दरअसल, रिलायंस इंडस्ट्रीज अपने FMCG कारोबार को बढ़ाना चाहती है. इसी के मद्देनजर उसने कैंपा कोला का अधिग्रहण किया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
नई दिल्लीः दौलत के मामले में गौतम अडानी से लगातार पिछड़ते जा रहे मुकेश अंबानी नए-नए सेक्टर्स में हाथ आजमा रहे हैं. वह ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं छोड़ना चाहते, जहां मुनाफे की संभावना नजर आ रही है. अब उन्होंने कोला बाजार में उतरने की तैयारी कर ली है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो रिलायंस ने सॉफ्ट ड्रिंक ब्रांड कैंपा खरीद लिया है. बता दें कि यह वही ब्रांड है, जिसके कैंपा कोला ने किसी जमाने में धूम मचा रखी थी.
22 करोड़ में हुआ सौदा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस ने प्योर ड्रिंक ग्रुप से लगभग 22 करोड़ रुपए में 'कैंपा' को खरीद लिया है. माना जा रहा है कि रिलायंस इस साल दीपावली पर अक्टूबर के महीने में इस ब्रांड को री-लॉन्च कर सकती है. इसी के साथ मुकेश अंबानी की कोला बाजार में एंट्री हो जाएगी. दूसरे शब्दों में कहें तो अंबानी पेप्सी और कोको कोला जैसे कंपनियों को चुनौती देने जा रहे हैं.
3 फ्लेवर्स में होगी लॉन्च
Campa को 3 फ्लेवर्स में री-लॉन्च किया जाएगा. यह आइकॉनिक Campa Cola, लेमन और ऑरेंज फ्लेवर में आएगी. कैंपा ब्रांड को रिलायंस रिटेल के स्टोर्स और लोकल किराना शॉप्स के जरिए बेचा जाएगा. बता दें कि कैंपा कोला को 1970 के दशक में प्योर ड्रिंक्स ग्रुप ने लॉन्च किया था, यही ग्रुप भारतीय बाजार में 1949 में कोका-कोला लेकर आया था. दरअसल, रिलायंस इंडस्ट्रीज अपने FMCG कारोबार को बढ़ाना चाहती है. इसी के मद्देनजर उसने कैंपा कोला का अधिग्रहण किया है.
ग्राहकों को मिलेगा फायदा
रिलायंस अब इस डील से जहां कोका-कोला और पेप्सिको को टक्कर मिलेगी, वहीं ग्राहकों को फायदा होगा. बाजार में कैंपा कोला के आने के बाद प्राइज़ वार तय माना जा रहा है, ऐसे में ग्राहकों को कोल्ड ड्रिंक कम दाम में मिल सकती हैं.
कंपनी का लक्ष्य शहरी उपभोक्ताओं के लिए ऐसा रिटेल अनुभव तैयार करना है, जहां रोजमर्रा के खाद्य उत्पादों के साथ प्रीमियम और गॉरमे कैटेगरी के विकल्प भी उपलब्ध हों.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय फूड रिटेल बाजार में प्रतिस्पर्धा के बीच उद्योग जगत के अनुभवी कारोबारी अरविंद मेदिरत्ता ने अपनी नई कंपनी Elixiir Foods के तहत FreshTerra की शुरुआत की है. कंपनी ने गुरुग्राम में अपना पहला स्टोर लॉन्च किया है और वित्त वर्ष 2027-28 तक दिल्ली-NCR में 12-15 स्टोर खोलने की योजना बनाई है. FreshTerra एक क्यूरेशन-आधारित फूड रिटेल मॉडल पर काम करेगा, जिसमें उत्पादों के चयन, गुणवत्ता और ताजगी पर विशेष ध्यान दिया जाएगा. कंपनी का लक्ष्य शहरी उपभोक्ताओं के लिए ऐसा रिटेल अनुभव तैयार करना है, जहां रोजमर्रा के खाद्य उत्पादों के साथ प्रीमियम और गॉरमे कैटेगरी के विकल्प भी उपलब्ध हों.
अरविंद मेदिरत्ता का रिटेल अनुभव कंपनी की रणनीति का अहम हिस्सा है. वह इससे पहले Metro Cash & Carry India के प्रबंध निदेशक और CEO रह चुके हैं, जहां उन्होंने लंबे समय से घाटे में चल रहे कारोबार को लाभदायक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इससे पहले उन्होंने Walmart India में COO के तौर पर Best Price कैश एंड कैरी कारोबार को स्थापित किया था. इसके अलावा वह Walmart USA के Fresh Division और Yum! South Asia में भी नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभा चुके हैं. इस वेंचर में उनके साथ अंबुज नारायण सह-संस्थापक और COO के रूप में जुड़े हैं. नारायण को Titan Company, Metro Cash & Carry India और Walmart India में दो दशकों से अधिक का रिटेल संचालन अनुभव है.
फंडिंग के जरिए विस्तार की तैयारी
FreshTerra को फरवरी 2026 में 9 मिलियन डॉलर की सीड फंडिंग मिली थी. इस निवेश दौर का नेतृत्व 3one4 Capital ने किया था, जबकि Incubate Fund Asia ने भी इसमें भागीदारी की थी. कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल स्टोर विस्तार, टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म और सप्लाई चेन को मजबूत करने में करेगी.
कंपनी ने अपने कारोबार को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बढ़ाने की रणनीति बनाई है. इसके तहत FreshTerra मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया गया है, जिसके जरिए ग्राहक स्टोर विजिट के अलावा घर तक डिलीवरी का विकल्प चुन सकेंगे.
फूड रिटेल में अनुभव आधारित मॉडल
गुरुग्राम स्थित पहले स्टोर में कंपनी ने लाइव प्रिपरेशन मॉडल को शामिल किया है. इसमें ग्राहक आटा पिसाई, मसाला तैयार करने और कोल्ड-प्रेस तेल बनाने की प्रक्रिया को देख सकेंगे. कंपनी का मानना है कि इससे ग्राहकों का भरोसा बढ़ेगा और खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर पारदर्शिता आएगी. स्टोर में कैफे और रेडी-टू-ईट विकल्पों की सुविधा भी दी गई है, जहां ताजा सामग्री से तैयार भोजन और अन्य उत्पाद उपलब्ध होंगे.
भारतीय फूड रिटेल बाजार में बढ़ती मांग
भारत में प्रीमियम और संगठित फूड रिटेल सेगमेंट तेजी से विस्तार कर रहा है. बढ़ती शहरी आबादी, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और गुणवत्ता वाले खाद्य उत्पादों की मांग को देखते हुए कई कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रही हैं. FreshTerra इसी बढ़ते बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है.
देश में कुल रिटेल लीजिंग गतिविधि जनवरी से जून 2026 के बीच सालाना आधार पर 20 फीसदी बढ़कर करीब 39 लाख वर्ग फुट पहुंच गई. इसमें अप्रैल-जून तिमाही का योगदान करीब 20 लाख वर्ग फुट रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के रिटेल सेक्टर में डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर (D2C) ब्रांड्स तेजी से अपनी ऑफलाइन मौजूदगी मजबूत कर रहे हैं. प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी फर्म CBRE की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी-जून 2026 के दौरान देश में कुल रिटेल लीजिंग गतिविधियों में D2C ब्रांड्स की हिस्सेदारी बढ़कर 28 फीसदी पहुंच गई, जो पिछले साल की समान अवधि में 23 फीसदी थी.
भारत के रिटेल बाजार में बढ़ा D2C ब्रांड्स का विस्तार
CBRE की ‘India Retail Figures H1 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल माध्यम से कारोबार शुरू करने वाले D2C ब्रांड्स अब फिजिकल स्टोर्स के जरिए ग्राहकों तक अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं. ब्रांड विजिबिलिटी, ग्राहकों के साथ बेहतर जुड़ाव और व्यक्तिगत खरीदारी अनुभव देने के लिए कंपनियां ऑफलाइन स्टोर नेटवर्क का विस्तार कर रही हैं.
देश में कुल रिटेल लीजिंग गतिविधि जनवरी से जून 2026 के बीच सालाना आधार पर 20 फीसदी बढ़कर करीब 39 लाख वर्ग फुट पहुंच गई. इसमें अप्रैल-जून तिमाही का योगदान करीब 20 लाख वर्ग फुट रहा.
दिल्ली-NCR में सबसे ज्यादा रिटेल स्पेस की मांग
रिपोर्ट के मुताबिक, रिटेल स्पेस की मांग में दिल्ली-NCR सबसे आगे रहा. जनवरी-जून 2026 के दौरान कुल रिटेल स्पेस टेक-अप में दिल्ली-NCR की हिस्सेदारी 35 फीसदी रही. इसके बाद चेन्नई 17 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे और मुंबई 15 फीसदी हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर रहा.
घरेलू रिटेलर्स का दबदबा कायम
CBRE के अनुसार, इस अवधि में घरेलू रिटेलर्स ने लीजिंग गतिविधियों में अपना दबदबा बनाए रखा और कुल मांग में उनकी हिस्सेदारी 70 फीसदी से अधिक रही. फैशन और अपैरल, फूड एंड बेवरेज, एंटरटेनमेंट और ज्वेलरी जैसे सेगमेंट में ब्रांड्स की ओर से मजबूत मांग देखने को मिली.
D2C ब्रांड्स अब विस्तार से ज्यादा मुनाफे पर दे रहे ध्यान
CBRE ने कहा कि D2C ब्रांड्स अब केवल स्टोर की संख्या बढ़ाने के बजाय स्टोर की लाभप्रदता, पूंजी दक्षता और ओमनीचैनल रणनीति पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. प्रीमियम रिटेल स्पेस के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच ब्रांड्स अपनी फिजिकल मौजूदगी को लेकर ज्यादा सोच-समझकर फैसले ले रहे हैं.
CBRE के चेयरमैन और CEO (भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका) अंशुमान मैगजीन ने कहा कि 2026 की पहली छमाही में भारत का रिटेल बाजार केवल विस्तार नहीं बल्कि परिपक्वता की ओर बढ़ता हुआ नजर आया है. कंपनियां अब यह तय कर रही हैं कि कहां और किस तरीके से विस्तार करना उनके लिए बेहतर होगा.
फैशन सेगमेंट में D2C ब्रांड्स की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी
रिपोर्ट के अनुसार, D2C ब्रांड्स की रिटेल लीजिंग में फैशन और अपैरल सेगमेंट सबसे आगे रहा. H1 2026 में इस कैटेगरी की हिस्सेदारी करीब 69 फीसदी रही. इसके अलावा होमवेयर और फर्निशिंग सेगमेंट की हिस्सेदारी 12 फीसदी, जबकि ज्वेलरी सेगमेंट की हिस्सेदारी 7 फीसदी रही.
CBRE के मैनेजिंग डायरेक्टर (कंसल्टिंग एंड वैल्यूएशंस, भारत, मध्य पूर्व और अफ्रीका) रामी कौशल ने कहा कि रिटेलर्स अब नए बाजारों में अवसरों और लंबी अवधि की स्थिरता के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी विस्तार रणनीतियों में बदलाव कर रहे हैं.
नए रिटेल फॉर्मेट आजमा रहे D2C ब्रांड्स
D2C कंपनियां अब पारंपरिक स्टोर्स के अलावा नए रिटेल मॉडल भी अपना रही हैं. कई ब्रांड्स माइक्रो-स्टोर्स और एक्सपीरियंस सेंटर जैसे फॉर्मेट के जरिए ग्राहकों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
इसके अलावा शॉप-इन-शॉप मॉडल भी लोकप्रिय हो रहा है, जिसमें डिजिटल ब्रांड्स बड़े रिटेलर्स के फुटफॉल और भरोसे का फायदा उठाते हुए कम जोखिम के साथ ऑफलाइन विस्तार कर सकते हैं. वहीं, कई कंपनियां लाइफस्टाइल आधारित रिटेल प्लेटफॉर्म भी विकसित कर रही हैं, जहां एक ही जगह पर कई D2C ब्रांड्स को प्रदर्शित किया जा रहा है. यह मॉडल नए ब्रांड्स को फिजिकल रिटेल में प्रवेश के लिए कम जोखिम वाला विकल्प उपलब्ध करा रहा है.
SBI ने इस AT-1 बॉन्ड इश्यू का बेस साइज 3,000 करोड़ रुपये रखा था, जबकि कुल इश्यू साइज 5,000 करोड़ रुपये था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने वित्त वर्ष 2027 का पहला बैंकिंग सेक्टर AT-1 बॉन्ड इश्यू सफलतापूर्वक पूरा करते हुए 4,691 करोड़ रुपये जुटाए हैं. बैंक को इस इश्यू में बेस साइज से दोगुने से अधिक बोलियां मिलीं, जो निवेशकों के बीच SBI की मजबूत वित्तीय स्थिति और भरोसे को दर्शाता है. बॉन्ड 7.75 फीसदी की कूपन दर पर जारी किए गए हैं.
SBI के AT-1 बॉन्ड इश्यू को मिला जोरदार रिस्पॉन्स
बैंक ने बुधवार को जानकारी दी है कि उन्होंने अतिरिक्त टियर-1 (AT-1) बॉन्ड के जरिए 4,691 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई है. यह वित्त वर्ष 2027 में किसी बैंक की ओर से जारी किया गया पहला परपेचुअल (स्थायी) बॉन्ड इश्यू है. इस बॉन्ड इश्यू पर बैंक ने 7.75 फीसदी की कट-ऑफ यील्ड तय की है. इन बॉन्ड पर पांच साल बाद कॉल ऑप्शन उपलब्ध होगा और इसके बाद हर साल बैंक को इन्हें वापस खरीदने का विकल्प मिलेगा.
5,000 करोड़ रुपये के इश्यू में मिलीं 89 बोलियां
SBI ने इस AT-1 बॉन्ड इश्यू का बेस साइज 3,000 करोड़ रुपये रखा था, जबकि कुल इश्यू साइज 5,000 करोड़ रुपये था. बैंक को बेस इश्यू के मुकाबले दोगुने से अधिक बोलियां प्राप्त हुईं, जिसके बाद उसने 4,691 करोड़ रुपये स्वीकार किए. बैंक के मुताबिक, इस इश्यू में कुल 89 बोलियां मिलीं. इसमें भविष्य निधि (PF), पेंशन फंड, म्यूचुअल फंड और अन्य बैंकों समेत कई संस्थागत निवेशकों ने हिस्सा लिया.
निवेशकों का भरोसा मजबूत: SBI चेयरमैन
SBI के चेयरमैन सी. एस. शेट्टी ने कहा कि अलग-अलग श्रेणी के निवेशकों की व्यापक भागीदारी और विभिन्न प्रकार की बोलियां यह दिखाती हैं कि देश के सबसे बड़े बैंक में निवेशकों का भरोसा कायम है. उन्होंने कहा कि यह बॉन्ड इश्यू बैंक के लिए अहम है, क्योंकि इससे फंडिंग स्रोतों में विविधता आएगी और लंबी अवधि की गैर-इक्विटी नियामकीय पूंजी जुटाने में मदद मिलेगी.
क्या होते हैं AT-1 बॉन्ड?
AT-1 यानी अतिरिक्त टियर-1 बॉन्ड ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट होते हैं, जिन्हें बैंक अपनी पूंजी मजबूत करने के लिए जारी करते हैं. इन्हें बेसल-III मानकों के तहत बैंक की अतिरिक्त टियर-1 पूंजी का हिस्सा माना जाता है. इन बॉन्ड की कोई निश्चित परिपक्वता अवधि नहीं होती. हालांकि, नियामकीय मंजूरी के बाद बैंक आमतौर पर पांच साल बाद इन्हें वापस खरीदने का विकल्प रखते हैं. वित्तीय संकट की स्थिति में नुकसान को समायोजित करने की क्षमता के कारण AT-1 बॉन्ड को सामान्य बॉन्ड की तुलना में अधिक जोखिम वाला निवेश माना जाता है.
कार्गो वॉल्यूम, इंटरनेशनल पोर्ट्स और लॉजिस्टिक्स कारोबार की मजबूत ग्रोथ से बढ़ी कमाई. FY27 के लिए ₹45,000 करोड़ तक के रेवेन्यू का अनुमान बरकरार.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन्स (APSEZ) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1FY27) में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है. कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 9 फीसदी बढ़कर ₹3,620 करोड़ रहा, जबकि परिचालन से राजस्व (Revenue from Operations) 18.5 फीसदी बढ़कर ₹10,821 करोड़ पर पहुंच गया. बेहतर कार्गो हैंडलिंग, इंटरनेशनल पोर्ट्स से मजबूत आय और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के विस्तार ने कंपनी के प्रदर्शन को मजबूती दी.
स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी का नेट प्रॉफिट ₹3,315 करोड़ और परिचालन राजस्व ₹9,126 करोड़ था. हालांकि, तिमाही नतीजों के बाद बीएसई पर कंपनी का शेयर करीब 3 फीसदी की गिरावट के साथ ₹1,720 के स्तर पर कारोबार करता दिखा.
कंपनी का EBITDA 19 फीसदी बढ़कर ₹6,540 करोड़ हो गया, जो एक साल पहले की समान अवधि में ₹5,495 करोड़ था. EBITDA मार्जिन बढ़कर 60.4 फीसदी रहा, जबकि पिछले वर्ष की पहली तिमाही में यह 60.2 फीसदी था.
ऑस्ट्रेलिया और कोलंबो स्थित पोर्ट्स का बेहतर प्रदर्शन
इंटरनेशनल पोर्ट्स कारोबार ने तिमाही के दौरान उल्लेखनीय प्रदर्शन किया. इस सेगमेंट का राजस्व 80 फीसदी बढ़कर ₹1,747 करोड़ पहुंच गया, जबकि EBITDA 256 फीसदी की वृद्धि के साथ ₹730 करोड़ रहा. कंपनी ने इसका श्रेय ऑस्ट्रेलिया और कोलंबो स्थित पोर्ट्स के बेहतर प्रदर्शन को दिया है.
मरीन कारोबार से राजस्व 67 फीसदी बढ़कर ₹901 करोड़ हो गया. ऑफशोर वेसल फ्लीट के विस्तार और यूरोप में सबसी ऑपरेशन्स के विस्तार ने इस वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया. वहीं, घरेलू पोर्ट्स कारोबार से राजस्व में 12 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. अधिक कार्गो वॉल्यूम, बेहतर प्रोडक्ट मिक्स और बेहतर रियलाइजेशन के चलते इस सेगमेंट का EBITDA मार्जिन 74 फीसदी रहा.
कंपनी ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹43,000 करोड़ से ₹45,000 करोड़ के राजस्व और ₹25,000 करोड़ से ₹26,000 करोड़ के EBITDA का मार्गदर्शन (Guidance) बरकरार रखा है. पहली तिमाही के अंत तक नेट डेट-टू-EBITDA अनुपात 1.9 गुना रहा, जबकि पूरे वित्त वर्ष के लिए इसे 2.5 गुना तक रहने का अनुमान है.एपीएसईजेड के पूर्णकालिक निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अश्विनी गुप्ता ने कहा कि सभी कारोबारों में संतुलित वृद्धि कंपनी के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों को मजबूत आधार प्रदान कर रही है. उन्होंने कहा कि घरेलू क्षमता विस्तार, अंतरराष्ट्रीय पोर्ट्स कारोबार में बढ़ती हिस्सेदारी और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के विस्तार के जरिए कंपनी वैश्विक स्तर पर एक अधिक विविधीकृत और प्रतिस्पर्धी परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स प्लेटफॉर्म के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रही है.
तीस रिटायर्ड नौकरशाह. सबसे ताकतवर कुर्सियां. भारत की पूरी वित्तीय व्यवस्था पर खामोश कब्जा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
18 मार्च 2026 को अतनु चक्रवर्ती ने HDFC बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया और कुछ ऐसा कहा, जो बड़े बैंकों के चेयरमैन आमतौर पर नहीं कहते. उन्होंने लिखा कि बैंक में कुछ घटनाएं और प्रक्रियाएं "मेरे व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं हैं."
बैंक के अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट्स (ADR) में आठ फीसदी की गिरावट आई. एक हफ्ते में करीब ₹61,000 करोड़ का बाजार मूल्य खत्म हो गया. बोर्ड ने यह पता लगाने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय लॉ फर्मों को नियुक्त किया कि चक्रवर्ती के आरोपों का मतलब क्या था. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उनके आरोपों की पुष्टि नहीं हुई. करियर फाइनेंसर के रूप में पहचान रखने वाले केकी मिस्त्री ने अंतरिम चेयरमैन का पद संभाला, जबकि बैंक स्थायी चेयरमैन की तलाश कर रहा था.
फिस उसे राजीव कुमार मिले.
चक्रवर्ती 1985 बैच के गुजरात कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो अप्रैल 2020 तक आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs) में सचिव थे. जुलाई 2026 में उनके उत्तराधिकारी के रूप में नामित राजीव कुमार (रिजर्व बैंक की मंजूरी के अधीन) भी एक रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं. वह वित्त सचिव रहे, फिर वित्तीय सेवा सचिव बने और मई 2022 से फरवरी 2025 तक मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहे.
भारत के सबसे बड़े निजी बैंक को चेयर पर एक रिटायर्ड नौकरशाह के साथ मुश्किल अनुभव हुआ. उसने उसकी जगह भी एक रिटायर्ड नौकरशाह को ही चुना.
यह कोई संयोग नहीं है. अब सिस्टम इसी तरह काम करता है.
तीन नियामक, तीन अधिकारी
भारतीय वित्त व्यवस्था में महत्वपूर्ण पदों को गिनिए और एक ही करियर बार-बार दिखाई देता है: भारतीय प्रशासनिक सेवा में तीन दशक, वित्त मंत्रालय में अंतिम पोस्टिंग, फिर रिटायरमेंट और उसके बाद चेयरमैन की कुर्सी.
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की अध्यक्षता तुहिन कांत पांडे कर रहे हैं. वह 1987 बैच के ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो 1 मार्च 2025 को पदभार संभालने से पहले वित्त सचिव और राजस्व सचिव रह चुके थे.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का नेतृत्व संजय मल्होत्रा कर रहे हैं. वह 1990 बैच के राजस्थान कैडर के IAS अधिकारी हैं. उनके नाम की घोषणा उनके पूर्ववर्ती के कार्यकाल खत्म होने से एक दिन पहले की गई थी और उन्हें राजस्व सचिव के पद से करीब तीन साल पहले RBI लाया गया, जबकि उनकी अपनी सेवानिवृत्ति में अभी समय बाकी था.
उनसे पहले RBI गवर्नर रहे शक्तिकांत दास भी IAS अधिकारी थे और वह भी पूर्व राजस्व सचिव और आर्थिक मामलों के सचिव रह चुके थे.
बीमा नियामक IRDAI की अध्यक्षता अजय सेठ कर रहे हैं. वह 1987 बैच के कर्नाटक कैडर के IAS अधिकारी हैं. जून 2025 तक वह आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव थे और 1 सितंबर को IRDAI के चेयर पर पहुंचे. उन्होंने डेबाशीष पांडा की जगह ली, जो 1987 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी थे और वित्तीय सेवा विभाग का नेतृत्व कर चुके थे.
तीन नियामक. तीन रिटायर्ड IAS अधिकारी. सभी वित्त मंत्रालय की कुर्सी छोड़कर कुछ ही महीनों में एक नियामक संस्था के प्रमुख बन गए.
अब मायने यह रखता है कि वे नियामक किन लोगों की नियुक्तियों को मंजूरी देते हैं.
2018 के SECC नियमों के तहत, SEBI को हर चेयरपर्सन और हर पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर की नियुक्ति को मंजूरी देनी होती है, जो बाजार की बुनियादी संस्थाओं — एक्सचेंज, डिपॉजिटरी और क्लियरिंग कॉरपोरेशन में नियुक्त होते हैं. इन संस्थाओं को नियमों में बाजार का प्रथम स्तर का नियामक कहा गया है.
बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के तहत, रिजर्व बैंक को हर निजी बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन की नियुक्ति को मंजूरी देनी होती है.
इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि नियामकों को कौन चला रहा है. सवाल यह भी है कि नियामक किन लोगों को मंजूरी दे रहे हैं, जिसमें CEO भी शामिल हैं. इसलिए यह स्पष्ट है कि सबसे ज्यादा शक्ति किसके पास है.
नियामक तक ही सीमित नहीं है यह पैटर्न
यह पैटर्न केवल नियामक संस्थाओं तक नहीं रुकता.
SEBI के खिलाफ अपीलों की सुनवाई सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) में होती है, जिसके दो तकनीकी सदस्य भी करियर नौकरशाह हैं.
इनमें मीरा स्वरूप शामिल हैं, जो 1988 बैच की इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स सर्विस अधिकारी हैं और मार्च 2022 में नियुक्त हुईं. दूसरे हैं धीरज भटनागर, जो दिल्ली में इनकम टैक्स के प्रिंसिपल चीफ कमिश्नर के पद से रिटायर हुए और अप्रैल 2024 में नियुक्त किए गए.
इन पदों के लिए आवेदन आर्थिक मामलों का विभाग (Department of Economic Affairs) आमंत्रित करता है. वही मंत्रालय, जहां से अधिकांश नियामक संस्थाओं के प्रमुख आए हैं
असल में दांव पर क्या है
ये केवल औपचारिक पद नहीं हैं. नौ वर्षों तक नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) खुद को सूचीबद्ध नहीं करा पाया. उसका IPO 2016 से अटका हुआ था. इसकी वजह को-लोकेशन मामला और उसके बाद सामने आया लंबा गवर्नेंस विवाद था.
30 जनवरी 2026 को SEBI ने नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी किया, जिससे NSE की लिस्टिंग का रास्ता साफ हुआ. NSE बोर्ड ने 6 फरवरी को ऑफर को मंजूरी दी. दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती को 16 फरवरी को खारिज कर दिया गया.
अब एक्सचेंज करीब छह फीसदी हिस्सेदारी की बिक्री (Offer for Sale) की तैयारी कर रहा है, जिसकी अनुमानित वैल्यू करीब 2.5 अरब डॉलर है. अंतिम SEBI मंजूरी अगस्त के आसपास मिलने की उम्मीद है.
इस नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट से चार महीने पहले NSE में एक नए चेयरपर्सन की नियुक्ति हुई थी, श्रीनिवास इंजेती. वह 1983 बैच के ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी हैं.
वह सितंबर 2025 में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर के रूप में बोर्ड में शामिल हुए और उसी महीने SEBI की मंजूरी के बाद चेयरमैन बना दिए गए.
जिस SEBI ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी और बाद में NSE की लिस्टिंग प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, उसका नेतृत्व भी 1987 बैच के उसी ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी के पास है.
इस बात का कोई सबूत नहीं है कि दोनों घटनाओं का आपस में कोई संबंध था. NSE का IPO कई वर्षों से प्रक्रिया में था और कानूनी अड़चनें अपने तरीके से दूर हुईं.
लेकिन व्यवहार में बंद सिस्टम ऐसा ही दिखाई देता है: 2.5 अरब डॉलर का फैसला, एक रिटायर्ड अधिकारी द्वारा ऐसे संस्थान के बारे में लिया गया जिसकी अध्यक्षता एक अन्य रिटायर्ड अधिकारी कर रहा है. कमरे में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है और फैसले की प्रक्रिया का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं है.
NSE का इतिहास भी दिलचस्प रहा है. इसके पूर्व चेयरमैन अशोक चावला 1973 बैच के IAS अधिकारी थे और वित्त मंत्रालय में काम कर चुके थे.
2019 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दिल्ली की एक अदालत को यह बताए जाने के बाद कि केंद्र सरकार ने एयरसेल-मैक्सिस मामले में पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी है, जिनमें अशोक चावला भी शामिल थे, उन्हें NSE के चेयरमैन और पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर पद से इस्तीफा देना पड़ा.
उनकी जगह गिरीश चंद्र चतुर्वेदी आए, जो 1973 बैच के IAS अधिकारी और पूर्व पेट्रोलियम सचिव थे. वह ICICI बैंक के चेयरमैन भी रह चुके थे.
एक ही व्यक्ति ने छह साल में तीन भूमिकाएं निभाईं
मौजूदा NSE चेयरमैन श्रीनिवास इंजेती के करियर को देखना भी महत्वपूर्ण है. वह कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में सचिव रहे. वही मंत्रालय जो भारत के कंपनी कानून और कॉरपोरेट गवर्नेंस नियम तैयार करता है.
इसके बाद वह इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर अथॉरिटी (IFSCA) के संस्थापक चेयरपर्सन बने, जो GIFT City का नियामक है.
अब वह देश के सबसे बड़े एक्सचेंज के चेयरमैन हैं. छह वर्षों में एक व्यक्ति एक ही टेबल के तीन अलग-अलग हिस्सों में बैठा नियम बनाए, उन्हें लागू किया और अब ऐसी संस्था चला रहा है जो उन्हीं नियमों के अधीन है.
उनके खाली किए गए IFSCA चेयर का पद के. राजारमन ने संभाला, जो 1989 बैच के तमिलनाडु कैडर के IAS अधिकारी और पूर्व टेलीकॉम सचिव हैं.
प्रथम स्तर के नियामक
NSE इंटरनेशनल एक्सचेंज में, जो NSE समूह की GIFT City इकाई है, अप्रैल 2025 से चेयरमैन नीरज कुमार गुप्ता हैं. वह 1982 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो सरकार के निवेश और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (Department of Investment and Public Asset Management) के सचिव पद से रिटायर हुए हैं.
मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज (Metropolitan Stock Exchange) ने मई 2026 में SEBI की मंजूरी के साथ घोषणा की कि उसकी चेयरपर्सन उपमा दादा चौधरी होंगी. वह 1983 बैच की हिमाचल प्रदेश कैडर की अधिकारी हैं, जो भारत सरकार में सचिव पद से रिटायर हुईं और मसूरी स्थित सिविल सेवा अकादमी की प्रमुख बनने वाली पहली महिला थीं.
वह ऐसे बोर्ड की जिम्मेदारी संभालेंगी, जिसमें दिनेश चंदर पाटवारी चेयरमैन और पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर के रूप में काम कर चुके हैं. पाटवारी 1986 बैच के इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) अधिकारी हैं.
नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (NCDEX) की अध्यक्षता आशीष बहुगुणा कर रहे हैं, जिन्होंने 1978 में IAS ज्वाइन किया था और 2015 में रिटायर हुए.
BSE में, जिसके चेयरमैन पूर्व IIT बॉम्बे निदेशक सुभाषिस चौधरी हैं, राजीव बंसल अप्रैल 2025 से पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर हैं.
वह 1988 बैच के नगालैंड कैडर के अधिकारी हैं. वह पूर्व नागरिक उड्डयन सचिव और एयर इंडिया के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक रह चुके हैं.
डिपॉजिटरी और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर में भी वही पैटर्न
डिपॉजिटरी भारत में लगभग हर शेयर के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को संभालती हैं.
CDSL की अध्यक्षता गुरुमूर्ति महालिंगम कर रहे हैं. वह RBI के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और SEBI के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य रह चुके हैं.
CDSL की वेबसाइट पर सूचीबद्ध उनके अन्य पदों पर नजर डालना भी महत्वपूर्ण है:
1. भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC)
2. सिटी यूनियन बैंक
3. केयर रेटिंग्स
4. केयर रेटिंग्स नेपाल
5. इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज
6. DSP पेंशन फंड मैनेजर्स
7. थॉमस कुक इंडिया
एक व्यक्ति और बैकिंग, रेटिंग, पेंशन और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में आठ बोर्ड बीमा,
CDSL के पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर्स में राजेश तुतजा भी शामिल हैं. वह 1987 बैच के IRS अधिकारी हैं और 2020 में इनकम टैक्स (जांच) के डायरेक्टर जनरल पद से रिटायर हुए.
इसके अलावा एस. गणेश कुमार भी बोर्ड में हैं, जो RBI के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रह चुके हैं. सिद्धार्थ प्रधान, जो रिटायर्ड IRS अधिकारी हैं, भी इसी बोर्ड में रह चुके हैं.
NSDL में शशांक सक्सेना पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर हैं. उन्होंने आर्थिक मामलों के विभाग में वर्षों तक सीनियर इकोनॉमिक एडवाइजर के रूप में काम किया और इससे पहले PFRDA, IBBI, इलाहाबाद बैंक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और DICGC के बोर्ड में रह चुके हैं.
MCX में संतोष कुमार मोहंती, जो SEBI के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य हैं, मई 2026 में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर बने.
मोहंती SEBI में सबसे लंबे समय तक काम करने वाले पूर्णकालिक सदस्यों और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स में से एक रहे हैं. इससे पहले वह फॉरवर्ड मार्केट कमीशन में थे. दोनों संस्थाएं MCX को रेगुलेट करती थीं, जहां अब मोहंती बोर्ड में हैं.
NSE क्लियरिंग में RBI और NPCI के पूर्व अधिकारी अभय होता चेयरमैन हैं. उनके बोर्ड में जी.एस. हेगड़े भी शामिल हैं, जो कभी RBI के प्रिंसिपल लीगल एडवाइजर थे.
पैटर्न बाजार से आगे भी जाता है
यह पैटर्न केवल बाजार तक सीमित नहीं है.
शिवासुब्रमण्यम रमन, जो 1991 बैच के इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स सर्विस अधिकारी और पूर्व डिप्टी कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल हैं, ने जून 2025 में पेंशन नियामक PFRDA का कार्यभार संभाला.
रवि मित्तल, जो 1986 बैच के बिहार कैडर के IAS अधिकारी हैं, भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) के चेयरमैन हैं.
नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA), जिसे IL&FS संकट के बाद ऑडिटर निगरानी संस्था के रूप में बनाया गया था, की अध्यक्षता नितिन गुप्ता कर रहे हैं. वह रिटायर्ड IRS अधिकारी और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के पूर्व चेयरमैन हैं.
उन्होंने अजय भूषण पांडे की जगह ली, जो 1984 बैच के IAS अधिकारी और पूर्व वित्त सचिव थे. वह अप्रैल 2025 में एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) में उपाध्यक्ष पद के लिए चले गए.
प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission) की अध्यक्षता रवनीत कौर कर रही हैं. वह 1988 बैच की पंजाब कैडर अधिकारी हैं, जिसके सदस्यों में पुलिस और ऑडिट सेवाओं के अधिकारी शामिल हैं.
फाइनेंशियल सर्विसेज इंस्टीट्यूशंस ब्यूरो (FSIB), जो सरकारी बैंकों और बीमा कंपनियों के प्रमुखों का चयन करता है, में बी.पी. शर्मा शामिल हैं. वह 1981 बैच के अधिकारी और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के पूर्व सचिव हैं.
और फिर बैंक
ICICI बैंक के गैर-कार्यकारी चेयरमैन पद पर जुलाई 2024 से प्रदीप कुमार सिन्हा हैं. वह 1977 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं.
वह 2015 से 2019 तक कैबिनेट सचिव रहे, भारतीय नौकरशाही का सबसे वरिष्ठ पद. उनका कार्यकाल इतना लंबा था कि छह दशक पुराने एक नियम में संशोधन करना पड़ा ताकि उन्हें इस पद पर बने रहने की अनुमति दी जा सके. इसके बाद वह प्रधानमंत्री के प्रधान सलाहकार भी रहे.
कोटक महिंद्रा बैंक के चेयरमैन सी.एस. राजन हैं, जो रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं और राजस्थान के मुख्य सचिव रह चुके हैं.
एक्सिस बैंक के चेयरमैन एन.एस. विश्वनाथन हैं, जो रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर रह चुके हैं.
इंडसइंड बैंक के चेयरमैन अरिजीत बसु हैं, जो भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर रह चुके हैं.
बैंक ऑफ बड़ौदा की अध्यक्षता 2019 से 2024 तक हसमुख अधिया ने की थी. वह रिटायर्ड IAS अधिकारी और पूर्व वित्त सचिव हैं.
बैंक छोड़ने के पांच महीने बाद उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री का मुख्य प्रधान सचिव नियुक्त किया गया.
सरकार, फिर बैंक, फिर दोबारा सरकार.
और अप्रैल 2026 में रिजर्व बैंक ने बंधन बैंक के लिए नए पार्ट-टाइम चेयरमैन की नियुक्ति को मंजूरी दी, जो 5 जुलाई से प्रभावी हुई: डेबाशीष पांडा.
वित्तीय सेवा विभाग के सचिव रहते हुए उन्होंने भारत के बैंकों की निगरानी में भूमिका निभाई थी और RBI, भारतीय स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और LIC के बोर्ड में भी रह चुके थे.
मार्च 2025 तक वह देश के बीमा नियामक के प्रमुख थे.
पंद्रह महीने बाद वह एक निजी बैंक के चेयरमैन हैं, जिसे उनके ही सेवा कैडर से आने वाले RBI गवर्नर ने मंजूरी दी.
वे नियम जो पहले असर डालते थे
यह व्यवस्था हमेशा इतनी आसान नहीं थी.
1990 में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पद से हटने के बाद बी.जी. देशमुख को टाटा समूह से जुड़ने की अनुमति मिलने से पहले कई महीने इंतजार करना पड़ा था.
2007 में वित्त सचिव अशोक झा को हुंडई इंडिया के अध्यक्ष बनने के लिए कूलिंग-ऑफ नियमों से विशेष छूट लेनी पड़ी थी. यह छूट उन्हें कुछ महीने बाद मिली, जब वह केंद्रीय बजट तैयार करने में शामिल थे.
छूट मांगी जाती थी, उन पर बहस होती थी और कई बार उन्हें खारिज भी कर दिया जाता था.
दिसंबर 2015 में अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के निजी व्यावसायिक रोजगार में जाने के लिए कूलिंग-ऑफ अवधि को दो साल से घटाकर एक साल कर दिया गया.
वहीं, छूट की प्रक्रिया धीरे-धीरे सामान्य बन गई.
और इस नियम में एक ऐसी खामी है, जो पूरे उद्देश्य को कमजोर कर देती है.
कूलिंग-ऑफ अवधि केवल व्यावसायिक रोजगार पर लागू होती है.
यह मंत्रालय से किसी नियामक संस्था में जाने पर लागू नहीं होती, क्योंकि नियामक भी एक सरकारी संस्था होती है.
न ही इसके बाद किसी अन्य पद पर जाने से यह अवधि किसी प्रभावी तरीके से दोबारा शुरू होती है.
इसी वजह से वित्तीय सेवा सचिव से बीमा नियामक और फिर निजी बैंक चेयरमैन बनने की यात्रा में औपचारिक रूप से कोई सवाल नहीं उठता.
बचाव का पक्ष
दो पूर्व वित्त सचिवों ने इस आलोचना पर अपनी राय सार्वजनिक रूप से रखी है.
सुभाष गर्ग ने पिछले साल द प्रिंट को बताया, "यह एक बिल्कुल अभूतपूर्व स्थिति है, जहां वित्त सचिव, जो हाल ही में रिटायर हुए हैं, अब उन संस्थानों का नेतृत्व कर रहे हैं, जिनका काम स्वतंत्र नियामक की भूमिका निभाना है."
उन्होंने कहा, "यह एक खतरनाक स्थिति है क्योंकि हम नियामकों को सरकारी अधिकारियों में बदलते हुए देख रहे हैं."
गर्ग ने BW Businessworld को भी एक विस्तृत इंटरव्यू दिया है. उन्होंने Businessworld से कहा, "यह अब केवल कब्जा (capture) नहीं है. यह पूरी तरह से अधीनता (subordination) है."
बैंकों के बारे में गर्ग का तर्क है कि वे तर्कसंगत व्यवहार कर रहे हैं.
"सैद्धांतिक रूप से निजी बैंक रिटायर्ड IAS अधिकारियों को अपने बोर्ड में शामिल नहीं करने का विकल्प चुन सकते हैं. वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर उनके बोर्ड में कोई रिटायर्ड सरकारी अधिकारी होगा, तो सरकार के साथ बेहतर संवाद स्थापित किया जा सकता है."
Business Standard के ए.के. भट्टाचार्य ने भी इस महीने इसी तरह का तर्क दिया. उनका कहना है कि रिटायर्ड IAS अधिकारियों के नेतृत्व वाली नियामक व्यवस्था से निपटना आसान हो जाता है, अगर आपके पास भी उसी पृष्ठभूमि का कोई व्यक्ति चेयर पर हो.
बैंकों की मांग नियामकों में मौजूद व्यवस्था का परिणाम है.
दूसरी तरफ एक गंभीर तर्क भी है
लोक सेवक दुनिया की सबसे कठिन चयन प्रक्रियाओं में से एक को पार करके आते हैं और फिर 35 साल तक मंत्रालयों, राज्यों और सार्वजनिक क्षेत्र के बोर्डों में काम करते हैं.
निजी क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति भारतीय राज्य के काम करने के तरीके की वैसी समझ हासिल नहीं कर सकता.
दुव्वुरी सुब्बाराव, जो IAS अधिकारी रहे और बाद में RBI गवर्नर बने, इसलिए दोनों पक्षों के उदाहरण हैं, का कहना है कि परिणाम व्यक्ति पर निर्भर करता है, उसकी पृष्ठभूमि पर नहीं.
उन्होंने कहा, "यह तय नहीं है कि क्योंकि कोई व्यक्ति अभी-अभी सरकार से वित्त नौकरशाह के रूप में रिटायर हुआ है, वह हर निर्देश के आगे झुक जाएगा."
उनके अनुसार, सरकार की कार्य संस्कृति की समझ एक संपत्ति है, लेकिन इसे संतुलित करना जरूरी है.
आलोचक जिस समस्या को नजरअंदाज करते हैं
इस व्यवस्था में एक सप्लाई की समस्या भी है, जिसे आलोचक अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.
एक पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर को हितों के टकराव से मुक्त होना चाहिए. इस वजह से ब्रोकिंग, बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट या सिक्योरिटीज कानून में काम कर चुके ज्यादातर लोग बाहर हो जाते हैं.
इसके बाद विकल्पों में रिटायर्ड अधिकारी, शिक्षाविद और न्यायाधीश ही बचते हैं और बोर्ड संरचनाएं भी यही दिखाती हैं.
NSE के निदेशकों में मणिपुर हाई कोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश, IIT बॉम्बे के दो प्रोफेसर, GNLU के एक कानून प्रोफेसर और TCS तथा Egon Zehnder के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी शामिल हैं.
CDSL के बोर्ड में IIT बॉम्बे के कंप्यूटर वैज्ञानिक और टाटा समूह के पूर्व जनरल काउंसल भी हैं.
NSE क्लियरिंग के बोर्ड में कोई रिटायर्ड नौकरशाह नहीं है.
और IL&FS संकट, खराब ऋण संकट और NSE को-लोकेशन मामले के बाद वित्तीय संस्थानों की बाहरी निगरानी की जरूरत का तर्क कमजोर नहीं बल्कि और मजबूत हुआ है.
जब किसी अंदरूनी व्यक्ति ने पहली बार खुलकर बात कही
यह तर्क कि इस व्यवस्था से कुछ गलत नहीं हुआ है, मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि इसके अंदर मौजूद लगभग किसी व्यक्ति ने कभी इसका विरोध नहीं किया.
दिसंबर 2010 में दो लोगों ने ऐसा किया.
जी. मोहन गोपाल, जो उस समय नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक थे, SEBI बोर्ड के सदस्य थे.
दो साल पहले उन्होंने और रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर वी. लीलाधर ने दो सदस्यीय पीठ के रूप में नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के IPO डिमैट घोटाले में आचरण की जांच की थी.
दिसंबर 2008 में उन्होंने तीन आदेश पारित किए.
उनके अनुसार, NSDL अपने निगरानी, जांच और मॉनिटरिंग के कर्तव्य को पूरा करने में विफल रहा था और उन्होंने इन विफलताओं के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने के लिए एक स्वतंत्र जांच के निर्देश दिए.
इसमें एक स्पष्ट समस्या थी.
जिस व्यक्ति ने संबंधित अवधि में NSDL का नेतृत्व किया था, वह आदेश लिखे जाने तक SEBI के चेयरमैन बन चुके थे.
उनका नाम था सी.बी. भावे.
SEBI बोर्ड ने इसके बाद तीन में से दो आदेशों को नॉन-एस्ट (non est) घोषित कर दिया यानी कानूनी रूप से अस्तित्वहीन.
तर्क दिया गया कि पीठ ने नियामक की आलोचना कर अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर काम किया था.
जांच का निष्कर्ष गायब हो गया.
कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई.
24 दिसंबर 2010 को जी. मोहन गोपाल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा.
इस पत्र में उन्होंने अपने शब्दों में SEBI बोर्ड के भीतर सत्ता के गंभीर दुरुपयोग और भ्रष्ट आचरण का आरोप लगाया, जिसका उद्देश्य NSDL में उनके कार्यकाल के दौरान चेयरमैन के आचरण की स्वतंत्र जांच से उन्हें बचाना था.
उन्होंने प्रधानमंत्री से SEBI द्वारा NSDL से जुड़े फैसलों की उच्च स्तरीय जांच कराने और इसके पीछे मौजूद संरचनात्मक समस्या की जांच करने की मांग की.
इस पत्र में उन बोर्ड सदस्यों के नाम भी थे, जिन्हें वह नॉन-एस्ट फैसले के लिए जिम्मेदार मानते थे. इनमें वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि भी शामिल थे.
प्रधानमंत्री ने यह पत्र वित्त मंत्रालय को भेज दिया.
यानी उसी मंत्रालय को, जिसकी ओर से नियुक्त प्रतिनिधि के.पी. कृष्णन (1983 बैच IAS अधिकारी) उस SEBI बोर्ड में सदस्य थे, जिसके खिलाफ शिकायत की गई थी.
इसके बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई.
यह पत्र किसी आधिकारिक माध्यम से सार्वजनिक नहीं हुआ.
यह केवल इसलिए सामने आया क्योंकि RTI कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने इसकी जानकारी मांगी.
जुलाई 2011 में, सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद SEBI बोर्ड ने एक असामान्य कदम उठाते हुए उन आरोपों को दोबारा बहाल किया, जिन्हें पहले वह कानूनी रूप से अस्तित्वहीन घोषित कर चुका था.
2013 में सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) ने NSDL के खिलाफ आदेश को रद्द कर दिया.
मार्च 2014 में MCX-SX मामले में भावे का नाम शामिल करते हुए CBI ने प्रारंभिक जांच दर्ज की, जिसे पांच महीने बाद बंद कर दिया गया.
भावे ने लगातार किसी भी गलत काम से इनकार किया.
उनके या किसी अन्य नामित व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया.
लेकिन यही मुख्य बिंदु है.
नियामक संस्था के अंदर मौजूद दो अधिकारियों ने देश के प्रधानमंत्री को लिखित रूप में गंभीर आरोप भेजे कि भारत के सिक्योरिटीज रेगुलेटर ने अपने ही चेयरमैन से जुड़े मामले को किस तरह संभाला.
इन आरोपों की किसी स्वतंत्र संस्था ने जांच नहीं की.
एक पत्र उसी मंत्रालय को वापस भेज दिया गया, जिसके खिलाफ शिकायत थी.
दूसरी ओर, उसी मंत्रालय ने मामले को खारिज कर दिया और शिकायत करने वाले अधिकारी को दोबारा नियुक्त नहीं किया गया.
जनता को इस पूरे मामले की जानकारी केवल इसलिए मिली क्योंकि एक निजी नागरिक ने सूचना के अधिकार कानून के तहत आवेदन किया.
व्यवस्था ने खुद को साफ नहीं किया.
उसने कभी अपनी जांच नहीं की.
जिन लोगों को जांच का आदेश देना था, वही लोग शिकायत के दायरे में थे.
यह पैटर्न वास्तव में क्या बताता है
इसलिए निष्कर्ष यह नहीं है कि "नौकरशाहों ने सभी बोर्डों पर कब्जा कर लिया है."
ऐसा नहीं है.
बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर के स्तर पर, चेयर के नीचे भारत की वित्तीय व्यवस्था वास्तव में प्रोफेसरों, न्यायाधीशों और अकाउंटेंट्स जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से आए लोगों के मिश्रण से चल रही है.
असल निष्कर्ष ज्यादा सीमित है और इसका जवाब देना ज्यादा कठिन है.
शक्ति का केंद्रीकरण चेयर की कुर्सी पर है, वह पद जो एजेंडा तय करता है, नामांकन समिति को संचालित करता है और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEO) की नियुक्तियों को मंजूरी देता है.
यह चेयर उस नियामक की मंजूरी से आता है, जिसका अपना प्रमुख भी उसी सेवा से आया है. और उस नियुक्ति को कैबिनेट की नियुक्ति समिति (Appointments Committee of the Cabinet) मंजूरी देती है, जिसकी बैठकों और विचार-विमर्श को सार्वजनिक नहीं किया जाता.
SEBI ने खुद इस समस्या की ओर इशारा किया है.
अगस्त 2024 में जारी एक परामर्श पत्र में SEBI ने पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर की नियुक्तियों में "निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया" (objective decision making) लाने के लिए बाहरी विशेषज्ञों वाली एक हाई लेवल अपॉइंटमेंट कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा था.
दो साल बाद भी इस कमेटी के अस्तित्व को लेकर कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है.
इन पदों पर बैठे अधिकांश लोग उपलब्ध जानकारी के अनुसार सक्षम और ईमानदार हैं.
इस लेख में जिन नियुक्तियों का जिक्र किया गया है, उनमें से किसी ने भी कोई नियम नहीं तोड़ा है.
हर नियुक्ति ने कानून में तय सभी प्रक्रियाओं को पूरा किया है.
यह व्यवस्था के पक्ष में तर्क से ज्यादा, व्यवस्था का विवरण है.
क्योंकि इन प्रक्रियाओं को उसी सेवा के लोगों ने तैयार किया, जिसके लोग अब इन्हीं प्रक्रियाओं के जरिए चुने जा रहे हैं.
और जब कभी किसी अंदरूनी व्यक्ति ने इन प्रक्रियाओं की जांच की मांग की, तो वह मांग उन्हीं लोगों के पास पहुंची, जिनसे सवाल पूछा जा रहा था.
यही वजह है कि यह समस्या किसी एक घोटाले की बजाय एक संरचनात्मक समस्या है.
संस्थाएं केवल भ्रष्टाचार से अपनी स्वतंत्रता नहीं खोतीं.
वे तब भी कमजोर होती हैं जब निर्णय लेने वाली पूरी व्यवस्था एक ही समूह से आने वाले लोगों से भर जाती है.
इसके लिए किसी विशेष पक्षपात की जरूरत नहीं होती और न ही किसी कानून को तोड़ने की.
साझा करियर और साझा सोच भी पर्याप्त हो सकती है.
करीब तीस पुरुष और महिलाएं, जो एक ही सेवा से आए हैं, अब उन संस्थाओं के शीर्ष पर बैठे हैं जो तय करती हैं कि भारत की बचत कहां जाएगी, कौन सी कंपनियां पूंजी जुटाएंगी और कौन से बैंक किसे कर्ज देंगे.
वे यह भी तय करते हैं कि नियामक कौन होगा, किसकी निगरानी होगी और अगली महत्वपूर्ण कुर्सी पर कौन बैठेगा.
इसके लिए कोई कानून नहीं बनाया गया.
यह एक-एक नियुक्ति के जरिए हुआ.
हर नियुक्ति कानूनी थी.
सवाल यह नहीं है कि ये अधिकारी सक्षम हैं या नहीं.
सवाल यह है कि क्या किसी वित्तीय व्यवस्था में यह उचित है कि एक ही सेवा उसके नियामक, उसके रेफरी और तेजी से उन संस्थानों के पसंदीदा चेयरमैन उपलब्ध कराए, जिनकी निगरानी वही व्यवस्था करती है.
जब हर रास्ता वापस उन्हीं लोगों के समूह तक पहुंचने लगे, तो स्वतंत्रता ऐसी चीज नहीं रह जाती जिसकी गारंटी व्यवस्था देती है.
वह व्यक्ति के चुनाव पर निर्भर हो जाती है.
कुछ ऐसा ही अतनु चक्रवर्ती ने मार्च में किया और इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी.
जैसे किसी सम्राट की उत्तराधिकार योजना हो, भारत की वित्तीय संरचना में अब कुछ-कुछ वंशानुगत प्रशासनिक व्यवस्था जैसी स्थिति दिखाई देती है, खून के रिश्ते से नहीं, बल्कि कैडर के आधार पर.
हर नियुक्ति कानूनी है और उसे योग्यता के आधार पर सही ठहराया जा सकता है.
लेकिन जब इन सभी नियुक्तियों को एक साथ देखा जाता है, तो एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जिसे कोई अकेली नियुक्ति नहीं दिखाती.
एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें शक्ति बार-बार उसी दायरे में घूमती रहती है.
बोर्ड संरचनाएं जुलाई 2026 तक संस्थानों की अपनी वेबसाइट और एक्सचेंज फाइलिंग में उपलब्ध जानकारी के आधार पर हैं और इनमें समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
फ्रेंचाइजी मॉडल के जरिए 2026 के अंत तक 1,000 आउटलेट्स का लक्ष्य, 10 लाख वर्गफुट से ज्यादा वेयरहाउसिंग क्षमता उपलब्ध कराएगी कंपनी
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
फ्लिपकार्ट (Flipkart Group) की सप्लाई चेन शाखा Ekart Logistics ने अपने पैन-इंडिया लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को देशभर के कारोबारियों के लिए खोलने का ऐलान किया है. अब MSME, D2C ब्रांड्स, FMCG कंपनियां और अन्य उद्यम Flipkart Group को सपोर्ट करने वाले Ekart के लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी और डिलीवरी नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकेंगे. कंपनने बताया कि इस विस्तार के तहत नया फ्रेंचाइजी मॉडल और डेडिकेटेड वेयरहाउसिंग सुविधाएं शुरू की गई हैं. इसके जरिए छोटे-बड़े सभी कारोबारी Ekart की तकनीक, देशव्यापी पहुंच और फुलफिलमेंट नेटवर्क का इस्तेमाल कर अपने कारोबार को तेजी से बढ़ा सकेंगे.
MSME और छोटे कारोबारियों को मिलेगा राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नेटवर्क
Ekart का फ्रेंचाइजी मॉडल MSME और छोटे कारोबारियों को बिना खुद का लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किए देशभर में सामान पहुंचाने की सुविधा देगा. कंपनी ने बताया कि इस नेटवर्क की शुरुआत सूरत, मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु समेत प्रमुख शहरों में 300 से ज्यादा आउटलेट्स के साथ की गई है. Ekart का लक्ष्य 2026 के अंत तक इस संख्या को बढ़ाकर 1,000 आउटलेट्स तक पहुंचाना है. इस नेटवर्क के जरिए कारोबारियों को रियल-टाइम शिपमेंट ट्रैकिंग, AI आधारित एड्रेस रिजॉल्यूशन और Ekart की स्थापित डिलीवरी क्षमताओं का लाभ मिलेगा.
ब्रांड्स के लिए 10 लाख वर्गफुट से ज्यादा वेयरहाउसिंग सुविधा
Ekart ने बताया कि कंपनियां अब उसकी 10 लाख वर्गफुट से ज्यादा की डेडिकेटेड वेयरहाउसिंग क्षमता का इस्तेमाल कर सकेंगी. इन सुविधाओं को दिल्ली-NCR, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई जैसे शहरों में और बढ़ाया जा रहा है.
इन वेयरहाउसिंग सुविधाओं का उद्देश्य ग्राहकों के करीब इन्वेंट्री रखने के जरिए डिलीवरी समय को कम करना है. साथ ही AI आधारित डिमांड फोरकास्टिंग की मदद से कंपनियां अपने स्टॉक को बेहतर तरीके से मैनेज कर सकेंगी और अलग-अलग क्षेत्रों में सप्लाई प्लान कर पाएंगी.
B2B ग्राहकों के लिए भी विशेष सुविधाएं
Ekart ने B2B ग्राहकों के लिए देशभर में डेडिकेटेड हब नेटवर्क तैयार किया है, जो बल्क फ्रेट और कंसोलिडेटेड फ्रेट ऑपरेशन को सपोर्ट करता है. यह नेटवर्क ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग गुड्स, FMCG और रिटेल जैसे सेक्टरों को सेवाएं उपलब्ध कराता है. इसके अलावा कंपनी Open Box Delivery जैसी सुविधाएं भी दे रही है, जिसमें ग्राहक डिलीवरी के समय उत्पाद की जांच कर सकते हैं. वहीं Any Day Delivery सुविधा के जरिए ग्राहकों को डिलीवरी शेड्यूल चुनने की अधिक सुविधा मिलेगी.
Ekart के चीफ बिजनेस ऑफिसर मणि भूषण ने कहा, "पिछले कुछ वर्षों में हजारों रिटेल, MSME, D2C और ग्लोबल ब्रांड्स ने भारत में अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए Ekart के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और तकनीक पर भरोसा किया है. अब हम फ्रेंचाइजी मॉडल और एंड-टू-एंड फुलफिलमेंट क्षमताओं के जरिए अपने नेटवर्क को और अधिक व्यवसायों तक पहुंचा रहे हैं." उन्होंने कहा कि कंपनी का उद्देश्य भारत के हर व्यवसाय को राष्ट्रीय बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराना है, ताकि वे तेजी से विस्तार कर सकें और प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ सकें.
Ekart वर्तमान में देश के 95% से ज्यादा पिनकोड तक पहुंच रखता है और 80 से अधिक प्रोडक्ट कैटेगरी में सेवाएं उपलब्ध कराता है. इस विस्तार के बाद देशभर के कारोबारी Ekart के बड़े लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का इस्तेमाल कर ग्राहकों तक ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से पहुंच बना सकेंगे.
सरकार ने फर्जी GST रजिस्ट्रेशन के मामलों की जानकारी भी साझा की. वित्त वर्ष 2025-26 में जाली PAN और आधार कार्ड जैसे दस्तावेजों के जरिए बनाए गए 1,517 नकली GST रजिस्ट्रेशन पकड़े गए.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्रीय वस्तु सेवा कर (GST) अधिकारियों ने वित्त वर्ष 2025-26 में इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) धोखाधड़ी के 30,162 मामलों का पता लगाया है. इन मामलों में करीब ₹74,782 करोड़ की टैक्स चोरी शामिल है. सरकार के मुताबिक, इस दौरान 358 लोगों को गिरफ्तार किया गया. ITC फ्रॉड के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र और गुजरात से सामने आए, जहां हजारों करोड़ रुपये की धोखाधड़ी पकड़ी गई.केंद्रीय GST अधिकारियों ने वित्त वर्ष 2025-26 में फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के बड़े नेटवर्क का खुलासा किया है.
राज्यसभा में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि इस अवधि में ITC धोखाधड़ी के 30,162 मामलों का पता लगाया गया, जिनमें कुल ₹74,782 करोड़ की हेराफेरी शामिल थी. इन मामलों में 358 लोगों को गिरफ्तार किया गया.
महाराष्ट्र और गुजरात में सबसे ज्यादा मामले
ITC फ्रॉड के मामलों में महाराष्ट्र सबसे आगे रहा. राज्य में ₹18,320 करोड़ की धोखाधड़ी से जुड़े 9,629 मामले दर्ज किए गए. वहीं गुजरात में ₹12,633 करोड़ के 12,511 मामले सामने आए. वित्त राज्य मंत्री ने बताया कि ये मामले कई क्षेत्रों में पाए गए हैं, जिनमें लोहा और स्टील, कपड़ा, प्लास्टिक, कागज उत्पाद, प्लाईवुड, सीमेंट, तांबा समेत कई मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर शामिल हैं. इसके अलावा वर्क कॉन्ट्रैक्ट सर्विस, मैनपावर सप्लाई, रियल एस्टेट और अन्य सर्विस सेक्टर में भी ITC धोखाधड़ी के मामले मिले हैं.
तीन साल में तेजी से बढ़े ITC फ्रॉड
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में ITC धोखाधड़ी के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई है.
1. वित्त वर्ष 2025 में ₹58,773 करोड़ के 15,283 मामलों का खुलासा हुआ और 178 लोगों को गिरफ्तार किया गया.
2. वित्त वर्ष 2024 में ₹36,373 करोड़ से जुड़े 9,190 मामलों का पता चला और 182 गिरफ्तारियां हुईं.
फर्जी GST रजिस्ट्रेशन से ₹9,940 करोड़ की धोखाधड़ी
सरकार ने फर्जी GST रजिस्ट्रेशन के मामलों की जानकारी भी साझा की. वित्त वर्ष 2025-26 में जाली PAN और आधार कार्ड जैसे दस्तावेजों के जरिए बनाए गए 1,517 नकली GST रजिस्ट्रेशन पकड़े गए. इनसे करीब ₹9,940 करोड़ के ITC फ्रॉड का पता चला. इन मामलों में 60 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि सात आरोपी अभी फरार हैं.
इसके मुकाबले वित्त वर्ष 2024-25 में 3,977 फर्जी GST रजिस्ट्रेशन पकड़े गए थे, जिनमें ₹13,109 करोड़ की ITC धोखाधड़ी शामिल थी. वहीं वित्त वर्ष 2023-24 में 5,699 फर्जी रजिस्ट्रेशन के जरिए ₹15,085 करोड़ के फ्रॉड का खुलासा हुआ था. सरकार ने कहा कि ITC धोखाधड़ी सिर्फ किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग से लेकर सर्विस इंडस्ट्री तक इसका नेटवर्क फैला हुआ है.
भारत के FTA साझेदार देशों में ASEAN क्षेत्र को सबसे ज्यादा निर्यात किया गया. वित्त वर्ष 2025-26 में ASEAN देशों को भारत का निर्यात 38.42 अरब डॉलर रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के निर्यात क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड प्रदर्शन किया है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में देश का कुल निर्यात पहली बार 863.1 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया. इसमें वस्तुओं (Merchandise) का निर्यात 441.8 अरब डॉलर और सेवाओं (Services) का निर्यात 421.3 अरब डॉलर रहा. सरकार के अनुसार, बढ़ते मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के जरिए भारत को नए बाजारों तक पहुंच मिली है, जिससे UAE, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश प्रमुख निर्यात साझेदार बनकर उभरे हैं और देश के वैश्विक व्यापार को मजबूती मिली है.
ASEAN, UAE और UK बने प्रमुख बाजार
भारत के FTA साझेदार देशों में ASEAN क्षेत्र को सबसे ज्यादा निर्यात किया गया. वित्त वर्ष 2025-26 में ASEAN देशों को भारत का निर्यात 38.42 अरब डॉलर रहा. इसके बाद UAE के साथ भारत के व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) के तहत निर्यात 37.36 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
SAFTA देशों को भारत का निर्यात 25.77 अरब डॉलर रहा. वहीं, भारत और ब्रिटेन के बीच 15 जुलाई 2026 से लागू हुए Comprehensive Economic and Trade Agreement (CETA) के तहत वित्त वर्ष 2025-26 में 13.44 अरब डॉलर का मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट दर्ज किया गया.
इसके अलावा सिंगापुर को 11.86 अरब डॉलर, जबकि नेपाल, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देशों को भी भारत के निर्यात में मजबूत वृद्धि देखने को मिली.
FTA से बढ़ा निर्यात विविधीकरण
सरकार के अनुसार, हाल में हुए मुक्त व्यापार समझौतों के तहत मिलने वाली टैरिफ छूट का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है. इससे निर्यातकों की भागीदारी बढ़ी है और भारतीय उत्पादों की पहुंच नए बाजारों तक बनी है.
भारत-UAE CEPA, जो मई 2022 से लागू है, के तहत अब तक 4.45 लाख से ज्यादा Certificate of Origin जारी किए जा चुके हैं. UAE को निर्यात किए जाने वाले उत्पादों की टैरिफ लाइनों की संख्या वित्त वर्ष 2021-22 के 7,546 से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 8,053 हो गई है. इस दौरान UAE को भारत का निर्यात 37.3 अरब डॉलर रहा.
इसी तरह भारत-ऑस्ट्रेलिया Economic Cooperation and Trade Agreement (ECTA) के तहत दिसंबर 2022 से अब तक 2.73 लाख Certificate of Origin जारी किए गए हैं. ऑस्ट्रेलिया को निर्यात की जाने वाली टैरिफ लाइनों की संख्या 5,396 से बढ़कर 5,668 हो गई है, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 में निर्यात 7.28 अरब डॉलर रहा.
ओमान और EFTA समझौते से भी उम्मीदें
भारत-मॉरीशस CECPA के तहत भी भारतीय निर्यात उत्पादों की संख्या में विस्तार हुआ है. वहीं, हाल में लागू हुए भारत-ओमान CEPA का शुरुआती असर भी दिखाई देने लगा है. जून 2026 में ओमान को भारत का निर्यात महीने-दर-महीने आधार पर 54.7% और सालाना आधार पर 189.6% बढ़ा है.
इसके अलावा भारत-EFTA Trade and Economic Partnership Agreement (TEPA) के तहत अक्टूबर 2025 में समझौता लागू होने के बाद अब तक 7,885 Certificate of Origin जारी किए जा चुके हैं.
श्रम आधारित उद्योगों को मिलेगा फायदा
सरकार ने कहा कि भारत के हालिया व्यापार समझौतों का उद्देश्य घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक बाजारों तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराना है. UAE, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और EFTA के साथ हुए समझौते से टेक्सटाइल और परिधान, चमड़ा एवं फुटवियर, रत्न एवं आभूषण, समुद्री उत्पाद, कालीन, हस्तशिल्प और कृषि उत्पाद जैसे रोजगार आधारित क्षेत्रों को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है.
सरकार के मुताबिक, इन समझौतों से रोजगार आधारित निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग की प्रतिस्पर्धा क्षमता मजबूत होगी और भारतीय कंपनियां वैश्विक सप्लाई चेन से ज्यादा बेहतर तरीके से जुड़ सकेंगी.
निर्यात निगरानी के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म मजबूत
केंद्र सरकार ने कहा कि निर्यात प्रदर्शन की निगरानी के लिए वाणिज्य विभाग, विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT), निर्यात संवर्धन परिषदों, कमोडिटी बोर्डों, राज्य सरकारों, जिलों और विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों के बीच समन्वय बढ़ाया गया है.
निर्यातकों की मदद के लिए सरकार ने Trade e-Connect और Trade Intelligence and Analytics (TIA) Portal जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को मजबूत किया है. इन प्लेटफॉर्म के जरिए बाजार से जुड़ी जानकारी, टैरिफ डेटा, Rules of Origin, व्यापार विश्लेषण और खरीदार-विक्रेता से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है.
वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने लोकसभा में लिखित जवाब में यह जानकारी दी. उन्होंने कहा कि सरकार का फोकस बाजार पहुंच बढ़ाने, व्यापार प्रक्रियाओं को आसान बनाने और भारत की निर्यात आधारित विकास रणनीति को आगे बढ़ाने पर है.
कोयले की ढुलाई और निकासी क्षमता बढ़ाने के लिए कंपनी ने रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी बड़ा खर्च किया है. पहली तिमाही में रेलवे साइडिंग और रेल कॉरिडोर के विकास पर ₹754 करोड़ खर्च किए गए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी Coal India Limited (CIL) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में पूंजीगत खर्च में मजबूत प्रदर्शन किया है. कंपनी ने अप्रैल-जून 2026 के दौरान ₹3,399 करोड़ का कैपेक्स किया, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 16% अधिक है. कंपनी के मुताबिक, यह खर्च उसके पूरे वित्त वर्ष के ₹16,500 करोड़ के कैपेक्स लक्ष्य का 20.6% है.
Coal India ने बताया कि पहली तिमाही में उसके कुल कैपेक्स का सबसे बड़ा हिस्सा जमीन अधिग्रहण और उससे जुड़ी पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R) गतिविधियों पर खर्च हुआ. इस मद में कंपनी ने ₹804 करोड़ का निवेश किया, जो कुल तिमाही खर्च का करीब एक-चौथाई है.
जमीन अधिग्रहण पर सबसे ज्यादा जोर
कंपनी ने कहा कि खनन परियोजनाओं के लिए समय पर जमीन अधिग्रहण बेहद महत्वपूर्ण है. पर्याप्त कोयला भंडार उपलब्ध होने के बावजूद जमीन की उपलब्धता के बिना नई परियोजनाएं शुरू करना या मौजूदा परियोजनाओं का विस्तार करना संभव नहीं होता. वित्त वर्ष 2026-27 में Coal India ने जमीन अधिग्रहण और इससे जुड़ी गतिविधियों के लिए ₹4,173 करोड़ का प्रावधान किया है, जो उसके सभी कैपेक्स मदों में सबसे अधिक है.
कोयला निकासी ढांचे पर बढ़ा निवेश
कोयले की ढुलाई और निकासी क्षमता बढ़ाने के लिए कंपनी ने रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी बड़ा खर्च किया है. पहली तिमाही में रेलवे साइडिंग और रेल कॉरिडोर के विकास पर ₹754 करोड़ खर्च किए गए.
इसके अलावा कोयला हैंडलिंग प्लांट (CHP), साइलो, वे-ब्रिज और सड़कों जैसी सुविधाओं पर ₹195 करोड़ का निवेश किया गया. इस तरह कोयला निकासी से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर कुल खर्च ₹949 करोड़ रहा.
मशीनरी और उपकरणों पर ₹819 करोड़ खर्च
Coal India ने प्लांट और मशीनरी से जुड़े कामों पर पहली तिमाही में ₹819 करोड़ खर्च किए. इसमें भारी अर्थ मूविंग मशीनरी (HEMM) की खरीद, वॉशरी के निर्माण और विस्तार तथा अन्य उपकरणों पर किया गया निवेश शामिल है.
कंपनी के मुताबिक, जमीन अधिग्रहण, कोयला निकासी इंफ्रास्ट्रक्चर और प्लांट एवं मशीनरी पर किया गया खर्च उसके कुल पहली तिमाही कैपेक्स का करीब 75% हिस्सा है.
रिन्यूएबल एनर्जी में भी बढ़ा निवेश
कोयला कारोबार के साथ-साथ कंपनी अपने ऊर्जा पोर्टफोलियो में विविधता लाने पर भी काम कर रही है. पहली तिमाही में Coal India ने सोलर प्रोजेक्ट्स पर ₹278 करोड़ खर्च किए, जबकि जॉइंट वेंचर्स में उसका निवेश ₹207 करोड़ रहा. वित्त वर्ष 2025-26 में Coal India ने ₹16,000 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले ₹19,607 करोड़ का रिकॉर्ड कैपेक्स हासिल किया था.
पहली तिमाही में मुनाफा स्थिर
Coal India ने जून 2026 में समाप्त पहली तिमाही में ₹8,849 करोड़ का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट दर्ज किया, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले लगभग स्थिर रहा. वहीं, कंपनी की कुल आय 8% बढ़कर ₹48,295 करोड़ पहुंच गई.
अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी ‘मेड इन इंडिया’ खिलौनों की मांग बढ़ी है. यह बदलाव भारत के खिलौना निर्माण क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता सुधार को दर्शाता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का खिलौना उद्योग पिछले कुछ वर्षों में बड़े बदलाव से गुजर रहा है. कभी विदेशी खिलौनों से भरे रहने वाले भारतीय बाजार में अब घरेलू कंपनियों के बनाए खिलौनों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है. लोकसभा में सरकार की ओर से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2018-19 की तुलना में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत के खिलौना निर्यात में 89.1% की बढ़ोतरी हुई है. वहीं, इसी अवधि में खिलौनों के आयात में करीब 37.5% की कमी आई है.
आज भारत में बने खिलौने दुनियाभर के बाजारों में अपनी जगह बना रहे हैं. अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी ‘मेड इन इंडिया’ खिलौनों की मांग बढ़ी है. यह बदलाव भारत के खिलौना निर्माण क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता सुधार को दर्शाता है.
गुणवत्ता सुधार से बदली तस्वीर
कुछ साल पहले तक भारतीय बाजार में बड़ी संख्या में कम गुणवत्ता वाले विदेशी खिलौनों की बिक्री होती थी. वर्ष 2019 में सरकार की जांच में सामने आया था कि बाजार में उपलब्ध केवल करीब 33% खिलौने ही गुणवत्ता मानकों पर खरे उतर रहे थे. इसके बाद सरकार ने खिलौनों के लिए सख्त गुणवत्ता नियम लागू किए.
इन कदमों का असर अब दिखाई दे रहा है. सरकार के अनुसार, देश में उपलब्ध करीब 95% खिलौने अब गुणवत्ता मानकों को पूरा कर रहे हैं. इससे न केवल घरेलू निर्माताओं को फायदा हुआ है, बल्कि उपभोक्ताओं को भी सुरक्षित और बेहतर उत्पाद मिल रहे हैं.
भारत मंडपम में दिखी घरेलू उद्योग की ताकत
जुलाई 2026 में दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित टॉय बिज इंटरनेशनल प्रदर्शनी में भारतीय खिलौना उद्योग की बढ़ती ताकत देखने को मिली. इस आयोजन में 400 से अधिक भारतीय कंपनियों ने अपने उत्पाद प्रदर्शित किए. वहीं, 40 से ज्यादा देशों के खरीदारों और कारोबारियों ने इसमें हिस्सा लिया. इस तरह के आयोजनों से भारतीय खिलौना निर्माताओं को वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाने का अवसर मिल रहा है और निर्यात को बढ़ावा मिल रहा है.
सरकारी नीतियों से मिला सहारा
भारत के खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं. विदेशी खिलौनों के आयात पर कड़े नियम और बढ़ी हुई कस्टम ड्यूटी से घरेलू कंपनियों को प्रतिस्पर्धा करने का मौका मिला. इसके अलावा, स्थानीय निर्माताओं को प्रोत्साहन, गुणवत्ता प्रमाणन और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया. नई शिक्षा नीति में भी भारतीय खिलौनों और स्थानीय उत्पादों के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन पहलों से भारत वैश्विक खिलौना बाजार में अपनी हिस्सेदारी और बढ़ा सकता है.