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राष्ट्रीय स्तर पर प्ली बार्गेनिंग और लीगल हेल्थ इंडेक्स की पेशकश, एटॉर्नी जनरल ने दिया प्रस्ताव

वेंकटरमणि ने स्पष्ट किया कि प्ली बार्गेनिंग और लीगल हेल्थ इंडेक्स जैसे उपाय न्याय वितरण को समयबद्ध, पारदर्शी और प्रभावी बनाने में सहायक होंगे. सेमिनार ने भारत में न्याय सुधारों और संस्थागत क्षमता बढ़ाने की दिशा में ठोस सुझाव प्रस्तुत किए हैं, जिससे भविष्य में न्यायिक प्रणाली और अधिक सशक्त और समन्वित बन सके.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 6 months ago

एटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने राष्ट्रीय स्तर पर प्ली बार्गेनिंग (Plea Bargaining) और कानूनी स्वास्थ्य सूचकांक (Legal Health Index) के लिए एक नया ढांचा पेश करने की आवश्यकता जताई है. यह विचार उन्होंने “Delivering Justice in Time: Global Practices and Indian Experiences” सेमिनार के उद्घाटन सत्र में साझा किया, जिसे ओपी जिंदल
ग्लोबल यूनिवर्सिटी और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली ने संयुक्त रूप से आयोजित किया.

प्ली बार्गेनिंग पर राष्ट्रीय प्रोटोकॉल की आवश्यकता

वेंकटरमणि ने कहा कि प्ली बार्गेनिंग अब वैश्विक रूप से अपनाई जा रही है और इसके लिए एक राष्ट्रीय प्रोटोकॉल की आवश्यकता है, जो न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता सुनिश्चित कर सके. उन्होंने बताया कि इस प्रोटोकॉल के माध्यम से न्यायिक पेशेवरों और पीड़ितों दोनों को मार्गदर्शन, सलाह और समर्थन मिलेगा. साथ ही उन्होंने संसाधन प्रबंधन और राज्य की आर्थिक प्रभावशीलता पर जोर दिया, ताकि न्याय प्रशासन में संसाधनों का सही उपयोग हो सके.

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि एक राष्ट्रीय आपराधिक न्याय प्रशासन संस्थान (National Institute for Criminal Justice Administration) की स्थापना हो, जिसमें दैनिक कानूनी प्रदर्शन और न्याय वितरण की निगरानी के लिए एक इंडेक्स हो. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ट्रायल कोर्ट में संसाधनों की बर्बादी कम हो और न्याय प्रक्रिया प्रभावी हो.

लीगल हेल्थ इंडेक्स की भूमिका

एटॉर्नी जनरल ने लीगल हेल्थ इंडेक्स की आवश्यकता पर भी जोर दिया. इसके माध्यम से न्याय प्रक्रिया की आसानी, निवारक और पूर्वानुमान योग्य प्रक्रियाएं, और संसाधनों का निवेश निर्धारित किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि इसका निर्माण केवल शासन संस्थाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके लिए कानून स्कूल और विश्वविद्यालय जिम्मेदार हो सकते हैं. इससे न्याय प्रणाली में बौद्धिक और सामुदायिक सहभागिता भी बढ़ेगी.

न्यायिक पेंडेंसी और सुधारों पर चर्चा

मुख्य वक्ता, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद डॉ. अभिषक एम सिंघवी ने भारत में लंबित मामलों की संख्या और न्यायिक प्रणाली की पेंडेंसी पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि 'ABCD' यानी Access, Backlog, Cost और Delay के मुद्दों का समाधान करना जरूरी है. इसके लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति, मल्टी-ट्रैक केस मैनेजमेंट सिस्टम, पुराने मामलों का त्वरित निपटान, मध्यस्थता को मजबूत करना और ग्राम न्यायालयों को पुनर्जीवित करना आवश्यक है.

साथ ही उन्होंने उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में सेवानिवृत्ति आयु में असमानता पर पुनर्विचार करने और न्याय सुधारों में दीर्घकालिक स्थिरता बनाए रखने की बात कही.

सेमिनार में संस्थागत दृष्टिकोण

ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संस्थापक वाइस-चांसलर प्रोफेसर (डॉ.) सी राज कुमार ने कहा कि न्याय प्रणाली की प्रभावशीलता केवल संवैधानिक डिजाइन या कानूनी सिद्धांतों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि संस्थाओं की क्षमता पर निर्भर करती है कि वे समय पर और निष्पक्ष न्याय प्रदान करें. उन्होंने पांच स्तंभ सुझाए:

1. न्यायिक क्षमता को मजबूत करना
2. प्रक्रियागत सुधार और सक्रिय केस मैनेजमेंट
3. अदालतों में टेक्नोलॉजी और AI का उपयोग
4. प्ली बार्गेनिंग और प्री-ट्रायल मैकेनिज्म का विस्तार
5. डेटा-ड्रिवन न्याय प्रशासन

उन्होंने सेमिनार को पूरे देश में विस्तार देने और न्याय वितरण में सुधार की सामूहिक चेतना पैदा करने का इरादा जताया.

वरिष्ठ अधिवक्ताओं और विशेषज्ञों की भागीदारी

सेमिनार में सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालयों के कई वरिष्ठ अधिवक्ता, प्रोफेसर और विशेषज्ञों ने भाग लिया. प्रमुख सत्रों में शामिल थे:

1. Institutional & Procedural Reforms: Improving Efficiency In Court Systems
2. Technology & Timely Justice: Digital Courts, AI, And Data Governance
3. Plea Bargaining & Pre-Trial Mechanisms: Efficiency Without Compromising Justice

सत्रों में डॉ. पिंकी आनंद, तनवीर अहमद मीर, गीता लूथरा,  शिरीन मोती, प्रो गरिमा तिनारी सहित कई अन्य कानूनी विशेषज्ञों ने विचार साझा किए.

 


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