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भारत का तीसरा इंपोर्ट बिल
देश ने एक पीढ़ी तक दो बड़ी निर्भरताओं को संभाला है, कच्चा तेल और सोना. अब तीसरी निर्भरता चुपचाप हर AI-पावर्ड ऐप और वर्कफ्लो के अंदर बन रही है, जिसकी कीमत टोकन के आधार पर तय होती है, बिल डॉलर में आता है और जिसका स्वामित्व लगभग पूरी तरह विदेशों में है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
पलक शाह
हर तिमाही भारत के आर्थिक प्रबंधक एक ही चिंताजनक गणित करते हैं. वे कच्चे तेल की कीमतों पर नजर रखते हैं, क्योंकि तेल देश का सबसे बड़ा आयात है और खाड़ी क्षेत्र में किसी भी हलचल से घरेलू स्तर पर ईंधन पंपों तक असर पहुंचाने का सबसे तेज रास्ता है. वे सोने पर नजर रखते हैं, जो घरेलू स्तर पर सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और हर असुरक्षा के दौर को डॉलर के बाहर जाने का कारण बना देता है. और वे रुपये पर नजर रखते हैं, जो जुलाई में डॉलर के मुकाबले 97 के बेहद करीब पहुंच गया, जो लगभग रिकॉर्ड निचला स्तर है क्योंकि कारोबारी यह अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे थे कि भारतीय रिजर्व बैंक कितनी कमजोरी को सहन करने के लिए तैयार है.
हाल ही में समाप्त हुए वित्त वर्ष में तेल आयात बिल लगभग 212 अरब डॉलर और सोने का आयात बिल रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर रहा. दोनों मिलकर वह कारण हैं जिसकी वजह से चौथी तिमाही में चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) GDP के 2.6% तक पहुंच गया, जो 2013 के टेपर-टैंट्रम दौर के बाद सबसे खराब स्थिति थी. ये वे निर्भरताएं हैं जिन्हें भारत अच्छी तरह जानता है. इनके लिए बंदरगाह हैं, कीमतें हैं, सब्सिडी हैं और लंबा संस्थागत अनुभव है.
अब एक तीसरा बिल बन रहा है, और लगभग कोई इस पर नजर नहीं रख रहा है, क्योंकि यह किसी टैंकर में नहीं आता. यह टोकन के जरिए आता है.
एक ऐसा बिल जिसे आप देख नहीं सकते
जब भी कोई भारतीय बैंक चैटबॉट चलाता है, कोई स्टार्टअप किसी दस्तावेज का सार तैयार करता है, कोई सरकारी पोर्टल नागरिक के सवाल का जवाब देता है या कोई कोडर किसी फंक्शन को ऑटोकम्प्लीट करता है, तो दूसरी तरफ कुछ न कुछ मापा जा रहा होता है.
बड़े लैंग्वेज मॉडल (Large Language Models) टोकन के आधार पर शुल्क लेते हैं यानी टेक्स्ट के वे छोटे हिस्से जिन्हें वे पढ़ते और तैयार करते हैं. इन मॉडलों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, वे विदेशों में बनाए जाते हैं, वहीं होस्ट किए जाते हैं और उनकी कीमत डॉलर में तय होती है.
यूजर की तरफ से जो चीज मुफ्त या बिना किसी बाधा वाली इंटेलिजेंस जैसी दिखती है, वह भुगतान संतुलन (Balance of Payments) के नजरिए से एक आयात है. क्योंकि आर्थिक रूप से यह एक आयातित सेवा की तरह काम करता है.
फिलहाल यह राशि सीमित है. मार्केट रिसर्च फर्म IDC के अनुसार, भारत में कुल AI खर्च 2027 तक लगभग 6 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जिसमें बड़ी राशि विदेशी सब्सक्रिप्शन, API, क्लाउड सेवाओं और इंफरेंस चार्ज में जाएगी.
लेकिन इसकी रफ्तार तेज है. भारत में सार्वजनिक क्लाउड खर्च इस साल 28% बढ़कर 17.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं घरेलू AI बाजार, जो आज लगभग 7.6 अरब डॉलर का है, 2032 तक बढ़कर 130 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है.
एंटरप्राइज AI बजट में इंफरेंस यानी वास्तव में मॉडल चलाने की लागत पहले ही लगभग 85% खर्च का हिस्सा बन चुकी है. बाकी खर्च एक बार होने वाली ट्रेनिंग और टूलिंग पर होता है. इंफरेंस वह लगातार चलने वाला मीटर है.
इस बिल को खतरनाक बनाने वाली बात यही है कि यह दिखाई नहीं देता. तेल पर निर्भरता भौतिक वास्तविकता की तरह असर डालती है: ईंधन आना जरूरी है, जहाजों को चलना जरूरी है और कुछ दिनों में असर पेट्रोल पंप तक दिखाई देने लगता है.
लेकिन बढ़ता हुआ मॉडल बिल ऐसा कुछ नहीं करता. यह हजारों कंपनियों में एंटरप्राइज सब्सक्रिप्शन, API उपयोग, डेवलपर टूल लाइसेंस और क्लाउड खर्च के रूप में बंटा होता है.
इसे डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के रूप में दर्ज किया जाता है. इसे आमतौर पर सही तरीके से उत्पादकता बढ़ाने वाले निवेश के रूप में पेश किया जाता है. और जब तक यह इतना बड़ा नहीं हो जाता कि कोई केंद्रीय बैंक इसे व्यापक आर्थिक आंकड़े के रूप में पहचान सके, तब तक इस पर निर्भर वर्कफ्लो पहले ही महत्वपूर्ण बन चुके होते हैं.
टोकनाइजेशन टैक्स
भारत को एक अतिरिक्त कीमत भी चुकानी पड़ती है, जो दुनिया के बाकी हिस्सों में नहीं है और यह तकनीक के अंदर ही मौजूद है.
प्रमुख AI मॉडलों के अंदर इस्तेमाल होने वाले टोकनाइजर अंग्रेजी भाषा के लिए बेहतर तरीके से तैयार किए गए हैं. हिंदी, तमिल, बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं की स्क्रिप्ट समान अर्थ के लिए कहीं अधिक टोकन में विभाजित हो जाती हैं.
देवनागरी का एक अक्षर भी दो से चार टोकन में विभाजित हो सकता है. क्योंकि बिल प्रति टोकन के आधार पर आता है, इसलिए किसी भारतीय भाषा में ग्राहक सेवा जवाब या दस्तावेज सारांश तैयार करने की लागत अंग्रेजी की तुलना में तीन से पांच गुना अधिक हो सकती है.
कुछ अनुमानों के अनुसार, हिंदी उपयोगकर्ताओं को सेवा देने वाली कंपनी को समान अंग्रेजी सेवा की तुलना में हर साल कुछ लाख डॉलर अधिक खर्च करने पड़ सकते हैं.
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि किसी देश के विकास स्तर और उसकी भाषा की टोकन लागत के बीच नकारात्मक संबंध है: औसतन जितने कम संपन्न भाषा बोलने वाले होते हैं, उनके शब्दों को प्रोसेस करना उतना ही महंगा होता है.
यह वैश्विक AI अर्थव्यवस्था की एक शांत लेकिन असमान विशेषता है और ऐसे देश के लिए जो अपने अधिकांश डिजिटल सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर को भारतीय भाषाओं में चला रहा है, यह कोई मामूली अंतर नहीं है. यह भागीदारी पर लगने वाला एक संरचनात्मक टैक्स है.
सस्ता होने का मतलब छोटा होना नहीं है
स्वाभाविक आपत्ति यह है कि टोकन की कीमतें तेजी से गिर रही हैं, इसलिए कोई भी बिल समय के साथ कम होना चाहिए. कीमतें वास्तव में तेजी से गिर रही हैं: एक मिलियन टोकन की औसत एंटरप्राइज लागत एक साल में लगभग 67% घटकर करीब 18.40 डॉलर से 6.07 डॉलर रह गई है.
लेकिन उपयोग में वृद्धि कीमतों में गिरावट से भी तेज है. इसी अवधि में प्रति डेवलपर खपत लगभग 19 गुना बढ़ गई. यह वही पुराना जेवन्स पैराडॉक्स है, जिसने 19वीं सदी में कोयले की खपत को प्रभावित किया था: किसी संसाधन को सस्ता और अधिक कुशल बना दें, तो उसका कुल उपयोग घटने के बजाय बढ़ जाता है.
सस्ती इंटेलिजेंस का मतलब छोटा बिल नहीं है. इसका मतलब है कि कम होती यूनिट कीमत के सामने बहुत बड़ी मांग खड़ी हो रही है, और इस दौड़ में मांग जीत रही है.
यही कारण है कि एक ऐसा आंकड़ा, जो सुनने में चिंताजनक लगता है, अगले एक दशक में टोकन बिल के सालाना 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान, इसे खारिज करने के बजाय एक संभावित परिदृश्य के रूप में गंभीरता से लेने की जरूरत है.
यह एक आक्रामक लेकिन संभव परिदृश्य है. अगर घरेलू AI बाजार 130 अरब डॉलर तक पहुंचता है और मॉडल, चिप और क्लाउड वैल्यू का केवल एक-तिहाई हिस्सा भी भारत में ही रहता है, तो भी विदेशी स्वामित्व वाला हिस्सा अरबों डॉलर में होगा.
इसके ऊपर टोकनाइजेशन प्रीमियम जोड़ दिया जाए, तो सोचने की क्षमता (Cognition) के आयात का बिल आज के सोने और कच्चे तेल के आयात बिल के बीच कहीं पहुंच सकता है. यह अनुमान आक्रामक है, लेकिन असंभव नहीं.
यह ऐसा आंकड़ा है जिसे डेटा के आधार पर जांचने की जरूरत है, न कि भविष्यवाणी मानने की. लेकिन अब जिम्मेदारी उन लोगों पर है जो मानते हैं कि यह बिल छोटा ही रहेगा.
आयातित सोच, निर्यात किया गया काम
गहरी चिंता बिल के आकार को लेकर नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक मॉडल में इसकी जगह को लेकर है.
तीन दशकों तक भारत ने एक स्पष्ट बाहरी आर्थिक संतुलन बनाया: ऊर्जा का आयात करो, सेवाओं का निर्यात करो और सेवाओं से मिलने वाला अधिशेष — सॉफ्टवेयर, बैक ऑफिस, बिजनेस प्रोसेस, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर भौतिक घाटे के एक हिस्से को संतुलित करे.
यह मॉडल मानव बौद्धिक श्रम पर आधारित था, जिसे भारत पश्चिमी देशों की तुलना में कम लागत पर उपलब्ध करा सकता था.
इसमें फायदा इस बात से आता था कि भारत कुशल लोगों को ग्राहक की लागत संरचना से कम कीमत पर उपलब्ध कराता था. भारत डॉलर में कमाता था और अपनी लागत का बड़ा हिस्सा रुपये में चुकाता था.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस मॉडल को सीधे खत्म नहीं करता. इससे अधिक चिंताजनक संभावना यह है कि यह इस मॉडल की प्रकृति को बदल सकता है.
एक भारतीय कंपनी अब भी कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर सकती है, टीम तैयार कर सकती है, कोड भेज सकती है और काम पूरा कर सकती है — लेकिन अगर इसके पीछे काम करने वाला बौद्धिक इंजन तेजी से किसी विदेशी मॉडल, विदेशी क्लाउड और विदेशी चिप से किराए पर लिया जा रहा है, तो वैल्यू का एक हिस्सा ऊपर की ओर मॉडल मालिक और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदाता के पास जा सकता है.
निर्यात आंकड़ों में दिखाई देता रहेगा. कर्मचारी अब भी प्रक्रिया का हिस्सा रहेगा. लेकिन देश संभवतः किराए की इंटेलिजेंस को दोबारा बेच रहा होगा और यह मान रहा होगा कि वह अपनी क्षमता का निर्यात कर रहा है.
जहां पहले बाधा श्रम था, जिस पर भारत का नियंत्रण था, वहां अब विदेशी इंफरेंस आ सकता है, जिसमें भारत के पास केवल काम करने की भूमिका होगी.
जटिलता: कंप्यूट भारत की ओर आ रहा है
मेरे शोध के दौरान इस कहानी का एक वास्तविक दूसरा पहलू भी सामने आया है और ईमानदार विश्लेषण में इसे शामिल करना जरूरी है.
वही विदेशी कंपनियां जिनके पास ये मॉडल हैं, भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही हैं.
माइक्रोसॉफ्ट ने भारतीय क्लाउड और AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 17.5 अरब डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है, अमेजन ने भारत में अपना कुल निवेश लगभग 48 अरब डॉलर तक बढ़ाया है और गूगल देश के दक्षिणी हिस्से में एक बड़ा AI हब बना रहा है.
इन सभी निवेशों की संयुक्त प्रतिबद्धता 100 अरब डॉलर से अधिक है.
नई दिल्ली ने भी इसे सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया है. सरकार ने विदेशी क्लाउड प्रदाताओं को 2047 तक उन सेवाओं पर शून्य टैक्स की पेशकश की है, जिन्हें विदेशों में बेचा जाएगा, बशर्ते उनका वर्कलोड भारतीय डेटा सेंटर से संचालित हो.
अगर GPU वर्जीनिया के बजाय मुंबई और हैदराबाद में लगे हैं, तो क्या यह आयात है?
कुछ हद तक इसका जवाब नहीं है. बिजली की मांग, निर्माण गतिविधियां, ऑपरेशन से जुड़ी नौकरियां और कुछ वैल्यू भारत में रहती है.
लेकिन कठिन हिस्सा यह है कि जवाब हां भी है.
मॉडल, चिप डिजाइन, बौद्धिक संपदा और कीमत तय करने की ताकत अभी भी कुछ विदेशी कंपनियों के पास है और सर्वर चाहे कहीं भी चलें, आर्थिक लाभ ऊपर की ओर ही जाता है.
यहां महत्वपूर्ण अंतर यह है कि बहस अक्सर दो चीजों को मिला देती है कंप्यूटिंग कहां चल रही है और जिस इंटेलिजेंस को किराए पर लिया जा रहा है, उसका मालिक कौन है.
पहली चीज को स्थानीय बनाने से दूसरी समस्या अपने आप हल नहीं होती.
भारत क्या बना रहा है और क्या यह पर्याप्त है
भारत स्थिर नहीं बैठा है. IndiaAI Mission, लगभग 1.25 अरब डॉलर का एक कार्यक्रम है, जिसके तहत हजारों GPU ऑनलाइन उपलब्ध कराए गए हैं और 2026 के अंत तक इनकी संख्या 1 लाख तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है. यह मिशन स्टार्टअप्स को व्यावसायिक क्लाउड दरों के एक छोटे हिस्से पर सब्सिडी वाली कंप्यूटिंग सुविधा उपलब्ध कराता है.
सरकार ने घरेलू और स्वदेशी AI मॉडल बनाने के लिए Sarvam AI को भी समर्थन दिया है और इसके बदले कंपनी में इक्विटी हिस्सेदारी ली है. Sarvam ने इस साल की शुरुआत में 30-बिलियन और 105-बिलियन पैरामीटर वाले मॉडल पेश किए हैं.
इसके अलावा कम से कम पांच अन्य टीमों को भारत की 22 आधिकारिक भाषाओं में सक्षम AI सिस्टम विकसित करने के लिए चुना गया है. यह प्रयास सीधे तौर पर टोकनाइजेशन टैक्स को कम करने के उद्देश्य से किया जा रहा है.
यह प्रयास वास्तव में संप्रभुता (Sovereignty) की दिशा में कदम है या सिर्फ प्रतीकात्मक पहल, यह अभी खुला सवाल है.
GPU खरीदना और किसी सम्मेलन में राष्ट्रीय AI मॉडल पेश करना आसान हिस्सा है. असली सवाल यह है कि क्या यह क्षमता उन डेवलपर्स तक पहुंच पा रही है जिन्हें इसकी जरूरत है.
बार-बार उठने वाली आलोचना "IndiaAI, GPU कहां हैं?" इसी बात को दर्शाती है कि क्षमता को वास्तविक उपयोगकर्ताओं तक पहुंचने में देरी हो रही है.
ज्यादा उपयोगी सवाल यह नहीं है कि भारत एक प्रमुख AI मॉडल बना सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत एक न्यूनतम व्यवहार्य AI इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर सकता है:
1. संवेदनशील क्षेत्रों के लिए पर्याप्त भरोसेमंद घरेलू इंफरेंस क्षमता.
2. API पर पूरी निर्भरता से बचने के लिए पर्याप्त ओपन-मॉडल विशेषज्ञता.
3. चुपचाप होने वाली आर्थिक निर्भरता को रोकने के लिए पर्याप्त क्लाउड सौदेबाजी क्षमता.
4. अपने खर्च को समझने और यह पहचानने की क्षमता कि बिल बड़ा बनने से पहले ही कहां बन रहा है.
यह कोई स्मारक बनाने की बात नहीं है. यह सौदेबाजी की क्षमता बनाने की बात है — यानी विदेशी तकनीक को अपनाने की स्वतंत्रता, लेकिन उस पर पूरी तरह निर्भर न होने की क्षमता.
स्पष्ट रूप से समझना या देर कर देना
इन सबका मतलब यह नहीं है कि भारत हार जाएगा.
अपने आकार, प्रतिभा और कारोबारी उत्साह के कारण भारत इन तकनीकों को तेजी से अपनाएगा और कई जगहों पर बेहतर तरीके से इस्तेमाल भी करेगा.
भारत अपने ग्राहकों से बेहतर तरीके से मॉडल का उपयोग कर सकता है, अपने क्षेत्रीय ज्ञान और नियामकीय समझ को मशीन इंटेलिजेंस के साथ जोड़ सकता है, जिसे विदेशी प्रदाता आसानी से कॉपी नहीं कर सकते.
खतरा तकनीक को अपनाने में नहीं है. खतरा इस बात में है कि भारत की स्थिति क्या होगी.
पहला आयात बिल बंदरगाहों, टैंकरों, डॉलर कीमतों और सुर्खियों में दिखाई दिया.
दूसरा आयात बिल सोने की कीमतों में दिखाई दिया.
तीसरा आयात बिल किसी अखबार की हेडलाइन में दिखाई नहीं देगा.
यह सॉफ्टवेयर बजट और उत्पादकता डैशबोर्ड के अंदर धीरे-धीरे जमा होगा, एक-एक टोकन के साथ, जब तक यह इतना बड़ा नहीं हो जाएगा कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा और इतना गहराई से जुड़ जाएगा कि इसे बदलना मुश्किल होगा.
जो देश इस बिल को समय रहते समझ लेगा, वह अब भी बातचीत कर सकता है, निर्माण कर सकता है, मांग को एकत्र कर सकता है और तय कर सकता है कि कहां निर्भरता स्वीकार्य है और कहां नहीं.
जो देश इसे देर से समझेगा, उसे पता चलेगा कि उसका सबसे सफल निर्यात मॉडल चुपचाप अपने अंदर एक विदेशी किराया-आधारित व्यवस्था (Foreign Rentier) को शामिल कर चुका है और मीटर हमेशा से चल रहा था.
(नोट: यह खबर प्रकाशित आंकड़ों और संस्थागत अनुमानों (वाणिज्य मंत्रालय, RBI, IDC, Nasscom और भारतीय भाषाओं की टोकनाइजेशन लागत पर अकादमिक शोध) पर आधारित है.)
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
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