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रूस की धमकी पर भारी पड़ा मुनाफा और दोस्ती, ये हैं फॉसिल फ्यूल के टॉप इम्पोर्टर
अमेरिका ने सभी देशों को आगाह किया था कि वो यूक्रेन को युद्ध में धकेलने वाले रूस से सभी संबंध तोड़ दें, लेकिन इसका ज्यादा असर नहीं हुआ.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अमेरिका सहित तमाम देशों ने मॉस्को पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे. पश्चिमी देशों और NATO की सख्ती देखकर ऐसा लग रहा था जैसे रूस पूरी दुनिया से अलग-थलग पड़ जाएगा. हालांकि, ऐसा हुआ नहीं. अमेरिका के तीखे तेवरों के बावजूद भारत सहित कई देशों ने रूस के साथ अपने रिश्ते खत्म नहीं किए, उल्टा रूस से सस्ती कीमत में मिल रहे कच्चे तेल का आयात बढ़ा दिया.
EU देश भी रहे आगे
फ़िनलैंड के थिंक टैंक 'सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर' की हालिया रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका की धमकी ज्यादा काम नहीं आई. 24 फरवरी यानी यूक्रेन पर हमले के बाद से रूस ने कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और कोयला बेचकर करीब 97 बिलियन डॉलर राजस्व कमाया. खास बात ये है कि युद्ध के पहले 100 दिनों में लगभग 57 बिलियन यूरो का फॉसिल फ्यूल यूरोपियन यूनियन के देशों को भेजा गया.
चीन पहले नंबर पर
इसमें जर्मनी की हिस्सेदारी 12.1 बिलियन यूरो इटली यूरो, 7.8 बिलियन यूरो इटली और नीदरलैंड (प्रत्येक) और 4.4 बिलियन यूरो की हिस्सेदारी पोलैंड की रही. जर्मनी युद्ध के पहले दो महीनों में रूसी तेल का सबसे बड़ा इम्पोर्टर था, लेकिन बाद में वो एक स्थान नीचे खिसक आया और पहले नंबर पर चीन पहुंच गया. चीन ने रूस से करीब 12.6 बिलियन यूरो की एनर्जी एक्सपोर्ट की है. फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड ने मई में मॉस्को से बड़े पैमाने पर नेचुरल गैस और ऑयल आयात किया.
भारत का हिस्सा 18%
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत ने भी मॉस्को से अपनी तेल ज़रूरतों की पूर्ति के लिए आयात किया. रूस के कुल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 18% रही. भारत रूस से फॉसिल फ्यूल आयात करने वाले देशों की लिस्ट में 8वें नंबर पर है. जबकि चीन इस लिस्ट में टॉप पर जर्मनी दूसरे नंबर पर है. रिपोर्ट बताती है कि रूस का भारत के तेल आयात लगातार बढ़ता गया. फरवरी में करीब 100,000 प्रति बैरल से, अप्रैल में 370,000 और मई में 870,000 प्रति बैरल इम्पोर्ट हुआ. इस दौरान (युद्ध के पहले 100 दिन) भारत का कुल आयात 3.4 बिलियन यूरो रहा. कुल मिलाकर कहा जाए तो अमेरिका की धमकी पर मुनाफा, जो सस्ता तेल खरीदकर देशों को हुआ और रूस से दोस्ती भारी पड़ी.
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