उद्योग की चिंताओं के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कुछ नियमों में ढील दी है. मंत्रालय ने रेटिंग्स एजेंसियों के बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की अनिवार्य हिस्सेदारी 50% से घटाकर 33% कर दी है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत की टीवी रेटिंग एजेंसी ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) ने अपने टेलीविजन रेटिंग लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) में औपचारिक आवेदन दाखिल कर दिया है. यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब केंद्र सरकार नई टीआरपी पॉलिसी 2026 की व्यापक समीक्षा कर रही है. उद्योग सूत्रों के मुताबिक मंत्रालय ने हाल ही में मौजूदा टीवी ऑडियंस मेजरमेंट एजेंसियों के लिए अनुपालन अवधि बढ़ाई थी, जिसके बाद BARC ने यह आवेदन जमा किया.
टीआरपी पॉलिसी 2026 पर बढ़ी उद्योग की चिंता
सूत्रों के अनुसार, इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (Indian Broadcasting and Digital Foundation) और BARC के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात की थी. इस बैठक में नई TRP व्यवस्था के लागू होने की समयसीमा और परिचालन संबंधी चुनौतियों पर चिंता जताई गई. नई टीआरपी पॉलिसी 27 मार्च 2026 को अधिसूचित की गई थी. शुरुआत में इसे 30 दिनों के भीतर लागू करने का प्रावधान रखा गया था, लेकिन ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और ऑडियंस मेजरमेंट कंपनियों ने इसे व्यवहारिक रूप से मुश्किल बताया.
किन मुद्दों पर उठे सवाल
उद्योग से जुड़े पक्षों ने कई अहम मुद्दों पर आपत्ति जताई थी. इनमें तेजी से पीपल मीटर्स बढ़ाने का लक्ष्य, बोर्ड संरचना में अनिवार्य बदलाव और रेटिंग्स कैलकुलेशन से लैंडिंग-पेज इम्प्रेशंस को बाहर रखना शामिल था. ब्रॉडकास्टर्स का कहना था कि इतनी तेज़ी से सिस्टम लागू करने से परिचालन लागत में भारी बढ़ोतरी होगी, जबकि मेजरमेंट एक्युरेसी में उतना बड़ा फायदा नहीं मिलेगा.
सरकार ने कई नियमों में दी राहत
उद्योग की चिंताओं के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कुछ नियमों में ढील दी है. मंत्रालय ने रेटिंग्स एजेंसियों के बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की अनिवार्य हिस्सेदारी 50% से घटाकर 33% कर दी है. इसके अलावा 80,000 मीटर्ड होम्स के लक्ष्य को हासिल करने की समयसीमा बढ़ा दी गई है. वहीं एस्टैब्लिशमेंट सर्वे साइकिल को हर साल के बजाय तीन साल में एक बार करने का फैसला लिया गया है.
आगे और बदलाव संभव
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि सरकार का नया रुख यह संकेत देता है कि मंत्रालय सुधारों और व्यावहारिक चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. सूत्रों के मुताबिक मंत्रालय अभी भी विभिन्न स्टेकहोल्डर्स से मिले सुझावों की समीक्षा कर रहा है और इसके बाद ही ऑडियंस मेजरमेंट इकोसिस्टम की दीर्घकालिक रूपरेखा तय की जाएगी.
फिलहाल BARC भारत की एकमात्र टीवी ऑडियंस मेजरमेंट संस्था बनी हुई है और देश के टेलीविजन उद्योग में विज्ञापन दरों तथा चैनलों का प्रदर्शन तय करने में इसकी केंद्रीय भूमिका है.
अमेरिका ने गौतम अडानी को नष्ट नहीं किया. उसने उन्हें अपने भीतर समाहित कर लिया. अमेरिकी DOJ मामला खत्म हो चुका है. SEC मामला सुलझ चुका है. अब आगे क्या होता है, उसकी कहानी पहले सामने आए ड्रामे से कहीं ज्यादा दिलचस्प और कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
न्यूयॉर्क का ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट यूं ही किसी पर आरोप तय नहीं करता. यही वह अभियोजन तंत्र है जिसने गैम्बिनो क्राइम फैमिली के खिलाफ कार्रवाई की, HSBC को घुटनों पर ला दिया, और अपनी प्रतिष्ठा इस बात पर बनाई कि अमेरिकी कानून उसकी सीमाओं से बहुत दूर तक असर डालता है. जब ब्रुकलिन दुनिया के सबसे शक्तिशाली कारोबारियों में से एक पर रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के आरोपों के साथ चर्चा में आता है, तो वैश्विक वित्तीय जगत तुरंत प्रतिक्रिया देता है. संस्थागत पूंजी अदालतों द्वारा दोष या निर्दोष साबित किए जाने से बहुत पहले ही अनिश्चितता से दूरी बना लेती है.
उसी प्रवृत्ति ने लगभग रातोंरात वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में गौतम अडानी की स्थिति बदल दी थी. एक बड़े फंड मैनेजर का कहना है कि न्यूयॉर्क की निवेश समितियों से लेकर सिंगापुर के प्राइवेट बैंकों तक, अडानी नाम को अब इंफ्रास्ट्रक्चर स्टोरी के रूप में नहीं देखा जा रहा था. यह अब प्रतिष्ठा से जुड़े जोखिम की कहानी बन चुका था. और आधुनिक वित्तीय व्यवस्था में प्रतिष्ठा का जोखिम कई बार परिचालन कमजोरी से भी ज्यादा महंगा साबित होता है. निवेशकों ने यह पूछना बंद कर दिया था कि क्या अडानी की परिसंपत्तियां आकर्षक हैं. वे अब एक आसान सवाल पूछ रहे थे: “क्या कोई व्यक्ति अमेरिकी न्याय विभाग (US DOJ) के आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे अरबपति के पक्ष में खड़े होकर अपना करियर दांव पर लगाएगा?” अडानी फाइल को किनारे कर दिया गया था. बाजार नैतिक व्यवस्था नहीं होते. वे सिर्फ मूल्य निर्धारण की व्यवस्था होते हैं.
अब विडंबना देखिए. जिस हफ्ते DOJ ने गौतम अडानी के खिलाफ सभी आपराधिक आरोप स्थायी रूप से हटा दिए हमेशा के लिए खारिज कर दिए, उसी समय भारत में चर्चा का बड़ा हिस्सा नॉर्वे के सॉवरेन वेल्थ फंड और अडानी ग्रीन को कथित “गंभीर भ्रष्टाचार” के आरोपों के आधार पर बाहर रखने पर केंद्रित रहा.
लेकिन अमेरिका से जो संकेत आ रहा है, वह यह है कि वही पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था जिसने 18 महीनों तक अडानी को रेडियोधर्मी संपत्ति की तरह देखा, अब उसके पास रुख बदलने के लिए हर संस्थागत कारण मौजूद है. और जब इतने बड़े सिस्टम दिशा बदलते हैं, तो वे धीरे-धीरे नहीं चलते. वे खरबों डॉलर की चाल चलते हैं.
पिछले 18 महीनों के बड़े हिस्से में अडानी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऐसे व्यक्ति बन चुके थे, जिनसे संस्थान दूरी बनाए रखना चाहते थे. इसलिए नहीं कि उनके कारोबार रुक गए थे. बंदरगाहों पर माल ढुलाई जारी रही. एयरपोर्ट यात्रियों से भरे रहे. ट्रांसमिशन लाइनें पूरे भारत में बिजली पहुंचाती रहीं. रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स का विस्तार चलता रहा.
किसी ने औपचारिक रूप से इस बदलाव की घोषणा नहीं की. कोई प्रेस रिलीज जारी नहीं हुई जिसमें अडानी को “अछूत” कहा गया हो. लेकिन बदलाव सूक्ष्म तरीकों से दिखने लगा. मुलाकातें तय करना मुश्किल होने लगा. कर्जदाताओं ने ज्यादा सुरक्षा की मांग शुरू कर दी. ESG से जुड़ी पूंजी सूखने लगी. बीमा लागत बढ़ गई. विश्लेषक ज्यादा सतर्क हो गए. और उन कमरों में वकील दिखाई देने लगे जहां आमतौर पर बैंकर हावी रहते हैं.
अडानी समूह वह बोझ उठा रहा था जिसे फाइनेंसर निजी तौर पर “अछूत डिस्काउंट” कहते हैं, अनिश्चितता से जुड़ा एक अदृश्य लेकिन बेहद महंगा प्रीमियम, बिना किसी प्रतिबंध या सजा के भी बाजार अडानी का मूल्यांकन सिर्फ बंदरगाहों, एयरपोर्ट या पावर एसेट्स के आधार पर नहीं कर रहा था, बल्कि इस डर पर कर रहा था कि शायद सबसे बुरा अभी बाकी है.
और जब करीब ₹3 लाख करोड़ के कर्ज वाला कोई समूह थोड़ी भी ज्यादा उधारी लागत चुकाने लगता है, तो उसका असर विस्तार योजनाओं से लेकर लंबी अवधि की परियोजनाओं की अर्थव्यवस्था तक हर जगह दिखाई देता है. मुंबई का कोई भी इक्विटी ब्रोकर आपको यह साधारण बात बता देगा.
फिर कुछ असाधारण हुआ.
अमेरिका ने गौतम अडानी को नष्ट नहीं किया… उसने उन्हें अपने भीतर समाहित कर लिया
उस बदलाव के शुरुआती संकेत कुछ हफ्ते पहले ही चुपचाप दिखाई देने लगे थे. 6 मई को मैंने वॉशिंगटन डी.सी. से रिपोर्ट किया था कि अडानी अमेरिकी रेगुलेटर्स के साथ पर्दे के पीछे समझौते की दिशा में बढ़ रहे हैं, एक ऐसी संभावना जो आरोपों के तूफान के चरम पर बेहद अविश्वसनीय लग रही थी. लेकिन अब समझौते की संरचना यह संकेत देती है कि असली लड़ाई अदालतों से हटकर बातचीत की मेज पर पहुंच चुकी थी.
18 मई तक SEC ने अपनी सिविल कार्यवाही का निपटारा कर लिया. ट्रेजरी से जुड़े मामले भी सुलझा लिए गए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि DOJ ने गौतम और सागर अडानी के खिलाफ आपराधिक आरोपों को स्थायी रूप से वापस ले लिया, जिससे उसी मामले में भविष्य की किसी भी कानूनी कार्रवाई का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया.
लेकिन मुंबई के बाजार पर्यवेक्षकों के मुताबिक असली बदलाव रणनीतिक था. एक वरिष्ठ कॉरपोरेट वकील कहते हैं, “जो बदला वह सिर्फ अडानी की कानूनी स्थिति नहीं थी. उनकी वित्तीय स्थिति भी बदल गई थी.”
रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका के भीतर अडानी की कानूनी रणनीति अदालत की दलीलों से कहीं आगे बढ़ चुकी थी. Sullivan & Cromwell के रॉबर्ट जियुफ्रा जूनियर ने कथित तौर पर अभियोजन की बुनियाद को आक्रामक तरीके से चुनौती दी. उन्होंने अधिकार क्षेत्र की सीमा, सबूतों की मजबूती और निवेशकों को सीधे नुकसान न होने जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए, खासकर तब जब बॉन्ड दायित्वों का भुगतान लगातार जारी रहा था. बता दें, यह डोनाल्ड ट्रंप के भी वकील भी रह चुके हैं.
अडानी को लेकर माहौल बदलने वाली चीज एक बड़े भू-राजनीतिक और आर्थिक प्रस्ताव का उभरना था.
एक फंड मैनेजर के मुताबिक, “टेलीविजन स्टूडियो से पहले शेयर बाजारों ने इस बदलाव को समझ लिया था.”
ठीक उसी समय जब ट्रंप युग का अमेरिका खुद को इंफ्रास्ट्रक्चर पुनर्निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग विस्तार और ऊर्जा प्रभुत्व के इर्द-गिर्द फिर से परिभाषित कर रहा था, अडानी ने खुद को सिर्फ आरोपों से लड़ने वाले प्रतिवादी के रूप में नहीं, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में संभावित निवेशक के रूप में पेश किया.
और फिर वह तत्व सामने आया जिसे *The New York Times* ने “असामान्य प्रस्ताव” कहा: अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 10 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता, जो आपराधिक मामले पर बातचीत के साथ सामने आई. यह पूरी तरह नया नहीं था. नवंबर 2024 में ट्रंप की चुनावी जीत के तुरंत बाद अडानी 10 अरब डॉलर के अमेरिकी ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश की घोषणा कर चुके थे. लेकिन आपराधिक मामले के साथ इसके स्पष्ट जुड़ाव ने इसे अलग बना दिया — कानूनी परिधान में लिपटा एक भू-राजनीतिक सौदा.
डी.सी. के कानूनी हलकों में चर्चाओं से संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन, जिसने “अमेरिका में निवेश और नौकरियां लाओ” को अपना केंद्रीय आर्थिक नैरेटिव बनाया है, उसे इससे एक साफ निकास रास्ता मिल गया. DOJ इस परिणाम को अभियोजन विवेकाधिकार के रूप में पेश कर सकता था. अडानी को स्थायी राहत मिल गई. और अमेरिका को ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर, बंदरगाहों, डेटा सेंटर, LNG और रिन्यूएबल सेक्टर में 10 अरब डॉलर का विदेशी निवेशक मिल गया — कोई प्रतिवादी नहीं, एक लॉबिस्ट का कहना है.
डॉलर मार्केट का अब क्या मतलब है
अडानी ग्रुप पर लगभग 2.78 लाख करोड़ रुपये यानी करीब 32 अरब डॉलर का नेट कर्ज है. इसमें से 41 प्रतिशत वैश्विक बैंकों और अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों से लिया गया है. इसका मतलब है कि अडानी के करीब 13 अरब डॉलर के कर्ज की कीमत उन पश्चिमी संस्थानों द्वारा तय की जाती है जो न्यूयॉर्क कोर्ट के दस्तावेज पढ़ते हैं, कंप्लायंस वॉचलिस्ट जांचते हैं और हर बेसिस पॉइंट में जोखिम प्रीमियम जोड़ते हैं.
DOJ अवधि के दौरान यह जोखिम प्रीमियम बढ़ गया था. बॉन्ड निवेशकों ने अधिक रिटर्न की मांग की. सिंडिकेटेड लेंडर्स ने “अडानी क्लॉज” जोड़ दिए. Environmental Social and Governance (ESG) से जुड़ी ग्रीन फाइनेंसिं, जिसकी जरूरत अडानी ग्रीन को अपने रिन्यूएबल विस्तार के लिए है, संरचनात्मक रूप से पहुंच से बाहर हो गई थी. अंतरराष्ट्रीय साझेदारों ने कॉन्ट्रैक्ट्स में सुरक्षा संबंधी भाषा जोड़ दी थी.
अब यह सब बदल रहा है. डॉलर बॉन्ड जारी करना फिर से संभव हो रहा है और रीफाइनेंसिंग लागत घट सकती है. ग्रीन बॉन्ड बाजार अब फिर से उस कंपनी के लिए उपलब्ध हो रहे हैं जिसका मुख्य कारोबार रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर है. एयरपोर्ट फाइनेंसिंग, पोर्ट फाइनेंसिंग, डेटा सेंटर फाइनेंसिंग, जिन सभी को लंबी अवधि और कम लागत वाले अंतरराष्ट्रीय कर्ज की जरूरत होती है, अब संरचनात्मक रूप से कहीं अधिक आसान हो सकते हैं.
इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में, जहां प्रोजेक्ट 30 वर्षों तक चलते हैं और फाइनेंसिंग लागत उनकी व्यवहार्यता तय करती है, वहां 32 अरब डॉलर के कर्ज पर उधारी स्प्रेड में सिर्फ 50 बेसिस पॉइंट का सुधार हर साल सैकड़ों करोड़ रुपये की बचत में बदल सकता है. कुछ सौ मिलियन डॉलर की कानूनी सुलह भविष्य की फाइनेंसिंग क्षमता में अरबों डॉलर का रास्ता खोल सकती है. यह कोई प्रचार नहीं है. यह इंफ्रास्ट्रक्चर का गणित है.
वह साम्राज्य जो कभी रुका नहीं
यह रुककर याद करने लायक है कि अडानी वास्तव में क्या है, क्योंकि कानूनी विवाद अक्सर इतने बड़े औद्योगिक साम्राज्य को सिर्फ एक कोर्टरूम ड्रामा में बदल देते हैं.
यह समूह 13 बड़े बंदरगाह संचालित करता है जो भारत के लगभग 30 प्रतिशत कार्गो को संभालते हैं. यह मुंबई, अहमदाबाद और लखनऊ समेत सात अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट चलाता है. यह दुनिया के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर्स में से एक है, जिसके पास 20GW+ का पोर्टफोलियो है और 50GW तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा है.
कानूनी संकट के दौरान यह साम्राज्य रुका नहीं था. जो रुक गया था, वह इसकी पूरी गति से विस्तार करने की क्षमता थी. विदेशी अधिग्रहण ठहर गए. रणनीतिक साझेदारियां धीमी पड़ गईं. वैश्विक लेंडर्स ने नई क्रेडिट लाइनों पर ज्यादा सख्त जांच शुरू कर दी. विस्तार की मशीन आधी रफ्तार पर चल रही थी.
अब वह रफ्तार फिर खुल चुकी है और इसके शुरुआती संकेत दिखाई देने लगे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक सिंगापुर की सॉवरेन वेल्थ कंपनी टेमासेक और अल्फा वेव ग्लोबल, अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स में करीब 1.3 अरब डॉलर के निवेश पर विचार कर रहे हैं. इस डील में एयरपोर्ट बिजनेस का मूल्यांकन करीब 18 अरब डॉलर आंका जा रहा है.
अल्फा वेव खुद शेख तहनून बिन जायद अल नाहयान की इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी से जुड़ी है, जो अडानी ग्रुप के सबसे अहम रणनीतिक समर्थकों में से एक है. हिंडनबर्ग संकट के बाद, जब वैश्विक फाइनेंस पीछे हट रहा था, तब शेख तहनून पहले ही अडानी कंपनियों में अरबों डॉलर का निवेश कर चुके थे.
अब उम्मीद की जा रही है कि रुकी हुई डील्स फिर शुरू होंगी, विदेशी पूंजी दोबारा लौटेगी और अधिग्रहणों की रफ्तार बढ़ेगी. संकट के दौरान भी समूह की आय लगभग 20 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ती रही, यह दिखाता है कि मूल कारोबार कभी अपनी गति नहीं खो रहा था, भले ही उसके ऊपर का वित्तीय ढांचा डगमगा गया था.
जो कभी गायब नहीं होता
यहीं पर बौद्धिक ईमानदारी थोड़ी देर रुकने की मांग करती है. कानूनी समाधान इतिहास को मिटा नहीं देता. जनवरी 2023 की हिंडनबर्ग रिपोर्ट जिसने 150 अरब डॉलर की मार्केट कैप गिरावट शुरू की थी और समूह पर दशकों तक स्टॉक मैनिपुलेशन और ऑफशोर अकाउंटिंग के आरोप लगाए थे, ऐसे मामलों का कभी किसी अदालत में पूरी तरह फैसला नहीं हुआ. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की बाद की जांचों ने कुछ व्यक्तियों को विशेष आरोपों में राहत दी, लेकिन शॉर्ट सेलर्स द्वारा उठाए गए व्यापक गवर्नेंस सवाल अब भी संस्थागत स्मृति में मौजूद हैं.
पश्चिमी निवेशक जब अडानी के पास लौटेंगे, तो अपनी स्मृति के साथ लौटेंगे. वे ज्यादा मजबूत डिस्क्लोजर, बेहतर गवर्नेंस छवि, संबंधित पक्षों के लेनदेन की अधिक पारदर्शी रिपोर्टिंग और साफ-सुथरे फ्री-फ्लोट स्ट्रक्चर की मांग करेंगे. जो कंप्लायंस विभाग पहले हट गए थे, वे लौटेंगे, लेकिन इस बार ज्यादा लंबी चेकलिस्ट के साथ.
नॉर्वे का सवाल
भारत में अडानी को लेकर चर्चा का बड़ा हिस्सा नॉर्वे के सॉवरेन वेल्थ फंड द्वारा कथित “गंभीर भ्रष्टाचार या अन्य गंभीर वित्तीय अपराध” के आरोपों के आधार पर अडानी ग्रीन को बाहर किए जाने पर केंद्रित रहा. लेकिन असली महत्व निवेश के आकार का नहीं था. वह संस्थागत संकेत था. नॉर्वे का एक्सक्लूजन फ्रेमवर्क काफी हद तक DOJ और SEC की सक्रिय कार्यवाहियों पर आधारित था, जिसने वैश्विक कंप्लायंस सिस्टम्स को अडानी से जुड़े जोखिम को “उच्च जोखिम” के रूप में वर्गीकृत करने का आधार दिया.
अब वह संदर्भ बदल चुका है. जिस फंड ने वित्तीय अपराध के आरोपों का हवाला देकर निवेश हटाया था, और जो आरोप अब कानूनी रूप से समाप्त हो चुके हैं, उसके सामने अब एक वैध नीति सवाल खड़ा है: क्या यह प्रतिबंध हटेगा? अगर नॉर्वे औपचारिक समीक्षा शुरू करता है, तो दुनिया के सबसे बड़े सॉवरेन वेल्थ फंड पोर्टफोलियो में अडानी की वापसी खुद एक बड़ा वैश्विक बाजार संकेत बन सकती है.
वैश्विक फाइनेंस धीरे चलता है, लेकिन जब जोखिम का गणित बदलता है, तो पैसा उसका पीछा करता है. और अडानी को लेकर जोखिम का यह गणित मई 2026 के एक असाधारण सप्ताह में पूरी तरह और स्थायी रूप से बदल गया.
साथ ही, “जांच के दायरे में होना” और “अछूत होना” इन दोनों में बहुत बड़ा फर्क है. जांच का मतलब है कि आपको थोड़ा ज्यादा प्रीमियम चुकाना पड़ेगा और रोड शो में कठिन सवालों का सामना करना पड़ेगा. अछूत होने का मतलब है कि आपके कमरे में आते ही लोग बाहर निकल जाएं. 18 महीनों तक अडानी अछूत थे. अब वह दौर खत्म हो चुका है. ट्रंप के अमेरिका में, जहां लेन-देन आधारित पूंजीवाद तेजी से राजनीतिक और आर्थिक रिश्तों को आकार दे रहा है, इसका बिल्कुल अलग महत्व था.
इसके बाद बाजार से एक और संकेत आया. अमेरिकी समझौतों से ठीक पहले, दुनिया के सबसे बड़े एसेट मैनेजर्स में से एक कैपिटल ग्रुप इंटरनेशनल, (लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर की संपत्तियों का प्रबंधन करता है) ने कथित तौर पर सैकड़ों मिलियन डॉलर की बड़ी खरीद के जरिए अडानी पोर्ट्स में निवेश किया. ये घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि बड़े संस्थागत निवेशक शायद ही कभी आवेग में कदम उठाते हैं. सॉवरेन फंड्स और ट्रिलियन डॉलर एसेट मैनेजर्स सिर्फ बैलेंस शीट नहीं खरीदते, वे जोखिम का गणित खरीदते हैं. और अडानी को लेकर वही जोखिम गणित अब बदलना शुरू हो चुका है.
इसके बाद जो होगा, वह कोई वापसी की कहानी नहीं है. यह री-रेटिंग है.
DOJ मामले के खत्म होने के असली असर टीवी स्क्रीन या राजनीतिक मंचों पर नहीं दिखेंगे. वे वैश्विक वित्त की उस मशीनरी के भीतर चुपचाप सामने आएंगे, जहां कंप्लायंस नोट्स, लेंडिंग मॉडल, इंडेक्स क्लासिफिकेशन एल्गोरिद्म और आंतरिक जोखिम आकलन अरबों डॉलर की दिशा तय करते हैं.
बड़े संस्थानों के भीतर कहीं न कहीं भाषा बदलनी शुरू हो चुकी होगी. “सक्रिय DOJ आपराधिक जोखिम” जैसे संदर्भ आंतरिक मेमो से गायब हो सकते हैं. “Avoid” धीरे-धीरे “Review” में बदल सकता है. “High-risk exposure” अब “Re-entry opportunity” जैसा सुनाई देने लगा है.
ग्रीन फाइनेंसिंग के वे रास्ते, जो कानूनी संकट के दौरान राजनीतिक रूप से मुश्किल हो गए थे, फिर से खुल सकते हैं. वे वैश्विक लेंडर्स, जो पहले प्रतिष्ठा संबंधी प्रीमियम मांगते थे, दोबारा प्रतिस्पर्धा शुरू कर सकते हैं. जो रणनीतिक साझेदारियां रुक गई थीं, वे चुपचाप फिर शुरू हो सकती हैं.
पिछले डेढ़ साल तक अडानी को लेकर दुनिया का सबसे बड़ा सवाल बेहद सीधा था:
क्या यह समूह इससे बच पाएगा?
अब वह सवाल शायद पीछे छूट जाए.
नया सवाल यह है:
समूह अब कितनी आक्रामक तरीके से फिर विस्तार कर सकता है?
इस सवाल का जवाब इसलिए अहम है क्योंकि अडानी साम्राज्य भारत की व्यापक आर्थिक महत्वाकांक्षाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है. व्यापार प्रवाह संभालने वाले बंदरगाह, बड़े शहरों को जोड़ने वाले एयरपोर्ट, औद्योगिक विकास को ऊर्जा देने वाले ट्रांसमिशन नेटवर्क, ऊर्जा परिवर्तन को आगे बढ़ाने वाले रिन्यूएबल एनर्जी कॉरिडोर, और मैन्युफैक्चरिंग विस्तार को सहारा देने वाले लॉजिस्टिक्स सिस्टम, ये कोई परिधीय परिसंपत्तियां नहीं हैं. ये भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर भविष्य के केंद्र के बेहद करीब स्थित हैं.
यही वजह है कि अडानी की पूंजी लागत के साथ क्या होता है, इसका महत्व सिर्फ एक अरबपति से कहीं आगे तक जाता है.
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सभी साये खत्म हो गए हैं. हिंडनबर्ग के आरोप अब भी संस्थागत स्मृति में मौजूद हैं. गवर्नेंस को लेकर चिंताएं वैश्विक स्तर पर समूह का पीछा करती रहेंगी. ऑफशोर संरचनाओं, पारदर्शिता और राजनीतिक निकटता को लेकर सवाल खत्म नहीं होने वाले. गंभीर निवेशक बेहतर खुलासों और अधिक साफ-सुथरी गवर्नेंस छवि की मांग जारी रखेंगे. समूह को लेकर राजनीतिक जोखिम की धारणा भी कुछ संस्थागत दायरों में बनी रहेगी.
लेकिन जांच के दायरे में होना और अछूत होना एक जैसी चीजें नहीं हैं:
एक स्थिति अब भी पूंजी तक पहुंच देती है. दूसरी उसका दम घोंट देती है.
और यही बदलाव अब ट्रंप के अमेरिका में गौतम अडानी को लेकर दिखाई दे रहा है. बाजार यह नहीं पूछते कि कोई कारोबारी कभी राजनीतिक रूप से विवादित था या नहीं. वे यह पूछते हैं कि क्या जोखिम की कीमत दोबारा तय की गई है. गौतम अडानी के लिए, वह री-प्राइसिंग अब शुरू हो चुकी है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
रुपये की कमजोरी और महंगे कच्चे तेल का असर सीधे महंगाई पर पड़ सकता है. तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ने का खतरा रहता है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रुपये में कमजोरी लगातार गहराती जा रही है. बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले पहली बार 96 के स्तर से नीचे फिसल गया और शुरुआती कारोबार में 96.89 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और मजबूत अमेरिकी डॉलर ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है. पिछले कुछ कारोबारी सत्रों में आई तेज गिरावट ने बाजार और निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है.
लगातार पांचवें सत्र में कमजोर हुआ रुपया
मंगलवार को रुपया 96.53 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था, जबकि बुधवार को इसकी शुरुआत 96.86 के स्तर पर हुई. कारोबार के दौरान रुपया 96.89 तक फिसल गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है. पिछले पांच कारोबारी सत्रों में भारतीय मुद्रा करीब 1 रुपये तक कमजोर हो चुकी है, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव साफ दिखाई दे रहा है.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का बड़ा असर
रुपये पर सबसे ज्यादा दबाव कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है और बुधवार को यह करीब 111 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा.
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता के कारण तेल बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है, इसलिए तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है.
स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज को लेकर बढ़ी चिंता
वैश्विक बाजारों में स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज को लेकर चिंता बढ़ गई है. यह दुनिया का बेहद अहम समुद्री मार्ग है, जहां से लगभग 20% वैश्विक तेल सप्लाई गुजरती है. अगर इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा आती है, तो वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है. इसी आशंका के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है.
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और मजबूत डॉलर का असर
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और वैश्विक अनिश्चितता के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं. इससे डॉलर मजबूत हो रहा है और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है. भारतीय रुपया भी इसी वैश्विक दबाव का सामना कर रहा है, जिसके चलते विदेशी निवेशकों की सतर्कता बढ़ी हुई है.
पहले भी उछल चुकी हैं तेल कीमतें
इससे पहले 30 अप्रैल को ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, जबकि 9 मार्च को पश्चिम एशिया तनाव बढ़ने के बाद इसमें 27% तक की तेजी दर्ज की गई थी. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो तेल कीमतों और रुपये दोनों पर दबाव बना रह सकता है.
महंगाई बढ़ने का खतरा
रुपये की कमजोरी और महंगे कच्चे तेल का असर सीधे महंगाई पर पड़ सकता है. तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत बढ़ने का खतरा रहता है. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार और Reserve Bank of India के सामने महंगाई नियंत्रित करने की चुनौती और बढ़ सकती है.
यह वार्षिक समीक्षा प्रक्रिया राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के तहत नेशनल अकाउंट्स डिवीजन (NAD) द्वारा आयोजित की जा रही है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के आर्थिक आंकड़ों को अधिक सटीक और तुलनात्मक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) 20 मई से 19 जून 2026 तक देशभर के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ संयुक्त समीक्षा बैठकें करेगा. इस प्रक्रिया का उद्देश्य राज्य घरेलू उत्पाद (SDP) और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के आंकड़ों में अंतर को दूर करना और राष्ट्रीय आर्थिक डेटा में बेहतर तालमेल सुनिश्चित करना है.
चार चरणों में होंगी बैठकें
यह वार्षिक समीक्षा प्रक्रिया राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के तहत नेशनल अकाउंट्स डिवीजन (NAD) द्वारा आयोजित की जा रही है. नई दिल्ली स्थित खुर्शीद लाल भवन में चार चरणों में अलग-अलग राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ बैठकें होंगी. पहला चरण 20 से 22 मई तक चलेगा, जबकि अन्य बैठकें 3 से 5 जून, 10 से 12 जून और 17 से 19 जून के बीच आयोजित की जाएंगी.
GSDP आंकड़ों में सुधार पर रहेगा फोकस
इस वर्ष की चर्चा का मुख्य फोकस संशोधित आधार वर्ष 2022-23 के तहत 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के चालू कीमतों पर आधारित GSDP आंकड़ों पर रहेगा. बैठकों में विभिन्न सेक्टरों के लिए नई पद्धतियों, संशोधित अनुमान तकनीकों और नए डेटा स्रोतों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी, ताकि राज्यों के आर्थिक उत्पादन का अधिक सटीक आकलन किया जा सके.
राज्यों और केंद्र के बीच होगा तालमेल
इन बैठकों में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी निदेशालय (DES) के अधिकारी शामिल होंगे. अंतिम चरण में वरिष्ठ अधिकारी अनुमान संशोधन और आंकड़ों के सामंजस्य को अंतिम रूप देंगे. सरकार का मानना है कि एकरूप और तुलनात्मक आर्थिक आंकड़े नीति निर्माण और वित्तीय योजना को अधिक प्रभावी बनाने में मदद करेंगे.
वित्तीय योजना और नीति निर्माण में अहम भूमिका
MoSPI के अनुसार, इस प्रक्रिया से तैयार होने वाले तुलनात्मक SDP आंकड़ों का इस्तेमाल वित्त आयोग, वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) जैसी संस्थाएं करती हैं. इसके अलावा यह डेटा अंतर-सरकारी वित्तीय हस्तांतरण, सार्वजनिक खर्च के मूल्यांकन और व्यापक आर्थिक योजना तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
डेटा पारदर्शिता पर सरकार का जोर
सरकार लगातार आर्थिक आंकड़ों की सटीकता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाने पर जोर दे रही है. बदलते आर्थिक ढांचे और नई मापन प्रणालियों के बीच यह वार्षिक समीक्षा प्रक्रिया राष्ट्रीय खातों में एकरूपता बनाए रखने के लिए अहम मानी जा रही है.
यह साझेदारी भारत और डेनमार्क के संबंधों का अहम आधार बन चुकी है, जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास पर खास फोकस किया गया है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नॉर्डिक समिट के दौरान नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में डेनमार्क की कार्यवाहक प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के साथ द्विपक्षीय बैठक की. इस दौरान दोनों देशों ने भारत-डेनमार्क ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को और मजबूत बनाने पर सहमति जताई. बातचीत में ग्रीन ट्रांजिशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रक्षा सहयोग, स्टार्टअप, टेक्नोलॉजी और क्लीन एनर्जी जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई.
ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को मिला बढ़ावा
बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने 2020 में शुरू हुई भारत-डेनमार्क ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप की प्रगति की समीक्षा की. दोनों पक्षों ने सस्टेनेबिलिटी, क्लाइमेट एक्शन और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में बढ़ते सहयोग पर संतोष जताया. यह साझेदारी भारत और डेनमार्क के संबंधों का अहम आधार बन चुकी है, जिसमें रिन्यूएबल एनर्जी, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास पर खास फोकस किया गया है.
AI, टेक्नोलॉजी और डिफेंस सेक्टर पर जोर
दोनों देशों ने उभरती तकनीकों, एडवांस कम्युनिकेशन, रिसर्च कोलैबोरेशन, स्टार्टअप इकोसिस्टम और अकादमिक एक्सचेंज को और मजबूत करने पर सहमति जताई. इसके अलावा रक्षा सहयोग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाने पर चर्चा हुई.
डेनिश कंपनियों को GIFT City में निवेश का न्योता
प्रधानमंत्री मोदी ने डेनमार्क की कंपनियों को भारत में निवेश बढ़ाने और गुजरात स्थित गिफ्ट सिटी में अवसर तलाशने का आमंत्रण दिया. उन्होंने कहा कि भारत तेजी से ग्रीन इकोनॉमी की दिशा में आगे बढ़ रहा है और देश टिकाऊ एवं पर्यावरण-अनुकूल समाधानों के लिए डेनमार्क की तकनीक और विशेषज्ञता का स्वागत करने को तैयार है.
नदी सफाई और जल प्रबंधन पर भी चर्चा
बैठक में जल प्रबंधन और नदी सफाई तकनीकों पर भी विशेष चर्चा हुई. दोनों नेताओं ने वाराणसी में चल रही “स्मार्ट लेबोरेटरी ऑन क्लीन रिवर्स” पहल की सराहना की. यह परियोजना भारत सरकार, डेनमार्क सरकार और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) के सहयोग से चलाई जा रही है. इसका उद्देश्य नई जल और नदी सफाई तकनीकों का विकास करना है.
वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी हुई बातचीत
दोनों नेताओं ने वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी विचार साझा किए. प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में डेनमार्क की गैर-स्थायी सदस्यता के लिए शुभकामनाएं भी दीं.
भारत-डेनमार्क संबंधों को नई दिशा
ओस्लो में हुई यह बैठक इस बात का संकेत मानी जा रही है कि भारत और डेनमार्क भविष्य में ग्रीन टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, क्लाइमेट एक्शन और रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
रेलवे ने जम्मू-श्री माता वैष्णो देवी कटड़ा रेल सेक्शन के लिए ₹238 करोड़ के सुरक्षा पैकेज को मंजूरी दी है. इस प्रोजेक्ट के तहत भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा, टनलों के पुनर्वास, पानी के रिसाव को रोकने और संवेदनशील पुलों की मजबूती पर काम किया जाएगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रेलवे ने देश के रेल नेटवर्क को अधिक सुरक्षित, तेज और आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. दरअसल, रेलवे ने ₹2193 करोड़ की लागत वाली तीन अहम परियोजनाओं को मंजूरी दी है. इनमें जम्मू-श्री माता वैष्णो देवी कटड़ा रेल रूट की सुरक्षा मजबूत करने, हावड़ा-दिल्ली कॉरिडोर की क्षमता बढ़ाने और चेन्नई उपनगरीय नेटवर्क में भीड़ कम करने से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं. रेलवे का मानना है कि इन योजनाओं से यात्रियों की सुविधा बढ़ने के साथ माल ढुलाई और औद्योगिक कनेक्टिविटी को भी मजबूती मिलेगी.
वैष्णो देवी कटड़ा रूट को सुरक्षित बनाने पर फोकस
रेलवे ने जम्मू-श्री माता वैष्णो देवी कटड़ा रेल सेक्शन के लिए ₹238 करोड़ के सुरक्षा पैकेज को मंजूरी दी है. इस प्रोजेक्ट के तहत भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा, टनलों के पुनर्वास, पानी के रिसाव को रोकने और संवेदनशील पुलों की मजबूती पर काम किया जाएगा.
कटड़ा रूट देश के सबसे चुनौतीपूर्ण पहाड़ी रेल मार्गों में गिना जाता है, जहां खराब मौसम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां अक्सर परिचालन में बाधा बनती हैं. हर साल लाखों श्रद्धालु इस मार्ग से वैष्णो देवी धाम पहुंचते हैं, इसलिए इस रूट को और सुरक्षित बनाना रेलवे की प्राथमिकता माना जा रहा है.
हावड़ा-दिल्ली कॉरिडोर को मिलेगी नई रफ्तार
रेलवे ने बिहार के क्यूल-झाझा सेक्शन पर तीसरी रेल लाइन बिछाने के लिए ₹962 करोड़ की परियोजना को भी मंजूरी दी है. यह नई लाइन करीब 54 किलोमीटर लंबी होगी. फिलहाल इस रूट की डबल लाइन अपनी क्षमता से अधिक ट्रैफिक संभाल रही है, जिससे ट्रेनों की लेटलतीफी बढ़ रही है. तीसरी लाइन बनने के बाद यात्री और मालगाड़ियों दोनों का संचालन अधिक सुचारु हो सकेगा. यह कॉरिडोर कोलकाता और हल्दिया बंदरगाहों को उत्तर भारत तथा नेपाल से जोड़ने वाला अहम मार्ग माना जाता है. कई थर्मल पावर प्लांट के लिए कोयला सप्लाई भी इसी रूट से होती है.
चेन्नई सबअर्बन नेटवर्क में कम होगी भीड़
तीसरी बड़ी परियोजना तमिलनाडु के अरक्कोनम-चेंगलपट्टू सेक्शन से जुड़ी है. रेलवे इस 68 किलोमीटर लंबे सिंगल लाइन कॉरिडोर को डबल लाइन में बदलेगा, जिस पर करीब ₹993 करोड़ खर्च किए जाएंगे. यह रूट चेन्नई उपनगरीय नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां मौजूदा समय में भारी ट्रैफिक दबाव है. डबल लाइन बनने से लोकल ट्रेनों की संख्या बढ़ेगी और यात्रियों का यात्रा समय कम होगा.
यह कॉरिडोर महिंद्रा वर्ल्ड सिटी, श्रीपेरंबुदूर जैसे बड़े औद्योगिक क्षेत्रों को जोड़ता है. प्रस्तावित परंदूर एयरपोर्ट के लिए भी यह रेल नेटवर्क महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
माल ढुलाई और उद्योगों को मिलेगा फायदा
रेल मंत्रालय का कहना है कि इन परियोजनाओं से सीमेंट, ऑटोमोबाइल, खाद्यान्न, लोहा और इस्पात जैसे सेक्टर्स की माल ढुलाई में तेजी आएगी. बेहतर रेल कनेक्टिविटी से लॉजिस्टिक्स लागत घटेगी और उद्योगों को सप्लाई चेन मजबूत करने में मदद मिलेगी. रेल मंत्री अश्विनी वैषणव के मुताबिक ये प्रोजेक्ट देश के रेल नेटवर्क को अधिक भरोसेमंद, सुरक्षित और भविष्य के ट्रैफिक के लिए तैयार बनाने की दिशा में अहम कदम हैं.
रेलवे का इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार जारी
भारतीय रेलवे पिछले कुछ वर्षों में हाई-स्पीड कॉरिडोर, नई लाइनों, स्टेशन आधुनिकीकरण और सुरक्षा परियोजनाओं पर तेजी से निवेश बढ़ा रहा है. सरकार का फोकस ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर पर है, जो यात्रियों की सुविधा बढ़ाने के साथ देश की आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियों को भी नई गति दे सके.
मंगलवार को सेंसेक्स 114.19 अंक यानी 0.15% की गिरावट के साथ 75,200.85 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 31.95 अंक यानी 0.14% गिरकर 23,618 के स्तर पर आ गया.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में 19 मई को पूरे दिन तेजी का माहौल बना रहा, लेकिन कारोबार के आखिरी घंटे में अचानक आई बिकवाली ने निवेशकों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. बैंकिंग और मेटल शेयरों में दबाव, रुपये की रिकॉर्ड कमजोरी और वैश्विक तनावों ने बाजार का मूड बिगाड़ दिया. अब 20 मई को निवेशकों की नजर ग्लोबल मार्केट संकेतों, कच्चे तेल की चाल और कंपनियों के तिमाही नतीजों पर रहेगी, जो बाजार की अगली दिशा तय कर सकते हैं.
शुरुआती तेजी के बाद बाजार में पलटा रुख
कल बाजार की शुरुआत सकारात्मक ग्लोबल संकेतों के बीच मजबूत रही. बीएसई सेंसेक्स में कारोबार के दौरान 400 अंक से अधिक की तेजी देखने को मिली, जबकि एनएसई निफ्टी 23,700 के स्तर को पार कर गया था. हालांकि अंतिम घंटे में बिकवाली हावी हो गई और पूरा बढ़त वाला बाजार गिरावट में बदल गया. बाजार बंद होने पर सेंसेक्स 114.19 अंक यानी 0.15% की गिरावट के साथ 75,200.85 पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 31.95 अंक यानी 0.14% गिरकर 23,618 के स्तर पर आ गया. सेंसेक्स के 30 में से 18 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए, जिससे बाजार पर दबाव बढ़ गया.
किन शेयरों में रही सबसे ज्यादा हलचल
बैंकिंग और ऑटो सेक्टर के कई दिग्गज शेयरों में गिरावट देखने को मिली. कोटक महिंद्रा बैंक में 2.31% की सबसे बड़ी गिरावट, टाइटन, अल्ट्राटेक सीमेंट, भारती एयरटेल, सन फार्मा, अडानी पोर्ट्स, इंडिगो और हिंदुस्तान यूनिलीवर में भी कमजोरी दिखी. दूसरी ओर आईटी सेक्टर ने बाजार को कुछ सहारा दिया, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, टेक महिंद्रा, टीसीएस और इटरनल में 2% से अधिक तेजी दिखी.
कच्चे तेल में गिरावट का असर
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिली. ब्रेंट क्रूड करीब 1.89% गिरकर 110 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया. मध्य पूर्व में तनाव कम होने की उम्मीदों और अमेरिका के बयान के बाद तेल बाजार में नरमी देखी गई.
आज इन शेयरों पर रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज यानी 20 मई 2026 को शेयर बाजार में वैश्विक कमजोर संकेतों के बीच दबाव देखने को मिल सकता है और निवेशकों की नजर कई प्रमुख शेयरों पर रहेगी. महंगाई और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से ग्लोबल मार्केट सेंटीमेंट कमजोर बना हुआ है. अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण एशियाई बाजारों में गिरावट दर्ज की गई, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ सकता है. ऐसे माहौल में BPCL, कर्नाटक बैंक, हिंदाल्को, मैनकाइंड फार्मा और JSW एनर्जी जैसे शेयर निवेशकों के फोकस में रहेंगे.
BPCL ने मार्च 2026 तिमाही में ₹3,191 करोड़ का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया, जो सालाना आधार पर 1% कम रहा, जबकि कंपनी का रेवेन्यू 6.3% बढ़कर ₹1.34 लाख करोड़ पहुंच गया. वहीं कर्नाटक बैंक का मुनाफा 61.7% बढ़कर ₹408 करोड़ हो गया और नेट इंटरेस्ट इनकम में भी 8% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
हिंदाल्को की सहयोगी कंपनी नोवेलिस को अमेरिकी प्लांट में आग लगने के कारण 84 मिलियन डॉलर का घाटा हुआ, हालांकि कंपनी की बिक्री बढ़ी है. दूसरी ओर मैनकाइंड फार्मा का शुद्ध मुनाफा 31.7% बढ़कर ₹554 करोड़ पहुंच गया और कंपनी का रेवेन्यू भी मजबूत रहा.
इसके अलावा JSW एनर्जी ने Toshiba JSW Power Systems में अतिरिक्त हिस्सेदारी खरीदने के लिए ₹150 करोड़ का समझौता किया है. कंपनी का कहना है कि इससे थर्मल पावर कारोबार और सप्लाई चेन को मजबूती मिलेगी. वहीं गोदावरी पावर, ऑर्कला इंडिया, PTC इंडिया और सुला वाइनयार्ड्स से जुड़ी खबरें भी बाजार में हलचल पैदा कर सकती हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
BPCL का शुद्ध लाभ मार्च तिमाही में ₹3,191 करोड़ रहा, जो पिछली तिमाही के मुकाबले करीब 58% कम है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के मार्च 2026 तिमाही नतीजे कमजोर रहे. कंपनी का शुद्ध मुनाफा तिमाही-दर-तिमाही आधार पर करीब 57.7% गिरकर ₹3,191 करोड़ रह गया. तेल बाजार में उतार-चढ़ाव, असाधारण खर्चों में बढ़ोतरी और LPG पर लगातार नुकसान ने कंपनी की कमाई पर बड़ा दबाव डाला. हालांकि सालाना आधार पर मुनाफे में मामूली गिरावट दर्ज हुई.
तिमाही मुनाफे में बड़ी गिरावट
BPCL का शुद्ध लाभ मार्च तिमाही में ₹3,191 करोड़ रहा, जो पिछली तिमाही के मुकाबले करीब 58% कम है. सालाना आधार पर भी कंपनी के मुनाफे में लगभग 1% की हल्की गिरावट दर्ज की गई है. पिछले साल इसी अवधि में कंपनी का मुनाफा ₹3,214 करोड़ था, जो अब घटकर लगभग स्थिर स्तर पर आ गया है.
असाधारण खर्चों ने बढ़ाया दबाव
मुनाफे में तेज गिरावट की मुख्य वजह असाधारण खर्चों में बढ़ोतरी रही. यह नुकसान BPCL की अपस्ट्रीम सहायक कंपनी भारत पेट्रो रिसोर्सेज लिमिटेड से जुड़े इम्पेयरमेंट लॉस के कारण हुआ. इसी वजह से कंपनी का तिमाही प्रदर्शन बाजार उम्मीदों से कमजोर रहा.
रेवेन्यू में बढ़ोतरी, लेकिन मार्जिन दबाव में
रिपोर्टिंग तिमाही में BPCL का ऑपरेशनल रेवेन्यू बढ़कर ₹1,34,896 करोड़ हो गया, जो पिछले साल ₹1,26,864 करोड़ था. हालांकि तिमाही-दर-तिमाही आधार पर इसमें 1.2% की गिरावट देखी गई. EBITDA भी 13.8% घटकर ₹10,061 करोड़ पर आ गया, जबकि मार्जिन 100 बेसिस प्वाइंट घटकर 8.5% रह गया.
रिफाइनिंग और बिक्री का प्रदर्शन
कंपनी की रिफाइनरी थ्रूपुट 10.40 MMT रही, जो पिछले साल 10.58 MMT से कम है. घरेलू बिक्री में हालांकि 3.28% की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 13.86 MMT पर पहुंच गई. विश्लेषकों का अनुमान था कि मजबूत रिफाइनिंग मार्जिन से कंपनियों को फायदा होगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका.
LPG सब्सिडी से बढ़ा घाटा
BPCL ने बताया कि घरेलू LPG सिलेंडरों की बिक्री पर कंपनी को लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है. क्योंकि बिक्री मूल्य और वास्तविक लागत के बीच अंतर बना हुआ है, जिससे मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है.
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और ग्लोबल असर
जनवरी-मार्च अवधि में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 94% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई. मध्य पूर्व में तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष के चलते वैश्विक सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ी. होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी आपूर्ति चिंताओं ने भी तेल बाजार को प्रभावित किया.
सालाना आधार पर मजबूत प्रदर्शन
कमजोर तिमाही के बावजूद BPCL का पूरे वित्त वर्ष FY26 में प्रदर्शन बेहतर रहा. कंपनी का कंसोलिडेटेड रेवेन्यू ₹5.22 लाख करोड़ रहा, जो FY25 के ₹5 लाख करोड़ से अधिक है. नेट प्रॉफिट भी बढ़कर ₹23,303 करोड़ पहुंच गया, जो पिछले साल ₹13,275 करोड़ था.
तिमाही आधार पर BPCL के नतीजे कमजोर रहे, लेकिन सालाना स्तर पर कंपनी ने मजबूत ग्रोथ दिखाई. तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव, LPG सब्सिडी दबाव और असाधारण नुकसान ने इस तिमाही के प्रदर्शन को प्रभावित किया, जबकि रिफाइनिंग और डिमांड स्थिरता ने कुछ राहत दी.
देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 4 रुपये प्रति लीटर तक का इजाफा किया गया है. इससे ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ने और रोजमर्रा के सामान महंगे होने की आशंका जताई जा रही है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है. पांच दिनों में दूसरी बार ईंधन महंगा होने से महंगाई और घरेलू बजट पर असर की आशंका बढ़ गई है. हालांकि, SBI की ताजा रिपोर्ट बताती है कि यह फैसला सिर्फ कीमत बढ़ाने का नहीं, बल्कि तेल कंपनियों को भारी घाटे से बचाने की मजबूरी भी था. रिपोर्ट के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे कच्चे तेल और स्थिर खुदरा कीमतों के कारण तेल कंपनियां रोजाना करीब 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान झेल रही थीं.
पांच दिन में दूसरी बार बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम
देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 4 रुपये प्रति लीटर तक का इजाफा किया गया है. इससे ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ने और रोजमर्रा के सामान महंगे होने की आशंका जताई जा रही है. आम उपभोक्ताओं पर इसका सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि ईंधन की कीमतें लगभग हर सेक्टर की लागत से जुड़ी होती हैं.
SBI रिपोर्ट में सामने आई असली वजह
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की ‘इकोरैप’ रिपोर्ट के मुताबिक तेल कंपनियों को लंबे समय से भारी वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ रहा था. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई थीं, जबकि घरेलू खुदरा कीमतों में लंबे समय तक बदलाव नहीं किया गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वजह से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को हर दिन करीब 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था. सालाना आधार पर यह घाटा करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी कंपनियों के नुकसान को कुछ हद तक कम करने के लिए जरूरी मानी गई.
महंगाई पर पड़ेगा असर
रिपोर्ट के मुताबिक पेट्रोल-डीजल महंगा होने से मई और जून 2026 में खुदरा महंगाई दर यानी CPI में 0.15 से 0.20 फीसदी तक का उछाल आ सकता है. इसी के चलते वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 4.7 फीसदी कर दिया गया है.
हालांकि रिपोर्ट यह भी कहती है कि शुरुआती दौर में लोग ईंधन की खपत कम करते हैं, लेकिन कुछ समय बाद मांग दोबारा सामान्य स्तर पर लौट आती है. यानी लंबे समय में बिक्री पर बहुत बड़ा असर देखने को नहीं मिलता.
3 रुपये की बढ़ोतरी से कितनी राहत?
SBI के मुताबिक हालिया कीमत बढ़ोतरी से तेल कंपनियों को करीब 52,700 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राहत मिल सकती है. हालांकि यह राशि उनके अनुमानित कुल नुकसान का केवल 15 फीसदी हिस्सा ही कवर कर पाएगी, यानी मौजूदा बढ़ोतरी से कंपनियों पर दबाव कुछ कम जरूर होगा, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होगा.
टैक्स घटाने पर सरकार को होगा भारी नुकसान
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अगर सरकार जनता को राहत देने के लिए एक्साइज ड्यूटी में बड़ी कटौती करती है, तो इसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ेगा. फिलहाल पेट्रोल पर 11.9 फीसदी और डीजल पर 7.8 फीसदी एक्साइज ड्यूटी लगती है. अगर इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाए, तो सरकार को करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता है. इससे राजकोषीय घाटा GDP के 0.5 फीसदी तक बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है.
राज्यों की कमाई पर भी पड़ेगा असर
केंद्र सरकार की टैक्स नीति का असर राज्यों की कमाई पर भी पड़ता है. SBI के अनुमान के अनुसार, अगर केंद्र एक्साइज ड्यूटी शून्य कर देता है, तो राज्यों को करीब 80,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है. हालांकि बढ़ी हुई ईंधन कीमतों से राज्यों को वैट के जरिए अतिरिक्त आय भी मिलेगी. इसके बावजूद राज्यों का कुल शुद्ध नुकसान करीब 50,000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है.
आम आदमी के लिए क्या मायने?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. हालांकि सरकार और तेल कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि एक तरफ उपभोक्ताओं को राहत दी जाए और दूसरी तरफ कंपनियों तथा सरकारी वित्तीय संतुलन को भी बनाए रखा जाए.
कंपनी का कहना है कि नई फंडिंग के जरिए वह अपनी ब्रोकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करेगी और युवा निवेशकों के लिए नए फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स तैयार करेगी.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के युवा निवेशकों को ध्यान में रखकर बनाई गई इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म ट्रैक (Trackk) ने सीड फंडिंग राउंड में 3.7 मिलियन डॉलर जुटाए हैं. इस फंडिंग राउंड की अगुवाई Lightspeed ने की, जबकि Info Edge Ventures और कई चर्चित एंजेल निवेशकों ने भी इसमें हिस्सा लिया. कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल अपनी ब्रोकिंग टेक्नोलॉजी मजबूत करने, नए प्रोडक्ट्स विकसित करने और यूजर बेस बढ़ाने में करेगी.
Lightspeed और बड़े एंजेल निवेशकों का मिला साथ
मुंबई और बेंगलुरुस की स्टार्टअप कंपनी Trackk में Lightspeed के अलावा Info Edge Ventures ने भी निवेश किया है. वहीं एंजेल निवेशकों में गौरव मुंजाल, रोमन सैनी, तनमय भट्ट, वरुण मय्या और गौरव कपूर जैसे नाम शामिल हैं.
कंपनी का कहना है कि नई फंडिंग के जरिए वह अपनी ब्रोकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करेगी और युवा निवेशकों के लिए नए फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स तैयार करेगी. इसके अलावा ग्राहक ऑनबोर्डिंग, यूजर एक्विजिशन और टीम विस्तार पर भी फोकस किया जाएगा.
Gen Z निवेशकों के लिए बनाया गया प्लेटफॉर्म
Trackk की स्थापना वेदांत गुप्ते, सिद्धार्थ ठक्कर और आर्यन जैन ने की है. यह प्लेटफॉर्म खासतौर पर Gen Z यानी युवा निवेशकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. कंपनी AI आधारित स्टॉक डिस्कवरी, पर्सनलाइज्ड यूजर एक्सपीरियंस और आसान निवेश टूल्स के जरिए पहली बार निवेश करने वालों के लिए निवेश प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिश कर रही है.
“युवा निवेशकों की जरूरतें बदल चुकी हैं”
Trackk के को-फाउंडर और CEO वेदांत गुप्ते ने कहा कि आज के युवा निवेशक पहले की पीढ़ियों से अलग तरीके से वित्तीय जानकारी हासिल करते हैं. अब निवेश से जुड़ी जानकारी डिजिटल कम्युनिटी, क्रिएटर्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए तेजी से पहुंच रही है, लेकिन निवेश करने का अनुभव अब भी नए यूजर्स के लिए काफी जटिल है. उन्होंने कहा कि Trackk का मकसद युवा भारतीयों के लिए निवेश को आसान, सहज और ज्यादा सुलभ बनाना है.
“नई पीढ़ी के निवेशकों के लिए अलग सोच जरूरी”
Lightspeed के निवेशक रोमित मेहता ने कहा कि नई पीढ़ी का फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स के साथ रिश्ता पहले की तुलना में पूरी तरह बदल चुका है. Trackk की टीम युवा यूजर्स के व्यवहार को अच्छी तरह समझती है और उसी के अनुरूप प्रोडक्ट तैयार कर रही है. वहीं, Info Edge Ventures के पार्टनर चिन्मय शर्मा ने कहा कि युवा भारतीयों को ऐसे निवेश प्लेटफॉर्म्स की जरूरत है, जो उन्हें सही वित्तीय फैसले लेने और लंबे समय में संपत्ति बनाने में मदद करें.
Gen Z यूजर्स में तेजी से बढ़ रही लोकप्रियता
कंपनी के मुताबिक उसके करीब 90 फीसदी यूजर्स Gen Z कैटेगरी से आते हैं और प्लेटफॉर्म पर औसत यूजर की उम्र 20 से 24 साल के बीच है. Trackk भविष्य में मल्टी-एसेट फाइनेंशियल प्लेटफॉर्म बनाने की दिशा में काम कर रही है, जिसमें निवेश, वेल्थ क्रिएशन और अन्य वित्तीय सेवाएं शामिल होंगी.
भारत के सबसे युवा रजिस्टर्ड ब्रोकर में शामिल
अक्टूबर 2025 में Trackk भारत के सबसे युवा रजिस्टर्ड ब्रोकर्स में शामिल बनी थी. उस दौरान बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO सुंदररमन आर ने कंपनी को सम्मानित भी किया था.
एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का आइसक्रीम बाजार 2026 से 2034 के बीच करीब 16 फीसदी की CAGR से बढ़ सकता है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में बढ़ती गर्मी, बदलती लाइफस्टाइल और क्विक-कॉमर्स के तेजी से विस्तार ने आइसक्रीम कारोबार को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है. देश का आइसक्रीम बाजार अब सिर्फ गर्मियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह रोजमर्रा की लाइफस्टाइल का हिस्सा बनता जा रहा है. इसी तेजी से बढ़ते बाजार में अब अनंत अंबानी की एंट्री ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है. अनुमान है कि आने वाले कुछ वर्षों में भारत का आइसक्रीम कारोबार 1 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर सकता है. दरअसल, अनंत अंबानी ने हाल ही में अपना आइसक्रीम ब्रांड वंतारा क्रीमैरी (Vantara Creamery) लॉन्च किया है, जिससे इस कारोबार में तेजी की उम्मीद जताई जा रही है.
5 साल में दोगुना हुआ आइसक्रीम बाजार
देश में आइसक्रीम इंडस्ट्री ने पिछले पांच वर्षों में जबरदस्त ग्रोथ दर्ज की है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2020 में भारत का आइसक्रीम बाजार करीब 14,800 करोड़ रुपये का था, जो 2025 में बढ़कर 31,276 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. यानी महज पांच साल में यह कारोबार दोगुने से ज्यादा हो गया. विशेषज्ञों का मानना है कि अगले पांच वर्षों में भी यही रफ्तार बनी रह सकती है. अनुमान है कि 2030 तक भारत का आइसक्रीम बाजार 65,780 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा.
2034 तक 1.19 लाख करोड़ रुपये का होगा कारोबार
रिपोर्ट के अनुसार, भारत का आइसक्रीम बाजार 2026 से 2034 के बीच करीब 16 फीसदी की CAGR से बढ़ सकता है. इसी रफ्तार से आगे बढ़ते हुए 2034 तक यह इंडस्ट्री 1.19 लाख करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंचने का अनुमान है. इस तेज ग्रोथ के पीछे कई बड़े कारण हैं. इनमें बढ़ती डिस्पोजेबल इनकम, तेजी से हो रहा शहरीकरण, क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स का विस्तार, टियर-2 और टियर-3 शहरों में बढ़ती मांग और मजबूत कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं.
अब सिर्फ मौसमी नहीं रहा आइसक्रीम कारोबार
पहले आइसक्रीम को सिर्फ गर्मियों का प्रोडक्ट माना जाता था, लेकिन अब यह पूरे साल पसंद की जाने वाली फूड कैटेगरी बन चुकी है. ऑनलाइन डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स और क्विक-कॉमर्स कंपनियों ने इसकी पहुंच को काफी आसान बना दिया है. किराना दुकानों और लोकल स्टोर्स पर फ्रीजर नेटवर्क के विस्तार ने भी आइसक्रीम कंपनियों की बिक्री बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है.
इंपल्स आइसक्रीम का सबसे ज्यादा दबदबा
बाजार में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी इंपल्स आइसक्रीम सेगमेंट की है. 2025 में इसकी हिस्सेदारी करीब 59.62 फीसदी रही. चलते-फिरते आइसक्रीम खाने का बढ़ता ट्रेंड और हर जगह इसकी आसान उपलब्धता इसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है.
फ्लेवर की बात करें तो चॉकलेट फ्लेवर सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है. कुल बाजार में इसकी हिस्सेदारी 31.05 फीसदी है. इसके बाद वनीला 28.42 फीसदी और फ्रूट फ्लेवर 24.63 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं.
महाराष्ट्र सबसे बड़ा बाजार
राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र देश का सबसे बड़ा आइसक्रीम बाजार बनकर उभरा है. कुल कारोबार में इसकी हिस्सेदारी करीब 12 फीसदी है. मुंबई और पुणे जैसे बड़े शहरों में प्रीमियम और ब्रांडेड आइसक्रीम की मजबूत मांग इसकी प्रमुख वजह मानी जा रही है. इसके अलावा महाराष्ट्र का मजबूत कोल्ड-चेन नेटवर्क भी इस सेक्टर की ग्रोथ को बढ़ावा दे रहा है.
PLI स्कीम से मिल रही सरकारी मदद
भारत सरकार भी फूड प्रोसेसिंग सेक्टर को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है. PLI स्कीम के तहत फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के आधुनिकीकरण के लिए करीब 10,900 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना हुआ है. 2023-24 में देश में करीब 236.35 मिलियन मीट्रिक टन दूध का उत्पादन हुआ. यही मजबूत डेयरी बेस आइसक्रीम उद्योग को सस्ता और स्थिर कच्चा माल उपलब्ध कराने में मदद कर रहा है.
अनंत अंबानी की एंट्री से बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
मुकेश अंबानी के परिवार की ओर से लॉन्च की गई वंतारा क्रीमैरी (Vantara Creamery) अब इस तेजी से बढ़ते बाजार में नई चुनौती पेश कर सकती है. कंपनी ने 17 फ्लेवर के साथ अपनी शुरुआत की है. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तरह रिलायंस ने कैंपा के जरिए सॉफ्ट ड्रिंक मार्केट में बड़ी कंपनियों को चुनौती दी, उसी तरह आइसक्रीम कारोबार में भी क्वालिटी वॉल्स, क्रीमबेल और बास्किन रॉबिंस जैसी कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है. आने वाले वर्षों में भारत का आइसक्रीम बाजार सिर्फ बड़ा ही नहीं होगा, बल्कि इसमें प्रतिस्पर्धा भी पहले से कहीं ज्यादा तेज दिखाई दे सकती है.