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अगस्त में फिर से Bear Attack का शिकार हुआ भारतीय Share Market!

इक्विटी डेरीवेटिव्स हर महीने के आखिरी गुरुवार को एक्सपायर होते हैं और यह भारतीय बाजारों के लिए काफी आवश्यक घटना होती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

Palak Shah, The writer is author of the book: The Market Mafia - Chronicle of India's High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That went Scot free

डाटा से ट्रेंड का पता तो चल सकता है लेकिन किसी भी ट्रेंड के आस-पास होने वाली छोटी-बड़ी घटनाओं से ही हमें छुपी हुई कहानियों के बारे में पता चलता है. ये कहानी विदेशी शॉर्ट सेलर्स द्वारा अगस्त के महीने में भारतीय स्टॉक मार्केट पर प्लान किए गए हमले के बारे में है. यह हमला उसी तरह का हो सकता था जिस तरह का हमला हमने इस साल की शुरुआत में हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट के रूप में देखा था. 

पलक शाह ने किया दावा
11 फरवरी 2023 को पलक शाह ने अपनी एक रिपोर्ट में यह दावा किया था कि कैसे हिंडनबर्ग रिपोर्ट जारी होने से पहले शॉर्ट-सेलिंग की सुनामी आई और इसकी वजह से अडानी ग्रुप की कंपनियों को 100 बिलियन डॉलर्स का नुक्सान उठाना पड़ा था. इस रिपोर्ट की बदौलत भारतीय मार्केट के रेगुलेटर SEBI और अन्य जांच एजेंसियों ने बियर-कार्टेल (Bear Cartel) की जांच करनी शुरू कर दी. मार्च 2023 में SEBI ने भारत की एपेक्स कोर्ट को बताया था कि वह हिंडनबर्ग रिपोर्ट में शामिल शॉर्ट-सेलर्स की जांच कर रहा है. 

फिर से बनी शॉर्ट सेलिंग की पोजीशन
लेकिन एक बार फिर भारतीय बाजारों में शॉर्ट-सेलिंग पोजीशन बनाई गई थी और इसमें सबसे बड़ा हाथ विदेशी फंड्स का था. साथ ही आपको यह भी बता दें कि यह पोजीशन OCCCRP (Organised Crime and Corruption Reporting Project) द्वारा 31 अगस्त को जारी की गई रिपोर्ट से पहले ही तय कर ली गई थी. डेटा को सही तरीके से मिलाने और अन्य घटनाओं की वजह से एक नई कहानी सामने आती है. 

एक ही सिक्के के दो पहलू-हिंडनबर्ग और OCCCRP
इक्विटी डेरीवेटिव्स हर महीने के आखिरी गुरुवार को एक्सपायर हो जाते हैं और यह भारतीय बाजारों के लिए काफी आवश्यक घटना होती है. जब से व्यापारी जल्दी जल्दी अपनी पोजीशनों को बदलने लगे हैं तभी से डेरीवेटिव्स के एक्सपायर होने के आस-पास लालच और डर दोनों में ही बढ़ोत्तरी देखने को मिलती है. इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि डेरिवेटिव्स की संख्या आमतौर पर एक्सपायरी होने वाले हफ्ते के दौरान 10 बिलियन गुना ज्यादा होती है. स्टॉक मार्केट की चतुर दुनिया में यह सभी को पता होता है कि किसी भी तरह कि आश्चर्यचकित कर देने वाली या फिर स्तब्ध कर देने वाली खबर की बदौलत ऐसे पागलपन के बीच भी मार्केट पर काफी विस्तृत प्रभाव पड़ता है. हालांकि जांचकर्ता एवं मार्केट एक्सपर्ट भी इस बात से हैरान हैं कि जनवरी की ही तरह अगस्त में भी विदेशी फंड्स द्वारा अचानक पोजीशन ले लेने से भविष्य में होने वाली किसी भी घटना के बारे में पता कैसे नहीं चला? इतिहास से पता चलता है कि अधिकतर प्रमुख मार्केट क्रेश डेरीवेटिव के एक्सपायर होने वाले सप्ताह के दौरान भ्रांतियों और नकारात्मक खबरों के फैलने की वजह से हुए थे. यहां अडानी ग्रुप के खिलाफ जारी की गई दोनों रिपोर्ट्स एक कहानी का हिस्सा हैं. 

टाइमिंग का खेल
इस बात को विचार करें: अडानी समूह को लक्षित करने वाली हिंडनबर्ग रिपोर्ट 24 जनवरी की देर शाम को जारी की गई और 25 जनवरी को महीने का आखिरी गुरुवार था. यानी डेरिवेटिव एक्सपायर होने वाले दिन पर भारत के शेयर मार्केटों में यह खबर वायरल हो जाती है. कुछ इसी तरह OCCCRP की रिपोर्ट विदेशी अखबारों में प्रकाशित होती है और 31 अगस्त की सुबह महीने के आखिरी गुरुवार को, यानी एक बार फिर डेरीवेटिव के एक्सपायर होने वाले दिन पर वायरल हो जाती है. जिन लोगों को मार्केट की गतिशीलता के बारे में अच्छे से पता है, वे इस बात को अच्छे से जानते होंगे कि दोनों रिपोर्टों को रिलीज किये जाने का समय महज एक संयोग तो बिल्कुल नहीं हो सकता. फाइनेंशियल एसेट्स की शॉर्ट सेलिंग के लिए ग्लोबल स्तर पर मशहूर जॉर्ज सोरोस (George Soros) ने अडानी ग्रुप (Adani Group) पर हिंडनबर्ग रिपोर्ट के रिलीज होने के बाद बाजार की प्रतिक्रिया पर खुशी व्यक्त की थी. उसका मानना था कि रिपोर्ट और बाजार की प्रतिक्रिया, भारत के वर्तमान राजनीतिक दृश्य को प्रभावित करेगी और देश पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव को कमजोर कर देगी, क्योंकि इससे जनता की राय उनके खिलाफ झुक जाएगी. इतिहास में इस बात के भरपूर सबूत मौजूद हैं कि बाजार की मजबूत प्रतिक्रिया से आम जनता की राय व्यापक रूप से प्रभावित होती है. हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर सोरोस की प्रतिक्रिया के कुछ महीनों बाद, उसके फंड द्वारा चलाई जाने वाली इकाई OCCCRP ने अडानी ग्रुप (Adani Group) के खिलाफ लगभग इसी तरह के आरोप लगाए और फिर ये तर्क दिया कि उसने टैक्स हेवन (Tax Haven) और विदेशी न्यायक्षेत्रों से ग्रुप के खिलाफ अधिक सबूत खोजे हैं. 

बिजनेसवर्ल्ड ने पहले ही कर दिया था खुलासा
इतना ही नहीं 28 अगस्त को OCCCRP रिपोर्ट के रिलीज होने से ठीक दो दिन पहले BW BusinessWorld ने एक आर्टिकल लिखा था जिसमें बताया गया था कि कैसे अडानी समूह OCCCRP के रडार पर था. BW ने अपने आर्टिकल में उन प्रमुख आरोपों का भी उल्लेख किया है जो OCCCRP द्वारा अडानी समूह के खिलाफ लगाए गए थे. यदि एक भारतीय समाचार मीडिया आउटलेट को विदेशी प्रेस में क्या प्रकाशित होने वाला है, इसके बारे में पहले से जानकारी हो सकती है, तो इसका सीधा मतलब ये है कि रिपोर्ट की बारीकियों के बारे में विदेशी फंडों को पहले से जानकारी थी और उनके द्वारा इसका इस्तेमाल शॉर्ट 31 अगस्त से पहले भारतीय बाजार में पोजिशन बनाने के लिए किया गया था. 

FPIs ने बदल ली स्थिति
जुलाई के पूरे डेटा में से, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने अगस्त के महीने में इंडेक्स फ्यूचर्स सेगमेंट में अपनी स्थिति को नेट शॉर्ट में बदल दिया. जुलाई में FPI ने सूचकांकों में 77,390 कॉन्ट्रैक्ट पर नेट लॉन्ग पोजीशन के साथ शुरुआत की थी, जो 1,04,328 कॉन्ट्रैक्ट के उच्चतम स्तर को छू गया था. यहां तक कि महीने के आखिरी गुरुवार यानी 27 जुलाई को डेरिवेटिव के एक्सपायर होने पर FPI ने 33,241 समझौतों पर नेट लॉन्ग इंडेक्स एक्सचेंज डेटा के अनुसार जुलाई में कैश सेगमेंट में FPIs 13,922 करोड़ रुपये की इक्विटी के शुद्ध खरीदार थे. लेकिन 2 अगस्त को FPI की स्थिति 4343 समझौतों से सूचकांकों में शुद्ध रूप से कम होने लगी और अगस्त के दौरान यह 41,783 अनुबंधों के उच्च स्तर तक पहुंच गई थी. अगस्त में फ्यूचर स्टॉक्स में FPI की बिक्री और भी अधिक तीव्र थी. उन्होंने जुलाई में 14 करोड़ रुपये की तुलना में 17,752 करोड़ रुपये (लगभग 2.13 मिलियन डॉलर्स) के फ्यूचर स्टॉक बेचे थे. फ्यूचर सूचकांकों में FPIs द्वारा 5435 करोड़ रुपये ($0.65 बिलियन) की कीमत के स्टॉक्स बेचे गए थे. आपको बता दें कि अगस्त के महीने में FPIs, 43,807 करोड़ रुपये (लगभग 5.27 बिलियन डॉलर) के शुद्ध विक्रेता रहे, जिसमें 20,620 करोड़ रुपये के कैश सेगमेंट में शुद्ध बिक्री भी शामिल है. मार्च के बाद से लगातार सात महीनों की खरीदारी के बाद अगस्त में FPI कैश सेगमेंट में विक्रेता बन गए थे. 

लंबे वक्त तक चली शॉर्ट कवरिंग 
फ्यूचर सूचकांक सेगमेंट में पोजीशन 30 अगस्त तक शुद्ध रूप से कम थी, लेकिन 31 अगस्त को अचानक FPIs द्वारा शॉर्ट कवरिंग का एक दौर देखा गया और इसी दिन OCCCRP रिपोर्ट बाजार में रिलीज हुई. यह इनसाइड इन्फोर्मेशन और न्यूज में रिवर्स का एक क्लासिक मामला था. OCCCRP ने अपनी जांच के नतीजे ‘The Guardian’ और ‘Financial Times’ के साथ साझा किए थे और उन्होंने इसे 31 अगस्त को एक समाचार रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित किया था. व्यापारी काफी स्मार्ट और तेज होते जो विचार का वांछित प्रभाव नहीं पड़ने पर तुरंत अपनी स्थिति को कवर कर लेते हैं और यही OCCCRP रिपोर्ट के मामले में भी देखने को मिलता है. शॉर्ट कवरिंग तब तक जारी रही जब तक सितंबर में अडानी मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद FPI नेट लॉन्ग नहीं हो गए. फिर भी सितंबर के महीने में वह कैश सेगमेंट में शुद्ध विक्रेता बने रहे, जिससे वास्तव में उन्हें अपने शॉर्ट्स को कवर करने में मदद मिली, इससे लागत पर कम प्रभाव पड़ेगा क्योंकि स्टॉक की कीमतें कम थी और घरेलू खरीदारी के बावजूद भी इसमें तेजी नहीं आई.

ED की जांच से हुआ खुलासा 
अडानी समूह पर OCCCRP द्वारा रिपोर्ट रिलीज किये जाने से ठीक एक दिन पहले समाचार रिपोर्टों में कहा गया था कि भारत में मनी लॉन्ड्रिंग जांच से संबंध रखने वाले प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 16 संस्थाओं की पहचान की थी, जिन्हें जनवरी के आसपास अडानी समूह के शेयरों में संदिग्ध शॉर्ट-सेलिंग से लाभ हुआ था. ED ने SEBI को बताया है कि इन 16 संस्थाओं में से 3 भारत में स्थित थीं जिनमें से एक विदेशी बैंक की भारतीय शाखा थी, चार मॉरीशस में और एक फ्रांस, हांगकांग, केमैन द्वीप, आयरलैंड और लंदन में स्थित थी. इसके साथ ही ED ने यह भी कहा कि इनमें से किसी भी FPI ने भारत में आयकर अधिकारियों को अपने स्ट्रक्चर का खुलासा नहीं किया है. इसके अलावा, एक इकाई को जुलाई 2020 में निगमित किया गया था और यह सितंबर 2021 तक निष्क्रिय रही थी. इसके बाद सितंबर 2021 से लेकर मार्च 2022 के बीच केवल छह महीनों के दौरान इस इकाई को अचानक 31,000 करोड़ रुपये (लगभग 3.73 बिलियन डॉलर्स) का कारोबार और 1100 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी. 

इन बातों का भी हुआ खुलासा
अन्य बातों के साथ-साथ ED ने यह भी कहा कि केमैन आइलैंड स्थित FII ने पहले अंदरूनी व्यापार की बात स्वीकार की थी और फिर अमेरिका में 1.8 बिलियन डॉलर्स का जुर्माना अदा किया था. इनमें से अधिकांश FPI ने 20 जनवरी को अडानी समूह के शेयरों में शॉर्ट पोजीशन शुरू की थी और 23 जनवरी को अपने दांव बढ़ा दिए थे. इसके अलावा, ED की रिपोर्ट में मौजूद मॉरीशस-आधारित फंड का इस्तेमाल 10 जनवरी को पहली बार शॉर्ट सेलिंग में किया गया था.

आंकड़ों से सामने आई ये बात
आंकड़ों से पता चलता है कि NSE के इक्विटी ऑप्शन्स सेगमेंट में दिसंबर 2022 से लेकर केंद्रीय बजट तक जबरदस्त व्यापार हुआ था, जो हिंडनबर्ग रिपोर्ट के जारी होने से ठीक छह दिन बाद निर्धारित किया गया था. परिणामस्वरूप पुट ऑप्शन का रेशो, जिसे निवेशक बाजार में गिरावट की आशंका होने पर खरीदते हैं, लगातार बढ़ता रहा और 24 जनवरी को 13 सालों के दौरान अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया और इसी दिन हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की थी. 23 जनवरी को पुट और कॉल अनुपात 0.73 पर था और अगले दिन 0.74 पर पहुंच गया, जो मार्च 2009 में महान वित्तीय संकट के चरम के बाद से सबसे अधिक रीडिंग है. जब अनुपात 0.75 पर पहुंच गया था. इसका सीधा मतलब ये है कि केंद्रीय बजट के आने तक भारतीय बाजारों में बेतहाशा पुट जोड़े जा रहे थे, जबकि वैश्विक शेयर बाजार या तो स्थिर थे या रैली कर रहे थे. जांच से यह भी पता चलता है कि अदानी शेयरों के आउट-ऑफ-द-मनी पुट विकल्पों में ज्यादा कार्यवाही देखी गई, जिसका अर्थ है कि कुछ लोग तेज गिरावट की आशंका जता रहे थे.

रेगुलेटर और जांच एजेंसियों ने नहीं डाली नजर
निवेशकों की भावनाएं अक्सर मजबूत बाजार प्रतिक्रियाओं से प्रेरित होती हैं और चूंकि बाजारों ने OCCCRP रिपोर्ट पर बहुत अधिक हिंसक प्रतिक्रिया नहीं दी, इसलिए भारतीय बाजारों पर सावधानीपूर्वक नियोजित बियर अटैक 2.0 पर किसी का ध्यान नहीं गया. रेगुलेटर और जांच एजेंसियों द्वारा भी इस पर नजर नहीं डाली गई. 
 

यह भी पढ़ें: ओडिशा माइनिंग कॉरपोरेशन से इस कंपनी ने मिलाया हाथ, होने जा रहा है ये फायदा

 


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