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गिग इकॉनमी या जॉब ट्रैप? युवा कामगारों के लिए कम वेतन और लंबे घंटे बन रहे चुनौती

भारत एक निर्णायक मोड़ पर है. रणनीतिक सुधारों के साथ गिग वर्क कम वेतन वाली भूमिका से अवसरों की संरचित सीढ़ी में बदल सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

भारत की तेजी से बढ़ती गिग इकॉनमी अब फ्लेक्सिबल या अस्थायी काम का माध्यम नहीं बल्कि एक फुल-टाइम लेबर मार्केट के रूप में काम कर रही है. प्राइमस पार्टनर्स की नई रिपोर्ट के अनुसार, इस वजह से लाखों युवा कामगार कम वेतन वाली नौकरियों में फँसे हुए हैं और उनके पास ऊपर उठने का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं है.

लंबे घंटे और सातों दिन काम

रिपोर्ट में 1,100 से अधिक प्लेटफॉर्म-आधारित गिग वर्कर्स के सर्वेक्षण के आधार पर बताया गया है कि लगभग 61 प्रतिशत कामगार दिन में आठ घंटे या उससे अधिक काम करते हैं, जबकि 43 प्रतिशत पूरे सात दिन काम करते हैं. आधे से अधिक कामगार "वास्तव में फुल-टाइम" हैं, यानी सप्ताह में कम से कम पांच और आधे दिन या उससे ज्यादा लंबे घंटे काम कर रहे हैं.

कम वेतन और ग्राइंड-बेस्ड ग्रोथ

औसत मासिक कमाई लगभग 22,500 रुपये है, और आय में बढ़ोतरी मुख्य रूप से लंबे सप्ताह के काम से आती है, न कि प्रमोशन या कौशल आधारित प्रगति से. उदाहरण के लिए, पांच दिन से छह दिन का सप्ताह काम करने से लगभग 2,500 रुपये प्रति माह अतिरिक्त कमाई होती है, जिसे रिपोर्ट ने "ग्राइंड-बेस्ड ग्रोथ" कहा है.

गिग वर्क अब साइड हसल नहीं, मुख्य आय का स्रोत

प्राइमस पार्टनर्स के अनुसार, गिग वर्क अब साइड हसल नहीं रह गया है और विशेष रूप से युवा शहरी पुरुषों के लिए यह मुख्य आय का स्रोत बन गया है. 2021 में भारत में लगभग 7.7 मिलियन गिग वर्कर्स थे, जो लगभग 1.5 प्रतिशत कार्यबल के बराबर थे, और अनुमान है कि 2029–30 तक यह संख्या 23.5 मिलियन से अधिक हो जाएगी.

सोशल सुरक्षा का अभाव

रिपोर्ट चेतावनी देती है कि गिग सेक्टर दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने में विफल है. सर्वेक्षण में 31 प्रतिशत कामगारों के पास कोई बीमा या पेंशन-लिंक्ड लाभ नहीं था, जबकि 44 प्रतिशत के पास केवल आंशिक कवरेज थी. केवल एक-चौथाई कामगारों के पास बीमा और किसी प्रकार के बचत या सामाजिक लाभ दोनों थे.

कष्ट और आर्थिक जोखिम

सुरक्षा की कमी से कामगार अत्यधिक असुरक्षित बने हुए हैं. लगभग 60 प्रतिशत कामगार "क्राइसिस रिस्क" में थे, यानी उनके पास बचत नहीं थी और उन्हें क्रेडिट तक सीमित पहुंच थी. जिनके पास कोई सोशल सुरक्षा नहीं थी, उनमें यह जोखिम 84 प्रतिशत तक बढ़ गया, जबकि बीमा और लाभ दोनों वाले कामगारों में केवल 36 प्रतिशत था.

गिग वर्क से करियर प्रगति मुश्किल

केवल 15 प्रतिशत कामगारों ने गिग वर्क को बेहतर अवसरों के लिए stepping stone माना. 20 के दशक के कामगारों में, जो चार साल से अधिक समय से एक ही गिग में हैं, केवल 3 प्रतिशत ने इसे आगे बढ़ने का अवसर माना. ज्यादातर ने इसे लंबी अवधि के करियर या वित्तीय आवश्यकता के रूप में देखा.

मुख्य बाधाएं और प्रशिक्षण की कमी

वित्तीय दबाव, मार्गदर्शन की कमी और प्रशिक्षण के लिए समय न होना मुख्य बाधाएं हैं. लगभग एक चौथाई कामगारों ने कहा कि "प्रशिक्षण के लिए समय न होना" सबसे बड़ा बाधक है.

मूलभूत लेबर सुरक्षा का अभाव

रिपोर्ट में बताया गया कि केवल तीन में से 12 बड़े प्लेटफॉर्म ने ही बीमार होने पर सैलरी या आय सहायता जैसी सुविधा दी. कोई पेड लीव नहीं है, और एल्गोरिथम आधारित इंसेंटिव अक्सर कामगारों को पिक आवर्स में टास्क अस्वीकार करने या लॉग ऑफ करने पर दंडित करते हैं, जिससे फ्लेक्सिबिलिटी केवल दिखावटी रह जाती है.

आर्थिक प्रभाव और “मिसिंग मिडल” का खतरा

प्राइमस पार्टनर्स ने चेतावनी दी कि इन माइक्रो-स्तरीय कमजोरियों का व्यापक आर्थिक असर हो सकता है. उच्च आय अस्थिरता और कमजोर सामाजिक सुरक्षा घरेलू उपभोग को दबाती है, उत्पादकता घटाती है और "मिसिंग मिडल" बन सकती है — ऐसे कामगार जो शहरी सेवाओं को संचालित करते हैं लेकिन स्थिरता और लंबी अवधि की प्रगति से वंचित रहते हैं.

रिपोर्ट की सिफारिशें

रिपोर्ट में गिग सेक्टर के लिए "मोबिलिटी-ओरिएंटेड री-डिजाइन" की सिफारिश की गई है, जिसमें  भारत के लेबर कोड के तहत स्पष्ट कानूनी परिभाषाएँ,  बीमा और आय सहायता जैसी मूलभूत सामाजिक सुरक्षा, पारदर्शी प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम,  उम्र और अनुभव के अनुसार संरचित कौशल विकास कार्यक्रम शामिल हैं.

 


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