मई में मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 54.3 पर आ गया, जो अप्रैल में 54.7 था. इसका मतलब है कि फैक्टरी गतिविधियां बढ़ रही हैं, लेकिन उनकी रफ्तार पहले के मुकाबले कमजोर हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत की आर्थिक गतिविधियों में मई के दौरान मजबूती बरकरार रही, हालांकि कंपोजिट PMI में हल्की गिरावट दर्ज की गई. सेवा क्षेत्र की मजबूत ग्रोथ ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आई सुस्ती की भरपाई कर दी. वहीं बढ़ती इनपुट लागत और कमजोर निर्यात मांग ने कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है.
मई में 58.1 पर आया कंपोजिट PMI
HSBC फ्लैश इंडिया कंपोजिट PMI मई में 58.1 पर रहा, जो अप्रैल में 58.2 था. हालांकि इसमें मामूली गिरावट आई है, लेकिन 50 से ऊपर का स्तर आर्थिक गतिविधियों में विस्तार का संकेत देता है. S&P Global के आंकड़ों के मुताबिक भारत के निजी क्षेत्र में कारोबार की स्थिति अब भी मजबूत बनी हुई है.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार पड़ी धीमी
मई में मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 54.3 पर आ गया, जो अप्रैल में 54.7 था. इसका मतलब है कि फैक्टरी गतिविधियां बढ़ रही हैं, लेकिन उनकी रफ्तार पहले के मुकाबले कमजोर हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक नए निर्यात ऑर्डर की ग्रोथ पिछले 19 महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कमजोर मांग का असर भारतीय कंपनियों पर साफ दिखाई दिया.
सेवा क्षेत्र ने संभाला मोर्चा
मैन्युफैक्चरिंग में सुस्ती के बावजूद सेवा क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को मजबूती दी. घरेलू मांग और सर्विस गतिविधियों में तेजी की वजह से कंपोजिट PMI मजबूत बना रहा. हालांकि कंपनियों ने माना कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा, यात्रा में रुकावटें और पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर कारोबार पर पड़ा है.
बढ़ती लागत से कंपनियों पर दबाव
मई के दौरान कंपनियों की लागत में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई. ऊर्जा, ईंधन, गैस, धातु, प्लास्टिक, रबर और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी लागत बढ़ने से मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर दबाव बढ़ा. इनपुट कीमतों में जुलाई 2022 के बाद सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि कंपनियों ने ग्राहकों पर पूरा बोझ डालने से परहेज किया और बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी सीमित रखी.
स्टॉक बढ़ाने में जुटीं कंपनियां
रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियों ने तैयार माल और कच्चे माल का स्टॉक लगातार बढ़ाया है. कच्चे माल की खरीद पिछले तीन महीनों की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ी. विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां भविष्य की मांग को देखते हुए पहले से तैयारी कर रही हैं.
रोजगार और कारोबारी भरोसा मजबूत
निजी क्षेत्र में भर्ती का माहौल सकारात्मक बना हुआ है. सेवा क्षेत्र में रोजगार लगभग एक साल की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ा, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी नौकरियों में इजाफा हुआ.
हालांकि कारोबारी भरोसे में हल्की नरमी आई है, लेकिन कंपनियां भविष्य को लेकर अब भी आशावादी नजर आ रही हैं. उन्हें उम्मीद है कि आने वाले महीनों में बाजार की स्थिति और बेहतर हो सकती है.
बिजली की बढ़ती मांग और परिवहन संबंधी दिक्कतों के चलते थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले का दबाव बढ़ा, 190 में से 51 प्लांट्स में स्टॉक गंभीर स्तर पर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले के भंडार पर दबाव बढ़ गया है. अगस्त 2026 में पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक सालाना आधार पर करीब 42 फीसदी घटकर 29 मिलियन टन (MT) रह गया, जो एक साल पहले 50 MT था. क्रिसिल इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक, बिजली की बढ़ती मांग के बीच कोयला आधारित बिजली उत्पादन और खपत बढ़ने तथा कोयले की आपूर्ति में परिवहन संबंधी बाधाओं के कारण प्लांट स्तर पर स्टॉक में कमी आई है.
पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक कवर भी एक साल पहले के 17 दिनों से घटकर अगस्त में करीब 9 दिन रह गया. यह नवंबर 2023 के बाद सबसे निचला स्तर है. स्टॉक में गिरावट मुख्य रूप से घरेलू कोयले पर निर्भर पावर प्लांट्स में देखने को मिली है.
5 महीनों में कोयले की खपत 8% बढ़ी
अप्रैल से अगस्त के बीच थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले की खपत सालाना आधार पर करीब 8 फीसदी बढ़कर 395 MT हो गई. इसी अवधि में बिजली की मांग 9.5 फीसदी बढ़ी. रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान असामान्य रूप से गर्म गर्मी और सामान्य से कम दक्षिण-पश्चिम मानसून ने बिजली की मांग को बढ़ाया. जून से अगस्त के बीच संचयी बारिश दीर्घकालिक औसत से 13 फीसदी कम रही.
अप्रैल-अगस्त के दौरान कुल बिजली उत्पादन भी सालाना आधार पर करीब 10.5 फीसदी बढ़ा, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में 20.7 फीसदी की वृद्धि हुई. हालांकि रिन्यूएबल एनर्जी का उत्पादन तेजी से बढ़ा, लेकिन चौबीसों घंटे बिजली की मांग को पूरा करने में कोयला आधारित बिजली की महत्वपूर्ण भूमिका बनी रही. इससे थर्मल प्लांट्स के कोयला भंडार पर दबाव बढ़ा.
51 पावर प्लांट्स में स्टॉक गंभीर स्तर पर
अगस्त में देश के 190 थर्मल पावर प्लांट्स में से 51 में कोयले का स्टॉक गंभीर रूप से कम था. एक साल पहले ऐसे प्लांट्स की संख्या 20 थी. इनमें से ज्यादातर प्लांट घरेलू कोयले पर निर्भर हैं, इसलिए समय पर कोयले की ढुलाई और आपूर्ति इनकी स्थिति के लिए महत्वपूर्ण है.
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के मानदंड के अनुसार, जब किसी पावर प्लांट में कोयले का स्टॉक निर्धारित मानक स्तर से 25 फीसदी नीचे चला जाता है, तो उसे गंभीर श्रेणी में माना जाता है.
राजस्थान में स्थिति सबसे अधिक दबाव वाली रही, जहां करीब 72 फीसदी कोयला आधारित बिजली उत्पादन क्षमता वाले प्लांट्स में स्टॉक गंभीर स्तर पर था. इसके बाद मध्य प्रदेश में 69 फीसदी और आंध्र प्रदेश में 60 फीसदी क्षमता ऐसी स्थिति में थी.
बिहार में करीब 45 फीसदी और झारखंड में 48 फीसदी कोयला आधारित क्षमता वाले प्लांट्स में स्टॉक गंभीर स्तर पर था. वहीं ओडिशा में यह अनुपात 10 फीसदी और पश्चिम बंगाल में सिर्फ 6 फीसदी रहा.
खदानों पर स्टॉक पर्याप्त, लेकिन परिवहन बना चुनौती
क्रिसिल इंटेलिजेंस के निदेशक सेहुल भट्ट के अनुसार, मार्च 2026 की शुरुआत में 157 MT के उच्च स्तर पर पहुंचा खदानों के मुहाने यानी पिटहेड पर कोयले का स्टॉक अगस्त में घटकर करीब 76 MT रह गया.
रिपोर्ट के मुताबिक, यह गिरावट साल की शुरुआत में जमा हुए अतिरिक्त स्टॉक के सामान्य स्तर पर लौटने को दर्शाती है, न कि कोयले की उपलब्धता में व्यापक कमी को. भट्ट ने कहा कि मौजूदा पिटहेड स्टॉक अगस्त 2024 और 2025 के दौरान दर्ज 76.1 MT के औसत के आसपास है. इससे संकेत मिलता है कि स्टॉक में गिरावट के बावजूद कोयले की उपलब्धता पर्याप्त बनी हुई है और आपूर्ति पक्ष पर कोई बड़ा दबाव नहीं है. हालांकि, पावर प्लांट्स तक कोयला पहुंचाने में परिवहन क्षमता और बढ़ती मांग के बीच अंतर चुनौती बना हुआ है. पूर्वी कोयला क्षेत्र में लंबे समय तक हुई बारिश से खनन गतिविधियां और कोयले की ढुलाई प्रभावित हुई, जिससे पावर प्लांट्स तक आपूर्ति की गति धीमी हुई.
रेक लोडिंग बढ़ी, लेकिन पावर प्लांट्स तक पहुंच कम रही
अप्रैल से अगस्त के बीच कोयले की रेक लोडिंग करीब 5 फीसदी बढ़ी, जबकि पावर प्लांट्स तक कोयले की प्राप्ति सिर्फ 3 फीसदी बढ़ी. इसके मुकाबले कोयले की खपत 8 फीसदी बढ़ी. इसका मतलब है कि अतिरिक्त कोयला ढुलाई पावर प्लांट्स की बढ़ी हुई खपत के अनुरूप स्टॉक को फिर से भरने के लिए पर्याप्त नहीं रही.
स्थिति को सुधारने के लिए Coal India ने 7 सितंबर 2026 से फ्यूल सप्लाई एग्रीमेंट वाले पावर प्लांट्स को रेल परिवहन के साथ सड़क मार्ग से भी अतिरिक्त कोयला उठाने की अनुमति दी है. उम्मीद है कि सड़क के जरिए अतिरिक्त ढुलाई से रेल आधारित परिवहन को सपोर्ट मिलेगा और कम स्टॉक वाले प्लांट्स तक कोयले की आपूर्ति बढ़ाई जा सकेगी.
दूसरी छमाही में बिजली मांग 6-7% बढ़ने का अनुमान
क्रिसिल इंटेलिजेंस की एसोसिएट डायरेक्टर सुरभि कौशल के मुताबिक, वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में बिजली की मांग, कोयला आधारित बिजली उत्पादन, कोयले की खपत और पावर प्लांट्स को कोयले की आपूर्ति में सालाना आधार पर 6-7 फीसदी की वृद्धि हो सकती है.
इस अवधि में बिजली की मांग 860-870 अरब यूनिट रहने का अनुमान है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत के बिजली मिश्रण में कोयला आधारित उत्पादन की हिस्सेदारी 65-70 फीसदी के आसपास बनी रह सकती है. कौशल के अनुसार, खदानों पर पर्याप्त स्टॉक और कोयले की ढुलाई व्यवस्था में सुधार से बढ़ी हुई आपूर्ति जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है.
मौसम और रेल ढुलाई पर रहेगी नजर
क्रिसिल इंटेलिजेंस ने पावर प्लांट्स में स्टॉक की हालिया गिरावट को संरचनात्मक आपूर्ति संकट के बजाय मुख्य रूप से लॉजिस्टिक्स से जुड़ी अस्थायी समस्या माना है. हालांकि, खराब मौसम से खनन और कोयले की ढुलाई प्रभावित होने का जोखिम बना हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, रेल उपलब्धता और रेक लोडिंग क्षमता में सुधार में देरी होने पर पावर प्लांट स्तर पर स्टॉक का दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है.
क्रिसिल इंटेलिजेंस का कहना है कि पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक ऐतिहासिक औसत 16-18 दिनों के स्तर तक वापस लाने के लिए लगातार अधिक कोयला आपूर्ति जरूरी होगी. आने वाले महीनों में कोयले की ढुलाई और पावर प्लांट्स तक समय पर आपूर्ति बिजली क्षेत्र के लिए अहम बनी रहेगी
अगर मुझे कभी भारत के सबसे बड़े कमोडिटी एक्सचेंज के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर करनी पड़े, तो वह कुछ ऐसी होगी. लापता बैरल्स का मामला.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
20.9 लाख भारतीयों को ऐसे तेल की कीमत पर ट्रेड करने के लिए आमंत्रित करने की विचित्र प्रथा, जिसे भारत खरीदता नहीं है और देश में कोई भी हेजिंग के लिए इस्तेमाल नहीं करता. भारत ने क्रिकेट टीमों पर सट्टेबाजी को गैरकानूनी कर दिया. उसने एक अमेरिकी स्टोरेज टैंक में पानी के स्तर पर सट्टेबाजी को लाइसेंस दिया है.
त्यंत सम्मानपूर्वक प्रस्तुत है:
1. याचिकाकर्ता एक अप्रत्याशित जगह से शुरुआत करता है. फैंटेसी क्रिकेट से.
2. अगस्त 2025 में संसद ने ऑनलाइन गेमिंग के प्रचार और विनियमन संबंधी कानून पारित किया और ऑनलाइन मनी गेम्स पर प्रतिबंध लगा दिया. इसमें चुनी गई परिभाषा महत्वपूर्ण हिस्सा है. ऑनलाइन मनी गेम वह है जिसे शुल्क देने या धन या अन्य दांव जीतने की उम्मीद में खेला जाता है, "भले ही वह कौशल, संयोग या दोनों पर आधारित हो."
3. कौशल की परवाह किए बिना. एक दशक तक फैंटेसी प्लेटफॉर्म यह तर्क देते रहे और अदालतों ने बड़े पैमाने पर इसे स्वीकार भी किया, कि क्रिकेट की एकादश चुनना भाग्य के बजाय निर्णय का मामला है. संसद ने एक ही प्रावधान में इस तर्क को बंद कर दिया. जहां भारतीय बड़े पैमाने पर किसी अनिश्चित परिणाम पर पैसा लगा रहे थे और परिवारों को नुकसान हो रहा था, वहां राज्य ने कहा कि वह अब कौशल की दलील स्वीकार नहीं करेगा. बताए गए आधार थे लत, परिवारों को वित्तीय नुकसान और सबसे गंभीर मामलों में आत्महत्याएं.
4. याचिकाकर्ता स्वीकार करता है कि संसद को ऐसा दृष्टिकोण अपनाने का अधिकार था और सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करता है कि उसका ऐसा करना सही था.
5. इसलिए याचिकाकर्ता इस माननीय न्यायालय से एक अलग स्क्रीन पर नजर डालने का अनुरोध करता है, जिस पर एक अलग भारतीय एक अलग अनिश्चित परिणाम पर, कहीं अधिक मात्रा में पैसा लगाता है और जिसके बारे में राज्य ने बिल्कुल कुछ नहीं कहा है.
6. याचिकाकर्ता का एक सरल सवाल है.
तेल कहां है?
रूपक के तौर पर नहीं. सचमुच. हर कारोबारी दिन, भारत के सबसे बड़े कमोडिटी एक्सचेंज पर 'क्रूड ऑयल' नामक एक कॉन्ट्रैक्ट में 2.2 लाख करोड़ रुपये का लेनदेन होता है. राजकोट का एक व्यक्ति इसे खरीदता है. सूरत का एक व्यक्ति इसे बेचता है. मुंबई की एक मशीन इसे वापस खरीद लेती है, इससे पहले कि दोनों में से कोई पलक भी झपका पाए.
इसमें शामिल हर व्यक्ति इसे ऑयल कहता है.
याचिकाकर्ता तेल की तलाश में निकला है.
बैरल
7. तेल कुशिंग, ओक्लाहोमा में है.
8. कुशिंग आठ हजार से कम आबादी वाला एक अमेरिकी भू-आबद्ध शहर है, जो निकटतम समुद्र से कई राज्यों की दूरी पर है और स्टोरेज टैंकों से घिरा हुआ है, जिनमें वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) नामक ग्रेड रखा जाता है.
9. याचिकाकर्ता की जानकारी के अनुसार कुशिंग गुजरात का कोई बंदरगाह नहीं है. यह जामनगर की कोई रिफाइनरी नहीं है. यह पादुर, मंगलुरु या विशाखापत्तनम में कोई रणनीतिक रिजर्व नहीं है. कुशिंग से कोई बैरल कभी किसी भारतीय टर्मिनल पर उतारा नहीं गया है, और इसका उत्कृष्ट कारण यह है कि कुशिंग के पास समुद्र नहीं है.
10. याचिकाकर्ता ने जांच की है. भारत ने ओक्लाहोमा पर कब्जा नहीं किया है.
11. भारत वास्तव में रूसी क्रूड खरीदता है, जुलाई में आयात का 55 प्रतिशत और खाड़ी के ग्रेड, ओमान और दुबई, जबकि अधिक मीठे बैरल के लिए ब्रेंट का इस्तेमाल होता है. अगस्त में किसी भी प्रकार का अमेरिकी क्रूड लगभग 75,000 बैरल प्रतिदिन था, करीब 5 मिलियन में से. डेढ़ प्रतिशत, और घटता हुआ. साथ ही, जो अमेरिकी बैरल आते हैं वे WTI मिडलैंड हैं और MCX की कीमत से मेल नहीं खाते. इन्हें गल्फ कोस्ट से उठाया जाता है और 2023 से ब्रेंट कॉम्प्लेक्स में कीमत तय की जाती है.
12. इसलिए याचिकाकर्ता प्रस्तुत करता है कि जिस बेंचमार्क पर भारत का पूरा सूचीबद्ध क्रूड बाजार सेटल होता है, वह भारत द्वारा खरीदी जाने वाली लगभग किसी भी चीज को नियंत्रित नहीं करता. वास्तव में, इसका भारत से कोई लेना-देना ही नहीं है.
दांव
13. इससे किसी को कोई हतोत्साहन नहीं हुआ है.
14. पिछले वित्त वर्ष में MCX ने 65,617 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल के बराबर कारोबार किया. भारत की कुल वार्षिक आपूर्ति, उत्पादन और आयात को मिलाकर, लगभग 1,986 मिलियन बैरल थी. देश की पूरी तेल आपूर्ति से 15 गुना अधिक. प्राकृतिक गैस में 172 (एक सौ बहत्तर गुना).
16. याचिकाकर्ता जवाब की उम्मीद करता है. टर्नओवर हमेशा आपूर्ति से अधिक होता है. वही कॉन्ट्रैक्ट कई बार हाथ बदलता है. फ्यूचर्स बाजार कोई गोदाम नहीं है. याचिकाकर्ता यह सब स्वीकार करता है और न्यायालय का ध्यान दिन के अंत में बची हुई चीज पर आकर्षित करता है.
17. पूरे वर्ष MCX क्रूड में औसत ओपन इंटरेस्ट: 17 मिलियन बैरल. इसलिए वही बैरल किसी के पास रह जाने से पहले करीब 4000 (चार हजार) बार हाथ बदल चुका था.
18. यह ऊर्जा बाजार नहीं है. यह टर्नओवर है. भारत ने 65.6 अरब बैरल तेल हासिल नहीं किया. कॉन्ट्रैक्ट बार-बार हाथ बदलते रहे.
A. याचिकाकर्ता से समय-समय पर पूछा जाता है कि इतने सारे भारतीय इस बाजार में क्यों आ गए हैं. जवाब रहस्यमय नहीं है. यह SEBI के नियम बनाने और टैक्स कोड में मौजूद था.
B. इक्विटी डेरिवेटिव्स पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स अक्टूबर 2024 में और फिर अप्रैल 2026 में बढ़ाया गया, फ्यूचर्स के लिए 0.05 प्रतिशत, ऑप्शंस के लिए 0.15 प्रतिशत — घोषित उद्देश्य अल्पकालिक सट्टा कारोबार को हतोत्साहित करना था. लॉट साइज बढ़ाए गए. एक्सपायरी घटाई गई.
C. कमोडिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स 2013 से नहीं बदला है. फ्यूचर्स 0.01 प्रतिशत. ऑप्शंस प्रीमियम का 0.05 प्रतिशत. तेरह साल, बिना बदलाव, दो दौर की टैक्स नीति के बावजूद, जो स्पष्ट रूप से भारतीयों को डेरिवेटिव्स पर जुआ खेलने से रोकने के लिए लिखी गई थी.
D. निफ्टी पर सट्टेबाजी में अब गोल्ड पर सट्टेबाजी की तुलना में टैक्स तीन गुना अधिक लगता है. स्टॉक फ्यूचर्स की लागत क्रूड कॉन्ट्रैक्ट से पांच गुना अधिक है.
E. इक्विटी डेरिवेटिव ट्रेडर्स की संख्या लगभग 20 प्रतिशत घट गई. MCX के क्लाइंट्स की संख्या 13 लाख से बढ़कर 20.9 लाख हो गई. याचिकाकर्ता प्रस्तुत करता है कि आंकड़े एक स्पष्ट सवाल खड़ा करते हैं: क्या नीति ने एक कमरे को महंगा कर दिया, जबकि दूसरे कमरे का दरवाजा पूरी तरह खुला छोड़ दिया?
F. याचिकाकर्ता प्रस्तुत करता है कि टैक्स केवल शुरुआत थी.
G. इक्विटी में नियामक ने अपने पास मौजूद हर लीवर को इस्तेमाल किया. छोटे ट्रेडर को बाजार से बाहर करने के लिए लॉट साइज बढ़ाए गए. कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू बढ़ाई गई. साप्ताहिक एक्सपायरी को सप्ताह में एक तक सीमित कर दिया गया, इस स्पष्ट तर्क के साथ कि हर दिन नई एक्सपायरी निवेशकों के बजाय जुआरियों का निर्माण कर रही थी. चेयरमैन ने सार्वजनिक रूप से ऐसा कहा. सर्कुलर में इसे लिखित रूप में कहा गया. हर मामले में घोषित उद्देश्य तेजी से बढ़ रहे सट्टे को रोकना था.
H. कमोडिटीज में इनमें से एक भी लीवर नहीं छुआ गया है.
I. लॉट साइज अभी भी इतना छोटा है कि 5,000 रुपये वाला व्यक्ति ब्रेंट पर पोजीशन ले सकता है. कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू इक्विटी के समकक्ष का एक अंश बनी हुई है. एक्सपायरी अभी भी लगातार होती हैं. हर एक रुपये के ट्रेड में ऑप्शंस 87 पैसे के बने हुए हैं. और जहां इक्विटी को 18 महीनों में दो टैक्स बढ़ोतरी मिलीं, वहीं कमोडिटी टैक्स 2013 से नहीं बदला है.
J. याचिकाकर्ता प्रस्तुत करता है कि एक ऐसा नियामक जो खतरे की पहचान करता है, उसका नाम लेता है और एक बाजार में उसके खिलाफ कानून बनाता है, जबकि बगल के बाजार में वही सभी स्थितियां बरकरार रखता है, वह असावधान नहीं रहा है. उसने एक विकल्प चुना है.
K. यह विकल्प ऐसे कारणों से लिया गया था जिन्हें सार्वजनिक रूप से बताया जा सकता है या नहीं, यह ऐसा मामला है जिसमें याचिकाकर्ता की तुलना में प्रतिवादी इस माननीय न्यायालय की बेहतर सहायता कर सकते हैं.
कीमत
19. इनमें से कुछ भी दुर्घटना नहीं थी और याचिकाकर्ता को न्यायालय को यह बताने का खेद है कि यह सब लिखित रूप में है.
20. अक्टूबर 2005 में NYMEX और MCX ने एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत भारतीय एक्सचेंज को अमेरिकी सेटलमेंट कीमतों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई. 6 जून 2006 को यह एक लाइसेंस बन गया क्रूड, गैस, हीटिंग ऑयल, गैसोलीन भारत में रुपये वाले कॉन्ट्रैक्ट, जिनमें से प्रत्येक का आकार अमेरिकी मूल कॉन्ट्रैक्ट का ठीक दसवां हिस्सा था.
21. NYMEX के अध्यक्ष ने कहा कि यह व्यवस्था भारतीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए जोखिम प्रबंधन हेतु एक बेंचमार्क मूल्य संदर्भ उपलब्ध कराएगी, जो उस तरह का वाक्य है जो 27 वर्षों तक इसलिए जीवित रहता है क्योंकि कोई उसे दो बार नहीं पढ़ता.
22. MCX बनाने वाले जिग्नेश शाह कम संकोची थे. उन्होंने जिस चीज की शुरुआत की थी, उसे "मिनी-NYMEX एनर्जी कॉन्ट्रैक्ट्स" बताया.
भारतीय हेज नहीं. अमेरिकी हेज की एक छोटी प्रति. उन्होंने इसे एक प्रेस रिलीज में कहा था. वह सच बता रहे थे.
23. जुलाई 2015 में NYMEX को खरीद चुके CME Group ने लाइसेंस का नवीनीकरण किया. इसके चेयरमैन ने बिना किसी स्पष्ट असहजता के भारत की भूमिका समझाई: "भारत हमारी एशिया ग्रोथ रणनीति के लिए महत्वपूर्ण है."
23. CME की वेबसाइट अभी भी MCX को एक "रणनीतिक साझेदार" के रूप में सूचीबद्ध करती है और बताती है कि यह सौदा MCX को अपने रुपये वाले तेल और गैस कॉन्ट्रैक्ट्स का सेटलमेंट CME Group की कीमतों पर करने में सक्षम बनाता है. यह पूरे समय साफ अंग्रेजी में वहीं मौजूद रहा है.
24. याचिकाकर्ता प्रस्तुत करता है कि इस व्यवस्था को संक्षेप में कहा जा सकता है. भारत ट्रेडर्स, रुपये, एक्सचेंज, ब्रोकर, क्लियरिंग कॉरपोरेशन, नियामक का समय और निश्चित रूप से नुकसान उपलब्ध कराता है.
अमेरिका नंबर उपलब्ध कराता है.
हेज
25. न्यायालय स्पष्ट सवाल पूछेगा: क्या यह हेजिंग बाजार नहीं है?
यह मुंबई में अपने घर का फायर इंश्योरेंस खरीदने जैसा है, जो तभी भुगतान करता है जब कैलिफोर्निया में कोई घर जल जाए. वर्षों तक कुछ नहीं होता. प्रीमियम जाते रहते हैं. पॉलिसी एक दराज में पड़ी रहती है और आश्वस्त करती हुई दिखती है.
26. फिर एक रात आपके अपने घर में आग लग जाती है और आपको पता चलता है कि पॉलिसी किसी और के घर के लिए थी.
27. खाड़ी में युद्ध पर विचार कीजिए, वह परिदृश्य जिससे हर भारतीय ऊर्जा योजनाकार की नींद उड़ती है. मध्य पूर्व से आपूर्ति बाधित होती है. भारत वास्तव में जो क्रूड खरीदता है, उसकी कीमत आसमान छूने लगती है. और उन भू-आबद्ध ओक्लाहोमा टैंकों में मौजूद तेल, जिसका उस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है, उसका अनुसरण नहीं करता. वह गिर भी सकता है.
28. रिफाइनर की लागत बढ़ जाती है. उसका हेज पैसा खो देता है. उसी सुबह.
29. याचिकाकर्ता यह समझने में असमर्थ है कि किसी भारतीय रिफाइनरी से ओक्लाहोमा के एक स्टोरेज हब के इन्वेंट्री स्तर पर पोजीशन लेकर गल्फ कार्गो की सुरक्षा करने की अपेक्षा कैसे की जाती है. जब तक कि, निश्चित रूप से, रिफाइनरी चुपचाप ओक्लाहोमा स्थानांतरित न हो गई हो?
30. बाजार के पास इसके लिए एक नाम है. बेसिस रिस्क. किसी ऐसे देश में काम करने वाले अग्निशामक यंत्र के लिए एक सूखा-सा शब्द, जहां आग लगी ही नहीं है.
31. न्यायालय को याचिकाकर्ता की बात मानने की जरूरत नहीं है.
20 अप्रैल 2020 को कुशिंग के टैंक पूरी क्षमता तक भर गए, WTI गिरकर माइनस 37 डॉलर प्रति बैरल हो गया और MCX ने अपने भारतीय कॉन्ट्रैक्ट का सेटलमेंट माइनस 2,884 रुपये पर किया. इसके बाद भारतीय ब्रोकर और उनके ग्राहक इसी न्यायालय के सामने यह बहस करने आए कि आठ हजार लोगों के शहर में पैदा हुए स्टोरेज संकट का भुगतान कौन करे. तेल ओक्लाहोमा में ही रहा. नुकसान मुंबई आया. इस न्यायालय को इसके परिणामों की सुनवाई का दुर्भाग्य पहले ही हो चुका है.
पैसा
32. पिछले साल 17,52,200 से अधिक (सत्रह लाख बावन हजार दो सौ से अधिक) भारतीयों ने MCX क्रूड में कारोबार किया. 13 लाख से अधिक (तेरह लाख) ने गैस में कारोबार किया इनमें से कई वही लोग थे, जो दोनों में कारोबार कर रहे थे. क्रूड ट्रेडिंग का 60 प्रतिशत कारोबार लोगों ने नहीं, बल्कि एल्गोरिदम ने किया. बाकी बहुमत भोले-भाले रिटेल ट्रेडर्स हैं.
33. SEBI ने खुद जनवरी 2019 में एक्सचेंजों को निर्देश दिया था कि वे यह प्रकाशित करें कि कितने आयातक, प्रोसेसर, स्टॉकिस्ट और फिजिकल ट्रेडर्स भाग ले रहे हैं, ताकि जनता यह तय कर सके कि इस बाजार का वास्तविक हेजर्स से कोई संबंध है या नहीं. ये खुलासे 2020 से प्रकाशित किए जा रहे हैं. क्रूड और गैस में फिजिकल प्रतिभागी नगण्य हैं.
34. बाकी ट्रेडिंग का एक बहुत बड़ा हिस्सा उस श्रेणी में आता है जिसे एक्सचेंज "अन्य" कहता है, ऐसे क्लाइंट्स जिनकी वह पहचान नहीं कर सकता, क्योंकि उसने कभी यह जानकारी एकत्र ही नहीं की. याचिकाकर्ता प्रस्तुत करता है कि एक ऐसा एक्सचेंज जो यह नहीं जानता कि उस पर कौन ट्रेड कर रहा है, उसके पास निगरानी की असामान्य परिभाषा है.
35. एक आंकड़ा पूरी बात को एक पंक्ति में तय कर देगा: MCX के क्रूड ओपन इंटरेस्ट में से कितना हिस्सा वास्तव में भारतीय तेल की हेजिंग करने वाले किसी व्यक्ति के पास है?
इसे कभी प्रकाशित नहीं किया गया है. किसी को इसे प्रकाशित करने के लिए कभी बाध्य नहीं किया गया.
कानून
36. भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 30 में प्रावधान है कि सट्टे के माध्यम से किए गए समझौते शून्य हैं और कोई अदालत किसी व्यक्ति को अपनी जीत की राशि वसूलने में सहायता नहीं करेगी. अदालतें यह जांचती हैं कि क्या किसी पक्ष का दांव के अलावा परिणाम में कोई हित है.
37. मुंद्रा की ओर बढ़ रहे कार्गो वाला एक रिफाइनर ऐसा हित रखता है.
38. राजकोट में 5,000 रुपये वाला व्यक्ति ऐसा नहीं करता और कर भी नहीं सकता. पेट्रोलियम अधिनियम, 1934 और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार, भारत में क्रूड ऑयल का संचालन एक लाइसेंस प्राप्त कारोबार है, जिसकी शर्तें कोई व्यक्ति पूरी नहीं कर सकता. इस देश में कोई रिटेल ऑयल वेयरहाउस नहीं है. किसी के फ्लैट तक कोई पाइपलाइन नहीं है.
39. एक्सचेंज, क्लियरिंग हाउस और स्क्रीन को हटा दें और जो बचता है वह एक ऐसा व्यक्ति है जो एक नंबर पर पैसा लगा रहा है, जिसका कीमत तय की जा रही चीज में कोई हित ही नहीं है.
40. कानून इसे एक ही प्रावधान से बचाता है, सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट की धारा 18A, जिसे संसद ने 1999 में शामिल किया था, जिसमें कहा गया है कि डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट कानूनी और वैध हैं, यदि वे किसी मान्यता प्राप्त एक्सचेंज पर ट्रेड किए जाएं और उसके क्लियरिंग हाउस के माध्यम से सेटल हों.
41. अंतर केवल स्थान का है.
42. याचिकाकर्ता सम्मानपूर्वक ध्यान दिलाता है कि इस देश ने 30 साल पुलिसकर्मियों को रतन खत्री जैसे लोगों द्वारा चलाए जाने वाले पिछले कमरों में मटका तोड़ने के लिए भेजे — ऐसे लोग जो बिना किसी आधार के नंबरों पर पैसा लेते थे. आज अंतर एक लाइसेंस, एक क्लियरिंग कॉरपोरेशन और कानून की एक धारा है. याचिकाकर्ता इस न्यायालय से यह तय करने के लिए नहीं कहता कि इसे क्या कहा जाए. याचिकाकर्ता केवल यह कहता है कि किसी को इसे समझाने के लिए बाध्य किया जाए.
नियामक
43. SEBI हर साल, एक-एक रुपये तक, यह गिनता है कि साधारण भारतीय शेयर बाजार में जुआ खेलकर कितना पैसा गंवाते हैं. 2022 से 2024 के बीच इक्विटी डेरिवेटिव्स में 93 प्रतिशत व्यक्तिगत ट्रेडर्स को नुकसान हुआ. 1.8 लाख करोड़ रुपये. इन आंकड़ों ने ऊंचे टैक्स, कड़े नियम और छोटे निवेशक की सुरक्षा के बारे में बहुत सारे भाषणों को उचित ठहराया. और SEBI इसमें माहिर है. कार्रवाई को छोड़कर.
44. SEBI 11 वर्षों से कमोडिटी डेरिवेटिव्स को विनियमित कर रहा है.
उसने क्रूड ऑयल के नुकसान के लिए कभी यह आंकड़ा प्रकाशित नहीं किया. या प्राकृतिक गैस के लिए. एक बार भी नहीं. एक भी वर्ष के लिए नहीं.
45. याचिकाकर्ता प्रस्तुत करता है कि यह चूक से अधिक एक प्राथमिकता है.
46. याचिकाकर्ता आगे प्रस्तुत करता है कि इस संदर्भ में नियामक के अपने सर्कुलर असहज करने वाले हैं. सितंबर 2016 में SEBI ने प्रत्येक फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के लिए भारत के वार्षिक उत्पादन, आयात, खपत और घरेलू स्पॉट कीमतों के आधार पर औचित्य की मांग की. जनवरी 2017 में उसने अन्य परीक्षणों के साथ कम बेसिस रिस्क और घरेलू बेंचमार्क बनाने की क्षमता की मांग की. अक्टूबर 2017 में उसने निर्देश दिया कि फिजिकल डिलीवरी हमेशा पहली प्राथमिकता होगी, जबकि कैश सेटलमेंट की अनुमति केवल वहां होगी जहां कोई कमोडिटी अमूर्त हो या उसे स्टोर या परिवहन करना कठिन हो.
47. क्रूड ऑयल अमूर्त नहीं है. भारत इसे भूमिगत गुफाओं में रखता है. यह रोजाना जहाजों के पूरे लदान के रूप में आता है. और क्रूड तथा गैस, जैसा कि होता है, भारतीय एक्सचेंजों पर एकमात्र ऐसे कमोडिटी फ्यूचर्स हैं जिनमें कोई डिलीवरी ही नहीं होती. एक्सपायरी पर गोल्ड, सिल्वर, इलायची की डिलीवरी का विकल्प है.
48. तो दर्ज किया गया तर्क कहां है? कौन-सी फाइल? किसके हस्ताक्षर?
इसे प्रस्तुत नहीं किया गया है और किसी ने इसके लिए पूछा भी नहीं है. और अब सबसे अजीब हिस्सा आता है.
इंजन
49. याचिकाकर्ता अब उस हिस्से पर आता है जो अभी इतिहास नहीं है और जिसे यह न्यायालय अभी भी समय रहते देख सकता है. एक विदेशी बेंचमार्क के इर्द-गिर्द एक विशाल बाजार बनाने के बाद MCX बाजार को और तेज बनाना चाहता है. किसके लिए तेज?
50. भारतीय कमोडिटी डेरिवेटिव्स में को-लोकेशन की अनुमति नहीं है. इसे स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है. 27 सितंबर 2016 के SEBI सर्कुलर, संख्या SEBI/HO/CDMRD/DMP/CIR/P/2016/97 में, क्लॉज 7 में कहा गया है:
"को-लोकेशन, को-होस्टिंग या कोई अन्य सुविधा या व्यवस्था जो कुछ सदस्यों को अन्य सदस्यों की तुलना में नुकसानदेह स्थिति में रखती हो, की अनुमति नहीं दी जाएगी."
51. उस सर्कुलर के जारी होने के तीन सप्ताह बाद, एक SEBI कार्यकारी निदेशक से पूछा गया कि कमोडिटीज में को-लोकेशन कब आ सकता है. उन्होंने जवाब दिया: "हमने कमोडिटीज में को-लोकेशन के बारे में नहीं सोचा है. हमें नहीं लगता कि इसका समय आ गया है."
52. वह अधिकारी संतोष कुमार मोहंती थे. 28 मई 2026 को उन्हें मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज के बोर्ड में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर के रूप में नियुक्त किया गया — वह सीट जो एक्सचेंज की अपनी व्यावसायिक प्रवृत्तियों के सामने जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियमों में मौजूद है और जिसे SEBI की मंजूरी से भरा जाता है.
53. याचिकाकर्ता किसी अनुचित कार्य का आरोप नहीं लगाता और इसकी कोई आवश्यकता भी नहीं है. याचिकाकर्ता केवल यह दर्ज करता है कि जिस व्यक्ति ने कहा था कि समय नहीं आया है, वह अब उस मेज पर बैठा है जहां समय तय किया जा रहा है.
54. 11 मई 2026 को एक एनालिस्ट कॉल में MCX की प्रबंध निदेशक से पूछा गया कि अनुमति मिलने पर को-लोकेशन कितनी जल्दी शुरू किया जा सकता है. उन्होंने जवाब दिया: "हमारे पास अपनी योजनाएं तैयार हैं और हम उन्हें कम समय के नोटिस पर सक्रिय कर पाएंगे."
55. 21 जुलाई 2026 को MCX/TECH/424/2026 सर्कुलर के माध्यम से — विषय पंक्ति थी Planned Migration to a New Data Centre Facility — सदस्यों को बताया गया कि 31 दिसंबर से एक्सचेंज का ऑर्डर मैचिंग इंजन MB3 के अंदर चलेगा, जो चांदिवली, पवई में एक वाणिज्यिक डेटा सेंटर है.
56. MB3 का स्वामित्व और संचालन Equinix India Pvt Ltd के पास है, जो Equinix Pacific LLC की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है और Equinix Inc. का हिस्सा है. इसका अंतिम स्वामित्व काफी हद तक BlackRock, Vanguard और State Street के पास है. यह 8 अप्रैल 2026 को खोला गया, करीब चार एकड़ में पांच मंजिलों वाला है, जिसे 95 मिलियन डॉलर से अधिक की लागत से बनाया गया है, लॉन्च के समय 1,370 कैबिनेट और पूरा होने पर 5,475 कैबिनेट की पेशकश करता है और इसके मालिक द्वारा कम-लेटेंसी कनेक्टिविटी और एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए इसका विपणन किया जाता है.
57. याचिकाकर्ता तारीखों को एक-दूसरे के बगल में रखकर रुकता है. 11 मई को योजनाएं तैयार हैं. 21 जुलाई को गंतव्य तय है. 31 दिसंबर को इंजन पहुंचता है. इस पूरी अवधि में नियामक अभी भी यह तय कर रहा है कि इनमें से कुछ हो भी सकता है या नहीं.
58. याचिकाकर्ता प्रस्तुत करता है कि यहां कठिनाई नीति नहीं, भौतिकी है. फाइबर में प्रकाश हर तरफ प्रति किलोमीटर करीब पांच माइक्रोसेकंड की गति से चलता है. MB3 के अंदर एक कैबिनेट शून्य पर बैठता है. बगल का MB2 एक माइक्रोसेकंड पीछे है. उसी कैंपस में 1.5 किलोमीटर दूर डार्क फाइबर पर MB1 पंद्रह माइक्रोसेकंड पीछे है. BKC या गोरेगांव में किसी कैरियर पॉइंट पर मौजूद ब्रोकर 150 माइक्रोसेकंड पीछे है, जो इस बाजार में भूगर्भीय युग के बराबर है.
59. MB1 2012 से और MB2 2019 से संचालित हो रहे हैं. जो कोई भी उस कैंपस में पहले से जगह रखता था, MCX द्वारा MB3 चुनने से पहले ही उसी फाइबर फैब्रिक पर था.
60. इसलिए को-लोकेशन कोई ऐसा उत्पाद नहीं है जिसे एक्सचेंज बेचता है. यह दूरी है. एक बार इंजन इमारत के अंदर आ गया तो दूरियां एक फ्लोर प्लान, क्रॉस-कनेक्ट और मकान मालिक की ऑर्डर बुक से तय हो जाती हैं. SEBI अंततः जो भी नियम लिखेगा, वह पहले से चिन्हित मैदान पर लिखा जाएगा.
61. याचिकाकर्ता न्यायालय का ध्यान एक और अंतर की ओर आकर्षित करता है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज अपने भवन के अंदर को-लोकेशन चलाता है, तय करता है कि किसे रैक मिलेगा, प्रकाशित करता है कि वह कितना शुल्क लेता है और दोनों के लिए नियामक के प्रति जवाबदेह है. MCX भारत के कमोडिटी इंजन को ऐसी इमारत के अंदर चलाएगा जिसका वह मालिक नहीं है, ऐसे सेगमेंट में जहां उसे कानूनी रूप से रैक देने की अनुमति ही नहीं हो सकती और इसलिए उसके पास प्रकाशित करने के लिए कोई आवंटन नियम नहीं हैं और कोई ऐसा मकान मालिक नहीं है जिसकी वह निगरानी करता हो.
62. अमेरिका में एक्सचेंज को-लोकेशन शुल्क सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन के पास नियमों में बदलाव के रूप में दाखिल किए जाते हैं. MiFID II के तहत, एक विनियमित बाजार को यह सुनिश्चित करना होता है कि उसके को-लोकेशन नियम पारदर्शी, निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण हों — एक ऐसा दायित्व जो भवन के मालिक होने से पैदा नहीं होता और उसका मालिक न होने से खत्म भी नहीं होता. भारतीय इक्विटी के लिए SEBI के अपने 2018 फ्रेमवर्क में प्रकाशित लेटेंसी परसेंटाइल, कई कनेक्टिविटी वेंडर और एक्सचेंज को अपने वेंडरों के आचरण के लिए जवाबदेह रखा गया है.
63. यह फ्रेमवर्क कमोडिटी एक्सचेंजों पर लागू नहीं होता.
64. भारत पहले भी यहां आ चुका है. जून 2022 में SEBI ने NSE तक बिछाई गई डार्क फाइबर और उससे दो ब्रोकरों को मिली तरजीही कनेक्टिविटी को लेकर 18 पक्षों पर 43.8 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया. ट्रिब्यूनल ने अगस्त 2023 में उस आदेश को रद्द कर दिया. NSE ने तब से को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों को एक साथ निपटाने के लिए 1,388 करोड़ रुपये की पेशकश की है और SEBI ने जनवरी 2026 में सैद्धांतिक रूप से सहमति दी.
65. उस आंकड़े तक पहुंचने में 11 साल लगे.
66. उस मामले में निकटता पहले बनाई गई और बाद में उसकी जांच की गई.
67. याचिकाकर्ता सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करता है कि यह फिर से, सार्वजनिक रूप से, रिकॉर्ड पर मौजूद तारीखों के साथ हो रहा है और इस बार जांच उपयोगी रूप से निकटता से पहले हो सकती है. याचिकाकर्ता यह संकेत नहीं देता कि किसी ने कुछ गलत किया है. वह केवल यह देखता है कि नियम पुस्तिका से पहले इमारत खड़ी हो गई और इस देश में ऐसा पहले भी हो चुका है और इसका मतलब समझने में 11 साल और 1,388 करोड़ रुपये लगे.
68. A. न्यायालय पूछ सकता है कि कुछ माइक्रोसेकंड की कीमत क्या है. 3 जुलाई 2025 को SEBI ने कथित एक्सपायरी-डे हेरफेर को लेकर Jane Street से 4,844 करोड़ रुपये जब्त किए, यह दर्ज करते हुए कि फर्म ने 27 महीनों में भारतीय इंडेक्स ऑप्शंस से 44,358 करोड़ रुपये कमाए थे. पिछले साल उसी बाजार में प्रोप्राइटरी डेस्क और विदेशी निवेशकों ने करीब 58,000 करोड़ रुपये का सकल लाभ दर्ज किया, जिसमें से एल्गोरिदम ने 99 प्रतिशत लिया, जबकि 87.7 प्रतिशत व्यक्तिगत ट्रेडर्स को नुकसान हुआ.
B. याचिकाकर्ता प्रस्तुत करता है कि आंकड़े बताते हैं कि यह सवाल क्यों महत्वपूर्ण है. एक ऐसे बाजार में जहां कंपनियां एक सेकंड के अंशों के लिए प्रतिस्पर्धा करती हैं, गति कोई सजावटी चीज नहीं है.
69. याचिकाकर्ता केवल इतना और जोड़ता है. जबकि किसी ने यह नहीं गिना कि MCX पर ट्रेडर्स ने कितना नुकसान उठाया, एक्सचेंज का अब तक का सबसे अच्छा वर्ष रहा — आय दोगुनी होकर 2,429 करोड़ रुपये हो गई, लाभ 138 प्रतिशत बढ़ा और 12 महीनों में उसके बाजार मूल्य में 40,500 करोड़ रुपये जुड़ गए.
प्रार्थना
70. याचिकाकर्ता सट्टेबाज के पक्ष में कोई दलील नहीं देता. राजकोट का व्यक्ति पूरी तरह जानता था कि वह सट्टा लगा रहा है. जो वह नहीं जानता था वह यह है कि वह ओक्लाहोमा के एक टैंक में पानी के स्तर पर सट्टा लगा रहा था और इस देश में किसी ने यह गिनने की जहमत नहीं उठाई कि इसकी उसे कितनी कीमत चुकानी पड़ी. क्या MCX वास्तव में ऑक्लाहोमा के टैंकों में तेल या पानी भरा है, इसका ऑडिट कर सकता है? फिर, इसे अंडरलाइंग कीमत कैसे माना जा सकता है?
71. इसलिए याचिकाकर्ता अत्यंत सम्मानपूर्वक प्रार्थना करता है कि यह माननीय न्यायालय प्रतिवादियों को निम्नलिखित समझाने का निर्देश देने की कृपा करे:
(a) भारत का प्रमुख क्रूड कॉन्ट्रैक्ट ऐसे बेंचमार्क पर क्यों सेटल होता है, जो भारत के आयात के केवल डेढ़ प्रतिशत को नियंत्रित करता है;
(b) वास्तव में इस एक्सचेंज पर भारतीय फिजिकल ऑयल एक्सपोजर की हेजिंग कौन कर रहा है और कितनी मात्रा में;
(c) कैश सेटलमेंट के लिए दर्ज औचित्य कहां है, जबकि नियामक के अपने सर्कुलर में कहा गया है कि फिजिकल डिलीवरी को हमेशा प्राथमिकता दी जाएगी;
(d) नियामक (शक्तिशाली SEBI) हर साल इक्विटी डेरिवेटिव्स में रिटेल नुकसान प्रकाशित क्यों करता है और 11 वर्षों में क्रूड या गैस, गोल्ड या सिल्वर के लिए कभी प्रकाशित क्यों नहीं किया;
(e) लाइसेंसिंग समझौते के तहत भारत अमेरिकी कीमत के इस्तेमाल के लिए कितना भुगतान करता है;
(f) को-लोकेशन के लिए कौन पात्र होगा और उन सभी लोगों पर इसके प्रभाव का क्या आकलन किया गया है जो पात्र नहीं हैं;
(g) कच्चे तेल के दुनिया के तीसरे सबसे बड़े खरीदार के लिए भारतीय क्रूड बेंचमार्क बनाने के लिए 20 वर्षों में क्या किया गया है;
(h) क्या SEBI ने भारत के कमोडिटी मैचिंग इंजन को किसी विदेशी वाणिज्यिक ऑपरेटर के स्वामित्व वाले परिसर में स्थानांतरित करने के लिए कोई स्पष्ट या निहित मंजूरी दी है और यदि हां, तो दर्ज शर्तों के आधार पर;
(i) MB3 के अंदर इंजन के सबसे नजदीक कैबिनेट कौन आवंटित करेगा, किस प्रकाशित कीमत पर, किस कतार में और क्या कैंपस के मौजूदा कब्जाधारियों को ग्रैंडफादर किया जाएगा;
(j) क्या इमारत के अंदर आंतरिक फाइबर लंबाई को बराबर किया जाएगा और क्या लेटेंसी को 50वें और 99वें परसेंटाइल पर प्रकाशित किया जाएगा;
(k) मकान मालिक की निगरानी कौन करता है;
(l) क्या सबसे पहले पहुंचना स्वयं एक ऐसा लाभ है जिसकी नियम अनुमति देते हैं.
और ऐसी अन्य तथा आगे की राहत के लिए, जिसे यह माननीय न्यायालय भारतीय जनता के हित में उचित समझे.
72.याचिकाकर्ता यह आरोप नहीं लगाता कि किसी ने कानून तोड़ा है.
यदि न्यायालय उसे क्षमा करे, तो यही कठिनाई है.
यह एक काल्पनिक जनहित याचिका है. ऐसा कोई मामला बॉम्बे हाई कोर्ट के समक्ष लंबित नहीं है. याचिकाकर्ता ने इसे दायर नहीं किया है.
हालांकि, उसने इसकी एक प्रति रखी है. दुर्भाग्य से सभी के लिए तथ्य काल्पनिक नहीं हैं. वे पूरी तरह SEBI के सर्कुलर, MCX के खुलासे, CME की प्रेस रिलीज और कानून की किताब से लिए गए हैं, जो सभी उन लोगों के लिए उपलब्ध हैं जो उन्हें पढ़ने की परवाह करते हैं, जो अब तक कोई नहीं करता.
याचिकाकर्ता काल्पनिक बने रहने का अधिकार सुरक्षित रखता है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
LIC की शिकायत में 2012 से 2018 के बीच Reliance Capital द्वारा जारी पांच NCD में किए गए निवेश में गलत जानकारी देने और फंड डायवर्ट करने के आरोप
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रिलायंस ग्रुप के चेयरमैन अनिल अंबानी ने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया है. यह प्रतिक्रिया केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा Reliance Capital (RCAP) के खिलाफ भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के करीब ₹2,684.57 करोड़ के कथित धोखाधड़ी मामले में केस दर्ज किए जाने के बाद आई है. FIR में Reliance Capital, कंपनी के पूर्व चेयरमैन, पूर्व ग्रुप मैनेजिंग डायरेक्टर सतीश सेठ, अज्ञात सरकारी अधिकारियों और अन्य लोगों के नाम शामिल हैं.
CBI के अनुसार, यह FIR LIC की ओर से मिली लिखित शिकायत के आधार पर दर्ज की गई है. मामला LIC द्वारा Reliance Capital में किए गए निवेश और धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, आपराधिक कदाचार, फंड के डायवर्जन या गबन और खातों में हेरफेर जैसे आरोपों से जुड़ा है.
अनिल अंबानी के प्रवक्ता ने कहा कि FIR Reliance Capital से संबंधित है. प्रवक्ता के मुताबिक, अंबानी 2005 से नवंबर 2021 तक कंपनी के बोर्ड में नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और चेयरमैन रहे. नवंबर 2021 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कंपनी के बोर्ड को हटा दिया था और एक एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त किया था.
प्रवक्ता ने कहा कि अनिल अंबानी किसी भी तरह की गलत गतिविधि से पूरी तरह इनकार करते हैं और कानून के तहत उपलब्ध सभी अधिकार सुरक्षित रखते हैं. वहीं, CBI का मामला LIC की शिकायत में Reliance Capital, अनिल अंबानी, सतीश सेठ, अज्ञात सरकारी अधिकारियों और अन्य लोगों के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर आधारित है.
LIC के निवेश की जांच
CBI के मुताबिक, LIC ने आरोप लगाया है कि उसने 12 अप्रैल 2012 से 9 मार्च 2018 के बीच Reliance Capital द्वारा जारी पांच नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) में निवेश किया था. इन निवेशों की कुल राशि ₹3,900 करोड़ थी. यह निवेश सामान्य कॉरपोरेट उद्देश्यों, फंडिंग जरूरतों और मौजूदा कर्ज के पुनर्वित्त के लिए किया गया था.
CBI ने कहा कि LIC ने आरोप लगाया है कि आरोपियों ने आपराधिक साजिश रची और धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, आपराधिक कदाचार, फंड के डायवर्जन या गबन और खातों में हेरफेर जैसे अपराध किए. ये आरोप उस शिकायत का हिस्सा हैं, जिसके आधार पर FIR दर्ज की गई है.
LIC का आरोप है कि गलत जानकारी देकर उसे Reliance Capital में निवेश करने के लिए प्रेरित किया गया और इसके बाद इन फंड को कथित तौर पर गलत तरीके से दूसरी जगह डायवर्ट किया गया. CBI के अनुसार, बीमा कंपनी ने आरोप लगाया है कि इन गतिविधियों से LIC को नुकसान हुआ.
CBI ने बताया कि LIC के अनुसार इन गतिविधियों के कारण उसे ₹2,684.57 करोड़ का नुकसान हुआ. एजेंसी के मुताबिक, शिकायत में आरोपियों और अन्य लाभार्थियों को इसके अनुरूप गलत तरीके से लाभ मिलने की बात भी कही गई है.
CBI फंड के इस्तेमाल और डायवर्जन की जांच करेगी
CBI ने मामले की जांच शुरू कर दी है. एजेंसी सभी संबंधित लोगों की भूमिका की जांच करेगी, जिसमें सरकारी अधिकारी और निजी व्यक्ति भी शामिल हैं. इसके साथ ही कथित आपराधिक साजिश और निवेश की गई रकम के अंतिम इस्तेमाल या संभावित डायवर्जन का भी पता लगाया जाएगा.
जांच Reliance Capital द्वारा जारी किए गए पांच NCD के जरिए LIC द्वारा निवेश की गई रकम पर केंद्रित है. CBI ने कहा कि वह शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच करने के साथ-साथ इन निवेशों के अंतिम इस्तेमाल और संभावित डायवर्जन का पता लगाएगी.
मामला फिलहाल जांच के अधीन है. CBI FIR में नामजद व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका की जांच कर रही है. एजेंसी कथित आपराधिक साजिश और LIC द्वारा निवेश किए गए फंड की आवाजाही की भी जांच करेगी.
Reliance Group की कंपनियों के खिलाफ पहले भी FIR
CBI ने बताया कि वह इससे पहले Reliance Communications Limited, Reliance Capital Limited, Reliance Home Finance Limited, Reliance Commercial Finance Limited और Reliance Telecom Limited के खिलाफ आठ FIR दर्ज कर चुकी है. ये मामले विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और LIC से मिली शिकायतों के आधार पर दर्ज किए गए थे.
एजेंसी के मुताबिक, इन मामलों में अब तक छह चार्जशीट दाखिल की जा चुकी हैं और सात आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है. CBI ने कहा कि ये मामले अभी भी जांच के अधीन हैं और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हैं.
रूस से तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी राष्ट्रपति को 100% तक शुल्क लगाने का अधिकार, भारत और चीन हो सकते हैं दायरे में
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों से जुड़े एक व्यापक कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. इस कानून के तहत अमेरिकी प्रशासन को रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है. भारत और चीन भी इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं, क्योंकि दोनों देश रूस से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की खरीद करते हैं.
इस कानून का आधिकारिक नाम Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 है. इसके तहत रूस के अधिकारियों, बैंकों, ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े हितों और मॉस्को के सैन्य अभियानों में सहयोग करने वाली संस्थाओं को निशाना बनाया गया है. कानून में ईरान पर प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाया गया है.
यह कानून रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच आया है. अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 17 सितंबर को इस पैकेज को 262-159 मतों से मंजूरी दी थी. इससे पहले यह विधेयक सीनेट से भी पारित हो चुका था.
रूस के बड़े ऊर्जा खरीदारों पर टैरिफ का प्रावधान
नए कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति उन देशों से अमेरिका में आयात होने वाले सामान पर 100 फीसदी तक शुल्क लगा सकते हैं, जो संबंधित 12 महीने की अवधि में रूस से कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हों. इस सूची की समय-समय पर समीक्षा की जाएगी.
रूस से कच्चे तेल की खरीद के कारण भारत और चीन इस प्रावधान के संभावित दायरे में हैं. इसके अलावा कानून कुछ रूसी सामान पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगाने की अनुमति भी देता है. हालांकि, कानून पर हस्ताक्षर होने का मतलब यह नहीं है कि भारत या चीन से आने वाले सामान पर 100 फीसदी टैरिफ तत्काल लागू हो गया है. कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को टैरिफ की दर और उसके क्रियान्वयन को लेकर विवेकाधिकार देता है. साथ ही, कुछ निर्धारित परिस्थितियों में छूट देने का प्रावधान भी रखा गया है.
भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार पर असर
भारत पहले ही कह चुका है कि इस तरह के अमेरिकी कानून का द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी असर पड़ सकता है. विदेश मंत्रालय ने कहा था कि भारत ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्रोतों में विविधता बनाए रखने को प्रतिबद्ध है और अपने व्यापार तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा.
रूस से कच्चे तेल की खरीद लंबे समय से भारत और अमेरिका के बीच चर्चा और मतभेद का एक प्रमुख मुद्दा रही है. 2026 में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आई बाधाओं के बीच भारत की रूस से कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है.
मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश
इस प्रतिबंध पैकेज का उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और यूक्रेन में युद्ध को समर्थन देने वाले राजस्व स्रोतों को सीमित करना है. कानून में रूस के ऊर्जा हितों के साथ-साथ तेल के परिवहन और प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले तथाकथित 'शैडो फ्लीट' को भी निशाना बनाया गया है.
कानून अमेरिकी प्रशासन को रूस के ऊर्जा कारोबार और प्रतिबंधों से बचने की गतिविधियों में शामिल विदेशी संस्थाओं पर भी अतिरिक्त दबाव बनाने की क्षमता देता है. इसलिए, वॉशिंगटन इस कानून को किस तरह लागू करता है, उसके आधार पर इसका असर भारत और चीन के अलावा अन्य देशों पर भी पड़ सकता है.
ट्रंप के हस्ताक्षर के साथ रूस के ऊर्जा कारोबार को दंडित करने के लिए अमेरिकी कानूनी ढांचे का विस्तार हुआ है. साथ ही, रूस के प्रमुख तेल खरीदारों पर अमेरिकी बाजार में भारी टैरिफ लगाए जाने का जोखिम भी बढ़ गया है.
FSSAI के मुताबिक, Nestlé India के दो उत्पादों के प्रचार में ऐसे दावे पाए गए जिन्हें संबंधित नियमों का उल्लंघन माना गया. इनमें NAN Excella Pro Stage 1 और Lactogen Pro 1 शामिल हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्मूला फूड को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने Nestlé India के खिलाफ तीन अलग-अलग एडजुडिकेशन केस दर्ज किए हैं. FSSAI के अनुसार, जांच में कंपनी के कुछ उत्पादों के प्रचार में ऐसे दावे पाए गए जो शिशु आहार से जुड़े नियमों के अनुरूप नहीं थे. इसके अलावा, एक फॉलो-अप फॉर्मूला के नमूने में बायोटिन की मात्रा भी निर्धारित मानकों के मुताबिक नहीं पाई गई.
दो फॉर्मूला फूड के प्रचार पर आपत्ति
FSSAI के मुताबिक, Nestlé India के दो उत्पादों के प्रचार में ऐसे दावे पाए गए जिन्हें संबंधित नियमों का उल्लंघन माना गया. इनमें NAN Excella Pro Stage 1 और Lactogen Pro 1 शामिल हैं. जांच के दौरान NAN Excella Pro Stage 1 के प्रचार में ‘5 HMOs’ और ‘Whey Protein’ से जुड़े दावे पाए गए. वहीं, Lactogen Pro 1 के प्रचार में ‘Whey Protein being easy to digest’ यानी व्हे प्रोटीन आसानी से पचने का दावा किया गया था.
शिशु आहार के प्रचार को लेकर नियम
FSSAI ने इन दावों को लेकर Nestlé India से स्पष्टीकरण मांगा है. प्राधिकरण के अनुसार, दोनों उत्पादों के प्रचार को Food Safety and Standards (Food for Infant Nutrition) Regulations, 2020 के प्रावधान 4(2) के अनुरूप नहीं पाया गया.
इन नियमों के तहत शिशु आहार की बिक्री को बढ़ावा देने वाले कुछ तरह के प्रचार और दावों पर प्रतिबंध है. इसके अलावा, Infant Milk Substitutes Act, 1992 की धारा 3 के तहत भी ऐसे उत्पादों के विज्ञापन और प्रचार को लेकर प्रतिबंध लागू हैं.
उत्पाद के पोषण मानक पर भी सवाल
FSSAI की कार्रवाई केवल प्रचार से जुड़े मामलों तक सीमित नहीं है. प्राधिकरण के अनुसार, Nestlé India के एक फॉलो-अप फॉर्मूला के नमूने की प्रयोगशाला जांच में बायोटिन की मात्रा निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं मिली. इसके बाद नमूने को दोबारा जांच के लिए रेफरल लैबोरेटरी भेजा गया. FSSAI के मुताबिक, रेफरल लैबोरेटरी की जांच में भी नमूना निर्धारित बायोटिन मानक के अनुरूप नहीं पाया गया.
बायोटिन एक विटामिन है, जो शरीर में कई महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है. शिशुओं के लिए तैयार किए जाने वाले फॉर्मूला फूड में पोषक तत्वों की मात्रा निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप होना जरूरी है.
तीन अलग-अलग मामलों में कार्रवाई
FSSAI ने प्रचार से जुड़े कथित उल्लंघनों और उत्पाद में पोषण संबंधी मानकों से जुड़े मुद्दों के आधार पर Nestlé India के खिलाफ तीन अलग-अलग एडजुडिकेशन केस दर्ज किए हैं. इन मामलों में आगे की कार्रवाई संबंधित कानूनी और नियामकीय प्रक्रिया के तहत होगी.
विदेशी मुद्रा आस्तियां देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा होती हैं. डॉलर में व्यक्त FCA में यूरो, पाउंड और येन जैसी गैर-अमेरिकी मुद्राओं की विनिमय दरों में होने वाले बदलाव का असर भी शामिल होता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार 10 सप्ताह की बढ़ोतरी के बाद अब गिरावट दर्ज की गई है. 11 सितंबर 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का फॉरेक्स रिजर्व 4.924 अरब डॉलर घटकर 780.782 अरब डॉलर रह गया. इससे एक सप्ताह पहले, 4 सितंबर को विदेशी मुद्रा भंडार में रिकॉर्ड 44.903 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई थी और यह 785.706 अरब डॉलर के ऑल टाइम हाई पर पहुंच गया था. ताजा आंकड़ों में विदेशी मुद्रा आस्तियों (FCA) और सोने के भंडार, दोनों में कमी दर्ज की गई है.
FCA में 2.372 अरब डॉलर की गिरावट
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से जारी साप्ताहिक आंकड़ों के मुताबिक, 11 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भारत की विदेशी मुद्रा आस्तियों (Foreign Currency Assets) में 2.372 अरब डॉलर की कमी हुई. इसके साथ FCA घटकर 645.796 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह FCA में 47.494 अरब डॉलर की रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई थी.
विदेशी मुद्रा आस्तियां देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा होती हैं. डॉलर में व्यक्त FCA में यूरो, पाउंड और येन जैसी गैर-अमेरिकी मुद्राओं की विनिमय दरों में होने वाले बदलाव का असर भी शामिल होता है.
सोने के भंडार की वैल्यू भी घटी
समीक्षाधीन सप्ताह में भारत के स्वर्ण भंडार की वैल्यू में भी कमी आई. RBI के आंकड़ों के अनुसार, गोल्ड रिजर्व का मूल्य 2.591 अरब डॉलर घटकर 111.225 अरब डॉलर रह गया. इससे पिछले सप्ताह भी सोने के भंडार की वैल्यू में 2.594 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी. मार्च 2026 के अंत में RBI के पास 880.52 टन सोना था. सोने के भंडार के मूल्य में होने वाला बदलाव भी कुल विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़े को प्रभावित करता है.
SDR में मामूली बढ़ोतरी
इस दौरान भारत के स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) में 39 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई. इसके बाद SDR भंडार 18.845 अरब डॉलर हो गया. इससे पिछले सप्ताह SDR में 4 मिलियन डॉलर की कमी दर्ज की गई थी. वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास भारत के रिजर्व में इस सप्ताह कोई बदलाव नहीं हुआ. यह 4.916 अरब डॉलर पर स्थिर रहा. इससे पिछले सप्ताह IMF रिजर्व में 2 मिलियन डॉलर की कमी आई थी.
रिकॉर्ड ऊंचाई से 4.924 अरब डॉलर नीचे
ताजा गिरावट के बावजूद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 780 अरब डॉलर से ऊपर बना हुआ है. 4 सितंबर को यह 785.706 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था. इसके बाद 11 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 4.924 अरब डॉलर की कमी दर्ज होने से यह 780.782 अरब डॉलर रह गया.
इस पूरे क्लस्टर के लिए आंध्र प्रदेश मैरीटाइम बोर्ड और विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी ने मिलकर NSHIP-AP नाम की विशेष कंपनी बनाई है. इस परियोजना के लिए MDL को एंकर शिपयार्ड के तौर पर चुना गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के जहाज निर्माण उद्योग को बड़े पैमाने पर विस्तार देने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है. आंध्र प्रदेश के दुगाराजपट्टनम में मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) एक आधुनिक ग्रीनफील्ड मेगा शिपयार्ड विकसित करेगा. प्रस्तावित परियोजना में अगले 5 से 7 वर्षों के दौरान करीब 15,000 करोड़ रुपये के निवेश की योजना है. इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 45 हजार रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है. यह परियोजना भारत को 2047 तक दुनिया के शीर्ष 5 जहाज निर्माण देशों में शामिल करने के लक्ष्य के अनुरूप है.
MDL और NSHIP-AP के बीच हुआ समझौता
इस परियोजना के लिए MDL और नेशनल शिपबिल्डिंग एंड हेवी इंडस्ट्रीज पार्क-आंध्र प्रदेश (NSHIP-AP) के बीच 18 सितंबर 2026 को समझौता हुआ. यह करार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की मौजूदगी में किया गया. MDL के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर कैप्टन जगमोहन (रिटायर्ड) और NSHIP-AP के मैनेजिंग डायरेक्टर सीवी प्रवीण आदित्य ने समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए.
7 साल में 15 हजार करोड़ रुपये का निवेश
दुगाराजपट्टनम में प्रस्तावित शिपयार्ड में अगले 5 से 7 वर्षों के दौरान करीब 15,000 करोड़ रुपये निवेश किए जाने की योजना है. हालांकि, निवेश की योजना जरूरी मंजूरियों और नियामकीय क्लीयरेंस पर निर्भर करेगी. परियोजना के पूरी तरह विकसित होने पर करीब 45 हजार लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर बनने की उम्मीद है.
सालाना 12 लाख ग्रॉस टनेज की क्षमता
प्रस्तावित शिपयार्ड की डिजाइन क्षमता सालाना 12 लाख ग्रॉस टनेज होगी. बाजार की मांग और जरूरतों के आधार पर भविष्य में इसकी क्षमता का विस्तार भी किया जा सकेगा. यहां टैंकर, बल्क कैरियर, कंटेनर जहाज, LNG कैरियर समेत कई तरह के बड़े और विशेष व्यावसायिक जहाज बनाए जाएंगे.
29,254 करोड़ रुपये का शिपबिल्डिंग और पोर्ट क्लस्टर
आंध्र प्रदेश सरकार दुगाराजपट्टनम में एक बड़े शिपबिल्डिंग और पोर्ट क्लस्टर के विकास की योजना पर काम कर रही है. टेक्नो-इकोनॉमिक फिजिबिलिटी रिपोर्ट (TEFR) के मुताबिक, शिपबिल्डिंग और शिप रिपेयर यार्ड की अनुमानित लागत करीब 29,254 करोड़ रुपये है. वहीं, पोर्ट के विकास पर लगभग 9,513 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है.
पोर्ट को केंद्र सरकार की ओर से विकसित किए जाने का प्रस्ताव है. इस पूरे क्लस्टर के लिए आंध्र प्रदेश मैरीटाइम बोर्ड और विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी ने मिलकर NSHIP-AP नाम की विशेष कंपनी बनाई है. इस परियोजना के लिए MDL को एंकर शिपयार्ड के तौर पर चुना गया है.
युद्धपोत से कमर्शियल शिपबिल्डिंग तक MDL का विस्तार
यह परियोजना MDL के लिए व्यावसायिक जहाज निर्माण के क्षेत्र में विस्तार का महत्वपूर्ण कदम है. MDL अब तक मुख्य रूप से युद्धपोतों और पनडुब्बियों के निर्माण के लिए जाना जाता रहा है. दुगाराजपट्टनम परियोजना के जरिए कंपनी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए बड़े कमर्शियल जहाजों के निर्माण की क्षमता विकसित करेगी.
यह परियोजना केंद्र सरकार की शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम (SbDS) और मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047 के अनुरूप है. इससे जहाज निर्माण के साथ मरीन इंजीनियरिंग, शिप रिपेयर और इससे जुड़े सहायक उद्योगों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
भारत को टॉप 5 शिपबिल्डिंग देशों में लाने का लक्ष्य
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि भारत ने 2047 तक दुनिया के शीर्ष 5 जहाज निर्माण देशों में शामिल होने का लक्ष्य रखा है. उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश अपनी लंबी समुद्री तटरेखा, रणनीतिक स्थिति और औद्योगिक क्षमता के जरिए इस लक्ष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
दुगाराजपट्टनम में शिपबिल्डिंग क्लस्टर के विकास से आंध्र प्रदेश के एक प्रमुख जहाज निर्माण केंद्र के रूप में उभरने की उम्मीद है. इससे राज्य में सहायक उद्योगों, निवेश और रोजगार को भी बढ़ावा मिल सकता है.
MDL के CMD कैप्टन जगमोहन (रिटायर्ड) के मुताबिक, दुगाराजपट्टनम में वैश्विक स्तर का शिपयार्ड विकसित करने की क्षमता है. परियोजना से जहाज निर्माण के साथ मरीन इंजीनियरिंग और सहायक उद्योगों का एक मजबूत इकोसिस्टम विकसित करने में मदद मिलेगी.
Semicon India 2026 में मेघल ने कहा कि सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की पारंपरिक सप्लाई चेन और डिजाइन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव हो रहा है. खासकर AI आधारित वर्कलोड यह तय कर रहे हैं कि चिप्स को किस तरह डिजाइन किया जाए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव और चिप डिजाइन में हो रहे परिवर्तन भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए नई मांग और अवसर पैदा कर रहे हैं. Infosys के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट विक्रम मेघल के मुताबिक, भारत इस समय सेमीकंडक्टर क्षेत्र में “एक पीढ़ी में एक बार मिलने वाली मांग की खिड़की” का सामना कर रहा है. हालांकि, इस अवसर का लाभ उठाने के लिए भारत को केवल इंजीनियरिंग क्षमताओं तक सीमित रहने के बजाय पूरे सिस्टम और प्रोडक्ट के विकास में बड़ी भूमिका निभानी होगी.
Semicon India 2026 में बोलते हुए मेघल ने कहा कि सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की पारंपरिक सप्लाई चेन और डिजाइन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव हो रहा है. खासकर AI आधारित वर्कलोड यह तय कर रहे हैं कि चिप्स को किस तरह डिजाइन किया जाए. इसके साथ ही इंडस्ट्री Moore's Law से आगे बढ़कर सिस्टम-लेवल स्केलिंग की दिशा में जा रही है.
AI बढ़ा रहा चिप्स की मांग
मेघल के मुताबिक, AI से सेमीकंडक्टर की मांग में बड़ा इजाफा हो रहा है. आने वाले वर्षों में डेटा सेंटर पर खर्च करीब 6.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. इसमें लगभग आधा खर्च कंप्यूट, मेमोरी और नेटवर्किंग चिप्स पर होने की उम्मीद है.
उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री ऐसे मॉडल की ओर बढ़ रही है, जहां चिप्स यह तय नहीं करते कि वर्कलोड किस तरह होगा, बल्कि वर्कलोड के आधार पर चिप डिजाइन किया जा रहा है. इससे उन देशों के लिए अवसर बढ़ रहे हैं, जो सिर्फ चिप इंजीनियरिंग ही नहीं, बल्कि खास एप्लिकेशन के लिए प्रोडक्ट और सिस्टम विकसित करने में भी सक्षम हैं. मेघल ने भारत के लिए सेमीकंडक्टर क्षेत्र में तीन प्रमुख मांग के अवसर बताए हैं- 'Made for India', 'Engineered in India' और 'Invent in India'.
'Made for India' में लोकलाइजेशन का अवसर
'Made for India' के तहत घरेलू बाजार के लिए प्रोडक्ट और कंपोनेंट के लोकलाइजेशन पर जोर है. मेघल ने कहा कि मोबाइल फोन के क्षेत्र में लोकलाइजेशन की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन घरेलू कंटेंट फिलहाल करीब 23% है. ऐसे में अगले चार से पांच वर्षों में इस क्षेत्र में विस्तार की काफी गुंजाइश है.
'Engineered in India' से आगे बढ़ने की जरूरत
दूसरा अवसर 'Engineered in India' का है, जहां भारत अपनी मौजूदा इंजीनियरिंग और रिसर्च एंड डेवलपमेंट क्षमताओं का इस्तेमाल कर सकता है. मेघल के अनुसार, आने वाले वर्षों में इंजीनियरिंग और R&D पर खर्च मौजूदा स्तर से 1.8 गुना बढ़ने की उम्मीद है.
हालांकि, उन्होंने कहा कि इससे भी बड़ा अवसर 'Invent in India' में है. खासकर कस्टम चिप्स का वैश्विक बाजार बढ़ने के साथ भारतीय कंपनियों के लिए एप्लिकेशन-स्पेसिफिक सिलिकॉन विकसित करने की संभावनाएं बढ़ रही हैं. इससे भारतीय कंपनियां इनोवेशन और प्रोडक्ट ओनरशिप से जुड़े मूल्य का बड़ा हिस्सा हासिल कर सकती हैं.
इंजीनियरिंग से इनोवेशन की ओर बढ़े भारत
मेघल ने कहा कि भारत ने बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग क्षमताएं विकसित की हैं, लेकिन अब अगला चरण भारत से वैश्विक बाजारों के लिए प्रोडक्ट विकसित करने का होना चाहिए.
उन्होंने कहा कि अब तक भारत मुख्य रूप से 'Engineered in India' से मिलने वाली वैल्यू हासिल करता रहा है. अब वैश्विक प्रोडक्ट के जरिए इनोवेशन वैल्यू हासिल करने और भारत में ही नए प्रोडक्ट विकसित करने की क्षमता तैयार करने की जरूरत है. उनके मुताबिक, इससे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को तैयार करने में पिछले दशकों में किए गए निवेश का बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा.
सेमीकंडक्टर निवेश में 'स्ट्रैटेजिक पेशेंस' जरूरी
मेघल ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों से 'स्ट्रैटेजिक पेशेंस' अपनाने की अपील की. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में क्षमताएं विकसित करने के लिए बड़े निवेश और लंबी अवधि की जरूरत होती है.
उन्होंने कंपनियों से मजबूत प्रोडक्ट माइंडसेट अपनाने, रेगुलेटरी कंप्लायंस पर अधिक ध्यान देने और केवल सिलिकॉन तक सीमित रहने के बजाय पूरी टेक्नोलॉजी स्टैक पर स्वामित्व विकसित करने की दिशा में काम करने को कहा.
RBI ने बाजार में चल रही यील्ड से अधिक यील्ड पर सरकारी प्रतिभूतियों को स्वीकार किया. इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों ने बॉन्ड खरीदने के लिए प्रीमियम यील्ड की मांग की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की 50,000 करोड़ रुपये की पहली ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) बॉन्ड बिक्री को निवेशकों से मजबूत प्रतिक्रिया मिली. नीलामी में नोटिफाइड राशि के मुकाबले 66,590 करोड़ रुपये की बोलियां प्राप्त हुईं. केंद्रीय बैंक ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी यानी सरप्लस लिक्विडिटी को कम करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री की.
RBI ने बाजार में चल रही यील्ड से अधिक यील्ड पर सरकारी प्रतिभूतियों को स्वीकार किया. इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों ने बॉन्ड खरीदने के लिए प्रीमियम यील्ड की मांग की. यह सितंबर में RBI की कुल 1 लाख करोड़ रुपये की प्रस्तावित OMO बिक्री की पहली किस्त है.
सरप्लस लिक्विडिटी घटाने की कोशिश
RBI सीधे तौर पर सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकिंग सिस्टम से टिकाऊ लिक्विडिटी निकाल रहा है. इसका उद्देश्य वेटेड एवरेज कॉल रेट (WACR) को नीतिगत रेपो रेट 5.25% के करीब लाना है. गुरुवार को WACR करीब 5.05% रहा, जो जुलाई के अंत से लगातार रेपो रेट से नीचे बना हुआ है.
5 साल के बॉन्ड की यील्ड कट-ऑफ ज्यादा
8.28% GS 2032 बॉन्ड के लिए सबसे ज्यादा 19,700 करोड़ रुपये की बोलियां मिलीं. वहीं, 5 साल के 6.68% GS 2031 बॉन्ड के लिए 7,970 करोड़ रुपये की बोलियां आईं. 5 साल के सरकारी बॉन्ड की कट-ऑफ यील्ड 6.90% रही, जबकि गुरुवार को बाजार बंद होने पर इसकी यील्ड 6.78% थी. इसी तरह 6.79% GS 2029 को 6.70% की कट-ऑफ यील्ड पर स्वीकार किया गया, जबकि पिछली क्लोजिंग यील्ड 6.66% थी.
बाजार यील्ड से अधिक कट-ऑफ के बावजूद मजबूत मांग ने बॉन्ड यील्ड पर तत्काल दबाव को सीमित रखा. गुरुवार को बेंचमार्क 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 7.05% पर बंद हुई.
21 और 28 सितंबर को भी OMO बिक्री
16 सितंबर को बैंकिंग सिस्टम में नेट लिक्विडिटी सरप्लस करीब 7.37 लाख करोड़ रुपये रहा, जो एक दिन पहले 9.85 लाख करोड़ रुपये था. इस महीने की शुरुआत में सरप्लस रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने के बाद हाल में टैक्स भुगतान और अन्य लिक्विडिटी गतिविधियों के चलते इसमें कमी आई है.
RBI अब 21 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपये की एक और OMO बिक्री करेगा. इसके बाद 28 सितंबर को भी इतनी ही राशि की बॉन्ड बिक्री प्रस्तावित है. इसके अलावा केंद्रीय बैंक 2.25 लाख करोड़ रुपये की तीन दिवसीय वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑपरेशन भी कर रहा है.
RBI की ये लिक्विडिटी मैनेजमेंट कार्रवाइयां ऐसे समय में हो रही हैं जब लंबी अवधि वाली VRRR नीलामियों को अपेक्षाकृत सीमित मांग मिली है. केंद्रीय बैंक जरूरत पड़ने पर आगे भी OMO बिक्री कर सकता है, ताकि अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करने के साथ मौद्रिक नीति का असर मजबूत हो और शॉर्ट-टर्म बाजार दरें रेपो रेट के अनुरूप बनी रहें.
एक्सपो में एक 'इनोवेशन गैलरी' तैयार की गई है, जिसमें 200 से अधिक प्रोडक्ट्स को लॉन्च किया गया है. इस गैलरी उद्देश्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उभरती तकनीकों, नए विचारों और इनोवेटिव समाधानों को सामने लाना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इंडस्ट्री 4.0, स्मार्ट ऑटोमेशन और डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाने के साथ एमएसएमई के तकनीकी उन्नयन पर जोर बढ़ रहा है. नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित 'टूल्स एंड इक्विपमेंट एक्सपो 2026' में हैंड और पावर टूल्स से लेकर कटिंग एवं वेल्डिंग तकनीक और स्मार्ट ऑटोमेशन तक के समाधान प्रदर्शित किए जा रहे हैं. इस बार एक्सपो में खास तौर पर 'इनोवेशन गैलरी' भी तैयार किया गया है, जहां नई तकनीकों और इनोवेटिव समाधानों को एक अलग मंच दिया गया है. उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, तकनीक के साथ कौशल विकास और कार्यस्थल सुरक्षा को मजबूत करना भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए अहम होगा.
इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया द्वारा आयोजित इस एक्सपो में 300 से अधिक प्रदर्शक हिस्सा ले रहे हैं. जर्मनी, चीन, ताइवान और हांगकांग की भागीदारी भी देखने को मिल रही है. प्रदर्शनी में टूल्स और उपकरणों के साथ मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं को अधिक स्मार्ट, ऑटोमेटेड और कुशल बनाने वाली तकनीकों पर भी फोकस किया गया है.
इनोवेशन गैलरी में नई तकनीकों पर फोकस
एक्सपो में तैयार किया गया 'इनोवेशन गैलरी' इस आयोजन की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है. इसमें 200 से अधिक प्रोडक्ट्स को लॉन्च किया गया है. इस गैलरी उद्देश्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उभरती तकनीकों, नए विचारों और इनोवेटिव समाधानों को सामने लाना है. इससे उद्योग जगत, एमएसएमई और तकनीकी विशेषज्ञों को नई तकनीकों को समझने और उनके संभावित इस्तेमाल पर चर्चा करने का अवसर मिल रहा है.
एमएसएमई में इंडस्ट्री 4.0 का बढ़ता दायरा
एनपीसी-डीपीआईआईटी, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उप निदेशक यदु कुमार यादव के मुताबिक, भारत के विनिर्माण विकास का अगला चरण एमएसएमई को लीन मैन्युफैक्चरिंग से इंडस्ट्री 4.0 और आईओटी आधारित प्रणालियों की ओर ले जाने पर निर्भर करेगा. पिछले एक दशक में एमएसएमई के उत्पादों, प्रक्रियाओं और प्रणालियों को एकीकृत करने पर जोर रहा है, जबकि अब डिजिटल एकीकरण अगला कदम है. उन्होंने बताया कि एमएसएमई मंत्रालय की RAMP योजना के तहत गुजरात में 750 से अधिक इकाइयों को इंडस्ट्री 4.0 इकोसिस्टम से जोड़ा जा रहा है. इसी तरह के इकोसिस्टम देश के अन्य हिस्सों में भी विकसित करने की योजना है.
कटिंग टूल बाजार में भारत के लिए अवसर
इंडियन कटिंग टूल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के कार्यकारी सचिव पीजी सुब्रमण्यम ने कहा कि बढ़ते घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बाजार से भारतीय कटिंग टूल उद्योग के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं. उनके मुताबिक, वैश्विक कटिंग टूल बाजार करीब 23 अरब डॉलर का है और 2030 तक इसके करीब 30 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. भारत की मौजूदा हिस्सेदारी करीब 15% है.
उन्होंने कहा कि इससे भारतीय कंपनियों के लिए घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात बढ़ाने की भी संभावनाएं हैं. साथ ही, एमएसएमई और स्टार्टअप्स के लिए उपलब्ध करीब 40 सरकारी योजनाओं की जानकारी और आसान पहुंच बढ़ाने की जरूरत है.
आधुनिक मशीनरी अपनाने पर जोर
चैंबर ऑफ इंडियन माइक्रो स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज के अध्यक्ष मुकेश मोहन गुप्ता ने कहा कि नई तकनीक और आधुनिक मशीनरी को अपनाना एमएसएमई की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. उन्होंने सरकारी सहायता और वित्तीय योजनाओं तक आसान पहुंच की जरूरत पर जोर दिया.
उनके मुताबिक, 9.5 करोड़ से अधिक एमएसएमई देश की जीडीपी में 30% से अधिक योगदान देते हैं और 42 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देते हैं. ऐसे में एमएसएमई आधारित मैन्युफैक्चरिंग में तकनीकी उन्नयन का असर उत्पादन और रोजगार दोनों पर पड़ सकता है.
टेक्नोलॉजी के साथ स्किल्स भी जरूरी
ऑटोमोटिव स्किल्स डेवलपमेंट काउंसिल के चेयरपर्सन विनकेश गुलाटी ने कहा कि टूल्स और उपकरण मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री की उत्पादकता और उत्पादन क्षमता का अहम हिस्सा हैं. भारत के लिए मशीनरी, तकनीक और कलपुर्जों के स्थानीयकरण का बड़ा अवसर है, लेकिन इसके लिए कुशल कार्यबल भी जरूरी है. उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी सप्लाई चेन तैयार करने के लिए तकनीक अपनाने के साथ स्किल और टैलेंट डेवलपमेंट पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा.
उपकरणों की डिजाइन में ही हो सुरक्षा
औद्योगिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य निदेशालय (DISH), राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के निदेशक एसपी राणा ने औद्योगिक उपकरणों के सुरक्षित डिजाइन, रखरखाव और इस्तेमाल को महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि मशीनों और उपकरणों से जुड़े जोखिमों की पहचान और उनका आकलन शुरुआत में ही किया जाना चाहिए.
उनके मुताबिक, 'ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड, 2020' के तहत दुर्घटना रोकथाम और सुरक्षित कार्यस्थल पर जोर दिया गया है. सुरक्षा को बाद में जोड़ने के बजाय उपकरणों के डिजाइन और कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाना जरूरी है.
बड़े पैमाने पर उत्पादन और एक्सपोर्ट की तैयारी
चैंबर ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल अंडरटेकिंग्स के उपाध्यक्ष दीदारजीत सिंह लोटे ने कहा कि भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन, लीन मैन्युफैक्चरिंग और क्लस्टर आधारित विकास पर ध्यान देना होगा. उन्होंने कहा कि मजबूत बुनियादी ढांचे और बेहतर उत्पादन प्रणालियों के साथ भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजारों की जरूरतों को पूरा करने की क्षमता बढ़ा सकती हैं.
2035 तक 25 अरब डॉलर से ज्यादा टूल्स एक्सपोर्ट की क्षमता
इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया के प्रबंध निदेशक योगेश मुद्रास ने कहा कि भारत का टूल्स और इक्विपमेंट सेक्टर विकास के महत्वपूर्ण दौर में है. उनके मुताबिक, भारत का हैंड और पावर टूल्स निर्यात फिलहाल करीब 1 अरब डॉलर है और इसमें 2035 तक 25 अरब डॉलर से अधिक तक पहुंचने की क्षमता है.
ऐसे में इंडस्ट्री 4.0, स्मार्ट ऑटोमेशन, आधुनिक टूलिंग, इनोवेशन और कुशल श्रमबल का विस्तार भारत के लिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ वैश्विक निर्यात बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का आधार बन सकता है.