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भारत में 3D प्रिंटिंग को बढ़ावा देने की तैयारी, NSAM 2.0 से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मिलेगी रफ्तार

नई रणनीति में स्वदेशी तकनीकों को व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल के योग्य बनाने, बौद्धिक संपदा विकसित करने, डिजिटल तकनीकों को एकीकृत करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उत्पाद तैयार करने पर ध्यान दिया जाएगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

भारत सरकार देश में 3D प्रिंटिंग तकनीक और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए नेशनल स्ट्रैटेजी फॉर एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (NSAM) के दूसरे चरण NSAM 2.0 की रूपरेखा तैयार कर रही है. इसके तहत स्वदेशी तकनीकों के व्यावसायीकरण, उपकरणों और कच्चे माल की उपलब्धता बेहतर बनाने और विभिन्न उद्योगों में इस तकनीक के इस्तेमाल का विस्तार करने पर जोर दिया जाएगा. फरवरी 2022 में शुरू की गई पहली रणनीति के तहत अब तक 1.54 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है, 56 स्टार्टअप को समर्थन मिला है और 65 स्वदेशी तकनीकों के विकास में मदद की गई है.

NSAM 2.0 में स्वदेशी तकनीकों के व्यावसायीकरण पर जोर

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) NSAM 2.0 की रूपरेखा तैयार कर रहा है. इसका उद्देश्य नवाचार को बढ़ावा देना, उद्योगों में 3D प्रिंटिंग को अपनाने की गति तेज करना और वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग बाजार में भारत की स्थिति मजबूत करना है.

नई रणनीति में स्वदेशी तकनीकों को व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल के योग्य बनाने, बौद्धिक संपदा विकसित करने, डिजिटल तकनीकों को एकीकृत करने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उत्पाद तैयार करने पर ध्यान दिया जाएगा. इसके अलावा, क्लस्टर विकसित करके मशीनों और कच्चे माल की लागत कम करने की योजना भी प्रस्तावित है.

NSAM 2.0 अभी अवधारणा तैयार करने के चरण में है. इसमें स्टार्टअप इकोसिस्टम का विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना, रक्षा क्षेत्र में 3D प्रिंटिंग के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और सतत विकास लक्ष्यों से जुड़े पायलट प्रोजेक्ट शुरू करना भी शामिल है.

पहली रणनीति के तहत 1.54 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण

भारत की पहली नेशनल स्ट्रैटेजी फॉर एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग फरवरी 2022 में शुरू की गई थी. इसके तहत वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग बाजार में 5% हिस्सेदारी हासिल करने और भारत की जीडीपी में करीब 1 अरब डॉलर का योगदान देने का लक्ष्य रखा गया था.

रणनीति के अन्य लक्ष्यों में भारत की जरूरतों के अनुरूप 50 तकनीकों का विकास, 100 स्टार्टअप को समर्थन, 500 नए उत्पाद तैयार करना, एक लाख कुशल कामगारों को प्रशिक्षण देना और 10 विनिर्माण क्षेत्रों में क्षमताएं विकसित करना शामिल है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 1.54 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जो शुरुआती लक्ष्य से ज्यादा है. इसके अलावा, 56 स्टार्टअप को समर्थन मिला है और सामग्री, मशीनों, डिजाइन प्रक्रियाओं तथा तैयार उत्पादों से जुड़ी 65 स्वदेशी तकनीकों के विकास में मदद की गई है. सरकार ने अनुसंधान, तकनीक विकास, उद्योगों के साथ सहयोग और कौशल प्रशिक्षण को बढ़ावा देने के लिए सात विशेष विकास एवं तैनाती केंद्र भी स्थापित किए हैं.

क्या है 3D प्रिंटिंग तकनीक?

एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग को आम तौर पर 3D प्रिंटिंग कहा जाता है. इसमें डिजिटल डिजाइन के आधार पर सामग्री की परत-दर-परत जमावट करके किसी वस्तु का निर्माण किया जाता है. इस प्रक्रिया में कंप्यूटर आधारित डिजाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स और मटेरियल साइंस का इस्तेमाल होता है.

इस तकनीक के जरिए पॉलिमर, धातु, सिरेमिक, कंपोजिट और जैविक सामग्री से विभिन्न उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं. पारंपरिक विनिर्माण प्रक्रियाओं के मुकाबले यह जटिल डिजाइन वाले पुर्जे बनाने और जरूरत के अनुसार कस्टमाइज्ड उत्पाद तैयार करने में उपयोगी हो सकती है. 3D प्रिंटिंग का इस्तेमाल एयरोस्पेस, रक्षा, स्वास्थ्य सेवा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण और फोटोनिक्स जैसे क्षेत्रों में बढ़ रहा है.

अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में बढ़ रहा इस्तेमाल

अंतरिक्ष क्षेत्र में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास से जुड़े स्टार्टअप अग्निकुल कॉसमॉस ने मई 2024 में अपने अग्निबाण SOrTeD मिशन के तहत एक ही हिस्से में 3D प्रिंट किया गया सेमी-क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन इस्तेमाल किया था. इस मिशन ने स्वदेशी अंतरिक्ष उपकरणों के विकास में एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता को प्रदर्शित किया.

रक्षा क्षेत्र में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. भारतीय सेना ने अहमदाबाद में 12 सप्ताह में दो मंजिला आवासीय इकाई का निर्माण किया. इसके अलावा, लद्दाख जैसे परिचालन क्षेत्रों में रक्षा बुनियादी ढांचे के निर्माण में भी 3D प्रिंटिंग का उपयोग बढ़ाया गया है.

सशस्त्र बल रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल यानी MRO गतिविधियों में भी इस तकनीक के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाश रहे हैं. इससे जरूरत के अनुसार पुर्जे तैयार करने और कुछ मामलों में आपूर्ति संबंधी चुनौतियों को कम करने में मदद मिल सकती है.

स्वास्थ्य और इलेक्ट्रॉनिक्स में भी नई संभावनाएं

स्वास्थ्य क्षेत्र में स्वदेशी चिकित्सा उपकरणों और मरीजों की जरूरत के अनुरूप इम्प्लांट विकसित करने के लिए 3D प्रिंटिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है. MeitY ने प्राकृतिक रेशम आधारित इम्प्लांट के विकास से जुड़े काम को समर्थन दिया है. वहीं, टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड स्वदेशी बायोसिरेमिक सामग्री से 3D प्रिंटेड बोन ग्राफ्ट विकसित करने की परियोजना को सहयोग दे रहा है.

इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में भी इस तकनीक के जरिए बैटरी, एंटीना, कैपेसिटर और वेरिस्टर जैसे कंपोनेंट तैयार करने के प्रदर्शन किए गए हैं. भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) ने एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग के जरिए फोटोनिक इंटीग्रेटेड सर्किट के ब्लॉक तैयार करने की क्षमता भी प्रदर्शित की है.

इन क्षेत्रों में तकनीक का विस्तार होने से स्वदेशी उत्पादों के विकास और आयात पर निर्भरता कम करने की संभावनाएं बन सकती हैं. हालांकि, इसका वास्तविक असर उत्पादन लागत, गुणवत्ता, बड़े पैमाने पर विनिर्माण और व्यावसायिक इस्तेमाल पर निर्भर करेगा.

निर्माण क्षेत्र में लागत और उत्सर्जन घटाने की संभावना

निर्माण क्षेत्र में भी 3D प्रिंटिंग को घरों और अन्य संरचनाओं के निर्माण के वैकल्पिक तरीके के रूप में देखा जा रहा है. केल्विन 6K प्रो नामक ऑन-साइट निर्माण प्रिंटर ने कम कार्बन वाले जियोपॉलिमर पदार्थों का इस्तेमाल करके 2,500 वर्ग फुट के घर को 30 दिनों से कम समय में बनाने की क्षमता प्रदर्शित की है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, शुरुआती अनुप्रयोगों में पारंपरिक सीमेंट आधारित निर्माण की तुलना में सामग्री और लॉजिस्टिक्स लागत में 30% तक तथा उत्सर्जन में 90% तक की कमी की संभावना जताई गई है. हालांकि, ये संभावित लाभ हैं. वास्तविक बचत परियोजना की प्रकृति, इस्तेमाल की गई सामग्री और निर्माण प्रक्रिया पर निर्भर करेगी.

सरकार और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने की तैयारी

MeitY ने मार्च 2026 में दूसरे नेशनल एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग सिम्पोजियम का आयोजन किया था. इसमें NSAM 2.0, रक्षा क्षेत्र में तकनीक के इस्तेमाल, उद्योगों में इसे अपनाने और अनुसंधान एवं विकास से जुड़ी पहलों पर चर्चा हुई.

सरकार स्कूल स्तर पर भी उभरती तकनीकों से परिचित कराने की कोशिश कर रही है. इसके लिए अटल टिंकरिंग लैब्स के माध्यम से कक्षा छह से 12वीं तक के विद्यार्थियों को 3D प्रिंटर, रोबोटिक्स किट और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) जैसी तकनीकों तक पहुंच दी जा रही है.

2035 तक 149 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है वैश्विक बाजार

सरकार की ओर से उद्धृत अनुमानों के मुताबिक, वैश्विक एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग मशीनों का बाजार 2035 तक 149 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. वहीं, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति श्रृंखला का आकार 18 अरब डॉलर से बढ़कर 112 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. ये भविष्य से जुड़े बाजार अनुमान हैं, मौजूदा बाजार का आकार नहीं. भारत के लिए NSAM 2.0 इस बढ़ते बाजार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने का अवसर बन सकता है.

कुल मिलाकर, नई रणनीति के जरिए सरकार स्वदेशी तकनीकों के व्यावसायीकरण, स्टार्टअप को समर्थन, उपकरणों की किफायती उपलब्धता और उद्योगों में 3D प्रिंटिंग के व्यापक इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहती है. हालांकि, इसके परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि प्रस्तावित योजनाओं को किस तरह लागू किया जाता है और उद्योग इन्हें कितनी तेजी से अपनाते हैं.

 


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