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भारत की भूमिका ऑफशोरिंग से आगे बढ़कर है: सर्जियो लोपेज, ओमनीकॉम प्रोडक्शन

एक विशेष इंटरव्यू में लोपेज ने ब्रांड की आवाज, कंटेंट की प्रभावशीलता, तेजी से प्रतिस्पर्धी होते मार्केटिंग इकोसिस्टम में अलग पहचान बनाने और भारत को वैश्विक व क्षेत्रीय नवाचार के केंद्र के रूप में स्थापित करने की ओमनीकॉम प्रोडक्शन की रणनीति पर बात की.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 hours ago

सौम्या सहगल भूटानी

प्रोडक्शन का काम बुनियादी बदलाव के दौर से गुजर रहा है. पहले इसे मुख्य रूप से विज्ञापन के क्रियान्वयन से जुड़ी इकाई के रूप में देखा जाता था, जो किसी विचार को एक कैंपेन में बदलती थी. अब प्रोडक्शन ब्रांड्स के कंटेंट, डेटा, पर्सनलाइजेशन और तेजी से वितरण के प्रबंधन में रणनीतिक भूमिका निभा रहा है.

ओमनीकॉम प्रोडक्शन के ग्लोबल CEO सर्जियो लोपेज के मुताबिक, यह बदलाव अधिक कंटेंट तैयार करने के बजाय इस बात से जुड़ा है कि ब्रांड्स उसे किस तरह बनाते हैं, उसका प्रबंधन कैसे करते हैं और उसे किस तरह वितरित करते हैं.

लोपेज ने कहा, “प्रोडक्शन लीडर्स या प्रोडक्शन की पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों की भूमिका हमेशा क्रियान्वयन से जुड़ी रही है. किसी के पास कोई विचार होता था और हम उसे हकीकत में बदलते थे. लेकिन पिछले एक-दो वर्षों में मार्केटिंग के बदलते स्वरूप के कारण प्रोडक्शन एक क्रियान्वयन विभाग से बदलाव लाने वाले माध्यम में तब्दील हो रहा है.”

यह बदलाव विभिन्न प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की तेजी से बढ़ती मात्रा और व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप, लक्षित और सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक संवाद की बढ़ती मांग से प्रेरित है. इसके परिणामस्वरूप, प्रोडक्शन मार्केटिंग संगठनों के केंद्र के करीब आ रहा है. उन्होंने कहा, “अब काम का दायरा काफी अलग है. आज हर क्लाइंट की मार्केटिंग में बदलाव की यात्रा में इसकी बड़ी भूमिका है.”

प्रोडक्शन से कंटेंट एक्सपीरियंस तक

ओमनीकॉम का अपना पुनर्गठन भी इसी बदलाव को दर्शाता है. कंपनी ने दुनियाभर की 86 प्रोडक्शन इकाइयों को एक साथ लाकर ओमनीकॉम प्रोडक्शन बनाया. इसके बाद IPG के अधिग्रहण के जरिए 25 अन्य प्रोडक्शन परिसंपत्तियां भी इसमें शामिल की गईं.

लोपेज के मुताबिक, पिछले साल इस कारोबार में 47 प्रतिशत की वृद्धि हुई. हालांकि, यह बदलाव केवल कारोबार का आकार बढ़ने तक सीमित नहीं है. वह कहते हैं, “यह एकीकरण नहीं, बल्कि बदलाव है.”

दो साल पहले ओमनीकॉम प्रोडक्शन के कारोबार में प्रिंट की हिस्सेदारी 72 प्रतिशत थी. आज यह घटकर 20 प्रतिशत रह गई है. लोपेज के अनुसार, यह बदलाव कंटेंट ट्रांसफॉर्मेशन और ब्रांड कम्युनिकेशन के प्रबंधन के लिए अधिक एकीकृत दृष्टिकोण की ओर बढ़ने को दर्शाता है.

लोपेज ने कहा, “किसी क्लाइंट को अपने दर्शकों के साथ एक संपूर्ण कंटेंट एक्सपीरियंस की जरूरत होती है. यह अनुभव लगातार एक जैसा होना चाहिए और इसे इस तरह प्रस्तुत करना जरूरी है, जो पहले के मुकाबले कहीं अधिक जटिल हो गया है.”

अब उपभोक्ताओं की यात्रा टेलीविजन के जरिए ब्रांड के बारे में जागरूकता और डिजिटल माध्यमों से विचार या खरीदारी करने तक सीमित नहीं है. दर्शक अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर जाते हैं और उम्मीद करते हैं कि ब्रांड उनकी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार संवाद में बदलाव करते हुए अपनी आवाज में निरंतरता बनाए रखेंगे.

लोपेज के मुताबिक, युवा दर्शकों के मामले में यह जटिलता और अधिक है. उनका कहना है कि यह वह पीढ़ी है जो नेटफ्लिक्स और अमेजन के साथ बड़ी हुई है और कंटेंट में उसी स्तर के पर्सनलाइजेशन की अपेक्षा करती है.

ओमनीकॉम कंटेंट एक्सपीरियंस (OCX) के पीछे भी यही सोच है. लोपेज इसे क्रिएटिविटी, मीडिया और क्लाइंट्स के बीच काम करने वाले मॉडल के रूप में देखते हैं.

प्रोडक्शन का नया समीकरण

प्रोडक्शन पर दबाव का स्वरूप भी बदल रहा है. ब्रांड्स को पहले से अधिक कंटेंट चाहिए, लेकिन बजट उसी गति से जरूरी नहीं कि बढ़ रहे हों. लोपेज का मानना है, “प्रोडक्शन में दक्षता पहली जरूरत है. अगर आप दक्ष नहीं हैं, तो आज इस क्षेत्र में टिक नहीं सकते.”

उनके मुताबिक, कुछ क्लाइंट्स के लिए कंटेंट की मात्रा दोगुनी या तिगुनी हो रही है, जबकि मार्केटिंग बजट काफी धीमी गति से बढ़ रहे हैं. ऐसे में लागत, गति और ऑटोमेशन सफलता के महत्वपूर्ण पैमाने बन गए हैं. हालांकि, सफलता केवल दक्षता तक सीमित नहीं है.

ओमनीकॉम कंटेंट के प्रदर्शन के आधार पर उसकी प्रभावशीलता भी मापता है. लोपेज ने निसान के साथ कंपनी के काम का उदाहरण दिया. उनके मुताबिक, दर्शकों के लिए संवाद को अधिक प्रासंगिक बनाने के उद्देश्य से तैयार किए गए नए कंटेंट वर्कफ्लो से निवेश पर रिटर्न (ROI) दोगुना हुआ है. वह कहते हैं, “जब आप कंटेंट ट्रांसफॉर्मेशन करते हैं, तो केवल बचत नहीं होती, बल्कि इससे कहीं अधिक मूल्य भी मिलता है.”

AI की भूमिका दक्षता से आगे बढ़ेगी

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्रोडक्शन के इस नए समीकरण का हिस्सा बन रहा है. लोपेज का कहना है कि ओमनीकॉम के प्रमुख क्लाइंट्स के साथ होने वाले एक-तिहाई से अधिक काम में वर्जनिंग और लोकलाइजेशन जैसी गतिविधियों के लिए AI का इस्तेमाल किया जा रहा है. हालांकि, वह इन उपयोगों को AI के बदलाव की प्रक्रिया का शुरुआती चरण मानते हैं.

उनके मुताबिक, “हम एक ऐसे मुकाम पर पहुंचेंगे, जहां AI ऐसी संभावनाओं के रास्ते खोलेगा, जिनके बारे में हम आज सोच भी नहीं रहे हैं.” उनका मानना है कि भविष्य में इसका इस्तेमाल केवल तेजी से कंटेंट बनाने या बड़े स्तर पर उसे पर्सनलाइज करने तक सीमित नहीं रहेगा.

AI के कारण उद्योग को असीमित कंटेंट तैयार करने के नकारात्मक पहलुओं पर भी विचार करना पड़ सकता है. ब्रांड्स के पास अधिक संवाद तैयार करने की क्षमता होगी, लेकिन इससे उपभोक्ताओं पर जरूरत से ज्यादा कंटेंट का बोझ पड़ने का जोखिम भी है. लोपेज कहते हैं, “कंटेंट की मात्रा और उसकी गुणवत्ता के बीच एक तरह का तनाव पैदा होने वाला है.”

ब्रांड्स के लिए इसका मतलब स्पष्ट है. AI प्रोडक्शन को आसान बना सकता है, लेकिन इससे संवाद अपने आप बेहतर नहीं हो जाता.

ब्रांड की आवाज बनाए रखने की चुनौती

लोपेज के मुताबिक, प्रोडक्शन नेटवर्क की एक और बड़ी भूमिका ब्रांड की विशिष्ट पहचान और उसकी आवाज को सुरक्षित रखना तथा बड़े स्तर पर उसे बनाए रखना है.

वह जोर देकर कहते हैं, “बाजार में ब्रांड की आवाज को परिभाषित करने और उसकी निगरानी करने की सख्त जरूरत है.” ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में उनका तर्क है कि उत्पादों और उनकी विशेषताओं के बीच अंतर कम होने से ब्रांड्स के एक जैसी पहचान वाले बाजार में खो जाने का जोखिम बढ़ रहा है.

लोपेज कहते हैं, “कीमतों को लेकर पर्सनलाइजेशन, ऑप्टिमाइजेशन और सुधार पर काफी ध्यान दिया गया है, लेकिन जरूरी नहीं कि ब्रांड निर्माण पर भी उतना ही ध्यान दिया गया हो.”

इसका समाधान क्रिएटिविटी को छोड़कर टेक्नोलॉजी या परफॉर्मेंस मार्केटिंग को अपनाना नहीं है. इसके बजाय, क्रिएटिव और ब्रांड एजेंसियों को ब्रांड की विशिष्ट आवाज और भावनात्मक पहचान तय करनी होगी. वहीं, प्रोडक्शन नेटवर्क को तेजी से जटिल होते कंटेंट इकोसिस्टम में उस विचार को बड़े स्तर पर लागू करना होगा.

वैश्विक स्तर और स्थानीय प्रासंगिकता

अलग-अलग बाजारों में काम करने वाले ब्रांड्स के लिए यह चुनौती और जटिल हो जाती है. ओमनीकॉम वैश्विक ब्रांड प्लेटफॉर्म को स्थानीय संदर्भ के अनुरूप ढालने के लिए उस प्रक्रिया का इस्तेमाल करता है, जिसे लोपेज ‘ट्रांसक्रिएशन’ कहते हैं. एप्पल, डिज्नी, निसान और लॉरियल जैसे वैश्विक ब्रांड्स के लिए इसका उद्देश्य उनकी वैश्विक पहचान को बनाए रखते हुए अलग-अलग बाजारों को स्थानीय संस्कृति और उपभोक्ता व्यवहार के अनुसार उसे अपनाने की गुंजाइश देना है.

वह कहते हैं, “उस पहचान को व्यक्त कर पाना और हर बाजार की जरूरतों तथा ब्रांड की वास्तविक पहचान के अनुरूप लागू कर पाना ही पिछले कुछ वर्षों से ट्रांसक्रिएशन का उद्देश्य रहा है.” कंटेंट के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बंटने और दर्शकों की सांस्कृतिक प्राथमिकताएं अधिक विशिष्ट होने के साथ निरंतरता और स्थानीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाना लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है.

भारत क्यों महत्वपूर्ण है

भारत भी ओमनीकॉम प्रोडक्शन की वैश्विक रणनीति का तेजी से महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है. लोपेज के मुताबिक, डिजिटल तकनीक को तेजी से अपनाने और भारत, चीन तथा जापान जैसे देशों के बड़े आकार व विविधता के कारण एशिया-प्रशांत (APAC) क्षेत्र नवाचार के लिए एक प्रमुख बाजार है.

वह कहते हैं, “मुझे लगता है कि डिजिटल दुनिया में इस समय नवाचार दुनिया के किसी भी अन्य हिस्से की तुलना में इस क्षेत्र में तेजी से हो रहा है.” लोपेज के अनुसार, पिछले साल ओमनीकॉम प्रोडक्शन के भारत स्थित कारोबार में 35 प्रतिशत की वृद्धि हुई. अब कंपनी के कुल कर्मचारियों में 20 प्रतिशत से अधिक भारत में कार्यरत हैं. कंपनी ने देश में अपने कार्यालयों की संख्या भी एक से बढ़ाकर तीन कर दी है. हालांकि, लोपेज इस रणनीति को पारंपरिक ऑफशोर प्रोडक्शन से अलग बताते हैं.

वह कहते हैं, “हमारी रणनीति भारत को ऑफशोरिंग सेंटर बनाने की नहीं है. यह रणनीति बहुत सीमित सोच पर आधारित है और भारत में किए जा सकने वाले सभी कामों को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता.”

इसके बजाय, वह भारत को एक ऐसे वैश्विक और क्षेत्रीय केंद्र के रूप में देखते हैं, जहां से नए विचार और काम शुरू हो सकें.

यह बदलाव प्रोडक्शन के आयोजन के तरीके में व्यापक परिवर्तन को दर्शाता है. पहले कंटेंट बनाने और उसे अलग-अलग बाजारों के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया रैखिक थी, लेकिन अब यह क्षमताओं, तकनीक, क्रिएटिविटी और डेटा से जुड़ी वैश्विक व्यवस्था में बदल रही है.

पर्सनलाइजेशन बनाम सामूहिक अनुभव

भविष्य की बात करते हुए लोपेज मार्केटिंग के सामने एक और चुनौती की पहचान करते हैं. यह चुनौती अत्यधिक व्यक्तिगत अनुभवों की मांग और साझा सांस्कृतिक अनुभवों की जरूरत के बीच संतुलन बनाने से जुड़ी है.

उपभोक्ता चाहते हैं कि ब्रांड उनकी व्यक्तिगत पसंद को समझें. साथ ही, वे मनोरंजन, खेल और सांस्कृतिक आयोजनों जैसे साझा अनुभवों का हिस्सा भी बनना चाहते हैं.

लोपेज कहते हैं, “इन दोनों चीजों को एक साथ लाना और इनके बीच जुड़ाव स्थापित कर पाना पूरे मार्केटिंग इकोसिस्टम को बदल देगा.”

यह बदलाव फिजिकल रिटेल को भी प्रभावित कर रहा है. ई-कॉमर्स के बढ़ने के बावजूद लोपेज का कहना है कि बड़ी खरीदारी करने वाले उपभोक्ता तेजी से खरीदने से पहले उत्पादों को वास्तविक रूप में अनुभव करना चाहते हैं.

ब्रांड्स के लिए इसका मतलब है कि मार्केटिंग का भविष्य पूरी तरह डिजिटल या केवल पर्सनलाइजेशन पर आधारित नहीं होगा. इसमें व्यक्तिगत अनुभवों को सामूहिक अनुभवों से जोड़ना, डिजिटल माध्यमों से उत्पादों की खोज को वास्तविक अनुभवों से जोड़ना और बड़े स्तर पर काम करने के साथ विशिष्ट पहचान बनाए रखना शामिल होगा. इससे प्रोडक्शन की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है.

लोपेज के अनुसार, चुनौती अब केवल कंटेंट तैयार करना नहीं है. असली सवाल यह है कि जब हर कोई बड़ी मात्रा में कंटेंट तैयार कर रहा है, तो ब्रांड्स इस भीड़ में अपनी अलग पहचान कैसे बनाएंगे और उपभोक्ताओं का भरोसा दोबारा कैसे हासिल करेंगे. कभी मुख्य रूप से क्रियान्वयन तक सीमित माने जाने वाले उद्योग के लिए यह कहीं बड़ी जिम्मेदारी है.

सौम्या सहगल भूटानी, BW रिपोर्टर्स

(BW Marketing World में सीनियर एडिटोरियल लीड के रूप में सौम्या भारत के मीडिया, मार्केटिंग और विज्ञापन इकोसिस्टम पर विस्तृत रिपोर्टिंग और विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं.)
 


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