मई में मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 54.3 पर आ गया, जो अप्रैल में 54.7 था. इसका मतलब है कि फैक्टरी गतिविधियां बढ़ रही हैं, लेकिन उनकी रफ्तार पहले के मुकाबले कमजोर हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत की आर्थिक गतिविधियों में मई के दौरान मजबूती बरकरार रही, हालांकि कंपोजिट PMI में हल्की गिरावट दर्ज की गई. सेवा क्षेत्र की मजबूत ग्रोथ ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आई सुस्ती की भरपाई कर दी. वहीं बढ़ती इनपुट लागत और कमजोर निर्यात मांग ने कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है.
मई में 58.1 पर आया कंपोजिट PMI
HSBC फ्लैश इंडिया कंपोजिट PMI मई में 58.1 पर रहा, जो अप्रैल में 58.2 था. हालांकि इसमें मामूली गिरावट आई है, लेकिन 50 से ऊपर का स्तर आर्थिक गतिविधियों में विस्तार का संकेत देता है. S&P Global के आंकड़ों के मुताबिक भारत के निजी क्षेत्र में कारोबार की स्थिति अब भी मजबूत बनी हुई है.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार पड़ी धीमी
मई में मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 54.3 पर आ गया, जो अप्रैल में 54.7 था. इसका मतलब है कि फैक्टरी गतिविधियां बढ़ रही हैं, लेकिन उनकी रफ्तार पहले के मुकाबले कमजोर हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक नए निर्यात ऑर्डर की ग्रोथ पिछले 19 महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कमजोर मांग का असर भारतीय कंपनियों पर साफ दिखाई दिया.
सेवा क्षेत्र ने संभाला मोर्चा
मैन्युफैक्चरिंग में सुस्ती के बावजूद सेवा क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को मजबूती दी. घरेलू मांग और सर्विस गतिविधियों में तेजी की वजह से कंपोजिट PMI मजबूत बना रहा. हालांकि कंपनियों ने माना कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा, यात्रा में रुकावटें और पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर कारोबार पर पड़ा है.
बढ़ती लागत से कंपनियों पर दबाव
मई के दौरान कंपनियों की लागत में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई. ऊर्जा, ईंधन, गैस, धातु, प्लास्टिक, रबर और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी लागत बढ़ने से मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर दबाव बढ़ा. इनपुट कीमतों में जुलाई 2022 के बाद सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि कंपनियों ने ग्राहकों पर पूरा बोझ डालने से परहेज किया और बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी सीमित रखी.
स्टॉक बढ़ाने में जुटीं कंपनियां
रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियों ने तैयार माल और कच्चे माल का स्टॉक लगातार बढ़ाया है. कच्चे माल की खरीद पिछले तीन महीनों की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ी. विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां भविष्य की मांग को देखते हुए पहले से तैयारी कर रही हैं.
रोजगार और कारोबारी भरोसा मजबूत
निजी क्षेत्र में भर्ती का माहौल सकारात्मक बना हुआ है. सेवा क्षेत्र में रोजगार लगभग एक साल की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ा, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी नौकरियों में इजाफा हुआ.
हालांकि कारोबारी भरोसे में हल्की नरमी आई है, लेकिन कंपनियां भविष्य को लेकर अब भी आशावादी नजर आ रही हैं. उन्हें उम्मीद है कि आने वाले महीनों में बाजार की स्थिति और बेहतर हो सकती है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक स्पेसएक्स करीब 2 ट्रिलियन डॉलर के वैल्यूएशन पर 75 अरब डॉलर जुटाने की तैयारी में है. भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब ₹7.25 लाख करोड़ बैठती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलॉन मस्क अब शेयर बाजार में एक नया इतिहास रचने की तैयारी में हैं. दरअसल, एलन मस्क की स्पेस कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) ने IPO के लिए अमेरिकी रेगुलेटर के पास आवेदन दाखिल कर दिया है. अगर यह इश्यू तय आकार में आता है, तो यह दुनिया का सबसे बड़ा IPO बन सकता है और सऊदी अरामको का रिकॉर्ड टूट जाएगा.
नैस्डैक पर लिस्ट होगी स्पेसएक्स
स्पेस एक्सप्लोरेशन टेक्नोलॉजीज कॉर्प नाम वाली कंपनी ने औपचारिक रूप से अमेरिकी बाजार नियामक SEC के पास दस्तावेज दाखिल किए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक कंपनी नैस्डैक पर “SPCX” सिंबल के तहत लिस्ट हो सकती है. इससे पहले ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया था कि कंपनी गोपनीय तरीके से IPO की तैयारी कर रही थी.
कितना बड़ा होगा स्पेसएक्स का IPO?
रिपोर्ट्स के मुताबिक स्पेसएक्स करीब 2 ट्रिलियन डॉलर के वैल्यूएशन पर 75 अरब डॉलर जुटाने की तैयारी में है. भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब ₹7.25 लाख करोड़ बैठती है. अगर ऐसा होता है तो यह दुनिया का सबसे बड़ा IPO होगा. अभी यह रिकॉर्ड सऊदी अरामको के नाम है, जिसने 2019 में करीब 29.4 अरब डॉलर जुटाए थे.
क्यों खास है स्पेसएक्स?
स्पेस ट्रांसपोर्टेशन इंडस्ट्री में स्पेसएक्स का दबदबा लगातार बढ़ता गया है. कंपनी नासा और अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन को रॉकेट लॉन्च सेवाएं देती है. इसके अलावा कंपनी का स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट बिजनेस भी तेजी से बढ़ रहा है, जिससे अरबों डॉलर का रेवेन्यू आता है. यही वजह है कि निजी बाजार में स्पेसएक्स दुनिया की सबसे मूल्यवान प्राइवेट कंपनियों में शामिल हो चुकी है.
xAI और X डील से बढ़ी ताकत
इस साल एलॉन मस्क के AI स्टार्टअप xAI के साथ हुए अधिग्रहण ने स्पेसएक्स की वैल्यूएशन को और मजबूती दी है. इस डील में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X भी शामिल है, जिसे मस्क ने 2022 में खरीदा था. विश्लेषकों का मानना है कि IPO के बाद मस्क की कुल संपत्ति में भी जबरदस्त उछाल देखने को मिल सकता है.
टेस्ला समेत कई दिग्गज कंपनियां रह जाएंगी पीछे
2 ट्रिलियन डॉलर की संभावित वैल्यूएशन स्पेसएक्स को दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों की कतार में खड़ा कर सकती है. यह आंकड़ा S&P 500 इंडेक्स की ज्यादातर कंपनियों से बड़ा होगा. यहां तक कि मस्क की इलेक्ट्रिक कार कंपनी टेस्ला भी वैल्यूएशन के मामले में पीछे छूट सकती है.
जून में सामने आ सकती हैं बड़ी डिटेल्स
रिपोर्ट्स के मुताबिक IPO से जुड़ी ज्यादा जानकारी 4 जून के बाद सामने आ सकती है. वहीं 11 जून तक इसके प्राइस बैंड और अन्य अहम विवरण जारी किए जा सकते हैं. ग्लोबल निवेशकों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या स्पेसएक्स सच में दुनिया के सबसे बड़े IPO का रिकॉर्ड अपने नाम कर पाएगी.
सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक कंपनियां अपने कर्मचारियों की सैलरी से तय रकम काटकर सीधे उनके म्युचुअल फंड खाते में निवेश कर सकेंगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अब म्यूचुअल फंड में निवेश करना पहले से ज्यादा आसान हो सकता है. बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ऐसे नए नियमों पर काम कर रहा है, जिनके तहत कंपनियां कर्मचारियों की सैलरी से सीधे पैसा काटकर म्युचुअल फंड (Mutual Fund ) में निवेश कर सकेंगी. इसके अलावा एजेंटों को कमीशन के बदले MF यूनिट्स देने और सामाजिक कार्यों के लिए निवेश का हिस्सा दान करने जैसे प्रस्ताव भी सामने आए हैं.
निवेश के नियमों में बड़ा बदलाव संभव
अभी तक म्यूचुअल फंड में निवेश के लिए पैसा केवल निवेशक के अपने बैंक खाते से ही भेजा जा सकता है. यह भुगतान आरबीआई से मान्यता प्राप्त पेमेंट गेटवे या सेबी द्वारा अधिकृत संस्थानों के जरिए ही स्वीकार किया जाता है. लेकिन अब सेबी कुछ खास परिस्थितियों में “थर्ड पार्टी पेमेंट” की अनुमति देने पर विचार कर रहा है. यानी निवेशक की ओर से कोई दूसरी संस्था या व्यक्ति भी निवेश राशि जमा कर सकेगा.
कंपनियां कर्मचारियों की सैलरी से कर सकेंगी निवेश
सेबी के प्रस्ताव के मुताबिक कंपनियां अपने कर्मचारियों की सैलरी से तय रकम काटकर सीधे उनके म्युचुअल फंड खाते में निवेश कर सकेंगी. इस कदम का मकसद SIP और लॉन्ग टर्म निवेश को बढ़ावा देना है. माना जा रहा है कि इससे नौकरीपेशा लोगों के लिए नियमित निवेश करना आसान होगा और बचत की आदत मजबूत होगी.
एजेंटों को कैश नहीं, MF यूनिट्स देने का सुझाव
सेबी ने एक और अहम प्रस्ताव रखा है. इसके तहत म्यूचुअल फंड कंपनियां अपने एजेंटों को कमीशन के बदले नकद भुगतान करने की जगह म्युचुअल फंड यूनिट्स दे सकेंगी. रेगुलेटर का मानना है कि इससे एजेंट खुद भी निवेश की तरफ आकर्षित होंगे और लंबी अवधि की बचत को बढ़ावा मिलेगा.
सामाजिक कार्यों के लिए भी इस्तेमाल हो सकेगा निवेश
नए प्रस्तावों में निवेशकों को अपने निवेश या उससे मिलने वाले मुनाफे का एक हिस्सा सामाजिक कार्यों के लिए दान करने की सुविधा देने की बात भी शामिल है. इसके लिए एक पारदर्शी और सुरक्षित सिस्टम तैयार किया जाएगा ताकि निवेशकों का पैसा सही तरीके से इस्तेमाल हो सके.
सुरक्षा और पारदर्शिता पर रहेगा पूरा फोकस
सेबी ने साफ किया है कि निवेश प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए कड़े नियम लागू किए जाएंगे.
1. पैसा देने वाले और निवेश पाने वाले दोनों के लिए KYC अनिवार्य होगा
2. सभी लेन-देन का इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड रखा जाएगा
3. म्युचुअल फंड कंपनियों को पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करनी होगी
4. निवेशक जब चाहें अपनी यूनिट्स बेचकर पैसा निकाल सकेंगे
10 जून तक मांगे गए सुझाव
सेबी ने इन प्रस्तावों पर आम लोगों और बाजार से जुड़े पक्षों से 10 जून तक सुझाव मांगे हैं. सुझावों के बाद नियमों को अंतिम रूप दिया जा सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये बदलाव लागू होते हैं तो भारत में म्युचुअल फंड निवेश का दायरा तेजी से बढ़ सकता है और नौकरीपेशा लोगों के बीच SIP संस्कृति को नया बल मिलेगा.
ICRA की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक FY27 में भारतीय दोपहिया उद्योग में सालाना 3-5 फीसदी की ग्रोथ दर्ज हो सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय दोपहिया वाहन बाजार में आने वाले वित्त वर्ष FY27 के दौरान स्थिर लेकिन मजबूत ग्रोथ देखने को मिल सकती है. क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA ने अनुमान जताया है कि घरेलू टू-व्हीलर इंडस्ट्री 3 से 5 फीसदी की दर से बढ़ सकती है. हालांकि कमजोर मानसून और हाई बेस इफेक्ट जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर की बढ़ती मांग, ग्रामीण बाजार में सुधार और निर्यात में तेज उछाल सेक्टर को नई रफ्तार दे रहे हैं.
FY27 में कैसी रहेगी दोपहिया बाजार की चाल
ICRA की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक FY27 में भारतीय दोपहिया उद्योग में सालाना 3-5 फीसदी की ग्रोथ दर्ज हो सकती है. एजेंसी का कहना है कि बाजार में मांग बनी हुई है, लेकिन पिछले सालों की तेज बिक्री के कारण तुलना का आधार काफी ऊंचा हो गया है. इसके अलावा कमजोर मानसून की आशंका भी बाजार की रफ्तार पर असर डाल सकती है.
मांग को सपोर्ट कर रहे हैं ये बड़े फैक्टर्स
रिपोर्ट के अनुसार रेगुलेटरी सुधार, रिप्लेसमेंट डिमांड और स्थिर उपभोक्ता मांग जैसे कई स्ट्रक्चरल फैक्टर्स दोपहिया बाजार को मजबूती दे रहे हैं. ग्रामीण इलाकों में आय में स्थिरता और कृषि क्षेत्र से बेहतर नकदी प्रवाह भी बिक्री को सहारा दे रहे हैं.
अप्रैल 2026 में बिक्री ने पकड़ी रफ्तार
नए वित्त वर्ष की शुरुआत टू-व्हीलर इंडस्ट्री के लिए शानदार रही. अप्रैल 2026 में घरेलू थोक बिक्री में 29 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई और बिक्री बढ़कर 1.9 मिलियन यूनिट तक पहुंच गई. ICRA के मुताबिक GST 2.0 सुधारों के बाद वाहनों की कीमतें अपेक्षाकृत किफायती होने से मांग में तेजी आई. वहीं खुदरा बिक्री में भी 13 फीसदी की ग्रोथ दर्ज हुई. शादी सीजन, सीमित कीमत बढ़ोतरी और ग्रामीण मांग में सुधार ने बाजार को सपोर्ट किया.
इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर बना सबसे बड़ा ग्रोथ ड्राइवर
देश में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर यानी e2W सेगमेंट तेजी से बढ़ रहा है. अप्रैल 2026 में इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की खुदरा बिक्री 68 फीसदी बढ़कर 1.54 लाख यूनिट से ज्यादा पहुंच गई. अब कुल टू-व्हीलर बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़कर 8 फीसदी हो गई है.
ICRA का कहना है कि बेहतर रेंज, नए मॉडल और कम ऑपरेटिंग कॉस्ट की वजह से ग्राहकों का रुझान तेजी से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ रहा है. पेट्रोल वाहनों की तुलना में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर अब ज्यादा किफायती विकल्प बनते जा रहे हैं.
निर्यात बाजार से भी मिला बड़ा सहारा
घरेलू मांग के साथ-साथ निर्यात बाजार में भी भारतीय कंपनियों को मजबूत बढ़त मिली है. अप्रैल 2026 में टू-व्हीलर एक्सपोर्ट में 38 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई. इससे पहले पूरे FY26 में निर्यात 23 फीसदी बढ़ा था.
वैश्विक बाजारों में किफायती और फ्यूल एफिशिएंट वाहनों की मांग बढ़ने से भारतीय कंपनियों को फायदा मिल रहा है. कई विदेशी बाजारों में भारतीय ब्रांड अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं.
कमजोर मानसून और महंगे कच्चे माल की चिंता
हालांकि ICRA ने कुछ जोखिमों को लेकर भी चेतावनी दी है. मौसम विभाग की ओर से अल नीनो के असर के चलते कमजोर मानसून की आशंका जताई गई है. अगर ग्रामीण क्षेत्रों में बारिश कमजोर रहती है तो दोपहिया वाहनों की मांग प्रभावित हो सकती है. इसके अलावा कच्चे माल की बढ़ती कीमतें कंपनियों की लागत बढ़ा सकती हैं, जिससे मुनाफे पर दबाव आने का खतरा बना रहेगा.
पश्चिम एशिया तनाव बढ़ा सकता है दबाव
रिपोर्ट में पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव को भी बड़ा जोखिम बताया गया है. अगर यह तनाव लंबा खिंचता है तो सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है. इसका सीधा असर वाहन कंपनियों की लागत और निर्यात कारोबार पर पड़ सकता है.
बुधवार को BSE सेंसेक्स 117.54 अंक की तेजी के साथ 75,318.39 अंक पर बंद हुआ था, NSE निफ्टी 41 अंक चढ़कर 23,659 के स्तर पर पहुंच गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
20 मई को भारतीय शेयर बाजार में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखने को मिला था. शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 600 अंक से ज्यादा टूट गया था, लेकिन बाद में रिलायंस इंडस्ट्रीज, हिंडाल्को और बजाज ऑटो जैसे दिग्गज शेयरों में खरीदारी लौटने से बाजार शानदार रिकवरी करते हुए हरे निशान में बंद हुआ. अब निवेशकों की नजर 21 मई के कारोबार पर है, जहां वैश्विक संकेतों, पश्चिम एशिया तनाव, रुपये की कमजोरी और कंपनियों के तिमाही नतीजों के बीच बाजार की दिशा तय होगी.
कल कैसी रही बाजार की चाल
बुधवार के कारोबारी सत्र में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 117.54 अंक की तेजी के साथ 75,318.39 अंक पर बंद हुआ था, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 41 अंक चढ़कर 23,659 के स्तर पर पहुंच गया था. कारोबार के दौरान बाजार में भारी गिरावट भी देखने को मिली, लेकिन दिन के दूसरे हिस्से में खरीदारी बढ़ने से माहौल बदल गया.
रिलायंस और हिंडाल्को से बाजार को उम्मीद
पिछले सत्र में रिलायंस इंडस्ट्रीज और हिंडाल्को इंडस्ट्रीज ने बाजार की रिकवरी में अहम भूमिका निभाई थी. आज भी निवेशकों की नजर इन दिग्गज शेयरों पर रहेगी, क्योंकि इनकी चाल पूरे बाजार की दिशा तय करने में अहम मानी जा रही है.
वैश्विक संकेत और पश्चिम एशिया तनाव अहम फैक्टर
विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और महंगाई की आशंकाएं आज भी बाजार पर असर डाल सकती हैं. इसके अलावा एशियाई बाजारों की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी निवेशकों के लिए अहम संकेत रहेंगी.
रुपये और सेक्टोरल ट्रेंड पर भी नजर
डॉलर के मुकाबले रुपया पिछले सत्र में कमजोर होकर 96.96 के स्तर पर पहुंच गया था. अगर रुपये में दबाव बना रहता है तो आईटी और आयात आधारित सेक्टर्स पर असर पड़ सकता है. वहीं ऑटो, ऑयल एंड गैस और मिडकैप शेयरों में खरीदारी का ट्रेंड जारी रह सकता है.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि शेयर बाजार में गुरुवार को कई बड़े स्टॉक्स निवेशकों के रडार पर रहने वाले हैं. तिमाही नतीजों, नए ऑर्डर्स, डिविडेंड घोषणाओं और कारोबारी अपडेट्स के चलते Vodafone Idea, RVNL, Whirlpool, Glenmark Pharma, Bosch India और Apollo Hospitals समेत 18 कंपनियों के शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है. Vodafone Idea ने हरित ऊर्जा क्षेत्र में निवेश का ऐलान किया है, जबकि RVNL को रेलवे प्रोजेक्ट में बड़ा ऑर्डर मिला है. वहीं BSNL से 264 करोड़ रुपये का ऑर्डर मिलने के बाद Pace Digitek भी फोकस में रहेगा. दूसरी ओर Whirlpool, JK Lakshmi Cement और Garware Technical Fibres जैसी कंपनियों के नतीजों में दबाव देखने को मिला, जबकि GPT Infraprojects, Metro Brands, Bosch India, TeamLease Services और Apollo Hospitals ने मजबूत तिमाही प्रदर्शन दर्ज किया है. इसके अलावा Sammaan Capital के भारी घाटे, Glenmark Pharma के कैंसर रिसर्च प्रोग्राम और JK Cement को मिले बड़े माइनिंग प्रोजेक्ट पर भी बाजार की नजर रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
इस डील को बंगाल प्रो टी20 लीग के बढ़ते व्यावसायिक महत्व के रूप में भी देखा जा रहा है. हाल के वर्षों में क्षेत्रीय टी20 लीगों में कॉरपोरेट निवेश तेजी से बढ़ा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मार्केटिंग और कम्युनिकेशन कंपनी ट्राइब्स ने स्पोर्ट्स सेक्टर में बड़ा कदम उठाते हुए श्राची स्पोर्ट्स की क्रिकेट फ्रेंचाइजी ‘रार्ह टाइगर्स’ में हिस्सेदारी खरीद ली है. यह ट्राइब्स का किसी स्पोर्ट्स फ्रेंचाइजी में पहला निवेश है. इस डील के बाद टीम अब ‘श्राची ट्राइब्स रार्ह टाइगर्स’ के नाम से बंगाल प्रो टी20 लीग के तीसरे सीजन में खेलेगी.
ट्राइब्स का स्पोर्ट्स बिजनेस में पहला बड़ा निवेश
कंपनी ने कहा कि यह अधिग्रहण केवल निवेश नहीं बल्कि खेल और समुदाय को जोड़ने की लंबी रणनीति का हिस्सा है. ट्राइब्स के चेयरमैन गौर गुप्ता ने कहा कि खेल सिर्फ जीतने का माध्यम नहीं बल्कि लोगों को जोड़ने और मजबूत समुदाय बनाने का जरिया भी है. उन्होंने कहा कि कंपनी ऐसी टीम तैयार करना चाहती है जो फैंस के साथ गहरा जुड़ाव बनाए और बंगाल में क्रिकेट के विकास में योगदान दे.
“क्रिकेट के जरिए सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश”
गौर गुप्ता के मुताबिक ट्राइब्स का लक्ष्य सिर्फ मजबूत टीम बनाना नहीं बल्कि खेल के जरिए समाज में सकारात्मक बदलाव लाना भी है. उन्होंने कहा कि कंपनी चाहती है कि टीम स्थानीय समुदाय का अहम हिस्सा बने और लोगों को साथ लाने का माध्यम तैयार करे.
बंगाल क्रिकेट में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
श्राची ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल तोड़ी ने कहा कि बंगाल में क्रिकेट जुनून और स्थानीय गर्व से जुड़ा हुआ है. उनके मुताबिक रार्ह टाइगर्स की शुरुआत से ही कोशिश रही है कि टीम इसी भावना को आगे बढ़ाए और भविष्य के क्रिकेट को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़े. उन्होंने कहा कि ट्राइब्स के जुड़ने से फ्रेंचाइजी को और मजबूत बनाने, बेहतर टीम तैयार करने और खिलाड़ियों व फैंस के अनुभव को बेहतर करने में मदद मिलेगी.
बंगाल प्रो टी20 लीग पर बढ़ रहा कॉरपोरेट फोकस
इस डील को बंगाल प्रो टी20 लीग के बढ़ते व्यावसायिक महत्व के रूप में भी देखा जा रहा है. हाल के वर्षों में क्षेत्रीय टी20 लीगों में कॉरपोरेट निवेश तेजी से बढ़ा है और कंपनियां इन्हें ब्रांड बिल्डिंग व फैन एंगेजमेंट के बड़े प्लेटफॉर्म के तौर पर देख रही हैं.
उद्योग की चिंताओं के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कुछ नियमों में ढील दी है. मंत्रालय ने रेटिंग्स एजेंसियों के बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की अनिवार्य हिस्सेदारी 50% से घटाकर 33% कर दी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की टीवी रेटिंग एजेंसी ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) ने अपने टेलीविजन रेटिंग लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) में औपचारिक आवेदन दाखिल कर दिया है. यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब केंद्र सरकार नई टीआरपी पॉलिसी 2026 की व्यापक समीक्षा कर रही है. उद्योग सूत्रों के मुताबिक मंत्रालय ने हाल ही में मौजूदा टीवी ऑडियंस मेजरमेंट एजेंसियों के लिए अनुपालन अवधि बढ़ाई थी, जिसके बाद BARC ने यह आवेदन जमा किया.
टीआरपी पॉलिसी 2026 पर बढ़ी उद्योग की चिंता
सूत्रों के अनुसार, इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (Indian Broadcasting and Digital Foundation) और BARC के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात की थी. इस बैठक में नई TRP व्यवस्था के लागू होने की समयसीमा और परिचालन संबंधी चुनौतियों पर चिंता जताई गई. नई टीआरपी पॉलिसी 27 मार्च 2026 को अधिसूचित की गई थी. शुरुआत में इसे 30 दिनों के भीतर लागू करने का प्रावधान रखा गया था, लेकिन ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और ऑडियंस मेजरमेंट कंपनियों ने इसे व्यवहारिक रूप से मुश्किल बताया.
किन मुद्दों पर उठे सवाल
उद्योग से जुड़े पक्षों ने कई अहम मुद्दों पर आपत्ति जताई थी. इनमें तेजी से पीपल मीटर्स बढ़ाने का लक्ष्य, बोर्ड संरचना में अनिवार्य बदलाव और रेटिंग्स कैलकुलेशन से लैंडिंग-पेज इम्प्रेशंस को बाहर रखना शामिल था. ब्रॉडकास्टर्स का कहना था कि इतनी तेज़ी से सिस्टम लागू करने से परिचालन लागत में भारी बढ़ोतरी होगी, जबकि मेजरमेंट एक्युरेसी में उतना बड़ा फायदा नहीं मिलेगा.
सरकार ने कई नियमों में दी राहत
उद्योग की चिंताओं के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कुछ नियमों में ढील दी है. मंत्रालय ने रेटिंग्स एजेंसियों के बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की अनिवार्य हिस्सेदारी 50% से घटाकर 33% कर दी है. इसके अलावा 80,000 मीटर्ड होम्स के लक्ष्य को हासिल करने की समयसीमा बढ़ा दी गई है. वहीं एस्टैब्लिशमेंट सर्वे साइकिल को हर साल के बजाय तीन साल में एक बार करने का फैसला लिया गया है.
आगे और बदलाव संभव
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि सरकार का नया रुख यह संकेत देता है कि मंत्रालय सुधारों और व्यावहारिक चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. सूत्रों के मुताबिक मंत्रालय अभी भी विभिन्न स्टेकहोल्डर्स से मिले सुझावों की समीक्षा कर रहा है और इसके बाद ही ऑडियंस मेजरमेंट इकोसिस्टम की दीर्घकालिक रूपरेखा तय की जाएगी.
फिलहाल BARC भारत की एकमात्र टीवी ऑडियंस मेजरमेंट संस्था बनी हुई है और देश के टेलीविजन उद्योग में विज्ञापन दरों तथा चैनलों का प्रदर्शन तय करने में इसकी केंद्रीय भूमिका है.
अमेरिका ने गौतम अडानी को नष्ट नहीं किया. उसने उन्हें अपने भीतर समाहित कर लिया. अमेरिकी DOJ मामला खत्म हो चुका है. SEC मामला सुलझ चुका है. अब आगे क्या होता है, उसकी कहानी पहले सामने आए ड्रामे से कहीं ज्यादा दिलचस्प और कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
न्यूयॉर्क का ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट यूं ही किसी पर आरोप तय नहीं करता. यही वह अभियोजन तंत्र है जिसने गैम्बिनो क्राइम फैमिली के खिलाफ कार्रवाई की, HSBC को घुटनों पर ला दिया, और अपनी प्रतिष्ठा इस बात पर बनाई कि अमेरिकी कानून उसकी सीमाओं से बहुत दूर तक असर डालता है. जब ब्रुकलिन दुनिया के सबसे शक्तिशाली कारोबारियों में से एक पर रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के आरोपों के साथ चर्चा में आता है, तो वैश्विक वित्तीय जगत तुरंत प्रतिक्रिया देता है. संस्थागत पूंजी अदालतों द्वारा दोष या निर्दोष साबित किए जाने से बहुत पहले ही अनिश्चितता से दूरी बना लेती है.
उसी प्रवृत्ति ने लगभग रातोंरात वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में गौतम अडानी की स्थिति बदल दी थी. एक बड़े फंड मैनेजर का कहना है कि न्यूयॉर्क की निवेश समितियों से लेकर सिंगापुर के प्राइवेट बैंकों तक, अडानी नाम को अब इंफ्रास्ट्रक्चर स्टोरी के रूप में नहीं देखा जा रहा था. यह अब प्रतिष्ठा से जुड़े जोखिम की कहानी बन चुका था. और आधुनिक वित्तीय व्यवस्था में प्रतिष्ठा का जोखिम कई बार परिचालन कमजोरी से भी ज्यादा महंगा साबित होता है. निवेशकों ने यह पूछना बंद कर दिया था कि क्या अडानी की परिसंपत्तियां आकर्षक हैं. वे अब एक आसान सवाल पूछ रहे थे: “क्या कोई व्यक्ति अमेरिकी न्याय विभाग (US DOJ) के आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे अरबपति के पक्ष में खड़े होकर अपना करियर दांव पर लगाएगा?” अडानी फाइल को किनारे कर दिया गया था. बाजार नैतिक व्यवस्था नहीं होते. वे सिर्फ मूल्य निर्धारण की व्यवस्था होते हैं.
अब विडंबना देखिए. जिस हफ्ते DOJ ने गौतम अडानी के खिलाफ सभी आपराधिक आरोप स्थायी रूप से हटा दिए हमेशा के लिए खारिज कर दिए, उसी समय भारत में चर्चा का बड़ा हिस्सा नॉर्वे के सॉवरेन वेल्थ फंड और अडानी ग्रीन को कथित “गंभीर भ्रष्टाचार” के आरोपों के आधार पर बाहर रखने पर केंद्रित रहा.
लेकिन अमेरिका से जो संकेत आ रहा है, वह यह है कि वही पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था जिसने 18 महीनों तक अडानी को रेडियोधर्मी संपत्ति की तरह देखा, अब उसके पास रुख बदलने के लिए हर संस्थागत कारण मौजूद है. और जब इतने बड़े सिस्टम दिशा बदलते हैं, तो वे धीरे-धीरे नहीं चलते. वे खरबों डॉलर की चाल चलते हैं.
पिछले 18 महीनों के बड़े हिस्से में अडानी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऐसे व्यक्ति बन चुके थे, जिनसे संस्थान दूरी बनाए रखना चाहते थे. इसलिए नहीं कि उनके कारोबार रुक गए थे. बंदरगाहों पर माल ढुलाई जारी रही. एयरपोर्ट यात्रियों से भरे रहे. ट्रांसमिशन लाइनें पूरे भारत में बिजली पहुंचाती रहीं. रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स का विस्तार चलता रहा.
किसी ने औपचारिक रूप से इस बदलाव की घोषणा नहीं की. कोई प्रेस रिलीज जारी नहीं हुई जिसमें अडानी को “अछूत” कहा गया हो. लेकिन बदलाव सूक्ष्म तरीकों से दिखने लगा. मुलाकातें तय करना मुश्किल होने लगा. कर्जदाताओं ने ज्यादा सुरक्षा की मांग शुरू कर दी. ESG से जुड़ी पूंजी सूखने लगी. बीमा लागत बढ़ गई. विश्लेषक ज्यादा सतर्क हो गए. और उन कमरों में वकील दिखाई देने लगे जहां आमतौर पर बैंकर हावी रहते हैं.
अडानी समूह वह बोझ उठा रहा था जिसे फाइनेंसर निजी तौर पर “अछूत डिस्काउंट” कहते हैं, अनिश्चितता से जुड़ा एक अदृश्य लेकिन बेहद महंगा प्रीमियम, बिना किसी प्रतिबंध या सजा के भी बाजार अडानी का मूल्यांकन सिर्फ बंदरगाहों, एयरपोर्ट या पावर एसेट्स के आधार पर नहीं कर रहा था, बल्कि इस डर पर कर रहा था कि शायद सबसे बुरा अभी बाकी है.
और जब करीब ₹3 लाख करोड़ के कर्ज वाला कोई समूह थोड़ी भी ज्यादा उधारी लागत चुकाने लगता है, तो उसका असर विस्तार योजनाओं से लेकर लंबी अवधि की परियोजनाओं की अर्थव्यवस्था तक हर जगह दिखाई देता है. मुंबई का कोई भी इक्विटी ब्रोकर आपको यह साधारण बात बता देगा.
फिर कुछ असाधारण हुआ.
अमेरिका ने गौतम अडानी को नष्ट नहीं किया… उसने उन्हें अपने भीतर समाहित कर लिया
उस बदलाव के शुरुआती संकेत कुछ हफ्ते पहले ही चुपचाप दिखाई देने लगे थे. 6 मई को मैंने वॉशिंगटन डी.सी. से रिपोर्ट किया था कि अडानी अमेरिकी रेगुलेटर्स के साथ पर्दे के पीछे समझौते की दिशा में बढ़ रहे हैं, एक ऐसी संभावना जो आरोपों के तूफान के चरम पर बेहद अविश्वसनीय लग रही थी. लेकिन अब समझौते की संरचना यह संकेत देती है कि असली लड़ाई अदालतों से हटकर बातचीत की मेज पर पहुंच चुकी थी.
18 मई तक SEC ने अपनी सिविल कार्यवाही का निपटारा कर लिया. ट्रेजरी से जुड़े मामले भी सुलझा लिए गए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि DOJ ने गौतम और सागर अडानी के खिलाफ आपराधिक आरोपों को स्थायी रूप से वापस ले लिया, जिससे उसी मामले में भविष्य की किसी भी कानूनी कार्रवाई का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया.
लेकिन मुंबई के बाजार पर्यवेक्षकों के मुताबिक असली बदलाव रणनीतिक था. एक वरिष्ठ कॉरपोरेट वकील कहते हैं, “जो बदला वह सिर्फ अडानी की कानूनी स्थिति नहीं थी. उनकी वित्तीय स्थिति भी बदल गई थी.”
रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका के भीतर अडानी की कानूनी रणनीति अदालत की दलीलों से कहीं आगे बढ़ चुकी थी. Sullivan & Cromwell के रॉबर्ट जियुफ्रा जूनियर ने कथित तौर पर अभियोजन की बुनियाद को आक्रामक तरीके से चुनौती दी. उन्होंने अधिकार क्षेत्र की सीमा, सबूतों की मजबूती और निवेशकों को सीधे नुकसान न होने जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए, खासकर तब जब बॉन्ड दायित्वों का भुगतान लगातार जारी रहा था. बता दें, यह डोनाल्ड ट्रंप के भी वकील भी रह चुके हैं.
अडानी को लेकर माहौल बदलने वाली चीज एक बड़े भू-राजनीतिक और आर्थिक प्रस्ताव का उभरना था.
एक फंड मैनेजर के मुताबिक, “टेलीविजन स्टूडियो से पहले शेयर बाजारों ने इस बदलाव को समझ लिया था.”
ठीक उसी समय जब ट्रंप युग का अमेरिका खुद को इंफ्रास्ट्रक्चर पुनर्निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग विस्तार और ऊर्जा प्रभुत्व के इर्द-गिर्द फिर से परिभाषित कर रहा था, अडानी ने खुद को सिर्फ आरोपों से लड़ने वाले प्रतिवादी के रूप में नहीं, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में संभावित निवेशक के रूप में पेश किया.
और फिर वह तत्व सामने आया जिसे *The New York Times* ने “असामान्य प्रस्ताव” कहा: अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 10 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता, जो आपराधिक मामले पर बातचीत के साथ सामने आई. यह पूरी तरह नया नहीं था. नवंबर 2024 में ट्रंप की चुनावी जीत के तुरंत बाद अडानी 10 अरब डॉलर के अमेरिकी ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश की घोषणा कर चुके थे. लेकिन आपराधिक मामले के साथ इसके स्पष्ट जुड़ाव ने इसे अलग बना दिया — कानूनी परिधान में लिपटा एक भू-राजनीतिक सौदा.
डी.सी. के कानूनी हलकों में चर्चाओं से संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन, जिसने “अमेरिका में निवेश और नौकरियां लाओ” को अपना केंद्रीय आर्थिक नैरेटिव बनाया है, उसे इससे एक साफ निकास रास्ता मिल गया. DOJ इस परिणाम को अभियोजन विवेकाधिकार के रूप में पेश कर सकता था. अडानी को स्थायी राहत मिल गई. और अमेरिका को ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर, बंदरगाहों, डेटा सेंटर, LNG और रिन्यूएबल सेक्टर में 10 अरब डॉलर का विदेशी निवेशक मिल गया — कोई प्रतिवादी नहीं, एक लॉबिस्ट का कहना है.
डॉलर मार्केट का अब क्या मतलब है
अडानी ग्रुप पर लगभग 2.78 लाख करोड़ रुपये यानी करीब 32 अरब डॉलर का नेट कर्ज है. इसमें से 41 प्रतिशत वैश्विक बैंकों और अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों से लिया गया है. इसका मतलब है कि अडानी के करीब 13 अरब डॉलर के कर्ज की कीमत उन पश्चिमी संस्थानों द्वारा तय की जाती है जो न्यूयॉर्क कोर्ट के दस्तावेज पढ़ते हैं, कंप्लायंस वॉचलिस्ट जांचते हैं और हर बेसिस पॉइंट में जोखिम प्रीमियम जोड़ते हैं.
DOJ अवधि के दौरान यह जोखिम प्रीमियम बढ़ गया था. बॉन्ड निवेशकों ने अधिक रिटर्न की मांग की. सिंडिकेटेड लेंडर्स ने “अडानी क्लॉज” जोड़ दिए. Environmental Social and Governance (ESG) से जुड़ी ग्रीन फाइनेंसिं, जिसकी जरूरत अडानी ग्रीन को अपने रिन्यूएबल विस्तार के लिए है, संरचनात्मक रूप से पहुंच से बाहर हो गई थी. अंतरराष्ट्रीय साझेदारों ने कॉन्ट्रैक्ट्स में सुरक्षा संबंधी भाषा जोड़ दी थी.
अब यह सब बदल रहा है. डॉलर बॉन्ड जारी करना फिर से संभव हो रहा है और रीफाइनेंसिंग लागत घट सकती है. ग्रीन बॉन्ड बाजार अब फिर से उस कंपनी के लिए उपलब्ध हो रहे हैं जिसका मुख्य कारोबार रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर है. एयरपोर्ट फाइनेंसिंग, पोर्ट फाइनेंसिंग, डेटा सेंटर फाइनेंसिंग, जिन सभी को लंबी अवधि और कम लागत वाले अंतरराष्ट्रीय कर्ज की जरूरत होती है, अब संरचनात्मक रूप से कहीं अधिक आसान हो सकते हैं.
इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में, जहां प्रोजेक्ट 30 वर्षों तक चलते हैं और फाइनेंसिंग लागत उनकी व्यवहार्यता तय करती है, वहां 32 अरब डॉलर के कर्ज पर उधारी स्प्रेड में सिर्फ 50 बेसिस पॉइंट का सुधार हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये की बचत में बदल सकता है. कुछ सौ मिलियन डॉलर की कानूनी सुलह भविष्य की फाइनेंसिंग क्षमता में अरबों डॉलर का रास्ता खोल सकती है. यह कोई प्रचार नहीं है. यह इंफ्रास्ट्रक्चर का गणित है.
वह साम्राज्य जो कभी रुका नहीं
यह रुककर याद करने लायक है कि अडानी वास्तव में क्या है, क्योंकि कानूनी विवाद अक्सर इतने बड़े औद्योगिक साम्राज्य को सिर्फ एक कोर्टरूम ड्रामा में बदल देते हैं.
यह समूह 13 बड़े बंदरगाह संचालित करता है जो भारत के लगभग 30 प्रतिशत कार्गो को संभालते हैं. यह मुंबई, अहमदाबाद और लखनऊ समेत सात अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट चलाता है. यह दुनिया के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर्स में से एक है, जिसके पास 20GW+ का पोर्टफोलियो है और 50GW तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा है.
कानूनी संकट के दौरान यह साम्राज्य रुका नहीं था. जो रुक गया था, वह इसकी पूरी गति से विस्तार करने की क्षमता थी. विदेशी अधिग्रहण ठहर गए. रणनीतिक साझेदारियां धीमी पड़ गईं. वैश्विक लेंडर्स ने नई क्रेडिट लाइनों पर ज्यादा सख्त जांच शुरू कर दी. विस्तार की मशीन आधी रफ्तार पर चल रही थी.
अब वह रफ्तार फिर खुल चुकी है और इसके शुरुआती संकेत दिखाई देने लगे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक सिंगापुर की सॉवरेन वेल्थ कंपनी टेमासेक और अल्फा वेव ग्लोबल, अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स में करीब 1.3 अरब डॉलर के निवेश पर विचार कर रहे हैं. इस डील में एयरपोर्ट बिजनेस का मूल्यांकन करीब 18 अरब डॉलर आंका जा रहा है.
अल्फा वेव खुद शेख तहनून बिन जायद अल नाहयान की इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी से जुड़ी है, जो अडानी ग्रुप के सबसे अहम रणनीतिक समर्थकों में से एक है. हिंडनबर्ग संकट के बाद, जब वैश्विक फाइनेंस पीछे हट रहा था, तब शेख तहनून पहले ही अडानी कंपनियों में अरबों डॉलर का निवेश कर चुके थे.
अब उम्मीद की जा रही है कि रुकी हुई डील्स फिर शुरू होंगी, विदेशी पूंजी दोबारा लौटेगी और अधिग्रहणों की रफ्तार बढ़ेगी. संकट के दौरान भी समूह की आय लगभग 20 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ती रही, यह दिखाता है कि मूल कारोबार कभी अपनी गति नहीं खो रहा था, भले ही उसके ऊपर का वित्तीय ढांचा डगमगा गया था.
जो कभी गायब नहीं होता
यहीं पर बौद्धिक ईमानदारी थोड़ी देर रुकने की मांग करती है. कानूनी समाधान इतिहास को मिटा नहीं देता. जनवरी 2023 की हिंडनबर्ग रिपोर्ट जिसने 150 अरब डॉलर की मार्केट कैप गिरावट शुरू की थी और समूह पर दशकों तक स्टॉक मैनिपुलेशन और ऑफशोर अकाउंटिंग के आरोप लगाए थे, ऐसे मामलों का कभी किसी अदालत में पूरी तरह फैसला नहीं हुआ. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की बाद की जांचों ने कुछ व्यक्तियों को विशेष आरोपों में राहत दी, लेकिन शॉर्ट सेलर्स द्वारा उठाए गए व्यापक गवर्नेंस सवाल अब भी संस्थागत स्मृति में मौजूद हैं.
पश्चिमी निवेशक जब अडानी के पास लौटेंगे, तो अपनी स्मृति के साथ लौटेंगे. वे ज्यादा मजबूत डिस्क्लोजर, बेहतर गवर्नेंस छवि, संबंधित पक्षों के लेनदेन की अधिक पारदर्शी रिपोर्टिंग और साफ-सुथरे फ्री-फ्लोट स्ट्रक्चर की मांग करेंगे. जो कंप्लायंस विभाग पहले हट गए थे, वे लौटेंगे, लेकिन इस बार ज्यादा लंबी चेकलिस्ट के साथ.
नॉर्वे का सवाल
भारत में अडानी को लेकर चर्चा का बड़ा हिस्सा नॉर्वे के सॉवरेन वेल्थ फंड द्वारा कथित “गंभीर भ्रष्टाचार या अन्य गंभीर वित्तीय अपराध” के आरोपों के आधार पर अडानी ग्रीन को बाहर किए जाने पर केंद्रित रहा. लेकिन असली महत्व निवेश के आकार का नहीं था. वह संस्थागत संकेत था. नॉर्वे का एक्सक्लूजन फ्रेमवर्क काफी हद तक DOJ और SEC की सक्रिय कार्यवाहियों पर आधारित था, जिसने वैश्विक कंप्लायंस सिस्टम्स को अडानी से जुड़े जोखिम को “उच्च जोखिम” के रूप में वर्गीकृत करने का आधार दिया.
अब वह संदर्भ बदल चुका है. जिस फंड ने वित्तीय अपराध के आरोपों का हवाला देकर निवेश हटाया था, और जो आरोप अब कानूनी रूप से समाप्त हो चुके हैं, उसके सामने अब एक वैध नीति सवाल खड़ा है: क्या यह प्रतिबंध हटेगा? अगर नॉर्वे औपचारिक समीक्षा शुरू करता है, तो दुनिया के सबसे बड़े सॉवरेन वेल्थ फंड पोर्टफोलियो में अडानी की वापसी खुद एक बड़ा वैश्विक बाजार संकेत बन सकती है.
वैश्विक फाइनेंस धीरे चलता है, लेकिन जब जोखिम का गणित बदलता है, तो पैसा उसका पीछा करता है. और अडानी को लेकर जोखिम का यह गणित मई 2026 के एक असाधारण सप्ताह में पूरी तरह और स्थायी रूप से बदल गया.
साथ ही, “जांच के दायरे में होना” और “अछूत होना” इन दोनों में बहुत बड़ा फर्क है. जांच का मतलब है कि आपको थोड़ा ज्यादा प्रीमियम चुकाना पड़ेगा और रोड शो में कठिन सवालों का सामना करना पड़ेगा. अछूत होने का मतलब है कि आपके कमरे में आते ही लोग बाहर निकल जाएं. 18 महीनों तक अडानी अछूत थे. अब वह दौर खत्म हो चुका है. ट्रंप के अमेरिका में, जहां लेन-देन आधारित पूंजीवाद तेजी से राजनीतिक और आर्थिक रिश्तों को आकार दे रहा है, इसका बिल्कुल अलग महत्व था.
इसके बाद बाजार से एक और संकेत आया. अमेरिकी समझौतों से ठीक पहले, दुनिया के सबसे बड़े एसेट मैनेजर्स में से एक कैपिटल ग्रुप इंटरनेशनल, (लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर की संपत्तियों का प्रबंधन करता है) ने कथित तौर पर सैकड़ों मिलियन डॉलर की बड़ी खरीद के जरिए अडानी पोर्ट्स में निवेश किया. ये घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि बड़े संस्थागत निवेशक शायद ही कभी आवेग में कदम उठाते हैं. सॉवरेन फंड्स और ट्रिलियन डॉलर एसेट मैनेजर्स सिर्फ बैलेंस शीट नहीं खरीदते, वे जोखिम का गणित खरीदते हैं. और अडानी को लेकर वही जोखिम गणित अब बदलना शुरू हो चुका है.
इसके बाद जो होगा, वह कोई वापसी की कहानी नहीं है. यह री-रेटिंग है.
DOJ मामले के खत्म होने के असली असर टीवी स्क्रीन या राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखेंगे. वे वैश्विक वित्त की उस मशीनरी के भीतर चुपचाप सामने आएंगे, जहां कंप्लायंस नोट्स, लेंडिंग मॉडल, इंडेक्स क्लासिफिकेशन एल्गोरिद्म और आंतरिक जोखिम आकलन अरबों डॉलर की दिशा तय करते हैं.
बड़े संस्थानों के भीतर कहीं न कहीं भाषा बदलनी शुरू हो चुकी होगी. “सक्रिय DOJ आपराधिक जोखिम” जैसे संदर्भ आंतरिक मेमो से गायब हो सकते हैं. “Avoid” धीरे-धीरे “Review” में बदल सकता है. “High-risk exposure” अब “Re-entry opportunity” जैसा सुनाई देने लगा है.
ग्रीन फाइनेंसिंग के वे रास्ते, जो कानूनी संकट के दौरान राजनीतिक रूप से मुश्किल हो गए थे, फिर से खुल सकते हैं. वे वैश्विक लेंडर्स, जो पहले प्रतिष्ठा संबंधी प्रीमियम मांगते थे, दोबारा प्रतिस्पर्धा शुरू कर सकते हैं. जो रणनीतिक साझेदारियां रुक गई थीं, वे चुपचाप फिर शुरू हो सकती हैं.
पिछले डेढ़ साल तक अडानी को लेकर दुनिया का सबसे बड़ा सवाल बेहद सीधा था:
क्या यह समूह इससे बच पाएगा?
अब वह सवाल शायद पीछे छूट जाए.
नया सवाल यह है:
समूह अब कितनी आक्रामक तरीके से फिर विस्तार कर सकता है?
इस सवाल का जवाब इसलिए अहम है क्योंकि अडानी साम्राज्य भारत की व्यापक आर्थिक महत्वाकांक्षाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है. व्यापार प्रवाह संभालने वाले बंदरगाह, बड़े शहरों को जोड़ने वाले एयरपोर्ट, औद्योगिक विकास को ऊर्जा देने वाले ट्रांसमिशन नेटवर्क, ऊर्जा परिवर्तन को आगे बढ़ाने वाले रिन्यूएबल एनर्जी कॉरिडोर, और मैन्युफैक्चरिंग विस्तार को सहारा देने वाले लॉजिस्टिक्स सिस्टम, ये कोई परिधीय परिसंपत्तियां नहीं हैं. ये भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर भविष्य के केंद्र के बेहद करीब स्थित हैं.
यही वजह है कि अडानी की पूंजी लागत के साथ क्या होता है, इसका महत्व सिर्फ एक अरबपति से कहीं आगे तक जाता है.
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सभी साये खत्म हो गए हैं. हिंडनबर्ग के आरोप अब भी संस्थागत स्मृति में मौजूद हैं. गवर्नेंस को लेकर चिंताएं वैश्विक स्तर पर समूह का पीछा करती रहेंगी. ऑफशोर संरचनाओं, पारदर्शिता और राजनीतिक निकटता को लेकर सवाल खत्म नहीं होने वाले. गंभीर निवेशक बेहतर खुलासों और अधिक साफ-सुथरी गवर्नेंस छवि की मांग जारी रखेंगे. समूह को लेकर राजनीतिक जोखिम की धारणा भी कुछ संस्थागत दायरों में बनी रहेगी.
लेकिन जांच के दायरे में होना और अछूत होना एक जैसी चीजें नहीं हैं:
एक स्थिति अब भी पूंजी तक पहुंच देती है. दूसरी उसका दम घोंट देती है.
और यही बदलाव अब ट्रंप के अमेरिका में गौतम अडानी को लेकर दिखाई दे रहा है. बाजार यह नहीं पूछते कि कोई कारोबारी कभी राजनीतिक रूप से विवादित था या नहीं. वे यह पूछते हैं कि क्या जोखिम की कीमत दोबारा तय की गई है. गौतम अडानी के लिए, वह री-प्राइसिंग अब शुरू हो चुकी है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
रुपये की कमजोरी और महंगे कच्चे तेल का असर सीधे महंगाई पर पड़ सकता है. तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ने का खतरा रहता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रुपये में कमजोरी लगातार गहराती जा रही है. बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले पहली बार 96 के स्तर से नीचे फिसल गया और शुरुआती कारोबार में 96.89 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और मजबूत अमेरिकी डॉलर ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है. पिछले कुछ कारोबारी सत्रों में आई तेज गिरावट ने बाजार और निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है.
लगातार पांचवें सत्र में कमजोर हुआ रुपया
मंगलवार को रुपया 96.53 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था, जबकि बुधवार को इसकी शुरुआत 96.86 के स्तर पर हुई. कारोबार के दौरान रुपया 96.89 तक फिसल गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है. पिछले पांच कारोबारी सत्रों में भारतीय मुद्रा करीब 1 रुपये तक कमजोर हो चुकी है, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव साफ दिखाई दे रहा है.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का बड़ा असर
रुपये पर सबसे ज्यादा दबाव कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है और बुधवार को यह करीब 111 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा.
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता के कारण तेल बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है, इसलिए तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है.
स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज को लेकर बढ़ी चिंता
वैश्विक बाजारों में स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज को लेकर चिंता बढ़ गई है. यह दुनिया का बेहद अहम समुद्री मार्ग है, जहां से लगभग 20% वैश्विक तेल सप्लाई गुजरती है. अगर इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा आती है, तो वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है. इसी आशंका के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है.
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और मजबूत डॉलर का असर
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और वैश्विक अनिश्चितता के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं. इससे डॉलर मजबूत हो रहा है और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है. भारतीय रुपया भी इसी वैश्विक दबाव का सामना कर रहा है, जिसके चलते विदेशी निवेशकों की सतर्कता बढ़ी हुई है.
पहले भी उछल चुकी हैं तेल कीमतें
इससे पहले 30 अप्रैल को ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, जबकि 9 मार्च को पश्चिम एशिया तनाव बढ़ने के बाद इसमें 27% तक की तेजी दर्ज की गई थी. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो तेल कीमतों और रुपये दोनों पर दबाव बना रह सकता है.
महंगाई बढ़ने का खतरा
रुपये की कमजोरी और महंगे कच्चे तेल का असर सीधे महंगाई पर पड़ सकता है. तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ने का खतरा रहता है. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार और Reserve Bank of India के सामने महंगाई नियंत्रित करने की चुनौती और बढ़ सकती है.
यह वार्षिक समीक्षा प्रक्रिया राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के तहत नेशनल अकाउंट्स डिवीजन (NAD) द्वारा आयोजित की जा रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के आर्थिक आंकड़ों को अधिक सटीक और तुलनात्मक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) 20 मई से 19 जून 2026 तक देशभर के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ संयुक्त समीक्षा बैठकें करेगा. इस प्रक्रिया का उद्देश्य राज्य घरेलू उत्पाद (SDP) और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के आंकड़ों में अंतर को दूर करना और राष्ट्रीय आर्थिक डेटा में बेहतर तालमेल सुनिश्चित करना है.
चार चरणों में होंगी बैठकें
यह वार्षिक समीक्षा प्रक्रिया राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के तहत नेशनल अकाउंट्स डिवीजन (NAD) द्वारा आयोजित की जा रही है. नई दिल्ली स्थित खुर्शीद लाल भवन में चार चरणों में अलग-अलग राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ बैठकें होंगी. पहला चरण 20 से 22 मई तक चलेगा, जबकि अन्य बैठकें 3 से 5 जून, 10 से 12 जून और 17 से 19 जून के बीच आयोजित की जाएंगी.
GSDP आंकड़ों में सुधार पर रहेगा फोकस
इस वर्ष की चर्चा का मुख्य फोकस संशोधित आधार वर्ष 2022-23 के तहत 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के चालू कीमतों पर आधारित GSDP आंकड़ों पर रहेगा. बैठकों में विभिन्न सेक्टरों के लिए नई पद्धतियों, संशोधित अनुमान तकनीकों और नए डेटा स्रोतों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी, ताकि राज्यों के आर्थिक उत्पादन का अधिक सटीक आकलन किया जा सके.
राज्यों और केंद्र के बीच होगा तालमेल
इन बैठकों में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी निदेशालय (DES) के अधिकारी शामिल होंगे. अंतिम चरण में वरिष्ठ अधिकारी अनुमान संशोधन और आंकड़ों के सामंजस्य को अंतिम रूप देंगे. सरकार का मानना है कि एकरूप और तुलनात्मक आर्थिक आंकड़े नीति निर्माण और वित्तीय योजना को अधिक प्रभावी बनाने में मदद करेंगे.
वित्तीय योजना और नीति निर्माण में अहम भूमिका
MoSPI के अनुसार, इस प्रक्रिया से तैयार होने वाले तुलनात्मक SDP आंकड़ों का इस्तेमाल वित्त आयोग, वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) जैसी संस्थाएं करती हैं. इसके अलावा यह डेटा अंतर-सरकारी वित्तीय हस्तांतरण, सार्वजनिक खर्च के मूल्यांकन और व्यापक आर्थिक योजना तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
डेटा पारदर्शिता पर सरकार का जोर
सरकार लगातार आर्थिक आंकड़ों की सटीकता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाने पर जोर दे रही है. बदलते आर्थिक ढांचे और नई मापन प्रणालियों के बीच यह वार्षिक समीक्षा प्रक्रिया राष्ट्रीय खातों में एकरूपता बनाए रखने के लिए अहम मानी जा रही है.
यह साझेदारी भारत और डेनमार्क के संबंधों का अहम आधार बन चुकी है, जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास पर खास फोकस किया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नॉर्डिक समिट के दौरान नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में डेनमार्क की कार्यवाहक प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के साथ द्विपक्षीय बैठक की. इस दौरान दोनों देशों ने भारत-डेनमार्क ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को और मजबूत बनाने पर सहमति जताई. बातचीत में ग्रीन ट्रांजिशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रक्षा सहयोग, स्टार्टअप, टेक्नोलॉजी और क्लीन एनर्जी जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई.
ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को मिला बढ़ावा
बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने 2020 में शुरू हुई भारत-डेनमार्क ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप की प्रगति की समीक्षा की. दोनों पक्षों ने सस्टेनेबिलिटी, क्लाइमेट एक्शन और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में बढ़ते सहयोग पर संतोष जताया. यह साझेदारी भारत और डेनमार्क के संबंधों का अहम आधार बन चुकी है, जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास पर खास फोकस किया गया है.
AI, टेक्नोलॉजी और डिफेंस सेक्टर पर जोर
दोनों देशों ने उभरती तकनीकों, एडवांस कम्युनिकेशन, रिसर्च कोलैबोरेशन, स्टार्टअप इकोसिस्टम और अकादमिक एक्सचेंज को और मजबूत करने पर सहमति जताई. इसके अलावा रक्षा सहयोग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाने पर चर्चा हुई.
डेनिश कंपनियों को GIFT City में निवेश का न्योता
प्रधानमंत्री मोदी ने डेनमार्क की कंपनियों को भारत में निवेश बढ़ाने और गुजरात स्थित गिफ्ट सिटी में अवसर तलाशने का आमंत्रण दिया. उन्होंने कहा कि भारत तेजी से ग्रीन इकोनॉमी की दिशा में आगे बढ़ रहा है और देश टिकाऊ एवं पर्यावरण-अनुकूल समाधानों के लिए डेनमार्क की तकनीक और विशेषज्ञता का स्वागत करने को तैयार है.
नदी सफाई और जल प्रबंधन पर भी चर्चा
बैठक में जल प्रबंधन और नदी सफाई तकनीकों पर भी विशेष चर्चा हुई. दोनों नेताओं ने वाराणसी में चल रही “स्मार्ट लेबोरेटरी ऑन क्लीन रिवर्स” पहल की सराहना की. यह परियोजना भारत सरकार, डेनमार्क सरकार और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) के सहयोग से चलाई जा रही है. इसका उद्देश्य नई जल और नदी सफाई तकनीकों का विकास करना है.
वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी हुई बातचीत
दोनों नेताओं ने वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी विचार साझा किए. प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में डेनमार्क की गैर-स्थायी सदस्यता के लिए शुभकामनाएं भी दीं.
भारत-डेनमार्क संबंधों को नई दिशा
ओस्लो में हुई यह बैठक इस बात का संकेत मानी जा रही है कि भारत और डेनमार्क भविष्य में ग्रीन टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, क्लाइमेट एक्शन और रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.