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भारत का जलवायु विजन 2047: समावेशी विकास और पर्यावरण संरक्षण का संतुलन

भारत का हरित विकास मॉडल केवल आर्थिक प्रगति का खाका नहीं, बल्कि न्याय, समानता और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी का संकल्प है.

रितु राणा 6 months ago

भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन प्रति वर्ष 2 टन से थोड़ा अधिक है, जो अमेरिका का लगभग एक-सातवां और यूरोपीय संघ का लगभग एक-चौथाई है तथा वैश्विक औसत से भी कम है. विकसित देशों ने औद्योगिकीकरण उच्च उत्सर्जन, तेल आधारित परिवहन और व्यापक वनों की कटाई के सहारे किया. इसके विपरीत भारत एक अधिक जटिल लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, जिसमें आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और साथ ही डीकार्बोनाइजेशन को एक साथ आगे बढ़ाना है. यह जानकारी एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) द्वारा आयोजित वर्ल्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट 2026 के समापन सत्र 'हमारे साझा भविष्य के लिए विचार, पुनरुत्थान और संकल्प' के दौरान भारत सरकार  के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), के सचिव (पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन) तनमय कुमार ने साझा की.

तनमय कुमार ने आगे कहा भारत इस बदलाव को केवल क्रमिक सुधार नहीं, बल्कि एक व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन के रूप में देखता है. इस परिवर्तन के केंद्र में दो प्रमुख सिद्धांत हैं, अंतर-पीढ़ीगत और अंतः-पीढ़ीगत न्याय व समानता. सरकार का स्पष्ट संदेश है कि बीते समय की गरीबी को दूर करने के लिए भविष्य का पारिस्थितिक संकट पैदा नहीं किया जाएगा.

जलवायु अनुकूलन पर बढ़ता फोकस

तनमय कुमार ने कहा जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में अनुकूलन (Adaptation) को वैश्विक प्राथमिकताओं में अहम स्थान दिया गया है. जहां शमन (Mitigation) दीर्घकालिक वैश्विक लक्ष्यों पर केंद्रित है, वहीं अनुकूलन समुदायों के सामने मौजूद तात्कालिक चुनौतियों का समाधान करता है. भारत ने अपना पहला अनुकूलन संचार दस्तावेज तैयार करने के बाद अब पहला राष्ट्रीय अनुकूलन योजना भी अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है. यह बिखरी हुई सफल पहलों से आगे बढ़कर एकीकृत योजना और वित्तीय ढांचे की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है.

अब ध्यान जलवायु आपदाओं पर प्रतिक्रिया देने के बजाय संभावित जोखिमों का पूर्वानुमान लगाकर व्यवस्थित योजना बनाने पर है.

2047 का विजन: विकसित लेकिन अलग पहचान वाला भारत

तनमय कुमार ने कहा स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने तक, यानी 2047 तक, भारत का लक्ष्य एक समावेशी और विकसित राष्ट्र बनना है, लेकिन अतीत की कार्बन-आधारित विकास मॉडल की नकल किए बिना. इस दृष्टि में ऐसे शहरों की कल्पना की गई है जो ट्रांजिट-आधारित और ऊर्जा दक्ष हों. उद्योगों को हरित हाइड्रोजन और स्वच्छ परमाणु ऊर्जा से संचालित करने पर जोर है. बिजली ग्रिड में बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण को शामिल किया जाएगा. साथ ही सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देकर संसाधनों की खपत कम करने का लक्ष्य रखा गया है. संदेश साफ है, भविष्य संयोग से नहीं मिलता, बल्कि ईमानदारी और दृढ़ संकल्प से सुरक्षित किया जाता है.

पर्यावरण संरक्षण: बच्चों के प्रति प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति

वहीं, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की गुडविस एंबेसडर दिया मिर्जा ने कहा जलवायु परिवर्तन कोई दूर की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की कठोर सच्चाई है. इसका प्रभाव अभी दिख रहा है और जब तक सामूहिक व तेज कार्रवाई नहीं होगी, स्थिति में सुधार संभव नहीं है. दीया मिर्जा ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा उन्होंने पर्यावरण के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा निराशा, बेचैनी और आक्रोश से पाई, लेकिन इन भावनाओं को कार्रवाई में बदलना जरूरी है, क्योंकि उम्मीद केवल तब जिंदा रहती है जब हम बदलाव के लिए काम करते हैं. उन्होंने कहा कि प्रकृति की रक्षा कोई अलग पर्यावरण एजेंडा नहीं है और न ही कोई अमूर्त विचार. यह हमारे बच्चों के प्रति प्रेम की सबसे गहरी अभिव्यक्ति है.

समय कम है, जिम्मेदारी बड़ी

दीया मिर्जा ने कहा अगर हम सचमुच अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, तो हमें और अधिक प्रयास करने होंगे. जलवायु संकट पहले से ही कमजोर वर्गों के लिए कठोर साबित हो रहा है और निकट भविष्य में यह विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों को भी प्रभावित करेगा. उन्होंने सहयोग, साझेदारी और एक-दूसरे को सशक्त बनाने की आवश्यकता पर बल दिया. साथ ही यह भी साझा किया कि उन्होंने 12,500 से अधिक प्लास्टिक बोतलों को प्राकृतिक तंत्र में जाने से रोकने में सफलता पाई है, जो छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम का उदाहरण है.

 

 


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