जिनेवा का नेटवर्क पाकिस्तान पर प्रभावशाली, भारत की बैंकिंग व्यवस्था में भी मौजूदगी के दावे

इस्लामाबाद के सेरेना होटल में 21 घंटों तक अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस और ईरान के संसदीय अध्यक्ष रेड ज़ोन कॉन्फ्रेंस रूम में युद्ध रोकने की कोशिश करते रहे. जब काफिले निकले, तो पाकिस्तानी सरकार होटल का बिल नहीं चुका सकी. लेकिन जिनेवा में पंजीकृत एक निजी संस्था ने आगे आकर भुगतान कर दिया.

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Saturday, 18 April, 2026
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पलक शाह
सेरेना होटल का बिना भुगतान किया गया बिल सिर्फ पाकिस्तान की शर्मिंदगी नहीं था, यह भारत के लिए एक चेतावनी थी. जिनेवा आधारित एक नेटवर्क पाकिस्तान के सबसे बड़े बैंक का मालिक है, उसकी सरकार को आर्थिक सहारा देता है, परमाणु कूटनीति की मेजबानी करता है और 41 वर्षों से ग्रामीण भारत में गहरी पैठ के बाद एक भारतीय अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक में प्रमोटर का दर्जा और बोर्ड तक पहुंच रखता है.

इस्लामाबाद के सेरेना होटल में 21 घंटों तक अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वांस और ईरान के संसदीय अध्यक्ष रेड जोन कॉन्फ्रेंस रूम में युद्ध रोकने की कोशिश करते रहे. जब काफिले निकले, तो पाकिस्तानी सरकार होटल का बिल नहीं चुका सकी. लेकिन जिनेवा में पंजीकृत एक निजी संस्था ने आगे आकर भुगतान कर दिया.

यह केवल “चैरिटी” नहीं था, बल्कि एक “गुडविल जेस्चर” जैसा था. 24 करोड़ आबादी वाला परमाणु संपन्न देश, जिसकी दुनिया की छठी सबसे बड़ी सेना है, उसे अपने ही देश में हुए सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक आयोजन के लिए एक होटल मालिक से सहायता लेनी पड़ी.

वह मालिक था आगा खान डेवलपमेंट नेटवर्क.

पाकिस्तान में समानांतर प्रभाव और नियंत्रण

यह वही नेटवर्क है जो अब पाकिस्तान में सह-शासक जैसी भूमिका निभा रहा है. यह न केवल पाकिस्तान के वित्तीय ढांचे में गहराई तक मौजूद है, बल्कि भारत के वित्तीय सिस्टम और ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसकी मजबूत मौजूदगी है. यह कहानी केवल परोपकार की नहीं है, बल्कि शक्ति और नियंत्रण की है.

पाकिस्तान पर वास्तविक नियंत्रण

AKFED (आगा खान फंड फॉर इकोनॉमिक डेवलपमेंट) पाकिस्तान के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक हबीब बैंक लिमिटेड में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है. यह बैंक 1,700 शाखाओं और 3.7 करोड़ ग्राहकों के साथ पाकिस्तान की वित्तीय रीढ़ है.

यह सेरेना होटल चेन का मालिक है, जो परमाणु दौर की कूटनीति के लिए सुरक्षित मानी जाती है. यह देश के सबसे संवेदनशील उत्तरी क्षेत्रों में अस्पताल, स्कूल और टेलीकॉम सेवाएं भी चलाता है.

जब पाकिस्तान को किसी बड़े आयोजन की जरूरत होती है, तो उसे AKFED पर निर्भर रहना पड़ता है. और जब वह भुगतान नहीं कर पाता, तो AKFED भुगतान करता है. यह व्यापार नहीं बल्कि गहरी संरक्षक व्यवस्था है. इसका केंद्र जिनेवा में है.

आगा खान तृतीय, जिन्होंने इस संस्था की नींव रखी, पाकिस्तान आंदोलन और मोहम्मद अली जिन्ना की ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के प्रमुख समर्थकों में से थे. उनकी वंश परंपरा अब आगा खान नेटवर्क का संचालन करती है.

स्विट्जरलैंड का पुराना उदाहरण, भारत पर प्रभाव

दिसंबर 1999. कंधार एयरपोर्ट का रनवे.

पाकिस्तान आधारित आतंकियों ने IC-814 विमान का अपहरण किया. अपहरणकर्ताओं को यह नहीं पता था कि एक यात्री रॉबर्टो जियोरी थे, स्विस-इटैलियन उद्योगपति, जिनकी कंपनी दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत बैंक नोट छापती थी.

इसके बाद स्विस सरकार सक्रिय हो गई. एक विशेष संकट सेल सीधे फेडरल काउंसिल को रिपोर्ट करने लगा.

तत्कालीन विदेश मंत्री जोसेफ डीस ने जसवंत सिंह को फोन कर कहा: “जियोरी को सुरक्षित करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाए.” स्विट्जरलैंड ने अपने राजदूत को तालिबान क्षेत्र में भेजा, जो एक तटस्थ देश के लिए असाधारण कदम था. अमेरिका ने भी “आर्थिक स्थिरता” का हवाला देकर दबाव का समर्थन किया.

भारत ने तीन आतंकियों को रिहा कर दिया, जिनमें मसूद अजहर भी शामिल था. बाद में उसने जैश-ए-मोहम्मद की स्थापना की.

भारत में गहरी मौजूदगी

1977 से AKFED भारत के वित्तीय ढांचे में मौजूद है. यह HDFC लिमिटेड के सह-संस्थापकों में शामिल था, जो आज भारत के सबसे बड़े निजी बैंक का आधार है.

वर्तमान में AKFED और इसकी सहयोगी संस्था प्लैटिनम जुबली इन्वेस्टमेंट्स DCB बैंक के आधिकारिक प्रमोटर हैं, जो एक RBI-मान्यता प्राप्त वाणिज्यिक बैंक है, जिसमें 469 शाखाएं और 25 लाख ग्राहक हैं.

गुजरात में आगा खान रूरल सपोर्ट प्रोग्राम 41 वर्षों से 3,500 से अधिक गांवों में काम कर रहा है, जिससे लगभग 40 लाख लोगों के जीवन से जुड़ा डेटा एकत्र किया गया है.

गंभीर नियामकीय सवाल

2017 में न्यूयॉर्क के नियामकों ने AKFED के नियंत्रण वाले हबीब बैंक पर 225 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया था. आरोपों में आतंक वित्तपोषण और मनी लॉन्ड्रिंग शामिल थे. इसके बावजूद भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इसे DCB बैंक के “फिट एंड प्रॉपर” प्रमोटर के रूप में बनाए रखने और 2025 में हिस्सेदारी बढ़ाने की अनुमति देने पर सवाल उठते हैं.

प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने उठने वाले सवाल

1. क्या 2017 के अमेरिकी आदेश के बाद RBI ने AKFED की दोबारा पूर्ण जांच की?
2. क्या इसके वास्तविक मालिक और फंडिंग स्रोतों की जांच हुई?
3. क्या इसके ग्रामीण भारत में 41 वर्षों से एकत्र डेटा की निगरानी किसी एजेंसी ने की?
4. क्या पाकिस्तान और भारत के बीच डेटा सुरक्षा के लिए कोई फायरवॉल मौजूद है?
5. क्या एक ऐसे नेटवर्क को भारतीय बैंक में प्रमोटर बने रहने दिया जाना चाहिए जो पड़ोसी देश में सह-शासक जैसी भूमिका निभाता है?

भारत ने वर्षों से विदेशी संरचनाओं पर सख्त निगरानी व्यवस्था बनाई है. यह उसी प्रणाली को लागू करने का समय है.

सेरेना होटल का बिना भुगतान किया गया बिल पाकिस्तान की शर्मिंदगी नहीं, भारत के लिए चेतावनी संकेत है.

जो नेटवर्क चुपचाप पाकिस्तान की व्यवस्था में गहराई से जुड़ा है, वह लगभग 50 वर्षों से भारत में भी मौजूद है. अब सवाल यह नहीं है कि किसी ने इसे देखा या नहीं, सवाल यह है कि क्या शीर्ष स्तर पर अब इस पर कार्रवाई होगी.

सभी तथ्य सार्वजनिक रिकॉर्ड, RBI फाइलिंग, अमेरिकी नियामकीय आदेश, AKDN के बयानों और अप्रैल 2026 की रिपोर्टिंग पर आधारित हैं. यह किसी व्यक्ति पर आरोप नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रश्न हैं.

AKFED, DCB बैंक और संबंधित सभी संस्थानों से प्रतिक्रिया अपेक्षित है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


सरकार का बड़ा फैसला, 15 बैंकों को 3 साल तक सोना-चांदी आयात की मंजूरी

सरकार का यह कदम बाजार में सप्लाई चेन को मजबूत करने और कीमतों में संतुलन बनाए रखने की दिशा में अहम माना जा रहा है.

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Saturday, 18 April, 2026
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आम लोगों के लिए सोने-चांदी के दाम में राहत की उम्मीद बढ़ सकती है. केंद्र सरकार ने देश के 15 प्रमुख बैंकों को अगले तीन साल तक सोना और चांदी आयात करने की अनुमति दी है. इस फैसले का मकसद घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाना, कीमतों को स्थिर रखना और ज्वेलरी एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना है.

तीन साल के लिए वैध होगा लाइसेंस

यह अनुमति 1 अप्रैल 2026 से लागू मानी जाएगी और 31 मार्च 2029 तक प्रभावी रहेगी. आमतौर पर यह मंजूरी हर साल दी जाती थी, लेकिन इस बार इसे तीन साल के लिए बढ़ाना एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है. इससे बैंकों और कारोबारियों को लंबी अवधि की योजना बनाने में सहूलियत मिलेगी.

देरी से अटका रहा आयात

विदेश व्यापार महानिदेशालय की अधिसूचना जारी होने में देरी के कारण सोना-चांदी का आयात अस्थायी रूप से रुक गया था. इससे करीब 5 मीट्रिक टन सोना और 8 मीट्रिक टन चांदी कस्टम क्लीयरेंस के लिए फंसी रही. इससे पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने 6 अप्रैल को बैंकों की सूची जारी कर दी थी, लेकिन DGFT की मंजूरी के बिना आयात संभव नहीं था.

त्योहार से पहले बढ़ी चिंता, अब राहत

अक्षय तृतीया जैसे बड़े त्योहार से पहले इस देरी ने बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी थी. यह समय आमतौर पर सोने-चांदी की सबसे ज्यादा मांग का होता है. हालांकि अब मंजूरी मिलते ही कस्टम विभाग ने क्लियरेंस प्रक्रिया को तेज करने की बात कही है.

किन बैंकों को मिली अनुमति

इस सूची में Axis Bank, Bank of India, HDFC Bank, Federal Bank और Industrial and Commercial Bank of China जैसे बैंक शामिल हैं. इसके अलावा Deutsche Bank, Indian Overseas Bank और Punjab National Bank को भी इस बार सूची में जोड़ा गया है. वहीं Union Bank of India और Sberbank को केवल सोना आयात करने की अनुमति दी गई है.

ज्वेलरी इंडस्ट्री को मिलेगा फायदा

उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से ज्वेलरी सेक्टर को मजबूती मिलेगी. पर्याप्त आपूर्ति से कीमतों में स्थिरता आएगी और निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा. साथ ही, त्योहारों और शादी के सीजन में ग्राहकों को बेहतर विकल्प मिल सकते हैं.

 


भारत के मसाला उद्योग को नई ऊंचाई देने के लिए ‘वैल्यू शिफ्ट’ की जरूरत: विशेषज्ञ

सरकार के “विकसित भारत 2047” विजन के तहत भारत को “ग्लोबल फूड बास्केट” बनाने में मसाला उद्योग की अहम भूमिका रहने की उम्मीद है.

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Saturday, 18 April, 2026
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भारत के मसाला उद्योग को अगले स्तर पर ले जाने के लिए अब मात्रा आधारित मॉडल से हटकर गुणवत्ता, नवाचार और वैश्विक ब्रांडिंग पर आधारित वैल्यू-ड्रिवन मॉडल अपनाना जरूरी है. यह बात उद्योग विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने कही. यह सुझाव ऐसे समय में आया है जब देश के मसाला बाजार के आकार को दोगुना करने की कोशिशें चल रही हैं. इस दौरान किसानों को वैल्यू चेन से जोड़ने, रिसर्च और टेक्नोलॉजी में निवेश बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों का पालन मजबूत करने पर जोर दिया गया.

हाई-वैल्यू सेगमेंट में बढ़त जरूरी

भारत मसाला सम्मेलन 2026 में बोलते हुए केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि मसाला व्यापार में भारत की ऐतिहासिक बढ़त को अब हाई-वैल्यू और प्रोसेस्ड उत्पादों में नेतृत्व में बदलने की जरूरत है. भारत दुनिया के 109 मान्यता प्राप्त मसालों में से 60 से अधिक का उत्पादन करता है और 200 से ज्यादा देशों को निर्यात करता है, लेकिन अभी भी निर्यात का बड़ा हिस्सा कच्चे या कम वैल्यू वाले उत्पादों का है.

वॉल्यूम से वैल्यू की ओर बदलाव जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोसेस्ड, ब्रांडेड और फंक्शनल प्रोडक्ट्स जैसे वैल्यू एडिशन पर ध्यान देने से निर्यात आय और किसानों की आमदनी दोनों बढ़ सकती हैं. सरकार इस बदलाव को बढ़ावा देने के लिए 100% विदेशी निवेश (FDI) और प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिककरण योजना (PMFME) जैसी योजनाओं के जरिए समर्थन दे रही है. मंत्री ने यह भी कहा कि न्यूट्रास्यूटिकल्स और वेलनेस प्रोडक्ट्स जैसे उभरते क्षेत्रों में मसालों के उपयोग से नए अवसर पैदा हो सकते हैं.

क्वालिटी और स्टैंडर्ड पर फोकस जरूरी

विशेषज्ञों ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसा बढ़ाने के लिए गुणवत्ता नियंत्रण मजबूत करना बेहद जरूरी है. अनिल राजपूत ने कहा कि प्राकृतिक और हेल्थ-ओरिएंटेड प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ा मौका है. उन्होंने टिकाऊ (सस्टेनेबल) और ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया, क्योंकि वैश्विक खरीदार अब सख्त सुरक्षा और पर्यावरण मानकों को प्राथमिकता दे रहे हैं.

ग्लोबल ब्रांडिंग पर देना होगा ध्यान

रणजीत मेहता ने कहा कि भारत को अब वैश्विक स्तर पर मजबूत ब्रांड बनाने पर ध्यान देना होगा. उन्होंने कहा, “भारत के पास उत्पादन और परंपरा की मजबूत नींव है, अब इसे ग्लोबल ब्रांड लीडरशिप में बदलने की जरूरत है.”

किसानों और MSME को सशक्त बनाना जरूरी

जे डी देसाई ने कहा कि किसानों और MSME सेक्टर की क्षमता बढ़ाना समावेशी विकास के लिए जरूरी है. उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर भारतीय मसालों को प्रीमियम उत्पाद के रूप में पेश किया जा सकता है.

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय और भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में यह निष्कर्ष निकला कि गुणवत्ता सुधार, वैल्यू एडिशन और वैश्विक मांग के अनुसार उत्पादन से भारत अपने मसाला उद्योग को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है.

 

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बारिश से प्रभावित फसल पर राहत: गेहूं के गुणवत्ता मानकों में ढील, MSP पर पूरी खरीद का भरोसा

सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि रियायती मानकों के बावजूद किसानों को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य में कोई कमी नहीं होगी. गेहूं की खरीद ₹2,585 प्रति क्विंटल के MSP पर ही की जाएगी.

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Saturday, 18 April, 2026
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केंद्र सरकार ने किसानों को बड़ी राहत देते हुए 2026-27 विपणन सत्र के लिए गेहूं के गुणवत्ता मानकों में महत्वपूर्ण ढील देने का फैसला किया है. बेमौसम बारिश से प्रभावित फसल को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है, जिससे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर अपनी उपज बेचने में किसी तरह की परेशानी न हो.

बारिश से प्रभावित फसल के लिए विशेष राहत

कई दिनों की प्रतीक्षा के बाद केंद्र ने पंजाब और चंडीगढ़ में बारिश से प्रभावित गेहूं के लिए गुणवत्ता मानकों में ढील दी है. यह फैसला राज्य सरकार और भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अनुरोध पर लिया गया, ताकि खराब मौसम से प्रभावित किसानों को नुकसान से बचाया जा सके.

नए गुणवत्ता मानकों में क्या बदलाव

संशोधित दिशानिर्देशों के तहत अब एफसीआई पंजाब में ऐसे गेहूं की खरीद करेगा जिसमें:

- 70% तक चमक खो चुकी हो
- 15% तक सिकुड़े हुए दाने हों (पहले सीमा 6% थी)
- हल्के और क्षतिग्रस्त दानों की मात्रा भी तय सीमा तक स्वीकार की जाएगी

इस फैसले से बड़ी मात्रा में गेहूं सरकारी खरीद के दायरे में आ सकेगा.

भंडारण और गुणवत्ता की जिम्मेदारी राज्य पर

केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि रियायती मानकों के तहत खरीदे गए गेहूं को अलग से भंडारित और दर्ज किया जाएगा. भंडारण के दौरान गुणवत्ता में किसी भी गिरावट की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी. इसके अलावा, इस श्रेणी में आने वाले गेहूं की समय से पहले खरीद की जाएगी और उससे जुड़ी अतिरिक्त लागत भी राज्य को ही उठानी होगी.

MSP पर कोई कटौती नहीं

सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि रियायती मानकों के बावजूद किसानों को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य में कोई कमी नहीं होगी. गेहूं की खरीद ₹2,585 प्रति क्विंटल के MSP पर ही की जाएगी.

खरीद प्रक्रिया में तेजी की उम्मीद

विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय से केंद्रीय पूल के लिए गेहूं की खरीद में तेजी आएगी और किसानों को राहत मिलेगी. साथ ही, यह कदम कृषि क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने और किसानों के भरोसे को मजबूत करने में मदद करेगा.


अक्षय तृतीया से पहले बड़ी राहत! सस्ता हुआ सोना, चांदी में भी बड़ी गिरावट

त्योहारी सीजन से ठीक पहले सोने और चांदी की कीमतों में आई गिरावट ने बाजार का रुख बदल दिया है. जहां एक ओर निवेशक सतर्क हैं, वहीं आम खरीदारों के लिए यह राहत भरी स्थिति है.

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Saturday, 18 April, 2026
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अक्षय तृतीया से ठीक एक दिन पहले सर्राफा बाजार में सुस्ती देखने को मिली है. सोने की कीमतों में आई गिरावट ने खरीदारों को राहत दी है, जबकि चांदी भी सस्ती हुई है. वैश्विक संकेतों और भूराजनीतिक हालात में नरमी के चलते कीमतों पर दबाव बना हुआ है, जिससे बाजार फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए है.

त्योहार से पहले सोना हुआ सस्ता

अक्षय तृतीया से पहले सोने की कीमतों में आई तेजी पर ब्रेक लग गया है. 18 अप्रैल की सुबह राजधानी दिल्ली में 24 कैरेट सोना घटकर 1,54,340 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया. इससे पहले भी कीमतों में गिरावट दर्ज की गई थी, जब सोना करीब 1,600 रुपये टूट गया था. मुंबई में भी 24 कैरेट सोने का भाव 1,54,190 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया है. यह गिरावट ऐसे समय आई है, जब आमतौर पर त्योहार से पहले सोने की मांग बढ़ती है.

ग्लोबल मार्केट का असर

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने की कीमतें सीमित दायरे में बनी हुई हैं. हाजिर सोना करीब 4,786.90 डॉलर प्रति औंस पर ट्रेड कर रहा है. बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, निवेशक अभी भूराजनीतिक तनाव में स्पष्टता का इंतजार कर रहे हैं. इजरायल और लेबनान के बीच अस्थायी युद्धविराम और अमेरिका-ईरान के बीच संभावित सुलह की खबरों ने बाजार में अनिश्चितता को कुछ हद तक कम किया है. इसी कारण सोने की सुरक्षित निवेश वाली मांग थोड़ी कमजोर पड़ी है.

देश के प्रमुख शहरों में गोल्ड रेट

देश के अलग-अलग शहरों में सोने के दाम में मामूली अंतर देखा गया है.

दिल्ली: 22 कैरेट – 1,41,490 रुपये | 24 कैरेट – 1,54,340 रुपये प्रति 10 ग्राम
मुंबई और कोलकाता: 22 कैरेट – 1,41,340 रुपये | 24 कैरेट – 1,54,190 रुपये
चेन्नई: 22 कैरेट – 1,42,090 रुपये | 24 कैरेट – 1,55,010 रुपये
पुणे और बेंगलुरु: 22 कैरेट – 1,41,340 रुपये | 24 कैरेट – 1,54,190 रुपये

इन कीमतों में स्थानीय टैक्स और डिमांड के हिसाब से थोड़ा अंतर संभव है.

चांदी में भी आई तेज गिरावट

सोने के साथ-साथ चांदी की कीमतों में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. 18 अप्रैल को चांदी का भाव घटकर 2,64,900 रुपये प्रति किलोग्राम हो गया. इससे पहले इसमें करीब 5,700 रुपये की गिरावट आई थी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी की कीमत करीब 79.28 डॉलर प्रति औंस पर बनी हुई है, जो संकेत देता है कि वैश्विक स्तर पर भी दबाव बना हुआ है.

खरीदारों के लिए मौका या इंतजार?

अक्षय तृतीया को सोना खरीदना शुभ माना जाता है, ऐसे में कीमतों में आई यह गिरावट खरीदारों के लिए एक अवसर बन सकती है. हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक हालात पूरी तरह स्पष्ट नहीं होते, तब तक कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है.

 


रूसी तेल पर अमेरिकी राहत: भारत के लिए सस्ते ईंधन का रास्ता फिर खुला

अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर छूट बढ़ाने का फैसला भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से फायदेमंद है. इससे जहां भारत को सस्ता ईंधन मिलता रहेगा, वहीं वैश्विक बाजार में भी स्थिरता लाने में मदद मिल सकती है.

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Saturday, 18 April, 2026
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वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है. अमेरिका ने रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में दी गई छूट को आगे बढ़ा दिया है, जिससे भारत जैसे देशों को रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने का मौका मिलता रहेगा. यह फैसला न सिर्फ भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश भी माना जा रहा है.

16 मई तक बढ़ाई गई छूट

अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने रूसी तेल की खरीद पर दी गई छूट को 16 मई तक बढ़ा दिया है. इस नई व्यवस्था के तहत देशों को समुद्र में लदे रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद जारी रखने की अनुमति मिलेगी. यह कदम पहले दी गई 30-दिवसीय छूट के समाप्त होने के बाद उठाया गया है. हालांकि, इस लाइसेंस में ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया से जुड़े लेन-देन को बाहर रखा गया है. अमेरिका का उद्देश्य साफ है, वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को नियंत्रण में रखना और सप्लाई चेन को बाधित होने से बचाना.

ऊर्जा संकट और युद्ध का असर

मौजूदा समय में दुनिया ऊर्जा संकट से जूझ रही है. पश्चिम एशिया में संघर्ष और ‘होर्मुज स्ट्रेट’ में व्यवधान के कारण तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है. इस मार्ग से पहले वैश्विक तेल-गैस का लगभग 20% परिवहन होता था. इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका का यह फैसला अहम हो जाता है, क्योंकि इससे बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ सकती है और कीमतों पर दबाव कम किया जा सकता है.

भारत की कूटनीतिक पहल रंग लाई

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने हाल ही में अमेरिका के साथ हुई बातचीत में इस छूट को बढ़ाने का मुद्दा उठाया था. विदेश स्तर पर हुई चर्चाओं में भारत ने साफ किया था कि ऊर्जा सुरक्षा उसके लिए प्राथमिकता है, खासकर तब जब वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो रही हो. यह निर्णय उसी कूटनीतिक प्रयास का परिणाम माना जा रहा है, जिसने भारत को एक बार फिर राहत दिलाई है.

सप्लाई बढ़ने की उम्मीद, लेकिन चुनौतियां बरकरार

रूस की ओर से संकेत मिले हैं कि इस छूट के चलते वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ सकती है. अनुमान है कि करोड़ों बैरल कच्चा तेल बाजार में उपलब्ध हो सकता है, जिससे कीमतों पर कुछ हद तक नियंत्रण संभव है. हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ छूट से कीमतों में बड़ी गिरावट की उम्मीद करना मुश्किल है, क्योंकि भू-राजनीतिक तनाव अभी भी बना हुआ है.

भारत को बढ़ेगी रूसी सप्लाई

रूस ने भारत को भरोसा दिलाया है कि वह कच्चे तेल के साथ-साथ LPG और LNG की सप्लाई भी बढ़ाने के लिए तैयार है. रूस भारत को एक भरोसेमंद साझेदार मानता है और भविष्य में ऊर्जा सहयोग को और मजबूत करने की बात कह चुका है.

रूसी तेल का भारत में बढ़ता आयात

हाल के आंकड़े बताते हैं कि भारत ने रूस से तेल आयात में तेजी लाई है. मार्च महीने में यह आयात कई गुना बढ़ गया, जो दर्शाता है कि भारत सस्ते तेल के अवसर का पूरा फायदा उठा रहा है. पिछले कुछ वर्षों में भारत रूस के लिए एक प्रमुख तेल खरीदार बनकर उभरा है. इससे भारत को लागत कम करने में मदद मिली है, वहीं रूस को भी बड़ा बाजार मिला है.

 


होर्मुज स्ट्रेट फिर खुला: वैश्विक तेल बाजार को राहत, ट्रंप ने किया स्वागत

होर्मुज स्ट्रेट का दोबारा खुलना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है. इससे न केवल तेल आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद है, बल्कि पश्चिम एशिया में शांति बहाली की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

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Saturday, 18 April, 2026
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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच बड़ी राहत की खबर सामने आई है. ईरान ने रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज स्ट्रेट को सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए फिर से खोलने की घोषणा कर दी है. इस फैसले से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बना दबाव कम होने की उम्मीद है, वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सकारात्मक असर देखने को मिला है.

युद्धविराम के बीच खुला समुद्री मार्ग

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बताया कि लेबनान में घोषित युद्धविराम के दौरान होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह से खोल दिया गया है. अब वाणिज्यिक जहाज इस मार्ग से निर्बाध आवाजाही कर सकेंगे, हालांकि उन्हें पहले से तय समुद्री मार्गों का पालन करना होगा. गौरतलब है कि हाल ही में अमेरिका ने लेबनान और इजरायल के बीच 10 दिनों के युद्धविराम की घोषणा की थी, जिससे क्षेत्र में तनाव कुछ कम हुआ है.

ट्रंप ने फैसले का किया स्वागत

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के इस कदम का स्वागत किया. उन्होंने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट अब पूरी तरह से व्यापार और आवाजाही के लिए तैयार है. साथ ही उन्होंने दावा किया कि अमेरिका की मदद से ईरान इस क्षेत्र से समुद्री बारूदी सुरंगों को हटा रहा है. हालांकि ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के खिलाफ नौसैनिक नाकाबंदी तब तक जारी रहेगी, जब तक दोनों देशों के बीच अंतिम समझौता नहीं हो जाता.

तेल की कीमतों में भारी गिरावट

होर्मुज स्ट्रेट खुलने की खबर का सीधा असर वैश्विक बाजारों पर पड़ा. कच्चे तेल की कीमतों में 10 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई. इससे निवेशकों को राहत मिली और अमेरिकी शेयर बाजारों में भी तेजी देखने को मिली.

1. एसएंडपी 500 में 0.7% की बढ़त.
2. डाउ जोंस में 1% उछाल.
3. नैस्डैक भी करीब 1% चढ़ा.

यह गिरावट इस संकेत का परिणाम है कि अब तेल आपूर्ति फिर से सामान्य हो सकती है.

तनाव के चलते बंद हुआ था होर्मुज स्ट्रेट

अमेरिका और इजरायल के साथ टकराव के बाद ईरान ने इस अहम समुद्री मार्ग को प्रभावी रूप से बंद कर दिया था. इससे फारस की खाड़ी से तेल आपूर्ति बाधित हो गई थी और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई थी. होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है.

पाकिस्तान की मध्यस्थता से बढ़ी कूटनीतिक हलचल

इस घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान की भूमिका भी अहम नजर आई. पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की, जिसमें तनाव कम करने और अमेरिका-ईरान वार्ता को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान जल्द ही अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली अहम वार्ता के अगले दौर की मेजबानी कर सकता है. इससे क्षेत्र में स्थायी शांति की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं.

समझौते की उम्मीदें बढ़ीं

ट्रंप ने संकेत दिया कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम समझौता हो जाता है, तो वे इस्लामाबाद का दौरा भी कर सकते हैं. उन्होंने यह भी दावा किया कि कई अहम मुद्दों पर सहमति लगभग बन चुकी है. फिलहाल दोनों देशों के बीच लागू युद्धविराम 21 अप्रैल तक जारी रहेगा. ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास तेज होने और किसी ठोस समझौते की उम्मीद जताई जा रही है.

 


विदेशी निवेशकों का दबाव: SEBI के 2023 सर्कुलर को कमजोर करने की कोशिश

विदेशी निवेशक SEBI और सरकार पर 2023 के एक सख्त सर्कुलर को कमजोर करने के लिए आक्रामक रूप से दबाव बना रहे हैं, जो अपारदर्शी ऑफशोर संरचनाओं के पीछे छिपे वास्तविक मालिकों का खुलासा कर सकता है.

Last Modified:
Friday, 17 April, 2026
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पलक शाह
विदेशी निवेशक चुपचाप सेबी (SEBI) और सरकार पर 2023 के एक सर्कुलर को कमजोर करने के लिए दबाव डाल रहे हैं, जो रेगुलेटर्स को उन वास्तविक अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स को उजागर करने की शक्ति देता है जो अपारदर्शी ऑफशोर वाहनों के पीछे छिपे होते हैं. यह दबाव ऐसे समय में आया है जब भारत का सबसे शक्तिशाली एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, सार्वजनिक होने की तैयारी कर रहा है. यह बाजार अखंडता की वह लड़ाई है जिसके बारे में कोई खुलकर चर्चा नहीं करना चाहता. फिर भी ट्रेडिंग स्क्रीन के पीछे एक शांत युद्ध चल रहा है, एक ऐसा युद्ध जो यह तय कर सकता है कि विदेशी निवेशक भारत के इक्विटी बाजारों की डोर कैसे अपने हाथ में रखते हैं.

गोपनीय सूत्रों के अनुसार नॉर्थ ब्लॉक और SEBI के मुंबई कार्यालयों में एक तनावपूर्ण गतिरोध की स्थिति है. एक ओर: वे रेगुलेटर्स हैं जिनके पास अपतटीय गोपनीयता की परतों को काटने के लिए बनाया गया नियम है. दूसरी ओर: शक्तिशाली विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक हैं जिन्होंने लंबे समय से अदृश्य बने रहने की कला में महारत हासिल कर रखी है.

SEBI का 24 अगस्त 2023 का सर्कुलर सिर्फ एक सामान्य अनुपालन नोट नहीं है, यह अपारदर्शिता के खिलाफ एक सर्जिकल स्ट्राइक है. यह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के एक सीमित लेकिन शक्तिशाली हिस्से को उनके वास्तविक अल्टीमेट बेनिफिशियल ओनर्स का खुलासा करने के लिए मजबूर करता है, यानी उन प्राकृतिक व्यक्तियों तक जो अंततः पैसे को नियंत्रित करते हैं. इसके ट्रिगर पॉइंट स्पष्ट और गैर-परक्राम्य हैं: कोई भी FPI जिसके भारत AUM का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा किसी एक कॉरपोरेट समूह में लगा हो, या कोई भी FPI जो भारतीय इक्विटी में ₹25,000 करोड़ से अधिक का प्रबंधन करता हो, उसे बिना किसी थ्रेशहोल्ड और बिना किसी सुरक्षित छूट के पूर्ण ‘लुक-थ्रू’ डिस्क्लोजर देना होगा. सॉवरेन वेल्थ फंड, सार्वजनिक रिटेल स्कीम्स और वास्तव में विविधीकृत पूल्ड वाहन स्पष्ट रूप से इससे बाहर रखे गए हैं. एक ही कदम में, रेगुलेटर ने स्वामित्व को कई संस्थाओं में बांटकर डिस्क्लोजर सीमा के ठीक नीचे रखने के पुराने खेल को खत्म कर दिया.

इसके केंद्र में SEBI का 24 अगस्त 2023 का “अतिरिक्त खुलासों” वाला सर्कुलर है. यह सामान्य कागजी कार्रवाई से कहीं आगे जाकर कुछ FPIs को जटिल संरचनाओं के पीछे मौजूद वास्तविक मानव व्यक्तियों का खुलासा करने के लिए मजबूर करता है, बिना किसी थ्रेशहोल्ड के, बिना किसी सुरक्षित छूट के, प्राकृतिक व्यक्तियों तक पूरा लुक-थ्रू.

ट्रिगर क्या है? वर्षों से भारतीय कंपनियों में केंद्रित हिस्सेदारी को लेकर चिंता, जो अपतटीय वाहनों में बिखरे रूप में रखी जाती थी और डिस्क्लोजर नियमों से बच निकलती थी. हिंडनबर्ग-अडानी प्रकरण के बाद SEBI ने जोखिम देखा: एक ही समूह में विशाल पोजिशन, जो कागज पर तो विविध दिखती थीं लेकिन संभवतः प्रमोटर या समन्वित नियंत्रण को छिपा सकती थीं, जिससे टेकओवर नियमों या सार्वजनिक शेयरधारिता आवश्यकताओं से बचाव हो सकता था. यह नियम उच्च-जोखिम मामलों को लक्षित करता है, वे फंड जिनका भारत AUM का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा एक कॉरपोरेट समूह में है, या वे जो भारतीय इक्विटी में ₹25,000 करोड़ से अधिक का प्रबंधन करते हैं. सॉवरेन वेल्थ फंड, रिटेल फंड और विविधीकृत वाहन इससे मुक्त हैं.

FPIs इस कदम को कमजोर करने के लिए जोरदार कोशिश कर रहे हैं. उनका तर्क है कि इससे पूंजी का पलायन होगा और ‘ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस’ को नुकसान पहुंचेगा. असली मुद्दा, सूत्रों के अनुसार, यह है कि यह संभाव्य इनकार (plausible deniability) को तोड़ देता है और कानूनी स्वामित्व तथा आर्थिक वास्तविकता के बीच तालमेल को मजबूर करता है.

समय का चयन कोई संयोग नहीं है. NSE की लंबे समय से लंबित लिस्टिंग आखिरकार आगे बढ़ रही है. अधिकांश कंपनियों के विपरीत, NSE का कोई स्पष्ट प्रमोटर समूह नहीं है, इसकी स्वामित्व संरचना बिखरी हुई है, जिसमें संस्थागत निवेशकों, जिनमें FPIs भी शामिल हैं, की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है जो मौरिशस जैसे टैक्स हेवन के जरिए संरचित हैं. इनमें से कुछ हिस्से वर्षों पहले भारतीय सार्वजनिक संस्थानों से सस्ते में खरीदे गए थे. गहरी पारदर्शिता के बिना, वास्तविक विकेंद्रीकरण और छिपे नियंत्रण के बीच अंतर करना कठिन है.

यही वह अंतर है जिसे 2023 का सर्कुलर बंद करने के लिए बनाया गया था. कुछ अपारदर्शी संरचनाओं ने इसके लागू होने के बाद Adani स्टॉक्स से कथित रूप से बाहर निकलना शुरू कर दिया. SEBI ने 2024-25 में पहले ही फ्रेमवर्क के कुछ हिस्सों को आसान किया है, थ्रेशहोल्ड बढ़ाकर और अनुपालन को व्यापार-अनुकूलता के नाम पर नरम करके. लेकिन डर यह है कि आगे की कमजोरियाँ इसकी धार को खत्म कर सकती हैं.

सभ्य भाषा और परामर्शों को हटाकर देखें तो यह शक्ति और सूचना पर एक सीधी लड़ाई है. ऑफशोर पूंजी गति, लचीलापन और अधिकार क्षेत्र की परतदार अस्पष्टता पर टिकी रही है. यह नियम तस्वीर को उलट देता है: यदि आप भारत में बड़े या अत्यधिक केंद्रित हैं, तो पूरी तरह खुलासा करें या बाहर निकलें. NSE के सूचीबद्ध होने के करीब आते ही दांव एक IPO से कहीं आगे बढ़ जाते हैं. यह इस बारे में है कि वास्तव में बाजार के हिस्सों का मालिक कौन है और क्या रेगुलेटर के पास इसे पता करने के उपकरण बने रहेंगे. बाजार की अखंडता गैर-परक्राम्य है, खासकर अब. सवाल अब एक धार की तरह लटक रहा है: जैसे ही NSE लिस्ट होने की तैयारी कर रहा है, क्या रेगुलेटर उस नियम को, जो बाजार की अखंडता की रक्षा के लिए बनाया गया था, चुपचाप कमजोर होने देगा या वह अपनी स्थिति पर कायम रहेगा?

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 

 


सनथ आर पुलिक्कल ने बजाज कंज्यूमर केयर के CMP पद से दिया इस्तीफा

सनथ आर पुलिक्कल का इस्तीफा बजाज कंज्यूमर केयर के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है. हालांकि, कंपनी की ओर से अभी उनके उत्तराधिकारी को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है.

Last Modified:
Friday, 17 April, 2026
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देश की प्रमुख पर्सनल केयर कंपनी बजाज कंज्यूमर केयर (Bajaj Consumer Care Limited) में बड़ा प्रबंधन बदलाव हुआ है. कंपनी के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर (CMO) सनथ आर पुलिक्कल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.

सनथ आर पुलिक्कल जून 2024 में बजाज कंज्यूमर केयर से जुड़े थे. अपने कार्यकाल के दौरान वे कंपनी के पर्सनल केयर पोर्टफोलियो के प्रमुख ब्रांड्स की मार्केटिंग रणनीतियों का नेतृत्व कर रहे थे. उनके नेतृत्व में ब्रांड पोजिशनिंग और मार्केट विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया.

दाबर इंडिया में भी निभा चुके हैं जिम्मेदारी
डबजाज कंज्यूमर केयर से पहले पुलिक्कल डावर इंडिया Dabur India Limited के साथ जुड़े हुए थे. जहां वे जनरल मैनेजर – मार्केटिंग (होम केयर) के पद पर कार्यरत थे. इस दौरान उन्होंने ओडोमॉस (Odomos) और ओडोनिल (Odonil) जैसे लोकप्रिय ब्रांड्स की जिम्मेदारी संभाली.

दो दशकों से अधिक का अनुभव
पुलिक्कल के पास मार्केटिंग क्षेत्र में दो दशकों से अधिक का अनुभव है. उन्होंने टाटा मोटर्स (Tata Motors), ज्योति लैब्स (Jyothy Labs) और महिंद्रा (Mahindra & Mahindra) जैसी बड़ी कंपनियों में भी काम किया है. उनका अनुभव एफएमसीजी और ऑटोमोबाइल दोनों क्षेत्रों में फैला हुआ है.

सनथ आर पुलिक्कल का इस्तीफा बजाज कंज्यूमर केयर के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है. हालांकि, कंपनी की ओर से अभी उनके उत्तराधिकारी को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है.


कम खर्च, ज्यादा रेंज, अशोक लेलैंड ने पेश किए DOST ट्विन फ्यूल वेरिएंट

कंपनी के अनुसार, नए ट्विन फ्यूल वेरिएंट उन्नत तकनीक से लैस हैं, जो वाहनों को CNG और पेट्रोल के बीच आसानी से स्विच करने की सुविधा देते हैं.

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Friday, 17 April, 2026
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देश की अग्रणी कमर्शियल वाहन निर्माता अशोक लेलैंड (Ashok Leyland) ने लाइट कमर्शियल व्हीकल (LCV) सेगमेंट में एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने लोकप्रिय मॉडल DOST और DOST+ XL के नए ‘ट्विन फ्यूल’ वेरिएंट लॉन्च कर दिए हैं. यह लॉन्च ऐसे समय पर हुआ है जब बाजार में किफायती, पर्यावरण-अनुकूल और भरोसेमंद ट्रांसपोर्ट समाधानों की मांग तेजी से बढ़ रही है.

ग्राहकों की जरूरतों के हिसाब से नई तकनीक

कंपनी के अनुसार, नए ट्विन फ्यूल वेरिएंट उन्नत तकनीक से लैस हैं, जो वाहनों को CNG और पेट्रोल के बीच आसानी से स्विच करने की सुविधा देते हैं. यह फीचर खासतौर पर उन ऑपरेटरों के लिए फायदेमंद है जो सीएनजी स्टेशन की सीमित उपलब्धता के कारण रेंज को लेकर चिंतित रहते हैं.

अब ड्राइवर बिना किसी रुकावट के लंबी दूरी तय कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत पेट्रोल मोड में शिफ्ट हो सकते हैं. इससे न सिर्फ परिचालन में लचीलापन बढ़ता है, बल्कि यात्रा भी अधिक भरोसेमंद बनती है.

कंपनी नेतृत्व ने क्या कहा

लॉन्च के दौरान कंपनी के प्रेसिडेंट (LCV, IO, डिफेंस और पावर सॉल्यूशंस) अमनदीप सिंह ने कहा कि यह कदम कंपनी की ग्राहक-केंद्रित और टिकाऊ मोबिलिटी की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है. उनके अनुसार, ट्विन फ्यूल तकनीक ऑपरेटरों को कम लागत और कम उत्सर्जन के साथ बेहतर विकल्प देती है. उन्होंने कहा, “हमने सिर्फ गाड़ियां नहीं बनाई, बल्कि एक पूरी मार्केट का नजरिया बदल दिया और आज वही बदलाव हमें आगे बढ़ा रहा है.”

वहीं, LCV बिजनेस हेड विपलव शाह ने बताया कि DOST रेंज पहले से ही छोटे व्यवसायों और फ्लीट ऑपरेटरों के बीच बेहद लोकप्रिय है, और नया वेरिएंट उन्हें अधिक दक्षता और विकल्प प्रदान करेगा.

दमदार परफॉर्मेंस और बढ़ी हुई रेंज

 1. DOST ट्विन फ्यूल

- पेलोड क्षमता: 1218 किलोग्राम
- ड्राइविंग रेंज: लगभग 400 किमी
- सीएनजी टैंक: 120 लीटर
- पेट्रोल टैंक: 5 लीटर (इमरजेंसी बैकअप)

2. DOST+ XL ट्विन फ्यूल

- पेलोड क्षमता: 1410 किलोग्राम
- ड्राइविंग रेंज: लगभग 500 किमी
- सीएनजी टैंक: 148 लीटर
- पेट्रोल टैंक: 5 लीटर

इन स्पेसिफिकेशंस के साथ दोनों मॉडल शहरी और अर्ध-शहरी लॉजिस्टिक्स, लास्ट-माइल डिलीवरी और छोटे व्यवसायों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं.

छोटे व्यापारियों के लिए गेम-चेंजर

ट्विन फ्यूल तकनीक से ऑपरेटर अब कम लागत में सीएनजी पर संचालन कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर पेट्रोल का सहारा लेकर लंबी दूरी तय कर सकते हैं. इससे न केवल ईंधन खर्च घटता है, बल्कि काम के अवसर और आय की संभावनाएं भी बढ़ती हैं. साथ ही, कम उत्सर्जन के चलते ये वाहन भारत के सस्टेनेबिलिटी लक्ष्यों को भी समर्थन देते हैं.

कीमत और उपलब्धता

कंपनी ने इन नए वेरिएंट्स को प्रतिस्पर्धी कीमत पर लॉन्च किया है.

- DOST ट्विन फ्यूल: ₹8.20 लाख (एक्स-शोरूम)
- DOST+ XL ट्विन फ्यूल: ₹8.75 लाख (एक्स-शोरूम)

बाजार में मजबूत होगी पकड़

DOST रेंज में ट्विन फ्यूल तकनीक जोड़कर Ashok Leyland ने यह साफ कर दिया है कि वह बदलती बाजार जरूरतों के साथ तेजी से खुद को ढाल रही है. भरोसेमंद प्रदर्शन, बेहतर माइलेज और नई तकनीक का यह संयोजन कंपनी की LCV सेगमेंट में स्थिति को और मजबूत कर सकता है.
 


यूरोपीय संघ का बड़ा कदम, स्टील और एल्युमिनियम उत्पादों पर CBAM का दायरा बढ़ाने की तैयारी

यूरोपीय संसद के भीतर पेश एक ड्राफ्ट प्रस्ताव के अनुसार, CBAM के तहत स्टील और एल्युमिनियम आधारित करीब 180 अतिरिक्त उत्पादों को शामिल किया जा सकता है.

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Friday, 17 April, 2026
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यूरोपीय संघ (European Union) अपने कार्बन प्राइसिंग ढांचे को और व्यापक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. प्रस्ताव है कि आयातित स्टील और एल्युमिनियम से जुड़े उत्पादों पर कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) का दायरा बढ़ाया जाए, जिससे वैश्विक निर्यातकों पर बड़ा असर पड़ सकता है.

दायरे में आएंगे और अधिक उत्पाद

यूरोपीय संसद (European Parliament) के भीतर पेश एक ड्राफ्ट प्रस्ताव के अनुसार, CBAM के तहत स्टील और एल्युमिनियम आधारित करीब 180 अतिरिक्त उत्पादों को शामिल किया जा सकता है. यह बदलाव 1 जनवरी 2028 से लागू होने की सिफारिश के साथ सामने आया है. यह कदम मौजूदा व्यवस्था से आगे बढ़कर सिर्फ कच्चे माल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रोसेस्ड और मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों को भी अपने दायरे में ले आएगा.

उद्योगों पर बढ़ेगा दबाव

European Parliament Committee on the Environment, Climate and Food Safety की रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो कई औद्योगिक सेक्टरों पर कार्बन आधारित शुल्क का प्रभाव और गहरा होगा. इसका मतलब यह है कि अब केवल बेस मेटल ही नहीं, बल्कि वैल्यू-ऐडेड उत्पादों के निर्यातकों को भी यूरोपीय बाजार में प्रवेश के लिए अतिरिक्त नियमों और लागत का सामना करना पड़ सकता है.

भारत सहित कई देशों की चिंता

यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को अंतिम रूप देने की दिशा में बातचीत चल रही है. इन वार्ताओं में CBAM एक विवादित मुद्दा बना हुआ है, क्योंकि यह जलवायु आधारित कर प्रणाली व्यापार प्रतिस्पर्धा और बाजार पहुंच को प्रभावित कर सकती है.

क्या है CBAM

कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत आयातित उत्पादों पर उनके उत्पादन के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन के आधार पर शुल्क लगाया जाता है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी उत्पादक भी वही पर्यावरण मानक अपनाएं, जो यूरोपीय संघ अपने घरेलू उद्योगों पर लागू करता है.

2030 तक और बढ़ सकता है दायरा

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (Global Trade Research Initiative) ने चेतावनी दी है कि यदि CBAM का दायरा इसी तरह बढ़ता रहा, तो 2030 तक यूरोपीय संघ में जाने वाले अधिकांश औद्योगिक उत्पाद इस कार्बन टैक्स के दायरे में आ सकते हैं. ऐसे में निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए अपनी उत्पादन तकनीक और कीमतों में बदलाव करना पड़ सकता है.

व्यापार पर दूरगामी असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम वैश्विक व्यापार के नियमों को नया आकार दे सकता है. बढ़ते पर्यावरणीय मानकों के बीच कंपनियों को न केवल लागत बल्कि रणनीति के स्तर पर भी बदलाव करने होंगे. यूरोपीय संघ का यह प्रस्ताव आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और उद्योग जगत के लिए एक बड़ा निर्णायक कारक बन सकता है.