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विदेशी सिंडिकेटेड लोन से भारतीय कंपनियों ने रचा इतिहास, 2025 में जुटाए 32.5 अरब डॉलर

रिकॉर्ड 32.5 अरब डॉलर की फंडिंग न सिर्फ कॉरपोरेट सेक्टर की विस्तार योजनाओं को गति देगी. बल्कि आने वाले वर्षों में भारत की वैश्विक आर्थिक मौजूदगी को भी और मजबूत करेगी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

साल 2025 भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर के लिए विदेशी फंडिंग के लिहाज से ऐतिहासिक रहा. बैंकों और एनबीएफसी समेत भारतीय कंपनियों ने सिंडिकेटेड लोन के जरिए विदेशों से रिकॉर्ड 32.5 अरब डॉलर जुटाए. अधिग्रहण गतिविधियों में तेजी. प्रायोजित फाइनैंसिंग की बढ़ती मांग और अंतरराष्ट्रीय बैंकों का भरोसा इस उछाल की बड़ी वजह बना.

2024 और 2023 को पीछे छोड़ा

उद्योग के आंकड़ों के मुताबिक. 2025 में जुटाई गई रकम 2024 के करीब 26 अरब डॉलर और 2023 के 31.6 अरब डॉलर से कहीं ज्यादा है. इससे साफ है कि भारतीय कंपनियों का विदेशी कर्ज बाजार में भरोसा लगातार मजबूत हुआ है और वे बॉन्ड के बजाय सिंडिकेटेड लोन को ज्यादा प्राथमिकता दे रही हैं.

अधिग्रहण और प्रायोजित फाइनैंसिंग से बढ़ी मांग

विशेषज्ञों का कहना है कि 2025 में विदेशी फंडिंग का बड़ा हिस्सा अधिग्रहण सौदों और प्रायोजित फाइनैंसिंग के लिए इस्तेमाल हुआ. कुल 32.5 अरब डॉलर में से करीब 12.5 अरब डॉलर कॉरपोरेट फाइनैंसिंग के लिए. 10 अरब डॉलर से ज्यादा वित्तीय संस्थानों ने और 9 अरब डॉलर से अधिक प्रायोजित इवेंट डील्स के लिए जुटाए गए.

एनबीएफसी और वित्तीय संस्थानों का दबदबा

सिंडिकेटेड लोन बाजार में वित्तीय संस्थानों की हिस्सेदारी करीब 42 फीसदी रही. खास बात यह रही कि एनबीएफसी का विदेशी कर्ज 108 फीसदी की रिकॉर्ड बढ़त के साथ सबसे आगे रहा. इससे साफ है कि वित्तीय सेक्टर विदेशी पूंजी जुटाने में सबसे आक्रामक रहा.

क्यों बॉन्ड से ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं सिंडिकेटेड लोन

एचएसबीसी इंडिया के एमडी और डेट फाइनैंसिंग प्रमुख चेतन जोशी के मुताबिक. सिंडिकेटेड लोन में निकासी और पूर्व भुगतान में ज्यादा लचीलापन होता है. वहीं. बॉन्ड आमतौर पर कम से कम 30 करोड़ डॉलर के बड़े साइज के होते हैं. जबकि 2025 में कई भारतीय कंपनियों ने 10 से 30 करोड़ डॉलर के बीच के लोन आसानी से हासिल किए.

फ्लोटिंग रेट का फायदा. ब्याज दर कटौती से उम्मीद

विशेषज्ञ बताते हैं कि बॉन्ड जहां फिक्स्ड रेट पर होते हैं. वहीं सिंडिकेटेड लोन फ्लोटिंग रेट पर मिलते हैं. अमेरिका में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद के चलते डॉलर रेवेन्यू वाली कंपनियां फ्लोटिंग रेट वाले लोन को ज्यादा फायदेमंद मान रही हैं. क्योंकि इससे आगे चलकर ब्याज बोझ कम हो सकता है.

उद्योग जगत को उम्मीद है कि 2026 में भी अधिग्रहण और विस्तार योजनाओं के चलते सिंडिकेटेड लोन बाजार में अच्छी-खासी हलचल रहेगी. साथ ही. ईसीबी दिशानिर्देशों में संभावित ढील और डॉलर बॉन्ड बाजार में बढ़ती गतिविधि से विदेशी फंडिंग के नए रास्ते खुल सकते हैं.


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