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हरदीप पुरी, एप्स्टीन और डिजिटल अपराध-बोध का युग
जब एप्स्टीन का कलंक किसी के साथ जोड़ने के लिए फैलाया जाता है और सामान्य कूटनीति को ही घोटाले के रूप में पेश किया जाता है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago
पलक शाह
एक समय था जब अपराध या गलती सिद्ध होने पर ही दोष तय होता था, अब केवल नजदीकी होना ही काफी है.
जेफ्री एप्स्टीन के अजीब "उत्तरजीवन" में, प्रतिष्ठाओं की जांच नहीं की जाती, उन्हें निगल लिया जाता है. उसके अपराध भयानक थे. उसका नेटवर्क विशाल था. और सोशल मीडिया के एल्गोरिदमिक न्यायालय में, ये दोनों मिलकर एक खतरनाक नया सिद्धांत बना देते हैं: अगर आपका नाम कभी उसके घेरे में आया, तो आप उसके पापों के उत्तराधिकारी बन जाते हैं.
यही कारण है कि एक करियर कूटनीतिज्ञ जैसे हारदीप सिंह पुरी खुद ऐसी अटकलों में फंस जाते हैं, जो समय की स्थिति के बारे में अधिक बताती हैं, व्यक्ति के बारे में कम.
एप्स्टीन कोई छिपा हुआ व्यक्ति नहीं था. वह सबके सामने चलता था. वह राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों, नोबेल विजेताओं और अरबपतियों के संपर्क में था. उसने अनुसंधान को वित्तपोषित किया, वैश्विक मंचों में भाग लिया, नीतिगत मंडलों में खुद को जोड़ा. उसकी मुद्रा था पहुंच और शक्ति थी नज़दीकी.
कूटनीतिज्ञ, परिभाषा के अनुसार, उसी दुनिया में काम करते हैं.
हारदीप पुरी ने दशकों तक बहुपक्षीय कूटनीति में काम किया, जिसमें भारत के स्थायी प्रतिनिधि के रूप में संयुक्त राष्ट्र में कार्य भी शामिल है. इस भूमिका में नैतिक रूप से शुद्ध अतिथि सूची बनाना शामिल नहीं होता. इसमें शामिल है वित्तपोषकों, लॉबिस्टों, शक्ति संचालकों, कार्यकर्ताओं और अधिकारियों के साथ संवाद. कूटनीति का संसार कोई मठालय नहीं है. यह बातचीत की मेज है.
फिर भी आज की "नारागी मशीन" सभी संदर्भों को मिटा देती है. एक बैठक समर्थन बन जाती है. एक साझा कार्यक्रम सहभगिता बन जाता है. एक कैलेंडर एंट्री कबूलनामा बन जाती है. निकटता ही आरोप बन जाती है.
लेकिन सबूत कहाँ हैं? न तो संकेत, न स्क्रीनशॉट पुरालेख, न वायरल बनाने के लिए जोड़े गए टाइमलाइन.
हाँ, एप्स्टीन के खुलासे कुछ संदिग्ध तस्वीरों और वैश्विक अभिजात वर्ग के परेशान करने वाले ईमेल ट्रेल को उजागर करते हैं. लेकिन हारदीप पुरी के मामले में क्या ऐसा कुछ है, सिवाय दस्तावेजीकृत कूटनीतिक पत्राचार के, जो भारत के हितों को प्रदर्शित करता है?
यदि केवल नजदीकी ही सबूत है, तो आधा वॉशिंगटन, लंदन और न्यूयॉर्क और विश्व का कूटनीतिक कॉर्पस दोषी ठहराया जा सकता है. इसकी गलतियॉं स्पष्ट हैं. भीड़ अक्सर स्पष्टता पर ध्यान नहीं देती.
यह खतरा केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है. यह जवाबदेही के सिद्धांत पर ही हमला है.
महुआ मोइत्रा सामान्य कूटनीतिक ईमेल को घोटाले के रूप में पेश कर रही हैं, राज्यकार्य को साजिश समझ रही हैं. हर ईमेल अपराध स्थल नहीं होता. लेकिन आज की राजनीति में, आरोप अक्सर सबूत से तेज़ी से फैलते हैं.
जब हम संपर्क और अपराध की रेखा धुंधली कर देते हैं, तो न्याय की कीमत घट जाती है. जांच की जगह अटकलें ले लेती हैं. त्रासदी कंटेंट बन जाती है, क्लिक के लिए तैयार किया गया गुस्सा. और ऐसा करते हुए हम वही मिथक दोहराते हैं जिसने एप्स्टीन को जीवन में ढक रखा था: यह भ्रम कि वह हर शक्ति के गलियारे में बुना हुआ था. यही मिथक उसे अछूता और सर्वव्यापी दिखाता था.
वास्तव में, उसने पहुंच का फायदा उठाया. उसने प्रभाव की संरचना का खेल खेला.
यदि हारदीप पुरी या किसी और ने कोई अपराध किया, तो कानून को बिना हिचक उसे पीछा करना चाहिए. लेकिन कानून को नजदीकी से ज्यादा चाहिए. इसे सबूत चाहिए: वित्तीय लिंक, विश्वसनीय गवाही, तथ्य जो अदालत में टिक सकें. इसके बिना जो देखा जा रहा है, वह जवाबदेही नहीं है. यह प्रदर्शन है.
यह अत्यंत परेशान करने वाला है कि अब हम इतनी सहजता से एक तस्वीर या बैठक को नैतिक निंदा में बदलने की अनुमति दे देते हैं. आज यह एक कैबिनेट मंत्री हो सकता है. कल यह कोई भी हो सकता है, जिसका पेशा जटिल लोगों के साथ संवाद की मांग करता है.
एप्स्टीन ने केवल अपराध नहीं छोड़े. उसने संदेह छोड़ा, एक कोहरा जिसमें जटिलताएं घुल जाती हैं और गुस्सा पनपता है.
घोटाला अब केवल एप्स्टीन का नहीं है. यह हमारा है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.
19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)
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