनी ट्राइब्स ने स्पोर्ट्स सेक्टर में बड़ा कदम उठाते हुए श्राची स्पोर्ट्स की क्रिकेट फ्रेंचाइजी ‘रार्ह टाइगर्स’ में हिस्सेदारी खरीद ली है. यह ट्राइब्स का किसी स्पोर्ट्स फ्रेंचाइजी में पहला निवेश है. इस डील के बाद टीम अब ‘श्राची ट्राइब्स रार्ह टाइगर्स’ के नाम से बंगाल प्रो टी20 लीग के तीसरे सीजन में खेलेगी.
ट्राइब्स का स्पोर्ट्स बिजनेस में पहला बड़ा निवेश
कंपनी ने कहा कि यह अधिग्रहण केवल निवेश नहीं बल्कि खेल और समुदाय को जोड़ने की लंबी रणनीति का हिस्सा है. ट्राइब्स के चेयरमैन गौर गुप्ता ने कहा कि खेल सिर्फ जीतने का माध्यम नहीं बल्कि लोगों को जोड़ने और मजबूत समुदाय बनाने का जरिया भी है. उन्होंने कहा कि कंपनी ऐसी टीम तैयार करना चाहती है जो फैंस के साथ गहरा जुड़ाव बनाए और बंगाल में क्रिकेट के विकास में योगदान दे.
“क्रिकेट के जरिए सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश”
गौर गुप्ता के मुताबिक ट्राइब्स का लक्ष्य सिर्फ मजबूत टीम बनाना नहीं बल्कि खेल के जरिए समाज में सकारात्मक बदलाव लाना भी है. उन्होंने कहा कि कंपनी चाहती है कि टीम स्थानीय समुदाय का अहम हिस्सा बने और लोगों को साथ लाने का माध्यम तैयार करे.
बंगाल क्रिकेट में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
श्राची ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल तोड़ी ने कहा कि बंगाल में क्रिकेट जुनून और स्थानीय गर्व से जुड़ा हुआ है. उनके मुताबिक रार्ह टाइगर्स की शुरुआत से ही कोशिश रही है कि टीम इसी भावना को आगे बढ़ाए और भविष्य के क्रिकेट को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़े. उन्होंने कहा कि ट्राइब्स के जुड़ने से फ्रेंचाइजी को और मजबूत बनाने, बेहतर टीम तैयार करने और खिलाड़ियों व फैंस के अनुभव को बेहतर करने में मदद मिलेगी.
बंगाल प्रो टी20 लीग पर बढ़ रहा कॉरपोरेट फोकस
इस डील को बंगाल प्रो टी20 लीग के बढ़ते व्यावसायिक महत्व के रूप में भी देखा जा रहा है. हाल के वर्षों में क्षेत्रीय टी20 लीगों में कॉरपोरेट निवेश तेजी से बढ़ा है और कंपनियां इन्हें ब्रांड बिल्डिंग व फैन एंगेजमेंट के बड़े प्लेटफॉर्म के तौर पर देख रही हैं.
उद्योग की चिंताओं के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कुछ नियमों में ढील दी है. मंत्रालय ने रेटिंग्स एजेंसियों के बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की अनिवार्य हिस्सेदारी 50% से घटाकर 33% कर दी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की टीवी रेटिंग एजेंसी ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) ने अपने टेलीविजन रेटिंग लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) में औपचारिक आवेदन दाखिल कर दिया है. यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब केंद्र सरकार नई टीआरपी पॉलिसी 2026 की व्यापक समीक्षा कर रही है. उद्योग सूत्रों के मुताबिक मंत्रालय ने हाल ही में मौजूदा टीवी ऑडियंस मेजरमेंट एजेंसियों के लिए अनुपालन अवधि बढ़ाई थी, जिसके बाद BARC ने यह आवेदन जमा किया.
टीआरपी पॉलिसी 2026 पर बढ़ी उद्योग की चिंता
सूत्रों के अनुसार, इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (Indian Broadcasting and Digital Foundation) और BARC के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात की थी. इस बैठक में नई TRP व्यवस्था के लागू होने की समयसीमा और परिचालन संबंधी चुनौतियों पर चिंता जताई गई. नई टीआरपी पॉलिसी 27 मार्च 2026 को अधिसूचित की गई थी. शुरुआत में इसे 30 दिनों के भीतर लागू करने का प्रावधान रखा गया था, लेकिन ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और ऑडियंस मेजरमेंट कंपनियों ने इसे व्यवहारिक रूप से मुश्किल बताया.
किन मुद्दों पर उठे सवाल
उद्योग से जुड़े पक्षों ने कई अहम मुद्दों पर आपत्ति जताई थी. इनमें तेजी से पीपल मीटर्स बढ़ाने का लक्ष्य, बोर्ड संरचना में अनिवार्य बदलाव और रेटिंग्स कैलकुलेशन से लैंडिंग-पेज इम्प्रेशंस को बाहर रखना शामिल था. ब्रॉडकास्टर्स का कहना था कि इतनी तेज़ी से सिस्टम लागू करने से परिचालन लागत में भारी बढ़ोतरी होगी, जबकि मेजरमेंट एक्युरेसी में उतना बड़ा फायदा नहीं मिलेगा.
सरकार ने कई नियमों में दी राहत
उद्योग की चिंताओं के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कुछ नियमों में ढील दी है. मंत्रालय ने रेटिंग्स एजेंसियों के बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की अनिवार्य हिस्सेदारी 50% से घटाकर 33% कर दी है. इसके अलावा 80,000 मीटर्ड होम्स के लक्ष्य को हासिल करने की समयसीमा बढ़ा दी गई है. वहीं एस्टैब्लिशमेंट सर्वे साइकिल को हर साल के बजाय तीन साल में एक बार करने का फैसला लिया गया है.
आगे और बदलाव संभव
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि सरकार का नया रुख यह संकेत देता है कि मंत्रालय सुधारों और व्यावहारिक चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. सूत्रों के मुताबिक मंत्रालय अभी भी विभिन्न स्टेकहोल्डर्स से मिले सुझावों की समीक्षा कर रहा है और इसके बाद ही ऑडियंस मेजरमेंट इकोसिस्टम की दीर्घकालिक रूपरेखा तय की जाएगी.
फिलहाल BARC भारत की एकमात्र टीवी ऑडियंस मेजरमेंट संस्था बनी हुई है और देश के टेलीविजन उद्योग में विज्ञापन दरों तथा चैनलों का प्रदर्शन तय करने में इसकी केंद्रीय भूमिका है.