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सप्लाई चेन को लेकर बदली भारतीय कंपनियों की रणनीति, 70% ने अपनाया डायवर्सिफाइड सोर्सिंग: रिपोर्ट

59% कंपनियां बढ़ा रहीं इन्वेंटरी, संभावित रुकावटों से निपटने के लिए डिजिटल टेक्नोलॉजी और मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स पर भी फोकस

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago

वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितताओं और सप्लाई चेन में संभावित रुकावटों के बीच भारतीय कंपनियां अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव कर रही हैं. कंपनियां अब सप्लायर बेस में विविधता लाने, रणनीतिक रूप से इन्वेंटरी बढ़ाने और डिजिटल तकनीक अपनाने पर ज्यादा जोर दे रही हैं. डीपी वर्ल्ड की ग्लोबल ट्रेड ऑब्जर्वेटरी की इंडिया कंट्री रिपोर्ट 2026 के मुताबिक, 70 प्रतिशत भारतीय एक्जीक्यूटिव्स ने सप्लायर डायवर्सिफिकेशन को प्राथमिकता बताया है, जबकि 59 प्रतिशत कंपनियां इन्वेंटरी का स्तर बढ़ा रही हैं.

सप्लाई चेन को मजबूत करना पहली प्राथमिकता

सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स से जुड़े 451 वरिष्ठ एक्जीक्यूटिव्स के सर्वे पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियां वैश्विक कंपनियों की तुलना में अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने को ज्यादा प्राथमिकता दे रही हैं. सप्लायर डायवर्सिफिकेशन के बाद इन्वेंटरी बढ़ाना और फ्रेंड-शोरिंग यानी भरोसेमंद एवं अनुकूल देशों से सोर्सिंग करना कंपनियों की प्रमुख रणनीतियों में शामिल है.

कंपनियां नए बाजारों में विस्तार के साथ टेक्नोलॉजी को भी तेजी से अपना रही हैं. आधे से अधिक भारतीय कंपनियों ने कस्टमर-फेसिंग सर्विसेज को पूरी तरह डिजिटल कर दिया है. वैश्विक स्तर पर ऐसी कंपनियों की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से भी कम है.

रिपोर्ट के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल रूट ऑप्टिमाइजेशन, डॉक्यूमेंटेशन और कस्टम्स प्रोसेस को अधिक प्रभावी बनाने में किया जा रहा है. इससे कंपनियों को लागत और समय कम करने के साथ सप्लाई चेन की रेजिलिएंस बढ़ाने में मदद मिल रही है.

ट्रेड एग्रीमेंट से बढ़े सोर्सिंग और नए बाजारों के अवसर

भारत के बदलते व्यापार परिदृश्य ने भी कंपनियों की रणनीति में इस बदलाव को गति दी है. प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम से घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा मिला है, जबकि बढ़ते व्यापारिक संबंधों से कंपनियों के लिए नए सोर्सिंग और एक्सपोर्ट बाजार खुले हैं.

2022 से अब तक भारत ने यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, ईएफटीए देशों, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ व्यापार समझौते किए हैं. यूरोपीय संघ के साथ भी व्यापार समझौते की दिशा में प्रगति हुई है, जबकि गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) और इजरायल के साथ बातचीत चल रही है.

रिपोर्ट में करीब आधे एक्जीक्यूटिव्स ने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA) को व्यापार विकास के लिए प्रमुख नीतिगत प्राथमिकता बताया है. डिजिटलाइजेशन और व्यापार सुविधा जैसे कदमों के अलावा भारत में ट्रेड फाइनेंस तक पहुंच भी अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है. 57 प्रतिशत एक्जीक्यूटिव्स का मानना है कि भारत में ट्रेड फाइनेंस आसानी से उपलब्ध है, जबकि वैश्विक स्तर पर ऐसा मानने वाले एक्जीक्यूटिव्स की हिस्सेदारी 39 प्रतिशत है.

ग्राहकों के करीब इन्वेंटरी रखने पर जोर

सोर्सिंग को डायवर्सिफाई करने और नए बाजारों में विस्तार के साथ कंपनियां इन्वेंटरी को ग्राहकों के करीब रखने की रणनीति पर भी जोर दे रही हैं. इसका उद्देश्य सप्लाई में किसी तरह की बाधा आने की स्थिति में ग्राहकों को समय पर उत्पाद उपलब्ध कराना है. इसी बढ़ती जरूरत के बीच भारत में डीपी वर्ल्ड का इंटीग्रेटेड ट्रेड और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क पोर्ट्स, वेयरहाउसिंग, फ्रेट फॉरवर्डिंग और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी को जोड़ता है.

कंपनी के मुताबिक, 60 लाख टीईयू की कुल सालाना क्षमता वाले उसके पांच कंटेनर टर्मिनल भारत के करीब एक-चौथाई आयात-निर्यात (EXIM) कंटेनर बाजार को सेवा देते हैं. इस नेटवर्क में तीन फ्री ट्रेड वेयरहाउसिंग जोन, 50 लाख वर्ग फीट वेयरहाउसिंग स्पेस, पांच कंटेनर फ्रेट स्टेशन और आठ इनलैंड रेल टर्मिनल शामिल हैं.

इसके अलावा नेटवर्क में 16,000 से अधिक कंटेनर, 15,000 पिन कोड को कवर करने वाला एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, डिजिटल फ्रेट फॉरवर्डिंग और ट्रेड फाइनेंस सॉल्यूशंस भी शामिल हैं. इन सुविधाओं का उद्देश्य कंपनियों को ज्यादा प्रभावी और रेजिलिएंट सप्लाई चेन बनाने में मदद करना है.

'डायवर्सिफाइड सोर्सिंग और स्ट्रैटेजिक इन्वेंटरी तेजी से महत्वपूर्ण'

रिपोर्ट के नतीजों पर डीपी वर्ल्ड के सबकॉन्टिनेंट, सेंट्रल एशिया, लेवांत एंड इजिप्ट के सीईओ एवं एमडी रिजवान सूमर ने कहा कि भारत का व्यापार विकास के नए चरण में प्रवेश कर रहा है और कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए रणनीतियों में बदलाव कर रही हैं.

उन्होंने कहा, "वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं से निपटने के लिए डायवर्सिफाइड सोर्सिंग, स्ट्रैटेजिक इन्वेंटरी, डिजिटलाइजेशन और नए बाजारों तक पहुंच तेजी से महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं."

उन्होंने कहा कि डीपी वर्ल्ड पोर्ट्स, इनलैंड मार्केट, लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी को जोड़कर कंपनियों को अधिक दक्षता के साथ कारोबार करने में मदद कर रहा है. इससे भारत की प्रतिस्पर्धी क्षमता और ग्लोबल वैल्यू चेन में उसकी भूमिका को मजबूत करने में मदद मिल सकती है.

46% लॉजिस्टिक्स अधिकारियों की पहली पसंद सड़क नेटवर्क

भारत का व्यापारिक आकार बढ़ने के साथ लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर भी कंपनियों की रणनीति का अहम हिस्सा बन रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, 46 प्रतिशत लॉजिस्टिक्स अधिकारियों ने सड़क नेटवर्क को प्राथमिकता दी है. हालांकि, कंपनियां अब सड़क परिवहन के साथ रेल और तटीय शिपिंग जैसे मल्टीमॉडल विकल्पों की ओर भी तेजी से बढ़ रही हैं. मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी से बंदरगाहों को देश के अंदरूनी बाजारों से जोड़ने में मदद मिलती है. इससे लॉजिस्टिक्स की दक्षता बढ़ाने के साथ लागत और उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिल सकती है.

कंपनियों के लिए बेहतर कनेक्टिविटी का मतलब देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक सामान पहुंचाने के लिए ज्यादा विकल्प और अधिक भरोसेमंद लॉजिस्टिक्स नेटवर्क है.

ग्लोबल ट्रेड कॉरिडोर में भारत की भूमिका बढ़ाने का मौका

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कारोबार के विकास का अगला चरण कंपनियों की बदलते वैश्विक व्यापार माहौल के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता पर निर्भर करेगा. इंटीग्रेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल क्षमताओं और व्यापार को सुगम बनाने वाली व्यवस्थाओं में निवेश से भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत किया जा सकता है. इससे भारत को उभरते ग्लोबल ट्रेड कॉरिडोर में अपनी भूमिका बढ़ाने और नए कारोबारी अवसर हासिल करने में मदद मिल सकती है.

 


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