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अमेरिकी टैरिफ से भारत के निर्यात पर बढ़ा दबाव, शिपमेंट घटने से जोखिम बढ़े: CareEdge

CareEdge Ratings की रिपोर्ट से साफ है कि अमेरिकी टैरिफ के चलते भारत के निर्यात पर दबाव बढ़ा है, खासकर श्रम-प्रधान सेक्टरों में जहां गिरावट ज्यादा देखने को मिल रही है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 9 months ago

अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊंचे रेसिप्रोकल टैरिफ का असर अब भारत के निर्यात पर साफ दिखने लगा है. CareEdge Ratings की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक हाल के महीनों में भारत की निर्यात रफ्तार कमजोर हुई है, खासकर श्रम-प्रधान सेक्टरों में, हालांकि देश का चालू खाता अभी नियंत्रण में बना हुआ है.

अमेरिकी टैरिफ से निर्यात की रफ्तार थमी

CareEdge Ratings की दिसंबर रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका द्वारा 50 फीसदी रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए जाने के बाद सितंबर–अक्टूबर 2025 के दौरान भारत के नॉन-पेट्रोलियम निर्यात में तेज गिरावट दर्ज की गई. इस दौरान अमेरिका को होने वाला नॉन-पेट्रोलियम निर्यात सालाना आधार पर 11.8 फीसदी घट गया. सबसे ज्यादा असर जेम्स एंड ज्वैलरी, टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट्स जैसे सेक्टरों पर पड़ा, जो कीमतों की प्रतिस्पर्धा और वैश्विक मांग के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं.

जेम्स-ज्वैलरी और टेक्सटाइल सेक्टर पर सबसे ज्यादा मार

रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर–अक्टूबर 2025 में जेम्स और ज्वैलरी का कुल निर्यात सालाना आधार पर 15.6 फीसदी घटा, जबकि अमेरिका को होने वाला निर्यात करीब 70 फीसदी तक गिर गया. वहीं, रेडीमेड गारमेंट्स को छोड़कर टेक्सटाइल निर्यात में 9.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. ज्यादातर मैन्युफैक्चरिंग कैटेगरी में निर्यात वृद्धि नकारात्मक रही, जबकि इलेक्ट्रॉनिक गुड्स इस गिरावट से बचे रहे क्योंकि वे अमेरिकी टैरिफ के दायरे से काफी हद तक बाहर हैं.

कुल नॉन-पेट्रोलियम निर्यात में गिरावट

सितंबर–अक्टूबर 2025 के दो महीनों में भारत का कुल नॉन-पेट्रोलियम निर्यात 3.9 फीसदी घट गया, जबकि इससे पहले के पांच महीनों में इसमें 7.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी. इस दौरान भारत के नॉन-पेट्रोलियम निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी घटकर अक्टूबर में करीब 20 फीसदी रह गई, जो FY25 में 22 फीसदी थी. यह बदलाव अमेरिकी टैरिफ के तत्काल प्रभाव को दर्शाता है.

श्रम-प्रधान सेक्टरों के लिए बढ़ी चिंता

CareEdge का कहना है कि निर्यात में आई यह सुस्ती श्रम-प्रधान मैन्युफैक्चरिंग सेक्टरों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में रोजगार जुड़ा हुआ है. हालांकि कुछ निर्यातक अब अमेरिका के बजाय दूसरे बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं, लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह रुझान लंबे समय तक टिक पाएगा.

चीन और सऊदी अरब को निर्यात में बढ़ोतरी

अमेरिका में गिरावट के बीच भारत का निर्यात कुछ अन्य देशों में बढ़ा है. रिपोर्ट के अनुसार सितंबर–अक्टूबर 2025 में चीन को निर्यात सालाना आधार पर 30.9 फीसदी बढ़ा, जबकि सऊदी अरब को निर्यात 4 फीसदी बढ़ा. अक्टूबर में भारत के नॉन-पेट्रोलियम निर्यात में चीन की हिस्सेदारी बढ़कर 4.9 फीसदी हो गई, जो FY25 में औसतन 3.5 फीसदी थी.

FY26 में निर्यात वृद्धि बेहद कमजोर

FY26 के पहले सात महीनों में भारत का कुल मर्चेंडाइज निर्यात सिर्फ 0.5 फीसदी बढ़ा, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह वृद्धि 3.3 फीसदी थी. पेट्रोलियम निर्यात कीमतों और वॉल्यूम में गिरावट के कारण 17 फीसदी घटा, जबकि नॉन-पेट्रोलियम निर्यात में 3.9 फीसदी की वृद्धि हुई, जो पिछले साल इसी अवधि में 7.5 फीसदी थी. CareEdge Ratings का अनुमान है कि FY26 में भारत का कुल मर्चेंडाइज निर्यात करीब 1 फीसदी तक घट सकता है, क्योंकि ऊंचे अमेरिकी टैरिफ निर्यात पर दबाव बनाए रखेंगे. वहीं, अप्रैल–अक्टूबर FY26 के दौरान आयात 6.8 फीसदी बढ़ा है, जिसमें सोने और चांदी का आयात 47.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो इस अवधि का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है.

व्यापार घाटा रिकॉर्ड स्तर पर

मजबूत आयात के चलते FY26 के पहले सात महीनों में भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट बढ़कर 199 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो इस अवधि का अब तक का सबसे बड़ा स्तर है. हालांकि CareEdge का कहना है कि मजबूत सर्विसेज सेक्टर और स्थिर रेमिटेंस से चालू खाते पर इसका असर सीमित रहेगा.

सर्विसेज और रेमिटेंस से राहत

अप्रैल–अक्टूबर FY26 के दौरान भारत का सर्विसेज निर्यात 8.2 फीसदी बढ़ा, जिसमें सॉफ्टवेयर और बिजनेस सर्विसेज का बड़ा योगदान रहा. वहीं, वित्त वर्ष की पहली छमाही में रेमिटेंस में करीब 15 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इन कारकों और कच्चे तेल की अपेक्षाकृत स्थिर कीमतों के चलते FY26 में चालू खाता घाटा GDP के करीब 1 फीसदी पर सीमित रहने का अनुमान है. 

रिपोर्ट में वैश्विक व्यापार विवाद, भू-राजनीतिक जोखिम और लंबी अवधि की ऊंची ब्याज दरों को प्रमुख बाहरी जोखिम बताया गया है. CareEdge का कहना है कि FY26 की पहली छमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई है, लेकिन निर्यात में कमजोरी और वैश्विक अनिश्चितताएं आने वाले महीनों में ग्रोथ आउटलुक के लिए अहम निगरानी बिंदु रहेंगी.


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