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बादलों की बेरुखी से बड़े संकट की आहट, आपकी जेब होगी ढीली; इस तरह बढ़ेगा खर्चा

पांच अगस्त तक के आंकड़े बताते हैं कि धान का रकबा 272.30 लाख हेक्टेयर है, जो पिछले साल इस अवधि तक 314.14 लाख हेक्टेयर था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

महंगाई के मोर्चे पर आम जनता को एक और झटका लगने वाला है. बड़े पैमाने पर धान की खेती करने वाले राज्यों में मानसून की बेरुखी की वजह से आने वाले दिनों में चावल के दाम बढ़ सकते हैं. यह खबर केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए परेशानी की वजह बन सकती है, क्योंकि भारत विश्व में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है.

मानसून पर निर्भर खेती
भारत कृषि प्रधान है और हमारी खेती मानसून पर निर्भर है. जब भी बारिश कम या ज्यादा होती है, उसका असर खेती पर पड़ता है और इस असर से पूरा देश प्रभावित होता है. अभी कुछ राज्यों में ज़बरदस्त बारिश हुई है, जबकि कुछ अभी भी बादलों के झूमकर बरसने की उम्मीद लगाए बैठे हैं. इनमें वे राज्य भी शामिल हैं, जहां धान की खेती सबसे ज्यादा होती है.

इतना कम हुआ रकबा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कृषि मंत्रालय ने खुद स्वीकार है कि बारिश नहीं होने के चलते धान का रकबा कम हुआ है. पांच अगस्त तक के आंकड़े बताते हैं कि धान का रकबा 272.30 लाख हेक्टेयर है, जो पिछले साल इस अवधि तक 314.14 लाख हेक्टेयर था. दरअसल, मौसम की बेरुखी की वजह से धान की बुवाई नहीं हो रही है. धान के लिए खाफी पानी की ज़रूरत होती है, छोटे मंझोले किसानों के लिए बारिश के अभाव में पानी की व्यवस्था करना संभव नहीं हो पाता. इसलिए खेती बड़े पैमाने पर प्रभावित होती है.

यहां होती है सबसे ज्यादा खेती
बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और तेलंगाना में धान की सबसे ज्यादा खेती होती है. लेकिन इन राज्यों में बदल अभी तक दिल खोलकर नहीं बरसे हैं. मध्य प्रदेश में ज़रूर इन दूसरे राज्यों की अपेक्षा बारिश की स्थिति कुछ बेहतर है. मौसम विभाग के आंकड़े कम बारिश की गवाही दे रहे हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 8 अगस्त तक 36% बारिश कम हुई है और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह 43 प्रतिशत तक है. इसी तरह, बिहार और झारखंड में इस साल अब तक क्रमश: 38% और 45%, पश्चिम बंगाल में 46 प्रतिशत तक बारिश कम हुई है.

ऐसे पड़ेगा दुनिया पर असर
भारत की यह परेशानी, केवल उसकी ही नहीं है, इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा. भारत दुनिया में चावल का सबसे एक्सपोर्टर है और एक अनुमान के मुताबिक, वैश्विक बाजार में उसकी हिस्सेदारी 40 प्रतिशत के आसपास है. ऐसे में यदि यहां चावल की पैदावार प्रभावित होती है, तो इसका मतलब है पूरी दुनिया की प्लेट से चावल गायब या कम हो सकता है. यहां गैर करने वाली बात ये है कि इस साल देश में गेहूं का उत्पादन भी कम हुआ है, जिसकी वजह से आटा महंगा हो गया है और अब चावल के भी महंगा होने के पूरे आसार हैं.

कितना पानी चाहिए?
धान की खेती हमेशा से मुश्किल रही है, क्योंकि इसके लिए बड़े पैमाने पर पानी की ज़रूरत होती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, धान की खेती के लिए प्रति एकड़ करीब 10 हजार क्यूबिक मीटर पानी का इस्तेमाल होता है. किसानों को औसतन धान के सीजन में 15 बार सिंचाई करनी होती है. उनका सबसे ज्यादा पैसा इसी में खर्च होता है. सक्षम किसान बारिश के अभाव में टैकरों से पानी की ज़रूरत पूरा कर लेते हैं, लेकिन छोटे और मंझोले किसानों के लिए यह संभव नहीं हो पता. 
 

 


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