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गॉसिप एंड टेल्स : दलाल स्ट्रीट की काली फुसफुसाहटें

बोर्डरूम बगावत से लेकर दुखद चुप्पियों और परदे के पीछे के पूर्व चेयर तक, स्ट्रीट ऐसे राज उगलती है जिन्हें नियामक अनदेखा कर देते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 9 months ago

दलाल स्ट्रीट में चर्चा है कि बीएसई के उन भव्य बोर्डरूम दरवाज़ों के पीछे एक खामोश तूफान पक रहा है. 2012 में ब्रोकरों को बाहर का रास्ता दिखाए जाने के बाद कई साल की शांति के बाद, अब कार्यवृत्त में पहली बार असहमति दर्ज हुई है, एक दुर्लभ झटका, जो एक्सचेंज के सुचारु संचालन में कंपन पैदा करता है. चर्चा का केंद्र? एक नया चेहरा राजीव बंसल, पूर्व आईएएस, पूर्व शीर्ष नौकरशाह, और दिल्ली के सत्ता गलियारों में सहजता से चलने वाले व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं. उनके प्रशासनिक कद और मजबूत संपर्कों को देखते हुए कई लोगों को लगा कि वे चेयरमैन पद के स्वाभाविक दावेदार हैं.

लेकिन किस्मत, या शायद राजनीति, ने कुछ और ही तय किया. बंसल को सिर्फ एक मामूली कुर्सी दी गई, सीएसआर समिति में ऐसा पद जिसने तालियों से ज्यादा भौंहें चढ़ा दीं.

अंदरखाने की फुसफुसाहट है कि मौजूदा एमडी का आत्मविश्वास या उदार शब्दों में कहें तो दृढ़ विश्वास, एमपीबी के दौर से ही और गहराया, जब एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को चुपचाप बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, जिसे कई लोगों ने “अविश्वसनीय” आधार बताया. इस कदम ने मानो एक लहजा तय कर दिया, एक ऐसा नेतृत्व जो अकेले खेलने में ज्यादा सहज होता जा रहा है. हाल के दिनों में चर्चाएं और तेज हुई हैं कि वे बाजार संस्थानों के बोर्ड में आईएएस अधिकारियों की मौजूदगी को लेकर खास उत्साहित नहीं हैं. आखिर वे भी सोचते हैं, और स्वतंत्रता की अपनी नेटवर्किंग होती है.

और इस तरह, वह एक्सचेंज जो कभी संतुलन और विविधता पर गर्व करता था, एक बार फिर गपशप के पन्नों में है, अब इसके बोर्डरूम की बातें बाजार की चटखारेदार चर्चाओं का विषय बन गई हैं. दलाल स्ट्रीट हाथ में कॉफी लिए तमाशबीन बनी बैठी है, अगली असहमति के नोट के गिरने का इंतज़ार करते हुए. हाल के समय में उनकी जगह-जगह की गई टिप्पणियों का तेवर और तीखा हुआ है, और यह भी सुना जा रहा है कि वे सरकार और तथाकथित आईएएस लॉबी के प्रति खामोश नाराजगी जता रहे हैं. कुछ लोगों को यह सुधार का जोश कम और पुराने शक्ति-संतुलन को नए सिरे से खींचने की सोची-समझी कोशिश ज्यादा लगती है.

बीएसई का घूमता दरवाजा

देश के सबसे पुराने एक्सचेंज के संगमरमर गलियारों में बेचैनी तैर रही है. इस साल की शुरुआत में 24 वर्षीय आईटी कर्मचारी की दुखद मौत की फुसफुसाहटें हैं, उसकी खामोश विदाई न तो स्वीकार की गई, न ही उस पर बात हुई, जबकि लंबे काम के घंटे और बढ़ते दबाव की बातें चलती रहीं. इस चुप्पी ने कई लोगों को बेचैन किया है, खासकर तब जब बाहर निकलने का सिलसिला हैरान करने वाली रफ्तार से जारी है. सिर्फ तीन साल में एक दर्जन से ज्यादा सी-सूट अधिकारी और वरिष्ठ विभाग प्रमुख जैसे 3 सीटीओ, 3 सीएचआरओ, 3 सीआईएसओ, 3 सर्विलांस प्रमुख, 3 लिस्टिंग प्रमुख, 2 संचार प्रमुख और एक बिजनेस डेवलपमेंट प्रमुख साथ ही कई दर्जन लंबे समय से जुड़े कर्मचारी बाहर हो चुके हैं.

बोर्ड नजरें फेर लेता है, सेबी चुप रहती है, और एमडी का प्रभाव बढ़ता जाता है, जिससे यह भावना गहराती है कि कहीं कुछ ज्यादा गड़बड़ है. “यह ऐसी जगह बनती जा रही है जहाँ अनुभवी लोग भी खुद को इस्तेमाल के बाद फेंका हुआ महसूस करते हैं,” एक अंदरूनी व्यक्ति आह भरते हुए कहता है. स्ट्रीट, हमेशा की तरह, सब सुनती है, खासकर वह जो कहा नहीं जाता.

बोर्डरूम का गणित बिगड़ा – सेबी की कठपुतली डोर उजागर

सेबी का बोर्डरूम अभियान तेज हो गया है. अब उसने हर मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थान के लिए दो अनिवार्य कार्यकारी निदेशक तय कर दिए हैं, एक तकनीक और एक नियामकीय और एक स्वैच्छिक भी, जिससे शेयरधारकों की सीटें घट रही हैं, जबकि परदे के पीछे से पूरी रफ्तार में संचालन की चर्चाएं और तेज हो रही हैं. सारी ताकत उनकी, जिम्मेदारी शून्य. शेयरधारक संकेत पर मंजूरी या अस्वीकृति देते हैं मुख्य कार्यकारी, चेयर, सार्वजनिक हित निदेशक नामों पर मौखिक इशारे चलते हैं.

अंदरूनी लोग बीएसई के मुख्य कार्यकारी चयन तमाशे को याद करते हैं. चयन समिति नियमों के अनुसार दो नाम भेजती है खारिज फिर दो और नामंजूर, एक और जोड़ी उड़ा दी गई. फिर फुसफुसाहट आती है, “उस अनुभवी को भेजो.” बोर्ड पालन करता है, मंजूरी मिल जाती है. मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थानों के पास कोई विकल्प नहीं, सारी डोरें नागपुर से हिलाई जाती हैं. दलाल स्ट्रीट मुस्कराती है, नियंत्रण पूर्ण, भागीदारी दिखावटी. आखिर शो कौन चला रहा है?

पूर्व चेयर के सिंहासन की परछाइयाँ

दलाल स्ट्रीट की पुरानी पीढ़ी, सेवानिवृत्त सेबी चेयर और अनुभवी पूर्णकालिक सदस्य जो बाद में बोर्डों में बैठे, हमेशा नियम से चले. नीतिगत टकरावों पर चुप्पी साधे रखी, भले ही व्यक्तिगत तौर पर झुलस गए हों, जैसे भवे-सिंह या दामोदरन के चर्चित टकराव.

लेकिन नया दौर अलग है. एक पूर्व टॉपर और उनकी भरोसेमंद सहयोगी कहानी पलट रही हैं. चर्चाएं हैं कि दिल्ली की खामोश सहमति उन्हें सेबी की राह के खिलाफ माहौल बनाने या उसे अपनी दिशा में मोड़ने का संकेत दे रही है. सिंगापुर से बैठकर कोई रोज़ अपने चुने हुए शिष्यों को फोन घुमा रहा है, लिफाफाबंद पदोन्नतियाँ रिश्तों को गर्म रखती हैं, एक ऐसी रानी की तरह जो कभी सच में सेवानिवृत्त ही नहीं हुई.

जेन स्ट्रीट प्रकरण को ही देख लें. सेवानिवृत्ति के महज चार महीने बाद, जुलाई में आया उनका त्वरित प्रेस नोट एक पूर्णकालिक सदस्य के आदेश को एकदम सही बताता है, जबकि 18 महीने की जांच में बीएसई के आंकड़ों को नजरअंदाज करने, स्वचालित ट्रेल्स की अनदेखी और उस अजीब “10 प्रतिशत चुकाओ और फिर शुरू करो” मोड़ पर उठी आपत्तियों को हल्के में लिया गया. पीछे बैठकर संचालन की मिसाल, दोनों अब बाहरी हैं, फिर भी सेबी की गाड़ी ऐसे चला रहे हैं जैसे कमान अब भी उनके हाथ में हो. स्ट्रीट मुस्कराती है, कुछ सिंहासन कभी धूल नहीं पकड़ते.

ब्रोकर का खरीद से पलायन का पलटा

केन्स टेक के शेयरों में अचानक तेज गिरावट आई, ठीक उसी समय जब लॉक-इन अवधि खत्म हुई. वजह बनी एक बड़े ब्रोकर द्वारा करीब 6,000 रुपये प्रति शेयर के भाव पर 8.17 लाख शेयरों की बिक्री, जिसकी कीमत करीब 489 करोड़ रुपये रही.

असली हैरानी की बात यह है कि महज दो हफ्ते पहले इसी फर्म ने शेयर पर चमकदार “खरीदें” रिपोर्ट जारी की थी और 8,200 रुपये का लक्ष्य दिया था. दलाल स्ट्रीट के ट्रेडिंग डेस्क पर चर्चा गर्म है, मंच से उपदेश और पीछे से चुपचाप निकास.

बोर्डरूम का गणित फिर गड़बड़ाया

सेबी का ताजा आदेश, हर एक्सचेंज में दो कार्यकारी निदेशक (एक तकनीकी विशेषज्ञ और एक नियामकीय सख्त निगरानीकर्ता, विज्ञापन के साथ) ने दलाल स्ट्रीट के अंदरूनी लोगों को फिर से हिसाब लगाने पर मजबूर कर दिया है. जो लोग इन पदों के करीब थे, अब बाहरी दावेदारों से मुकाबला करेंगे, और 50 प्रतिशत से अधिक सार्वजनिक हित निदेशक के नियम के साथ गणित सिरदर्द बन गया है.

एमसीएक्स को ही लें. 5 सार्वजनिक हित निदेशक और 3 शेयरधारक प्रतिनिधि का संतुलन ठीक था. दो नए कार्यकारी निदेशक आने से बराबरी हो जाती है और संतुलन बिगड़ जाता है. प्रबंध निदेशक को शेयरधारक पक्ष में गिना जाता है, सार्वजनिक हित निदेशक नहीं, इसलिए फुसफुसाहटें हैं कि संख्या बढ़ाने या गिनती में फेरबदल के लिए जोरदार लॉबिंग चल रही है. छह महीने की घड़ी चल चुकी है, दूसरे के लिए अतिरिक्त समय भी विज्ञापन आने से पहले दिल्ली में कुछ तनावपूर्ण बैठकें तय मानी जा रही हैं. स्ट्रीट हँसती है, जब सेबी रेफरी बनती है, सब दोबारा गणना करने लगते हैं.

शीर्ष पर वेतन का गतिरोध

खबर है कि एक कमोडिटी एक्सचेंज के प्रबंध निदेशक सरकारी समर्थन वाली एक क्लीयरिंग कॉरपोरेशन में प्रतिष्ठित पद की जुगत में हैं, शायद प्रतिष्ठा का आकर्षण. लेकिन पेंच यह है कि मौजूदा 5 करोड़ रुपये का वेतन पैकेज सरकारी खजाने से मिलने वाली रकम से कहीं ज्यादा है. अंदरूनी लोग कॉफी पर मुस्कराते हैं, क्या महत्वाकांक्षा वेतन पर भारी पड़ेगी, या यह फिर एक उच्च-दांव वाली सौदेबाजी का दौर भर है? स्ट्रीट इंतजार में है, मनोरंजन के साथ.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और *The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.

19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)

 

 


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