जानकारी के अनुसार, दोनों ब्रोकर्स फिलहाल MSE के साथ इंटीग्रेशन का परीक्षण कर रहे हैं. ग्राहकों के लिए एक्सचेंज उपलब्ध कराने से पहले उनके ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म में कुछ प्रोडक्ट-स्तरीय बदलाव करने होंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारत के दो बड़े रिटेल ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म ग्रोव और जेरोधा अगले तीन से चार महीनों में मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (MSE) को कैश मार्केट ट्रेडिंग के अतिरिक्त विकल्प के तौर पर अपने प्लेटफॉर्म पर जोड़ सकते हैं. इससे MSE की रिटेल निवेशकों तक पहुंच बढ़ने और एक्सचेंज की लिक्विडिटी में सुधार की संभावना है.
जानकारी के अनुसार, दोनों ब्रोकर्स फिलहाल MSE के साथ इंटीग्रेशन का परीक्षण कर रहे हैं. ग्राहकों के लिए एक्सचेंज उपलब्ध कराने से पहले उनके ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म में कुछ प्रोडक्ट-स्तरीय बदलाव करने होंगे. हालांकि, अंतिम रोलआउट इन प्रक्रियाओं के सफलतापूर्वक पूरा होने पर निर्भर करेगा.
MSE के कैश मार्केट में रोजाना 400-500 करोड़ रुपये का कारोबार
MSE में फिलहाल कैश मार्केट का दैनिक कारोबार करीब 400-500 करोड़ रुपये है. इसमें मार्केट मेकर के जरिए किए जाने वाले लेनदेन भी शामिल हैं. एक्सचेंज के बाजार आंकड़ों के मुताबिक, 9 सितंबर को दोपहर 2:01 बजे तक ट्रेडेड वैल्यू करीब 381.7 करोड़ रुपये थी.
ग्रोव और जेरोधा जैसे बड़े रिटेल ब्रोकर्स के जुड़ने से MSE को प्रोपाइटरी ट्रेडिंग फर्मों से आगे अपना निवेशक आधार बढ़ाने में मदद मिल सकती है. इससे एक्सचेंज को बड़ी संख्या में रिटेल निवेशकों तक पहुंच मिलेगी और कारोबार में विविधता आने की उम्मीद है.
MSE से पहले से जुड़ा है ग्रोव और जेरोधा का वित्तीय संबंध
ग्रोव और जेरोधा का MSE के साथ पहले से वित्तीय संबंध भी है. एक्सचेंज ने दिसंबर 2024 और अगस्त 2025 में दो चरणों में कुल 1,240 करोड़ रुपये जुटाए थे. इन फंडिंग राउंड में ग्रोव और जेरोधा समेत कई ब्रोकरेज हाउस ने भाग लिया था. MSE भारत का तीसरा स्टॉक एक्सचेंज है और इसने इस साल की शुरुआत में औपचारिक रूप से अपना परिचालन शुरू किया था.
3-4 महीने में F&O सेगमेंट लॉन्च करने की भी तैयारी
MSE अपने फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट को लॉन्च करने की भी तैयारी कर रहा है. हालांकि, डेरिवेटिव्स कारोबार शुरू करने से पहले एक्सचेंज कैश मार्केट में स्वस्थ और टिकाऊ ट्रेडिंग वॉल्यूम विकसित करना चाहता है. F&O सेगमेंट को भी करीब तीन से चार महीने में लॉन्च किए जाने की उम्मीद है. यह समयसीमा बड़े रिटेल ब्रोकर्स के साथ MSE के इंटीग्रेशन की संभावित समयसीमा के आसपास ही है. ऐसे में डेरिवेटिव्स कारोबार शुरू करने से पहले कैश मार्केट में पर्याप्त लिक्विडिटी बनाना MSE के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण होगा.
भारत के डेरिवेटिव्स बाजार में इस समय नियामकीय और संरचनात्मक बदलाव भी हो रहे हैं. अगस्त में इक्विटी डेरिवेटिव्स गतिविधि कमजोर हुई और नए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन मैकेनिज्म को लेकर अनिश्चितता के बीच ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स की ट्रेडिंग संख्या महीने-दर-महीने 30 फीसदी घट गई.
बड़े ब्रोकर्स से MSE को लिक्विडिटी बढ़ाने में मिलेगी मदद
ग्रोव और जेरोधा का जुड़ना MSE को भारत के इक्विटी बाजार में एक बड़े वैकल्पिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के तौर पर स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. रिटेल निवेशकों की अधिक भागीदारी से एक्सचेंज का ट्रेडिंग बेस अधिक विविध हो सकता है और प्रोपाइटरी मार्केट पार्टिसिपेंट्स पर उसकी निर्भरता कम हो सकती है.
इंटीग्रेशन पूरा होने के बाद इन ब्रोकरेज के ग्राहकों को कैश मार्केट में लेनदेन के लिए MSE एक और एक्सचेंज विकल्प के रूप में उपलब्ध होगा. फिलहाल मुख्य फोकस तकनीकी परीक्षण और ट्रेडिंग प्रोडक्ट में जरूरी बदलावों को पूरा करने पर है. इसलिए तीन से चार महीने की अनुमानित समयसीमा सफल इंटीग्रेशन पर निर्भर करेगी.
कोच्चि की इंटरनेशनल शिप रिपेयर फैसिलिटी को संयुक्त उद्यम में ट्रांसफर करेगा कोचीन शिपयार्ड, सुविधा के विस्तार से वर्कस्टेशन की संख्या 6 से बढ़कर 10 होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कोचीन शिपयार्ड ने विलिंगडन आइलैंड, कोच्चि स्थित अपनी इंटरनेशनल शिप रिपेयर फैसिलिटी (ISRF) के संचालन और प्रबंधन के लिए DP World की कंपनी Drydocks World–Dubai FZCO के साथ 50:50 संयुक्त उद्यम (JV) बनाने को मंजूरी दी है.
प्रस्तावित सौदे के तहत कोचीन शिपयार्ड ISRF को कम से कम ₹1,800 करोड़ के मूल्यांकन पर स्लंप-सेल आधार पर नए संयुक्त उद्यम को ट्रांसफर करेगा. इस राशि का आधा भुगतान नकद में किया जाएगा, जबकि बाकी आधी राशि JV के शेयरों के रूप में प्राप्त होगी. ₹1,800 करोड़ का यह मूल्यांकन कोचीन शिपयार्ड के लिए महत्वपूर्ण है. यह 31 मार्च 2026 तक कंपनी की नेटवर्थ के करीब 30.55 फीसदी के बराबर है.
DP World की कंपनी की संचालन में बड़ी भूमिका
संयुक्त उद्यम में कोचीन शिपयार्ड और Drydocks World की 50-50 हिस्सेदारी होगी. हालांकि, Drydocks World को JV के पांच निदेशकों में से तीन नामित करने का अधिकार होगा, जबकि कोचीन शिपयार्ड दो निदेशक नामित करेगा.
इसके अलावा, Drydocks World को वरिष्ठ प्रबंधन में CEO, CFO और COO समेत प्रमुख पदों पर अधिकारियों को नामित करने का अधिकार होगा. इससे सुविधा के संचालन और प्रबंधन में DP World की कंपनी की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी.
JV विलिंगडन आइलैंड स्थित ISRF का स्वामित्व, संचालन और प्रबंधन करेगा. यहां 130 मीटर तक लंबे और 6,000 टन तक वजन वाले वाणिज्यिक और नौसैनिक जहाजों की ड्राई-डॉकिंग, रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल का काम किया जा सकेगा. साझेदार सुविधा का विस्तार करने की भी योजना बना रहे हैं. इसके तहत चार नए वर्कस्टेशन जोड़े जाएंगे, जिससे कुल संख्या छह से बढ़कर 10 हो जाएगी.
₹970 करोड़ में बनी सुविधा ने FY26 में कमाए ₹207 करोड़
करीब 30 हेक्टेयर में फैली ISRF विलिंगडन आइलैंड पर स्थित है. यह सुविधा कोचीन पोर्ट अथॉरिटी से 60 साल की लीज पर मिली जमीन और जल क्षेत्र में विकसित की गई है.
इस सुविधा के निर्माण पर करीब ₹970 करोड़ खर्च हुए हैं. इसमें 6,000 टन क्षमता वाली शिप लिफ्ट और ट्रांसफर प्रणाली, छह वर्कस्टेशन और करीब 1,400 मीटर की बर्थिंग क्षमता शामिल है. यह सुविधा एक साथ छह जहाजों को संभाल सकती है और इसकी सालाना क्षमता 82 जहाजों तक है.
ISRF का उद्घाटन जनवरी 2024 में हुआ था और उसी साल अगस्त में इसने व्यावसायिक संचालन शुरू किया. वित्त वर्ष 2025-26 में इस सुविधा ने ₹207.33 करोड़ का राजस्व हासिल किया, जो कोचीन शिपयार्ड के ऑपरेशंस से प्राप्त कुल राजस्व का करीब 4.81 फीसदी था.
भारत की शिप रिपेयर क्षमता बढ़ाने पर जोर
इस साझेदारी से Drydocks World का जहाज मरम्मत और समुद्री परिचालन का अनुभव कोचीन शिपयार्ड की मौजूदा भारतीय सुविधा के साथ जुड़ेगा. इससे कंपनी को वाणिज्यिक और नौसैनिक जहाजों की मरम्मत क्षमता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है. Drydocks World जहाज मरम्मत, जहाजों के रूपांतरण और ऑफशोर एनर्जी सेवाओं के क्षेत्र में काम करती है. दुबई स्थित इसकी सुविधा मध्य पूर्व की सबसे बड़ी शिप रिपेयर फैसिलिटी है.
प्रस्तावित लेनदेन के लिए कोचीन पोर्ट अथॉरिटी, बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय, निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) और कोचीन शिपयार्ड के शेयरधारकों समेत संबंधित मंजूरियां जरूरी होंगी.
संयुक्त उद्यम समझौते पर 11 सितंबर को हस्ताक्षर किए जाने का प्रस्ताव है. इसके बाद JV के गठन और नियामकीय मंजूरियां मिलने के बाद अन्य अंतिम समझौतों पर हस्ताक्षर किए जाएंगे. कंपनी के मुताबिक, यह लेनदेन मौजूदा वित्त वर्ष के अंत से पहले पूरा होने की उम्मीद है.
विदेश यात्रा करने वालों और विदेशी मुद्रा में खरीदारी करने वाले ग्राहकों को मिलेगा सीधा फायदा, बैंक ने अंतरराष्ट्रीय खर्च को किफायती बनाने पर दिया जोर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC FIRST Bank) ने अपने क्रेडिट कार्ड पोर्टफोलियो में जीरो फॉरेक्स मार्कअप की सुविधा शुरू करने की घोषणा की है. बैंक का कहना है कि इस कदम से विदेश यात्रा करने वाले, अंतरराष्ट्रीय वेबसाइटों पर खरीदारी करने वाले और विदेशी मुद्रा में लेनदेन करने वाले ग्राहकों को फायदा होगा.
नई सुविधा के तहत पात्र आईडीएफसी फर्स्ट बैंक क्रेडिट कार्ड से विदेशी मुद्रा में किए गए लेनदेन पर ग्राहकों से सामान्य फॉरेक्स मार्कअप शुल्क नहीं लिया जाएगा. आमतौर पर कार्ड जारी करने वाले बैंक विदेशी मुद्रा में होने वाले लेनदेन पर मुद्रा रूपांतरण दर के अलावा फॉरेक्स मार्कअप शुल्क लेते हैं.
1.5 से 3.5 फीसदी तक हो सकता है फॉरेक्स मार्कअप
फॉरेक्स मार्कअप आम तौर पर कार्डधारक की घरेलू मुद्रा के अलावा किसी अन्य मुद्रा में किए गए लेनदेन पर लगाया जाता है. कार्ड और बैंक के आधार पर यह शुल्क करीब 1.5 से 3.5 फीसदी तक हो सकता है. ऐसे में जीरो फॉरेक्स मार्कअप की सुविधा से नियमित रूप से विदेश यात्रा करने वाले ग्राहकों और विदेशी वेबसाइटों से खरीदारी करने वालों को अच्छी-खासी बचत हो सकती है. बैंक ने इस पहल को “Travel more. Shop more. Save more” संदेश के साथ पेश किया है. इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय खर्च को क्रेडिट कार्ड ग्राहकों के लिए अधिक किफायती बनाना है.
कई कार्ड में पहले से उपलब्ध है जीरो फॉरेक्स सुविधा
IDFC FIRST Bank अपने कुछ क्रेडिट कार्ड में पहले से ही जीरो फॉरेक्स मार्कअप की सुविधा दे रहा है. इनमें FIRST WOW!, Mayura और Diamond Reserve क्रेडिट कार्ड शामिल हैं. FIRST WOW! कार्ड पर अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए जीरो फीसदी फॉरेक्स मार्कअप की सुविधा उपलब्ध है. वहीं, Diamond Reserve को इस साल की शुरुआत में जीरो-फॉरेक्स प्रीमियम ट्रैवल क्रेडिट कार्ड के तौर पर पेश किया गया था.
क्रेडिट कार्ड बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
बैंक की यह पहल भारत के क्रेडिट कार्ड बाजार में प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा सकती है, खासकर ट्रैवल और प्रीमियम खर्च वाले ग्राहकों के बीच. इस सेगमेंट में फॉरेक्स शुल्क के साथ-साथ एयरपोर्ट लाउंज एक्सेस, ट्रैवल रिवॉर्ड और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता जैसे फीचर ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं.
विदेश यात्रा करने वाले भारतीयों की संख्या बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय कारोबारियों व वेबसाइटों के साथ लेनदेन में वृद्धि के बीच विदेशी मुद्रा में होने वाले खर्च की लागत भी क्रेडिट कार्ड कंपनियों की ओर से दिए जाने वाले ऑफर का अहम हिस्सा बन गई है. ऐसे में जीरो फॉरेक्स मार्कअप की सुविधा ग्राहकों के लिए कार्ड चुनने में एक महत्वपूर्ण आकर्षण बन सकती है.
मई 2026 में, S.K. Mohanty उस बोर्डरूम में वापस आ गए, जहां कभी उनके पास किसी दूसरे व्यक्ति को प्रवेश से रोकने की शक्ति थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
चार साल पहले, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के कार्यरत पूर्णकालिक सदस्य के रूप में एस.के. मोहंती ने डिश टीवी के तीन स्वतंत्र निदेशकों के डीमैट खातों को बिना उनका पक्ष सुने फ्रीज करने का आदेश दिया था. बाद में जब इन तीन निदेशकों में से एक, शंकर अग्रवाल ने मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) में जनहित निदेशक के रूप में बोर्ड बैठकों में दोबारा शामिल होने की कोशिश की, तो मोहंती के नेतृत्व वाले सेबी ने विशेष रूप से उन्हें ऐसा न करने का निर्देश दिया. उसी आदेश में शामिल अन्य दो निदेशकों के लिए ऐसा कोई निर्देश नहीं था. केवल अग्रवाल को इससे रोका गया.
अब मोहंती खुद एमसीएक्स के संचालन मंडल में जनहित निदेशक के रूप में बैठे हैं. यह वही पद है, जिस पर कभी अग्रवाल थे. वही शेयर बाजार है, जहां से किसी व्यक्ति को बाहर रखने में मोहंती की भूमिका रही थी. एमसीएक्स या सेबी ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह स्थिति कम से कम सवाल खड़े करने वाली क्यों नहीं है. सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार, किसी ने इस मुद्दे पर सवाल भी नहीं उठाया है.
वह आदेश जिसका कोई बचाव नहीं कर सका
2022 में वास्तव में क्या हुआ था, इसकी शुरुआत करना जरूरी है, क्योंकि बिना किसी अतिशयोक्ति के भी यह मामला अपने आप में गंभीर है.
मार्च 2022 में मोहंती ने अग्रवाल, बी.डी. नारंग और रश्मि अग्रवाल, यानी डिश टीवी के तीन स्वतंत्र निदेशकों के खिलाफ एकतरफा आदेश पारित किया था. कंपनी द्वारा वार्षिक आम बैठक के मतदान परिणामों का खुलासा नहीं करने के मामले में उनके डीमैट खातों को फ्रीज कर दिया गया था.
एकतरफा आदेश का अर्थ है कि संबंधित पक्ष को न तो पहले कोई नोटिस दिया गया और न ही कार्रवाई से पहले अपना पक्ष रखने का अवसर मिला. सेबी के अपने उस परिपत्र में, जो इससे महज दो साल पहले जारी हुआ था, किसी प्रवर्तक के डीमैट खातों को फ्रीज करने से पहले 10 दिन का नोटिस देना अनिवार्य किया गया था. इन तीन निदेशकों को कोई नोटिस नहीं मिला.
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. जिस जानकारी को छिपाने के लिए सेबी ने इन निदेशकों के खिलाफ कार्रवाई की थी, उनके मुताबिक वह जानकारी कभी उनके बोर्ड तक पहुंची ही नहीं थी. यह जानकारी कंपनी और नियामक के बीच हुए पत्राचार में थी और स्वतंत्र निदेशकों का कहना था कि उन्हें वह पत्राचार दिखाया ही नहीं गया था. यानी उन्हें ऐसी जानकारी छिपाने के लिए दंडित किया गया, जिसके बारे में उनका कहना था कि उन्हें उसकी जानकारी ही नहीं थी.
इसके बाद मई 2022 में अग्रवाल ने कहा कि वह एमसीएक्स बोर्ड की बैठकों में दोबारा शामिल होंगे, क्योंकि उन्हें अलग रहने की अवधि समाप्त हो चुकी थी. इसके दो दिन बाद सेबी ने एक नया आदेश जारी किया. इसमें विशेष रूप से अग्रवाल को, और केवल उन्हें, अगली सूचना तक एमसीएक्स के बोर्ड कक्ष से दूर रहने का निर्देश दिया गया. नारंग या रश्मि अग्रवाल के लिए ऐसा कोई निर्देश नहीं था.
इस चयनात्मक कार्रवाई को किसी अन्य तरीके से देखना मुश्किल है. तीन लोगों में से केवल एक को अलग से निशाना बनाया गया और वह भी ऐसे मामले में जिसका एमसीएक्स से सीधा संबंध नहीं था.
प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण ने इस कार्रवाई को स्वीकार नहीं किया. न्यायाधिकरण ने पाया कि सेबी अंतिम फैसला जारी करने की अपनी समयसीमा पार कर चुका था और बाद में प्रतिबंध हटाने का आदेश दिया. हालांकि, उसने देरी के लिए जिम्मेदार पूर्णकालिक सदस्य का नाम बताने से इनकार कर दिया.
जब सेबी का अंतिम आदेश दूसरे पूर्णकालिक सदस्य अनंत बरुआ ने जारी किया, तो तीनों निदेशकों के खिलाफ सभी आरोप हटा दिए गए. कोई उल्लंघन नहीं पाया गया और कोई जुर्माना भी नहीं लगाया गया.
यानी एकतरफा आदेश के तहत पहले तीन लोगों के खाते फ्रीज किए गए और चार साल बाद मामला पूरी तरह खत्म हो गया.
वह सिद्धांत जो सच होने के लिए बहुत व्यवस्थित है
स्वाभाविक रूप से, लोग इस पूरे घटनाक्रम के पीछे नौकरशाही की गलती से बड़ा कोई कारण तलाशना चाहते हैं. अब जो कहानी सामने आ रही है, उसके मुताबिक मोहंती रास्ता साफ कर रहे थे. कहा जा रहा है कि एमसीएक्स के सबसे वरिष्ठ जनहित निदेशक के रूप में अग्रवाल अध्यक्ष पद की अगली कतार में थे और उन्हें अयोग्य ठहराना मकसद था, जबकि हर्ष कुमार भनवाला उस पद पर आने की तैयारी कर रहे थे.
यह एक आकर्षक कहानी है. लेकिन उपलब्ध दस्तावेज इसके उलट तस्वीर पेश करते हैं.
भनवाला को एमसीएक्स के जनहित निदेशकों के बीच से अध्यक्ष नहीं बनाया गया था. उन्हें नाबार्ड से लाया गया था और सेबी की मंजूरी के बाद 7 नवंबर 2022 से प्रभावी अध्यक्ष नियुक्त किया गया था.
अग्रवाल को भी वास्तव में कभी हटाया नहीं गया था. एमसीएक्स की फरवरी 2023 तक की शेयर बाजार संबंधी सूचना में उन्हें कार्यरत जनहित निदेशक के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. यानी भनवाला के अध्यक्ष पद संभालने के करीब तीन महीने बाद तक अग्रवाल कागजों पर बोर्ड में मौजूद थे.
जिस व्यक्ति को कथित तौर पर उत्तराधिकार की दौड़ से बाहर करने की योजना बताई जा रही थी, वह उस समय भी रिकॉर्ड में मौजूद था, जब अध्यक्ष पद की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी.
इससे किसी को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता. इसका अर्थ केवल इतना है कि वास्तविक मामला किसी बड़ी साजिश से छोटा और अधिक विचित्र हो सकता है. लेकिन छोटा और वास्तविक सवाल उस बड़ी कहानी से अधिक महत्वपूर्ण है, जो दस्तावेजों की तारीखें सामने आते ही कमजोर पड़ जाती है.
वह हिस्सा जिस पर अभी कोई बात नहीं कर रहा
क्योंकि असली सवाल यह होना चाहिए और फिलहाल नहीं है.
मई 2026 में एमसीएक्स ने एस.के. मोहंती को अपने ही संचालन मंडल में शामिल कर लिया. वह जनहित निदेशक बने.
2022 की घटनाओं को पूरी तरह अलग रख दें, तब भी यह समयक्रम सवाल खड़े करता है. मोहंती ने सेबी के पूर्णकालिक सदस्य के रूप में पांच साल बिताए और उनके पास उसी तरह के बाजार ढांचे पर नियामकीय अधिकार था, जिसका प्रतिनिधित्व एमसीएक्स करता है.
वह जून 2023 में सेबी से बाहर हुए. तीन साल से भी कम समय बाद वह उसी शेयर बाजार के संचालन मंडल में आ गए, जिसकी निगरानी कभी उनका पुराना विभाग करता था.
इस दौरान भी वह निष्क्रिय नहीं रहे. सार्वजनिक सूचनाओं के मुताबिक, सेबी छोड़ने के बाद उन्होंने यूपीएल, एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया, सीएएमएस और बजाज फिनसर्व एएमसी में निदेशक पद हासिल किए. यह नियुक्तियों का ऐसा समूह है जो किसी बड़े कारोबारी समूह के शीर्ष अधिकारी को भी प्रभावित कर सकता है.
इसे जैसा है वैसा ही कहना चाहिए. यह किसी गड़बड़ी का सबूत नहीं है, बल्कि हितों के संभावित टकराव से जुड़े उस ढांचे पर सवाल उठाता है, जहां अलग-अलग देखें तो कोई एक नियुक्ति इतनी असामान्य नहीं लगती कि उसे रोका जा सके.
वरिष्ठता का सवाल: क्या मोहंती बनेंगे एमसीएक्स के अध्यक्ष?
एक और तथ्य को बिना किसी निष्कर्ष के रिकॉर्ड पर रखना जरूरी है. एमसीएक्स के जनहित निदेशक आम तौर पर वरिष्ठता के आधार पर अध्यक्ष पद की अगली कतार में होते हैं.
वर्तमान में बोर्ड के सबसे वरिष्ठ जनहित निदेशक पूर्व भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड के पूर्णकालिक सदस्य तथा सशस्त्र बलों की पृष्ठभूमि वाले डॉ. नवरंग सैनी हैं. उन्हें एक ईमानदार अधिकारी के रूप में देखा जाता है.
किसी भी सार्वजनिक सूचना, प्रस्ताव या बयान में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि वरिष्ठता के आधार पर अगले एमसीएक्स अध्यक्ष बनने वाले सैनी को बदलने या हटाने की कोई प्रक्रिया चल रही है.
फिर भी, यह ऐसा घटनाक्रम है जिस पर नजर रखना जरूरी है, खासकर इसलिए कि अब बोर्ड में कौन-कौन मौजूद है. इससे ज्यादा और इससे कम नहीं.
अगर डॉ. सैनी को किसी तरह हटाया जाता है, तो मोहंती अगले एमसीएक्स अध्यक्ष बन सकते हैं.
एक पूर्णकालिक सदस्य द्वारा एक स्वतंत्र निदेशक के खिलाफ पारित एकतरफा आदेश अपील में खारिज कर दिया गया. तीन साल बाद वही अधिकारी उसी शेयर बाजार के संचालन मंडल में बैठे हैं, जिसे उनके आदेश ने कभी एक व्यक्ति को बाहर रखने की कोशिश की थी.
यह कोई अनुमान नहीं है. यह घटनाक्रमों का दर्ज इतिहास है.
एमसीएक्स और सेबी ने सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि संभावित हितों का यह टकराव क्यों नहीं माना जाना चाहिए. मौजूदा सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर इस सवाल का कोई स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आया है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
2,800 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर से माल परिवहन में समय और लागत घटने की उम्मीद, दादरी से मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट तक रेल कनेक्टिविटी हुई मजबूत
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को करीब ₹73,000 करोड़ की लागत से तैयार पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारे (Western Dedicated Freight Corridor) को राष्ट्र को समर्पित किया. उत्तर प्रदेश के दादरी से महाराष्ट्र के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) तक फैला यह कॉरिडोर देश के माल परिवहन नेटवर्क के लिए बड़ा बदलाव माना जा रहा है. इसके पूरा होने से उत्तर भारत के औद्योगिक क्षेत्रों और पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाहों के बीच माल की आवाजाही तेज होने के साथ लॉजिस्टिक्स लागत घटने की उम्मीद है.
20 साल बाद पूरा हुआ बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट
पश्चिमी DFC करीब 2,800 किलोमीटर लंबा है और इसकी योजना को औपचारिक रूप से वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में शुरू किया गया था. इस परियोजना ने करीब दो दशकों में तीन प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल देखे. इसके साथ ही देश के दो प्रमुख समर्पित माल ढुलाई गलियारों को पूरा करने का लक्ष्य हासिल हो गया है.
इससे पहले पंजाब और बिहार से पश्चिम बंगाल तक जुड़ने वाला पूर्वी समर्पित माल ढुलाई गलियारा अक्टूबर 2023 में पूरा हुआ था. पूर्वी DFC पर करीब ₹51,000 करोड़ खर्च हुए हैं. दोनों कॉरिडोर की कुल लागत लगभग ₹1.24 लाख करोड़ रही है.
30 घंटे की जगह 10-12 घंटे में पूरी होगी यात्रा
पश्चिमी DFC पर मालगाड़ियों की अधिकतम गति 100 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है. अधिकारियों के मुताबिक, जहां सामान्य रेलवे ट्रैक पर 100 किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब छह घंटे लगते हैं, वहीं DFC पर यही दूरी औसतन ढाई घंटे में पूरी की जा सकती है.
प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, एक ट्रक को जिस यात्रा में करीब 30 घंटे लगते हैं, वही दूरी DFC के जरिए 10-12 घंटे में पूरी की जा सकती है. इससे माल ढुलाई की गति बढ़ने के साथ कारोबारियों के लिए परिवहन लागत में भी कमी आने की उम्मीद है.
मुंद्रा, कांडला और पिपावाव के साथ JNPA की कनेक्टिविटी मजबूत
पश्चिमी DFC को देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों और बंदरगाहों को जोड़ने वाली अहम कड़ी माना जा रहा है. यह मुंद्रा, कांडला, पिपावाव और JNPA जैसे प्रमुख बंदरगाहों को उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के औद्योगिक केंद्रों से जोड़ता है. विशेष रूप से JNPA से जुड़ने वाला अंतिम महत्वपूर्ण हिस्सा लंबे समय से परियोजना की सबसे बड़ी बाधाओं में शामिल था. अब इसके पूरा होने से देश के सबसे बड़े सरकारी कंटेनर बंदरगाहों में शामिल JNPA को उत्तर भारत से सीधे और तेज रेल संपर्क का फायदा मिलेगा.
कंटेनर ढुलाई में डबल-स्टैक ट्रेन से बढ़ेगी क्षमता
कॉरिडोर के पूरा होने से कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों को भी बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है. JNPA तक डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेन चलने से अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध होगी और बंदरगाह पर कंटेनरों के टर्नअराउंड में भी सुधार आ सकता है. हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक वास्तविक लागत बचत अनुमान से कम रह सकती है. कंटेनर ट्रेन ऑपरेटर एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष पुरी के अनुसार, मौजूदा नियमों और कंटेनरों के वजन एवं आकार से जुड़ी पाबंदियों के कारण डबल-स्टैकिंग का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है.
उनके मुताबिक, डबल-स्टैक कंटेनरों के लिए ट्रेन की गति भी 65-70 किलोमीटर प्रति घंटा तक सीमित हो सकती है, जबकि सिंगल-स्टैक ट्रेनें 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल सकती हैं.
फीडर रूट और पोर्ट क्षमता में सुधार की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि DFC से अधिकतम लाभ हासिल करने के लिए सिर्फ मुख्य कॉरिडोर को तेज करना पर्याप्त नहीं होगा. बंदरगाहों को DFC से जोड़ने वाले फीडर रूट और सामान्य रेलवे नेटवर्क से DFC के इंटरचेंज पॉइंट को भी बेहतर करना होगा.
इसके अलावा, JNPA पर बढ़ने वाले कंटेनर यातायात को संभालने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी. बढ़ते रेल यातायात के साथ अगर बंदरगाह पर भीड़ बढ़ती है तो DFC से मिलने वाला समय लाभ प्रभावित हो सकता है.
लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के लिए गेमचेंजर बनने की उम्मीद
पश्चिमी और पूर्वी DFC के पूरा होने से देश में माल ढुलाई के लिए अलग रेल नेटवर्क तैयार हो गया है. इसका उद्देश्य मालगाड़ियों को यात्री ट्रेनों से अलग करके तेज, भरोसेमंद और अधिक कुशल परिवहन उपलब्ध कराना है.
पश्चिमी DFC खास तौर पर उत्तर भारत के औद्योगिक क्षेत्रों को पश्चिमी तट के बंदरगाहों से जोड़कर निर्यात-आयात कारोबार को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. इससे माल ढुलाई का समय कम होने, लॉजिस्टिक्स लागत घटने और उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ने की उम्मीद है.
UPI, आधार आधारित भुगतान और डिजिटल लेंडिंग ने बढ़ाई वित्तीय पहुंच, MSME के लिए कर्ज की राह आसान करने में भी तकनीक की अहम भूमिका
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के फिनटेक इकोसिस्टम ने देश की वित्तीय व्यवस्था को बड़े स्तर पर बदल दिया है. डिजिटल तकनीक की मदद से बैंकिंग और औपचारिक वित्तीय सेवाएं ग्रामीण इलाकों तक पहुंची हैं और लोगों के लिए भुगतान, बैंकिंग तथा कर्ज लेना पहले के मुकाबले आसान हुआ है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मंगलवार को मुंबई में ग्लोबल फिनटेक फेस्ट (GFF) 2026 के उद्घाटन के दौरान यह बात कही.
मल्होत्रा ने कहा कि फिनटेक कंपनियां भारत की विशाल और विविध आबादी तथा औपचारिक वित्तीय व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरी हैं. इनके चलते वित्तीय सेवाओं की लागत कम हुई है, ग्राहक अनुभव बेहतर हुआ है और पूरी व्यवस्था की दक्षता बढ़ी है.
शाखा से निकलकर हर नागरिक के हाथ तक पहुंची बैंकिंग
RBI गवर्नर ने कहा कि पिछले एक दशक में फिनटेक ने भारत की वित्तीय व्यवस्था के ढांचे को बुनियादी रूप से बदल दिया है. बैंकिंग अब सिर्फ बैंक शाखाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि डिजिटल माध्यमों के जरिए सीधे नागरिकों के हाथ तक पहुंच गई है. उन्होंने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI), आधार आधारित भुगतान प्रणाली और जनधन इकोसिस्टम को इस डिजिटल विस्तार की प्रमुख आधारभूत व्यवस्थाओं के रूप में रेखांकित किया. इन प्रणालियों की मदद से उन आबादी वर्गों तक भी वित्तीय सेवाएं पहुंची हैं, जो पहले औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से कम जुड़े हुए थे.
खाते खोलने से लेकर भुगतान तक, सब कुछ हुआ तेज
मल्होत्रा के मुताबिक, तकनीक ने केवल वित्तीय सेवाओं की पहुंच नहीं बढ़ाई, बल्कि इन्हें उपलब्ध कराने के तरीके को भी बदल दिया है. डिजिटल सिस्टम ने बैंक खाते खोलने और भुगतान निपटाने में लगने वाला समय कम किया है. इससे लेनदेन की लागत घटी है. साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस आधारित एनालिटिक्स की मदद से धोखाधड़ी की पहचान करने की क्षमता भी मजबूत हुई है.
उन्होंने रियल टाइम सुपरविजन में तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल का भी उल्लेख किया. इसके जरिए वित्तीय संस्थान और नियामक संभावित जोखिमों की पहले पहचान कर सकते हैं और तेजी से कार्रवाई कर सकते हैं.
MSME को कर्ज दिलाने में डिजिटल सिस्टम की बड़ी भूमिका
फिनटेक का प्रभाव
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण रहा है. छोटे कारोबारों के लिए औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से कर्ज हासिल करना लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है. मल्होत्रा ने कहा कि कैश फ्लो आधारित लेंडिंग, अकाउंट एग्रीगेटर और यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म छोटे कारोबारों की वित्तीय स्थिति को बेहतर तरीके से समझने में ऋणदाताओं की मदद कर रहे हैं.
इन प्रणालियों के जरिए कर्ज देने वाली संस्थाएं केवल पारंपरिक संपार्श्विक पर निर्भर रहने के बजाय डिजिटल वित्तीय जानकारी के आधार पर भी उधारकर्ता की क्षमता का आकलन कर सकती हैं. इससे छोटे कारोबारियों और उद्यमियों के लिए औपचारिक कर्ज तक पहुंच बढ़ने की संभावना है.
RBI फिनटेक को मानता है महत्वपूर्ण साझेदार
RBI गवर्नर ने कहा कि केंद्रीय बैंक भविष्य की वित्तीय व्यवस्था तैयार करने में फिनटेक को एक महत्वपूर्ण साझेदार मानता है. उन्होंने नियामकीय सैंडबॉक्स, रिजर्व बैंक इनोवेशन हब और स्टार्टअप्स, फिनटेक कंपनियों तथा अन्य हितधारकों के साथ लगातार संवाद का उल्लेख किया. उनके मुताबिक, लगातार खुले और रचनात्मक संवाद के जरिए ही बेहतर नीतियां तैयार की जा सकती हैं.
नवाचार के साथ ग्राहक सुरक्षा भी जरूरी
फिनटेक क्षेत्र के तेजी से विस्तार के बीच RBI ने उद्योग में स्व-नियमन को भी बढ़ावा दिया है. मल्होत्रा ने कहा कि तकनीकी नवाचार के साथ ग्राहक सुरक्षा, डेटा और लेनदेन की सुरक्षा तथा भरोसे से जुड़े मजबूत उपाय भी जरूरी हैं.
उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक का उद्देश्य ऐसा वित्तीय वातावरण तैयार करना है, जहां नवाचार को बढ़ावा मिले और इसके साथ वित्तीय व्यवस्था सुरक्षित, समावेशी, निष्पक्ष और कुशल भी बनी रहे.
डिजिटल ढांचा बना वित्तीय व्यवस्था का अहम हिस्सा
RBI गवर्नर की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब भारत की वित्तीय व्यवस्था में डिजिटल ढांचे की भूमिका लगातार बढ़ रही है. डिजिटल प्लेटफॉर्म ने लोगों और कारोबारों के भुगतान करने, कर्ज लेने तथा बैंकिंग और अन्य वित्तीय सेवाओं का इस्तेमाल करने के तरीके को तेजी से बदल दिया है.
फिनटेक के विस्तार के साथ भारत में वित्तीय सेवाओं का दायरा अब पारंपरिक बैंक शाखाओं से आगे बढ़कर मोबाइल, डिजिटल पहचान और आंकड़ों पर आधारित प्रणालियों तक पहुंच गया है. इससे वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिलने के साथ छोटे कारोबारों के लिए औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से कर्ज हासिल करना भी आसान होने की उम्मीद है.
इनसाइडर ट्रेडिंग से लेकर शेयर कीमतों में हेरफेर तक पर सख्त निगरानी, नए फ्रेमवर्क में गलत जानकारी फैलाने और कृत्रिम मांग बनाने पर भी कार्रवाई
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
गिफ्ट सिटी के वित्तीय बाजार में इनसाइडर ट्रेडिंग, धोखाधड़ी और बाजार में हेरफेर करने वालों पर अब और सख्त कार्रवाई होगी. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (IFSCA) ने प्रतिभूति बाजारों में बाजार के दुरुपयोग को रोकने के लिए नया ‘मार्केट अब्यूज फ्रेमवर्क 2026’ अधिसूचित किया है. यह नया ढांचा गिफ्ट सिटी में लागू भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के पुराने इनसाइडर ट्रेडिंग और धोखाधड़ी से जुड़े नियमों की जगह लेगा.
इनसाइडर ट्रेडिंग और हेरफेर पर सख्ती
नए नियमों के तहत धोखाधड़ी वाले लेनदेन, प्रतिभूतियों की कीमतों और बेंचमार्क में हेरफेर, कृत्रिम मांग पैदा करने, सर्कुलर ट्रेडिंग और गलत या भ्रामक जानकारी फैलाने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाई गई है. इसके अलावा ऐसे ऑर्डर देना और बाद में रद्द करना भी नियमों के दायरे में आएगा, जिनका मकसद वास्तविक कारोबार करना नहीं बल्कि किसी प्रतिभूति की मांग, आपूर्ति या कीमत को कृत्रिम रूप से प्रभावित करना हो.
गलत खबर फैलाने पर भी कार्रवाई
नए फ्रेमवर्क में डिजिटल और फिजिकल मीडिया के जरिए गलत या भ्रामक जानकारी फैलाने पर भी रोक लगाई गई है. ऐसी जानकारी भी प्रतिबंधित होगी, जिससे निवेशक किसी प्रतिभूति को खरीदने या बेचने के लिए प्रभावित हो सकते हैं. ग्राहक की अनुमति के बिना ट्रेड करना और कृत्रिम ट्रेडिंग गतिविधियां चलाना भी बाजार दुरुपयोग की श्रेणी में आएगा.
इनसाइडर्स के लिए क्या हैं नियम?
नए नियमों के तहत किसी कंपनी या बाजार से जुड़ी ऐसी अहम जानकारी रखने वाले व्यक्ति, जो अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, उसे बिना वैध कारण साझा नहीं कर सकेंगे. ऐसी जानकारी रखने वाले व्यक्ति को संबंधित प्रतिभूतियों में खुद ट्रेड करने या किसी अन्य व्यक्ति से ट्रेड करवाने की भी अनुमति नहीं होगी. इस तरह की गैर-सार्वजनिक महत्वपूर्ण जानकारी के आधार पर किए गए कारोबार को इनसाइडर ट्रेडिंग माना जाएगा.
बड़े ट्रेड की जानकारी देना जरूरी
नियंत्रक शेयरधारकों, निदेशकों और अन्य निर्धारित व्यक्तियों के लिए भी रिपोर्टिंग की व्यवस्था की गई है. उन्हें 25,000 डॉलर की तय तिमाही सीमा से अधिक के कारोबार की जानकारी दो कारोबारी दिनों के भीतर देनी होगी. सूचीबद्ध कंपनियों को ऐसी जानकारी मिलने के दो कारोबारी दिनों के भीतर संबंधित एक्सचेंज को इसकी सूचना देनी होगी. साथ ही कंपनी की वेबसाइट पर भी इसका खुलासा करना जरूरी होगा.
कंपनियों को मजबूत करना होगा आंतरिक नियंत्रण
नए नियमों के तहत सूचीबद्ध कंपनियों को बाजार के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी आंतरिक नियंत्रण और आचार संहिता तैयार करनी होगी. इन नियंत्रणों में अहम गैर-सार्वजनिक जानकारी की पहचान और उसकी गोपनीयता बनाए रखना, ऐसी जानकारी के अनधिकृत संचार को रोकना और उन कर्मचारियों की पहचान करना शामिल होगा, जिनकी ऐसी संवेदनशील जानकारी तक पहुंच है. इन व्यवस्थाओं की समय-समय पर समीक्षा भी करनी होगी.
नियम तोड़ने पर हो सकती है कड़ी कार्रवाई
IFSCA नियमों के उल्लंघन पर संबंधित कानून के तहत कार्रवाई कर सकता है. इसमें चेतावनी या निंदा से लेकर नियमन वाली इकाइयों या संबंधित व्यक्तियों का पंजीकरण रद्द करने तक की कार्रवाई शामिल है. गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों में गिफ्ट सिटी के नियामक ने कथित उल्लंघनों के मामलों में कार्रवाई तेज की है. इनमें जुर्माना लगाने और पंजीकरण रद्द करने जैसे कदम भी शामिल हैं.
पुराने SEBI नियमों की जगह नया फ्रेमवर्क
नए नियम लागू होने के साथ ही IFSCA में SEBI के ‘इनसाइडर ट्रेडिंग पर रोक लगाने वाले नियम, 2015’ और ‘प्रतिभूति बाजार से जुड़ी धोखाधड़ी एवं अनुचित व्यापार गतिविधियों पर रोक लगाने वाले नियम, 2003’ अब लागू नहीं होंगे. नए फ्रेमवर्क के जरिए IFSCA ने गिफ्ट सिटी के प्रतिभूति बाजार के लिए बाजार दुरुपयोग के मामलों से निपटने का एक व्यापक और एकीकृत नियामकीय ढांचा तैयार किया है.
पहले दौर में मिले 7 आवेदन, NTPC, तालचेर फर्टिलाइजर्स समेत निजी कंपनियों ने भी दिखाई दिलचस्पी; सरकार को बड़े निवेश की उम्मीद
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार की 37,500 करोड़ रुपये की कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण योजना को पहले ही दौर में जोरदार प्रतिक्रिया मिली है. योजना के तहत कुल सात आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें अडानी एंटरप्राइजेज ने अकेले यूरिया उत्पादन से जुड़ी तीन परियोजनाओं के लिए बोली लगाई है. इसके अलावा सरकारी कंपनी NTPC, तालचेर फर्टिलाइजर्स और निजी क्षेत्र की गैलेंट इस्पात तथा श्याम सेल एंड पावर ने भी अलग-अलग परियोजनाओं के लिए आवेदन किया है.
सात आवेदनों से बढ़ा सरकार का भरोसा
कोयला मंत्रालय ने मंगलवार को बताया कि सात आवेदन मिलना योजना और देश के कोयला गैसीकरण मिशन में उद्योग जगत के भरोसे को दर्शाता है. मंत्रालय की यह प्रतिक्रिया उन खबरों के बीच आई है, जिनमें योजना के लिए कंपनियों की सीमित रुचि को लेकर सवाल उठाए गए थे.
कोयला मंत्रालय में सलाहकार (प्रोजेक्ट्स) आलोक कुमार सिंह ने कहा कि पहले दौर में सात आवेदन मिलना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उद्योग को योजना पर भरोसा है. उनके मुताबिक, आवेदनों में देश के बड़े औद्योगिक समूहों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की भागीदारी से सरकार के कोयला गैसीकरण मिशन को मजबूती मिली है.
अडानी ने लगाई तीन बोलियां
पहले दौर में सबसे ज्यादा चर्चा अडानी एंटरप्राइजेज की तीन परियोजनाओं को लेकर है. कंपनी ने यूरिया उत्पादन से जुड़ी तीन परियोजनाओं के लिए आवेदन किया है. सात आवेदनों में से चार परियोजनाएं यूरिया उत्पादन से संबंधित हैं. इनमें अडानी एंटरप्राइजेज की तीन और तालचेर फर्टिलाइजर्स की एक परियोजना शामिल है. अन्य आवेदकों में NTPC ने सिंथेटिक प्राकृतिक गैस परियोजना के लिए आवेदन किया है. वहीं गैलेंट इस्पात ने डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन और सिनगैस उत्पादन से जुड़ी परियोजना का प्रस्ताव दिया है. श्याम सेल एंड पावर ने सिनगैस परियोजना के लिए आवेदन किया है.
क्या है कोयला गैसीकरण?
कोयला गैसीकरण की प्रक्रिया में कोयले को सिनगैस यानी सिंथेटिक गैस में बदला जाता है. इस गैस का इस्तेमाल आगे यूरिया, मेथनॉल, अमोनिया, हाइड्रोजन और सिंथेटिक प्राकृतिक गैस जैसे उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है.
सरकार का मकसद इस तकनीक के जरिए देश की LNG, यूरिया, अमोनिया और मेथनॉल जैसे उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम करना है. मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में इन उत्पादों का कुल आयात करीब 2.77 लाख करोड़ रुपये रहा था.
2030 तक 7.5 करोड़ टन क्षमता का लक्ष्य
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मई में इस योजना को मंजूरी दी थी. इसके तहत 2030 तक 7.5 करोड़ टन कोयला गैसीकरण क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है. यह 2030 तक देश में 10 करोड़ टन कोयला गैसीकरण क्षमता हासिल करने के व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य में योगदान देगा.
सरकार का अनुमान है कि इस योजना के जरिए 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये तक का निवेश आकर्षित किया जा सकता है. इसके साथ ही कोयला गैसीकरण की पूरी मूल्य श्रृंखला में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के बड़े अवसर पैदा होने की उम्मीद है.
पिछली योजना से आगे बढ़ा मिशन
नई योजना जनवरी 2024 में मंजूर की गई 8,500 करोड़ रुपये की आर्थिक प्रोत्साहन योजना पर आधारित है. पिछली योजना के तहत आठ गैसीकरण परियोजनाएं पहले से लागू की जा रही हैं. पहले दौर में मिले आवेदनों की अब निर्धारित दिशानिर्देशों और आशय पत्र के आधार पर विस्तृत जांच की जाएगी. इस बीच कोयला मंत्रालय ने मंगलवार से आवेदन का दूसरा दौर भी शुरू कर दिया है.
कंपनियों को आगे भी मिलेगा मौका
सरकार ने कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए आवेदन प्रक्रिया को चरणबद्ध रखा है. योजना के तहत आवेदन विंडो दो महीने के अंतराल पर खोली जाएंगी. इससे पात्र कंपनियों को अपनी परियोजनाओं की तैयारी पूरी कर बाद के दौर में आवेदन करने का अवसर मिलेगा. मंत्रालय के अनुसार, कई संभावित आवेदक अपनी परियोजनाओं की तैयारी के उन्नत चरण में हैं. ऐसे में आने वाले दौर में योजना के तहत आवेदन की संख्या और बढ़ने की उम्मीद है.
मंगलवार को सेंसेक्स 555.23 अंक यानी 0.73 फीसदी गिरकर 75,577.58 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 144.05 अंक यानी 0.61 फीसदी की गिरावट के साथ 23,635.10 पर आ गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार में बुधवार को भी दबाव बने रहने के संकेत मिल रहे हैं. मंगलवार को भारी बिकवाली के बाद अब निवेशकों की नजर आज बाजार की शुरुआत पर है. गिफ्ट निफ्टी (GIFT Nifty) में कमजोरी और ब्रेंट क्रूड के 99 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत कमजोर रहने की आशंका है. पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक बाजारों में नरमी ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है.
सेंसेक्स 555 अंक टूटा, निफ्टी भी फिसला
मंगलवार, 8 सितंबर को घरेलू शेयर बाजार में जोरदार बिकवाली देखने को मिली. सेंसेक्स 555.23 अंक यानी 0.73 फीसदी गिरकर 75,577.58 के स्तर पर बंद हुआ. वहीं निफ्टी 144.05 अंक यानी 0.61 फीसदी की गिरावट के साथ 23,635.10 पर आ गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में 21 गिरावट के साथ बंद हुए, जबकि सिर्फ 9 शेयरों में तेजी रही.
बैंकिंग और बड़े शेयरों में बिकवाली का बाजार पर सबसे ज्यादा असर पड़ा. ICICI Bank करीब 2 फीसदी टूटकर 1,399.50 रुपये पर बंद हुआ और सेंसेक्स का सबसे बड़ा लूजर रहा. Axis Bank 1.72 फीसदी, UltraTech Cement 1.23 फीसदी, Kotak Mahindra Bank 1.20 फीसदी, Reliance Industries 1.16 फीसदी और HDFC Bank 1.11 फीसदी नीचे बंद हुए. Infosys में भी 0.37 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
BEL और Adani Ports ने संभाला मोर्चा
बाजार में गिरावट के बीच कुछ शेयरों में खरीदारी देखने को मिली. Bharat Electronics यानी BEL 1.48 फीसदी चढ़कर 410.50 रुपये पर बंद हुआ. Adani Ports में 1.06 फीसदी और Hindustan Unilever में 0.84 फीसदी की तेजी रही. इसके अलावा IndiGo, HCLTech, Titan, SBI, Eternal और Tech Mahindra भी बढ़त के साथ बंद हुए.
GIFT Nifty ने दिए कमजोर शुरुआत के संकेत
बुधवार सुबह GIFT Nifty करीब 97 अंक की गिरावट के साथ 23,657 के आसपास कारोबार कर रहा था. इससे घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. शुरुआती कारोबार में बैंकिंग, आईटी और एनर्जी शेयरों की चाल बाजार की दिशा तय करने में अहम रह सकती है.
99 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें भारतीय बाजार के लिए बड़ी चिंता बनी हुई हैं. ब्रेंट क्रूड 99 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है और जुलाई के बाद के ऊंचे स्तरों के करीब कारोबार कर रहा है. Strait of Hormuz क्षेत्र में तनाव और वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं से क्रूड की कीमतों को सहारा मिल रहा है. भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए लंबे समय तक महंगा क्रूड रहने से महंगाई और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है.
एशियाई बाजारों में मिला-जुला कारोबार
बुधवार सुबह एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख देखने को मिला. दक्षिण कोरिया का Kospi करीब 1.36 फीसदी की बढ़त में था, जबकि जापान का Nikkei 225 करीब 0.40 फीसदी ऊपर कारोबार कर रहा था. AI से जुड़ी कंपनियों में खरीदारी से कुछ एशियाई बाजारों को सहारा मिला.
अमेरिकी बाजार भी दबाव में
मंगलवार को अमेरिकी शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक भी गिरावट के साथ बंद हुए. Dow Jones Industrial Average में 1.18 फीसदी, S&P 500 में 0.58 फीसदी और Nasdaq Composite में 0.32 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. अमेरिकी बॉन्ड बाजार में 10 वर्षीय ट्रेजरी नोट की यील्ड करीब 4.8 फीसदी रही, जिस पर निवेशकों की नजर बनी हुई है.
आज किन संकेतों पर रहेगी बाजार की नजर?
बुधवार के कारोबार में निवेशकों की नजर कच्चे तेल की कीमतों, पश्चिम एशिया के घटनाक्रम, GIFT Nifty के संकेत और वैश्विक बाजारों की चाल पर रहेगी. मंगलवार की तेज गिरावट के बाद बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ा रह सकता है. ऐसे में बैंकिंग, आईटी, एनर्जी और बड़े बाजार पूंजीकरण वाले शेयरों में खास गतिविधि देखने को मिल सकती है.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज Bandhan Bank से लेकर HCLTech के शेयरों पर खास नजर रहेगी. जैसे Innovision को मध्य प्रदेश में नेशनल हाईवे से जुड़े टोल प्लाजा के लिए 243.6 करोड़ रुपये का Letter of Award मिला है, जबकि Enviro Infra की सहायक कंपनी Suyog Urja को NTPC के 180 MW विंड प्रोजेक्ट के लिए 190 करोड़ रुपये का EPC कॉन्ट्रैक्ट मिला है. Biocon में करीब 638.4 करोड़ रुपये की संभावित ब्लॉक डील की खबर है. Raymond का बोर्ड 214.71 करोड़ रुपये जुटाने के लिए कन्वर्टिबल वारंट जारी करेगा. Great Eastern Shipping ने 2019 में बने Kamsarmax dry bulk carrier को खरीदने का करार किया है. HCLTech ने बेंगलुरु में 185 करोड़ रुपये के निवेश से एडवांस्ड सेमीकंडक्टर लैब शुरू की है. वहीं Moschip Technologies को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत 15 सितंबर से पहले 200 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सुरक्षा राशि जमा करनी है. Sri Lotus Developers के प्रमोटर 2 फीसदी तक हिस्सेदारी बेच सकते हैं. Fermenta Biotech ने VIT के साथ Vitamin B12 fortification तकनीक के व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए एक्सक्लूसिव लाइसेंस एग्रीमेंट किया है, जबकि Sanofi India से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की याचिका खारिज कर दी है. Bandhan Bank ने Mastercard क्रेडिट कार्ड लॉन्च को सामान्य कारोबारी गतिविधि बताया है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
11 सितंबर को मोदी-पुतिन की मुलाकात संभव, व्यापार, रक्षा और ऊर्जा सहयोग पर हो सकती है चर्चा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आएंगे. क्रेमलिन ने मंगलवार को पुतिन की भारत यात्रा की पुष्टि की. इस दौरान वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी करेंगे. दोनों नेताओं की मुलाकात 11 सितंबर को होने की संभावना है, जबकि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होगा.
मोदी-पुतिन की यह बैठक शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन से इतर दोनों नेताओं के बीच हुई हालिया मुलाकात के कुछ ही समय बाद होगी. बिश्केक में हुई बैठक के दौरान मोदी और पुतिन ने व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष सहित कई क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग की समीक्षा की थी. दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी विचार-विमर्श किया था.
व्यापार और आर्थिक सहयोग पर रहेगा जोर
मोदी और पुतिन की आगामी बैठक में व्यापार और आर्थिक सहयोग प्रमुख मुद्दों में शामिल रहने की उम्मीद है. व्यापक भू-राजनीतिक और व्यापारिक अनिश्चितताओं के बीच दोनों देश द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं. बैठक में रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग की भी समीक्षा हो सकती है. दोनों देशों के बीच हालिया चर्चाओं में रक्षा सहयोग को व्यापक बनाने पर जोर दिया गया है. भारत रूस के साथ उन्नत लड़ाकू विमान और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ना चाहता है.
अंतर-सरकारी आयोग की बैठक के नतीजों की भी समीक्षा
एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान हुई पिछली बैठक में मोदी और पुतिन ने 24 अगस्त को मॉस्को में हुई भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की व्यापार, आर्थिक और सांस्कृतिक मामलों से संबंधित बैठक के नतीजों की भी समीक्षा की थी. दोनों नेताओं ने भारत और रूस के बीच विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के लिए लगातार संपर्क में रहने पर सहमति जताई थी.
12-13 सितंबर को होगा ब्रिक्स सम्मेलन
पुतिन की भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है. भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली थी. इस सम्मेलन में विस्तारित ब्रिक्स समूह के सदस्य देशों के नेता हिस्सा लेंगे.
पुतिन की यात्रा के दौरान मोदी के साथ बैठक में ब्रिक्स के ढांचे के तहत भारत-रूस सहयोग पर भी चर्चा होने की उम्मीद है. अगस्त में हुई मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत द्विपक्षीय जुड़ाव पर विचार साझा किए थे. इसके अलावा समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रीय मुद्दों पर भी चर्चा हुई थी.
रूसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा से ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का कूटनीतिक महत्व और बढ़ गया है. भारत अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक शासन से जुड़े मुद्दों पर संवाद को आगे बढ़ा रहा है. ऐसे में मोदी-पुतिन की द्विपक्षीय वार्ता शिखर सम्मेलन के दौरान होने वाली अहम उच्चस्तरीय बैठकों में शामिल होगी.
आरईसी के बाद एलएंडटी टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में उतरने वाली पहली निजी क्षेत्र की कंपनी होगी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
लार्सन एंड टुब्रो (L&T) भारत के उभरते टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में कदम रखने की तैयारी कर रही है. कंपनी ब्लॉकचेन आधारित टोकनाइज्ड बॉन्ड जारी कर करीब 500 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है. ऐसा होने पर एलएंडटी इस तरह के बॉन्ड जारी करने वाली भारत की पहली निजी क्षेत्र की कंपनी बन जाएगी.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित बॉन्ड की अवधि तीन साल हो सकती है और इस पर करीब 7.40 फीसदी कूपन दर रहने की उम्मीद है. इस लेनदेन में ब्लॉकचेन आधारित बुनियादी ढांचे के साथ भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) का इस्तेमाल सेटलमेंट के लिए किया जा सकता है.
यह कदम सरकारी स्वामित्व वाली आरईसी लिमिटेड के भारत के पहले टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड लेनदेन के जरिए 500 करोड़ रुपये जुटाने के कुछ ही समय बाद सामने आया है. आरईसी के बॉन्ड पर 7.30 फीसदी कूपन दर थी और इसे करीब आठ गुना अधिक सब्सक्रिप्शन मिला था.
आरईसी के बाद एलएंडटी की टोकनाइज्ड डेट में एंट्री
टोकनाइज्ड बॉन्ड पारंपरिक डेट सिक्योरिटीज होते हैं, लेकिन इनके स्वामित्व और लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड ब्लॉकचेन या अन्य डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर तकनीक पर दर्ज किए जाते हैं. इस तकनीक से सेटलमेंट प्रक्रिया को तेज करने, लेनदेन की लागत घटाने और पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
एलएंडटी के लिए यह प्रस्तावित लेनदेन वित्तीय व्यवस्था में नई तकनीकों को अपनाने की दिशा में एक और कदम है. कंपनी इससे पहले भी भारत के तेजी से विकसित हो रहे सस्टेनेबल डेट मार्केट में सक्रिय रही है. एलएंडटी ने सेबी के ईएसजी डेट फ्रेमवर्क के तहत 500 करोड़ रुपये का सस्टेनेबिलिटी-लिंक्ड बॉन्ड भी जारी किया था.
सीबीडीसी से तेज हो सकता है सेटलमेंट
टोकनाइज्ड बॉन्ड की संरचना में डिजिटल सेटलमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर एक अहम भूमिका निभाता है. भारत में परीक्षण किए जा रहे इस मॉडल के तहत जरूरी सीबीडीसी और डीमैट सुविधाओं वाले पात्र संस्थागत निवेशक लेनदेन में हिस्सा ले सकते हैं और उसी दिन इसका सेटलमेंट किया जा सकता है.
यह ढांचा भारतीय प्रतिभूति बाजार के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने और मुख्यधारा के पूंजी बाजार में डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाओं को तलाशने की नियामकीय कोशिशों का हिस्सा है. आरईसी का हालिया लेनदेन कॉरपोरेट डेट में इस मॉडल के बड़े स्तर पर इस्तेमाल का पहला उदाहरण बना है.
500 करोड़ रुपये की रकम छोटी, लेकिन बाजार के लिए बड़ा संकेत
एलएंडटी के कुल वित्तपोषण की जरूरतों की तुलना में 500 करोड़ रुपये की रकम भले ही छोटी हो, लेकिन प्रस्तावित बॉन्ड इश्यू भारत के कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार के विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
एलएंडटी की स्टैंडअलोन कुल आय वित्त वर्ष 2025-26 में सालाना आधार पर 8.68 फीसदी बढ़कर 1.61 लाख करोड़ रुपये रही. 31 मार्च 2026 तक कंपनी के बकाया नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर 9,800 करोड़ रुपये थे. इसके अलावा कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान लिस्टेड कमर्शियल पेपर के जरिए 14,600 करोड़ रुपये भी जुटाए.
ऐसे में एलएंडटी का प्रस्तावित टोकनाइज्ड बॉन्ड इश्यू सिर्फ 500 करोड़ रुपये जुटाने तक सीमित नहीं है. इसका बड़ा उद्देश्य कॉरपोरेट उधारी के लिए एक नए माध्यम की व्यवहारिकता को परखना है. अगर ऐसे लेनदेन संचालन के लिहाज से प्रभावी और बड़े स्तर पर लागू करने योग्य साबित होते हैं, तो आने वाले समय में टोकनाइजेशन भारत के डेट मार्केट के बुनियादी ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है.