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फंडिंग की कमी से सीमित हो रही भारत के गैर-लाभकारी ‘यूनिकॉर्न’ की महत्वाकांक्षाएं

जब भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब रिपोर्ट का तर्क है कि “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” के साथ-साथ “ईज ऑफ डूइंग गुड” को भी उतनी ही प्राथमिकता देना आवश्यक है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 months ago

भारत में बड़े पैमाने पर सामाजिक प्रभाव डालने वाले गैर-लाभकारी संगठनों (नॉन-प्रॉफिट) के सामने लचीली फंडिंग (फ्लेक्सिबल फंडिंग) की गंभीर कमी एक बड़ी बाधा बनकर उभर रही है. Change Engine की नई रिपोर्ट के अनुसार, देश को अगले पांच वर्षों में 100 बड़े गैर-लाभकारी संगठनों को सक्षम बनाने के लिए 75 करोड़ अमेरिकी डॉलर (USD 750 million) की लचीली फंडिंग अनलॉक करनी होगी. इसका अर्थ है कि हर वर्ष लगभग 15 करोड़ अमेरिकी डॉलर की लचीली पूंजी उपलब्ध करानी होगी, ताकि प्रत्येक संगठन कम से कम 10 लाख लोगों तक प्रभाव पहुंचा सके.

100 ‘नॉन-प्रॉफिट यूनिकॉर्न’ का लक्ष्य.

‘Ease of Doing Good: The Flexible Funding Gap for Non-profit Unicorns’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में 146 संगठनों के जवाबों के आधार पर विश्लेषण किया गया है. रिपोर्ट का कहना है कि जहां भारत ने 100 से अधिक स्टार्टअप यूनिकॉर्न तैयार किए हैं, वहीं सामाजिक क्षेत्र अब भी बिना शर्त (अनरिस्ट्रिक्टेड) पूंजी की कमी से संरचनात्मक रूप से जूझ रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक, 100 बड़े गैर-लाभकारी संगठनों को खड़ा करने के लिए आवश्यक 75 करोड़ डॉलर की राशि भारत के वार्षिक CSR व्यय का लगभग 4% और कुल परोपकारी दान का करीब 1% है. इसे रिपोर्ट ने “महत्वाकांक्षी लेकिन संभव” लक्ष्य बताया है.

लचीली फंडिंग की भारी कमी

सर्वेक्षण के अनुसार

1. 80% संगठनों ने बताया कि उनकी कुल फंडिंग का 25% से भी कम हिस्सा अनरिस्ट्रिक्टेड है.
2. आधे से अधिक संगठन अपने बजट का 10% से भी कम हिस्सा लचीली पूंजी के रूप में संचालित करते हैं.

छोटे (वार्षिक बजट 1 करोड़ रुपये से कम), मध्यम (1–5 करोड़ रुपये) और बड़े (5 करोड़ रुपये से अधिक) सभी आकार के संगठनों में यह पैटर्न लगभग समान है.

मध्यम स्तर के 10 में से 6 संगठनों के पास 25 लाख रुपये से कम की अनरिस्ट्रिक्टेड फंडिंग है, जबकि यही वह चरण है जब वे अपने सिद्ध मॉडलों को विस्तार देने की कोशिश कर रहे होते हैं.

करीब 60% उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें मिलने वाले अनरिस्ट्रिक्टेड चेक आमतौर पर 10 लाख रुपये से कम के होते हैं, जबकि केवल 7% संगठनों को 50 लाख रुपये या उससे अधिक की लचीली फंडिंग मिलती है.

बहुवर्षीय अनुदान भी दुर्लभ

लगभग 40% संगठनों ने बताया कि उन्हें कभी भी मल्टी-ईयर (बहुवर्षीय) अनुदान नहीं मिला. जिन संगठनों के पास विदेशी फंडिंग के लिए FCRA या अमेरिकी 501(c) पंजीकरण की पात्रता नहीं है, उनमें यह आंकड़ा 58% तक पहुंच जाता है. इसके विपरीत, विदेशी फंडिंग के पात्र संगठनों में यह अनुपात लगभग 20% है.

स्थिर और पूर्वानुमानित बहुवर्षीय फंडिंग की कमी का सीधा असर संचालन पर पड़ता है.

1. 45% संस्थापकों ने कहा कि वे अपना आधे से अधिक समय फंड जुटाने में खर्च करते हैं.
2. 15% ने बताया कि उनका 75% समय केवल फंडरेजिंग में चला जाता है.

रिपोर्ट के अनुसार, “छोटे चेक साइज, धीमी निर्णय प्रक्रिया और बहुवर्षीय अनुदान की अनुपस्थिति संस्थापकों का बहुमूल्य समय नष्ट करती है.”

CSR और घरेलू फाउंडेशन पीछे.

रिपोर्ट में पाया गया कि:

1. 55% संगठनों को लचीली फंडिंग उच्च निवल मूल्य वाले व्यक्तियों (HNIs) से मिलती है.
2. 41% को क्राउडफंडिंग के जरिए.
3. केवल 33% को घरेलू फाउंडेशन से.
4. 23% को विदेशी फाउंडेशन से और मात्र 18% को CSR के माध्यम से अनरिस्ट्रिक्टेड फंडिंग प्राप्त हुई.

संगठनों ने बताया कि प्रोग्राम-लिंक्ड अनुदान की तुलना में अनरिस्ट्रिक्टेड फंडिंग जुटाना कहीं अधिक कठिन है. CSR के मामले में यह अंतर सबसे अधिक देखा गया.

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में CSR के तहत हर साल लगभग 34,000 करोड़ रुपये की फंडिंग उपलब्ध है, जिसे “पूंजी का विशाल स्रोत” बताया गया है, लेकिन यह लचीले उपयोग के लिए काफी हद तक अनुपलब्ध है.

55% उत्तरदाताओं ने कहा कि नियामकीय और CSR नियम अनरिस्ट्रिक्टेड फंडिंग को हतोत्साहित करते हैं.
53% ने कम ओवरहेड लागत की अपेक्षा को बाधा बताया, जबकि 53.4% ने नियामकीय प्रतिबंधों को कारण माना.

विस्तार में बाधाएं और निवेश प्राथमिकताएं

करीब 80% संगठनों ने कहा कि लचीली फंडिंग की कमी उनके विस्तार (स्केलिंग) में बाधा बन रही है.

यदि उन्हें 25% अतिरिक्त अनरिस्ट्रिक्टेड फंडिंग मिले तो 75% संगठन प्रतिभा और टीम क्षमता में निवेश करेंगे. 32% पायलट, नवाचार और प्रयोग में निवेश करेंगे. 27% तकनीक और सिस्टम को मजबूत करेंगे और 18% मॉनिटरिंग और मूल्यांकन क्षमताओं को बेहतर बनाएंगे.

रिपोर्ट के अनुसार, जोखिम सहने वाली पूंजी के अभाव में संगठन अधिक जोखिम से बचने वाले बन जाते हैं, जिससे नवाचार बाधित होता है. “लचीली फंडिंग ही गैर-लाभकारी संगठनों के लिए ईंधन है,” रिपोर्ट में कहा गया है.

नीतिगत सुधारों की जरूरत

उत्तरदाताओं में से लगभग आधे ने बहुवर्षीय अनुदान को प्राथमिक सुधार बताया. 28% ने विशेष अनरिस्ट्रिक्टेड अनुदानों की मांग की.

सुझावों में शामिल हैं:

1. एक वर्ष के बजाय 3–5 वर्ष की प्रतिबद्धताएं.
2. रिपोर्टिंग आवश्यकताओं को सरल बनाना.
3. लाइन-आइटम बजट के बजाय परिणामों पर निगरानी.

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि जनरल पब्लिक यूटिलिटी (GPU) श्रेणी के संगठनों के लिए आर्थिक गतिविधियों से आय पर 20% की सीमा की समीक्षा की जाए, क्योंकि इससे स्थायी आय मॉडल विकसित करने की क्षमता सीमित होती है.

इसके अलावा, CSR पात्रता मानदंड में तीन वर्ष के न्यूनतम ट्रैक रिकॉर्ड की शर्त को आसान बनाने का सुझाव दिया गया है, जिससे शुरुआती चरण के संगठन भी घरेलू फंडिंग के बड़े स्रोत तक पहुंच सकें.

‘ईज ऑफ डूइंग गुड’ भी उतना ही जरूरी

रिपोर्ट ने माना है कि अध्ययन में कुछ सीमाएं हैं, जैसे गैर-यादृच्छिक सैंपलिंग और स्व-रिपोर्टेड डेटा पर निर्भरता. फिर भी इसे भारत में अनरिस्ट्रिक्टेड फंडिंग पर अपनी तरह का पहला साक्ष्य बताया गया है.

रिपोर्ट का निष्कर्ष है, “पूंजी मौजूद है; जरूरत है तो उसे अलग तरीके से उपयोग में लाने की इच्छाशक्ति की.”

जब भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब रिपोर्ट का तर्क है कि “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” के साथ-साथ “ईज ऑफ डूइंग गुड” को भी उतनी ही प्राथमिकता देना आवश्यक है.
 


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