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2030 तक $10.1 अरब का हो सकता है भारत का सीनियर लिविंग मार्केट, 74,000 यूनिट्स की क्षमता: रिपोर्ट
जून 2026 तक संगठित सीनियर लिविंग स्टॉक 25,050 यूनिट्स, 2030 तक 7.7 अरब डॉलर के निवेश की संभावना; बढ़ती बुजुर्ग आबादी से असिस्टेड लिविंग की मांग भी बढ़ेगी.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 hours ago
भारत में तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी अब केवल सामाजिक चुनौती नहीं, बल्कि रियल एस्टेट और केयर इकोनॉमी के लिए बड़ा कारोबारी अवसर बन रही है. एसोसिएशन ऑफ सीनियर लीविंग इंडिया (ASLI) और जेएलएल की रिपोर्ट ‘इंडियाज सिल्वर इकोनॉमी: फ्रॉम निच टू नेसेसिटी’ के मुताबिक, देश का सीनियर लिविंग बाजार 2030 तक करीब 10.1 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. नीति आधारित विकास की स्थिति में इस क्षेत्र में करीब 7.7 अरब डॉलर के पूंजी निवेश की जरूरत पड़ सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 तक देश में संगठित सीनियर लिविंग स्टॉक करीब 25,050 यूनिट्स था. भारत में इसकी बाजार पैठ अभी लगभग 1.5% है, जबकि अमेरिका में यह 6-7% और न्यूजीलैंड में 14-15% के स्तर पर है. इससे संकेत मिलता है कि भारत में इस क्षेत्र के विस्तार की काफी गुंजाइश मौजूद है.
2050 तक 34.6 करोड़ हो सकती है 60 वर्ष से अधिक आबादी
भारत में 60 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी फिलहाल करीब 16.69 करोड़ है, जिसके 2050 तक बढ़कर लगभग 34.6 करोड़ होने का अनुमान है. इसके साथ ही शहरी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से स्वतंत्र वरिष्ठ नागरिक परिवारों की संख्या 2026 में करीब 17 लाख से बढ़कर 2030 तक 21 लाख तक पहुंच सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, सीनियर लिविंग क्षेत्र ने 2024 से जून 2026 के बीच करीब 14.2% की सालाना वृद्धि दर दर्ज की है, जो 2019-2023 के दौरान दर्ज 8.5% की वृद्धि दर से काफी अधिक है. बेहतर तरीके से संचालित सीनियर लिविंग सुविधाओं में ऑक्यूपेंसी 80-85% तक पहुंच रही है.
असिस्टेड लिविंग में बड़ी कमी
असिस्टेड लिविंग सेगमेंट में मांग और उपलब्ध क्षमता के बीच बड़ा अंतर है. वर्तमान में देश में करीब 2,100 असिस्टेड लिविंग बेड उपलब्ध हैं, जबकि 2030 तक करीब 11,000 बेड की जरूरत होने का अनुमान है. खासतौर पर 75 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी में 7.8% की सालाना वृद्धि इस मांग को और बढ़ा सकती है.
जेएलएल के सीनियर मैनेजिंग डायरेक्टर करण सिंह सोढ़ी के मुताबिक, भारत का सीनियर लिविंग सेक्टर मौजूदा करीब 25,050 यूनिट्स से बढ़कर 2030 तक लगभग 74,000 यूनिट्स तक पहुंच सकता है. इसके लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश और नीतिगत समर्थन की जरूरत होगी.
तीन संभावित परिदृश्य
रिपोर्ट ने सीनियर लिविंग बाजार के लिए तीन संभावित विकास परिदृश्य बताए हैं. बेसलाइन स्थिति में 2030 तक करीब 51,000 यूनिट्स और लगभग 4.5 अरब डॉलर का बाजार बनने का अनुमान है. तेज विकास की स्थिति में यह संख्या करीब 63,000 यूनिट्स और बाजार 6.2 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. वहीं, नीति आधारित विकास की स्थिति में करीब 74,000 यूनिट्स और 7.7 अरब डॉलर के पूंजी निवेश की संभावना जताई गई है.
महाराष्ट्र और हरियाणा से मिल सकता है मॉडल
रिपोर्ट में महाराष्ट्र और हरियाणा को सीनियर लिविंग क्षेत्र में नीतिगत पहल के उदाहरण के तौर पर पेश किया गया है. महाराष्ट्र में सीनियर लिविंग को प्लानिंग मानकों और स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़कर औपचारिक पहचान देने की दिशा में कदम उठाए गए हैं. वहीं, हरियाणा में अनुमति प्रक्रिया को स्पष्ट करने और अतिरिक्त एफएआर जैसे प्रोत्साहनों से इस क्षेत्र को बढ़ावा देने की कोशिश की गई है.
‘घर से अमीर, नकद से गरीब’ बुजुर्गों के लिए वित्तीय समाधान जरूरी
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्गों के पास घर और संपत्ति तो है, लेकिन नियमित नकदी प्रवाह सीमित है. ऐसे में ‘घर से अमीर, नकद से गरीब’ की स्थिति सीनियर लिविंग की अफोर्डेबिलिटी के सामने बड़ी चुनौती है. रिवर्स मॉर्गेज और बीमा से जुड़े उत्पाद इस समस्या का समाधान करने में मदद कर सकते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले वर्षों में सीनियर लिविंग का मॉडल केवल प्रॉपर्टी बिक्री तक सीमित नहीं रहेगा. केयर और सर्विस आधारित मॉडल, खासकर किराये पर उपलब्ध सुविधाएं, अगले तीन से पांच वर्षों में तेजी से बढ़ सकती हैं.
टेक्नोलॉजी और केयर मॉडल पर बढ़ेगा जोर
सीनियर लिविंग के साथ मेमोरी केयर, कंटीन्यूम ऑफ केयर, इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड, वियरेबल डिवाइस और टेलीमेडिसिन जैसी सेवाओं का महत्व भी बढ़ने की उम्मीद है. हालांकि, प्रशिक्षित केयरगिवर्स की कमी और रियल एस्टेट की ऊंची लागत इस क्षेत्र के विस्तार में बड़ी बाधा बनी हुई है.
रिपोर्ट में सीनियर लिविंग सेवाओं पर जीएसटी व्यवस्था को सरल बनाने, रिवर्स मॉर्गेज को बढ़ावा देने, बीमा उत्पादों को सीनियर लिविंग से जोड़ने और अस्पतालों के साथ लंबी अवधि की लीज या एसेट-लाइट साझेदारी को प्रोत्साहित करने जैसे उपाय सुझाए गए हैं. साथ ही, इस पूरे क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नीति ढांचा तैयार करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है. बढ़ती उम्र की आबादी के साथ भारत में सीनियर लिविंग अब एक सीमित रियल एस्टेट सेगमेंट नहीं रह गया है. आने वाले वर्षों में यह आवास, स्वास्थ्य सेवा, देखभाल, बीमा और वित्तीय सेवाओं को जोड़ने वाली एक बड़ी ‘सिल्वर इकोनॉमी’ का आधार बन सकता है.
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