डेरिवेटिव्स मार्केट में युवाओं की बढ़ती हिस्सेदारी के साथ नुकसान का आंकड़ा भी चौंकाने वाला, 30 साल से कम उम्र के ट्रेडर्स सबसे ज्यादा प्रभावित
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
शेयर बाजार में निवेश को लेकर युवाओं की दिलचस्पी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस यानी F&O ट्रेडिंग में बढ़ती भागीदारी उनके लिए महंगी साबित हो रही है. सोशल मीडिया पर जल्दी पैसा कमाने के दावे, ट्रेडिंग ऐप्स की आसान उपलब्धता और कम समय में ज्यादा रिटर्न की उम्मीद युवाओं को डेरिवेटिव्स बाजार की ओर खींच रही है. हालांकि, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के ताजा आंकड़े इस ट्रेंड की दूसरी तस्वीर दिखाते हैं. वित्त वर्ष 2026 में 30 साल से कम उम्र के करीब 89 फीसदी F&O ट्रेडर्स को नुकसान हुआ. वहीं, इस उम्र वर्ग की डेरिवेटिव्स मार्केट में हिस्सेदारी भी चार साल में 31 फीसदी से बढ़कर 43 फीसदी हो गई है.
F&O में युवाओं की बढ़ी हिस्सेदारी
SEBI की स्टडी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में 30 साल से कम उम्र के ट्रेडर्स व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स पार्टिसिपेंट्स का करीब 43 फीसदी रहे. चार साल पहले यह हिस्सेदारी 31 फीसदी थी. यानी कम उम्र के निवेशकों की F&O मार्केट में भागीदारी तेजी से बढ़ी है. हालांकि, इसी वर्ग में नुकसान उठाने वाले ट्रेडर्स की संख्या भी सबसे ज्यादा रही. वित्त वर्ष 2026 में 30 साल से कम उम्र के करीब 89 फीसदी ट्रेडर्स को नुकसान हुआ. इसके मुकाबले 60 साल से ज्यादा उम्र वाले पार्टिसिपेंट्स में नुकसान उठाने वालों की हिस्सेदारी 81 फीसदी रही. इससे साफ है कि कम उम्र के ट्रेडर्स की बढ़ती भागीदारी के साथ जोखिम और नुकसान का स्तर भी चिंता का विषय बना हुआ है.
कम आय वाले ट्रेडर्स पर ज्यादा मार
SEBI के आंकड़ों में आय के आधार पर भी F&O ट्रेडिंग की तस्वीर चिंताजनक है. व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स में करीब तीन-चौथाई ऐसे थे, जिनकी सालाना आय 5 लाख रुपये से कम थी. इस समूह का डेरिवेटिव्स टर्नओवर में करीब 43 फीसदी हिस्सा था, लेकिन कुल नुकसान में इनकी हिस्सेदारी 53 फीसदी रही. इस आय वर्ग में करीब 88 फीसदी ट्रेडर्स को नुकसान हुआ. वहीं, सालाना 1 करोड़ रुपये से ज्यादा कमाने वाले निवेशकों में नुकसान उठाने वालों की हिस्सेदारी 81 फीसदी रही.
छोटे शहरों के निवेशक भी F&O में बढ़ा रहे दांव
डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग का विस्तार सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहा है. SEBI के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में B30 यानी बड़े शहरों के बाहर के इलाकों के निवेशक व्यक्तिगत ट्रेडर्स का करीब दो-तिहाई हिस्सा थे. डेरिवेटिव्स के कुल टर्नओवर में भी उनका हिस्सा करीब आधा रहा. खास बात यह है कि B30 निवेशकों की हिस्सेदारी व्यक्तिगत म्यूचुअल फंड एसेट्स में करीब एक-चौथाई है. इससे संकेत मिलता है कि छोटे शहरों के निवेशक पारंपरिक निवेश की तुलना में डेरिवेटिव्स जैसे ज्यादा जोखिम वाले विकल्पों में अपेक्षाकृत ज्यादा सक्रिय हैं.
1 लाख रुपये से कम पोर्टफोलियो वालों का सबसे ज्यादा नुकसान
SEBI की स्टडी में निवेशकों के इक्विटी पोर्टफोलियो और F&O ट्रेडिंग के बीच संबंध भी सामने आया है. वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 95 लाख यानी 78 फीसदी व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स का इक्विटी पोर्टफोलियो 1 लाख रुपये से कम था. इस समूह की डेरिवेटिव्स टर्नओवर में हिस्सेदारी करीब 51 फीसदी थी, लेकिन कुल नुकसान में इनकी हिस्सेदारी 70 फीसदी तक पहुंच गई. यानी कम पूंजी वाले निवेशकों ने F&O में अपेक्षाकृत बड़ा जोखिम उठाया और नुकसान का बोझ भी ज्यादा झेला.
छोटा पोर्टफोलियो, बड़ा F&O दांव
स्टडी के मुताबिक, ऐसे ट्रेडर्स जिनका इक्विटी पोर्टफोलियो 1 लाख रुपये से कम था, लेकिन डेरिवेटिव्स में उनका टर्नओवर 1 करोड़ रुपये से ज्यादा था, उनकी संख्या कुल ट्रेडर्स की करीब 13 फीसदी थी. हालांकि, कुल नुकसान में उनकी हिस्सेदारी 52 फीसदी रही. यह आंकड़ा बताता है कि सीमित इक्विटी पूंजी वाले कई निवेशक डेरिवेटिव्स में अपने उपलब्ध संसाधनों की तुलना में काफी बड़ा दांव लगा रहे थे.
बिना इक्विटी पोर्टफोलियो के भी F&O ट्रेडिंग
SEBI के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 43 लाख ट्रेडर्स यानी व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स पार्टिसिपेंट्स का लगभग 35 फीसदी हिस्सा ऐसा था, जिसके पास वित्त वर्ष 2026 के अंत में कोई अंडरलाइंग इक्विटी पोर्टफोलियो नहीं था. इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में लोग बिना कैश इक्विटी होल्डिंग के भी डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग कर रहे थे. ऐसे में F&O उनके लिए निवेश के बजाय सीधे सट्टेबाजी जैसे जोखिम वाला विकल्प बन सकता है.
कुल ट्रेडर्स की संख्या घटी, लेकिन जोखिम बना रहा
SEBI की स्टडी के मुताबिक, व्यक्तिगत डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स की कुल संख्या में भी गिरावट आई है. वित्त वर्ष 2025 में करीब 1.06 करोड़ व्यक्तिगत ट्रेडर्स थे, जो वित्त वर्ष 2026 में घटकर करीब 87.5 लाख रह गए. यानी ट्रेडर्स की संख्या में करीब 18 फीसदी की कमी आई. इसके बावजूद युवा निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़ना और छोटे पोर्टफोलियो वाले ट्रेडर्स का भारी नुकसान उठाना बाजार नियामक के लिए चिंता का विषय है.
सोशल मीडिया और आसान ट्रेडिंग से बढ़ा आकर्षण
F&O ट्रेडिंग की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे सोशल मीडिया पर मौजूद फिनफ्लुएंसर्स, ट्रेडिंग से जल्दी पैसा कमाने की उम्मीद और मोबाइल ऐप्स के जरिए बाजार तक आसान पहुंच जैसे कई कारण हैं. हालांकि, SEBI के आंकड़े बताते हैं कि डेरिवेटिव्स में तेजी से पैसा बनाने की कोशिश बड़े नुकसान में बदल सकती है.
SEBI ने अपनी स्टडी में उम्र, आय, भौगोलिक स्थिति, ट्रेडिंग गतिविधि और पोर्टफोलियो के आकार के आधार पर ट्रेडिंग के नतीजों का विश्लेषण किया है. हालांकि, नियामक ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन संबंधों को सीधे कारण और प्रभाव के प्रमाण के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.
35,000 करोड़ रुपये की फंडिंग जुटाने की योजना में बढ़ी उम्मीद, प्रवर्तक कंपनियां देंगी गारंटी; SBI निजी बैंकों से बाकी कर्ज मिलने के बाद ही जारी करेगा अपनी रकम
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दूरसंचार कंपनी वोडाफोन-आईडिया (Vodafone Idea) को अपनी 45,000 करोड़ रुपये की पूंजीगत व्यय योजना के लिए बैंक ऋण जुटाने में बड़ी राहत मिली है. भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने कंपनी के हिस्से का ऋण मंजूर करने पर सहमति जताई है. दरअसल, वोडाफोन-आईडिया की प्रवर्तक कंपनियां कर्ज के लिए गारंटी देने को तैयार हो गई हैं, जिससे पहले गारंटी को लेकर अटका वित्तपोषण प्रस्ताव आगे बढ़ने की उम्मीद जगी है. हालांकि, SBI ने रकम जारी करने से पहले एक अहम शर्त रखी है. बैंक तब तक अपना हिस्सा जारी नहीं करेगा, जब तक वोडाफोन-आईडिया निजी क्षेत्र के बैंकों से प्रस्तावित ऋण का बाकी हिस्सा हासिल नहीं कर लेती.
प्रवर्तक कंपनियां देंगी गारंटी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गारंटी वोडाफोन-आईडिया की प्रवर्तक कंपनियां देंगी, न कि समूह की बड़ी सूचीबद्ध कंपनियां. यह गारंटी SBI के ऋण के लिए अतिरिक्त सुरक्षा कवर के तौर पर काम करेगी. सूत्र के मुताबिक, कंपनी की ओर से यह अनुरोध किया गया था कि यदि चार वर्षों तक सब कुछ ठीक रहता है तो गारंटी वापस ले ली जाए. SBI ने इस शर्त पर भी सहमति जताई है.
कंपनी में प्रमोटरों की 25.64 फीसदी हिस्सेदारी
मार्च 2026 तक वोडाफोन-आईडिया में प्रवर्तकों की कुल हिस्सेदारी 25.64 फीसदी थी. इसमें वोडाफोन ग्रुप पीएलसी की 19 फीसदी और कुमार मंगलम बिड़ला के नेतृत्व वाले आदित्य बिड़ला ग्रुप की 6.63 फीसदी हिस्सेदारी शामिल है. भारत सरकार की कंपनी में करीब 49 फीसदी हिस्सेदारी है, लेकिन इसे प्रवर्तक के बजाय सार्वजनिक शेयरधारक की श्रेणी में रखा गया है.
निजी बैंकों से कर्ज जुटाना अभी बाकी
बैंकर के मुताबिक, निजी क्षेत्र के बैंक फिलहाल इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हैं. ऐसे में वोडाफोन-आईडिया को उनके साथ अलग से बातचीत करनी होगी. कंपनी को सभी ऋणदाताओं के साथ चर्चा कर पूरे वित्तपोषण को अंतिम रूप देना होगा. इसमें कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भी शामिल हो सकते हैं, हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि प्रत्येक ऋणदाता कितना योगदान देगा. कंपनी को तब तक वित्तपोषण प्रस्ताव आगे बढ़ाने में मुश्किल होगी, जब तक सभी ऋणदाता अपने-अपने हिस्से को मंजूरी नहीं दे देते.
35,000 करोड़ रुपये के नए कर्ज की जरूरत
वोडाफोन-आईडिया ने अगले तीन वर्षों में 45,000 करोड़ रुपये की पूंजीगत व्यय योजना के लिए 35,000 करोड़ रुपये का नया वित्तपोषण मांगा है. इसमें 25,000 करोड़ रुपये बैंक ऋण के तौर पर और 10,000 करोड़ रुपये क्रेडिट लाइन या अन्य गैर-ऋण सुविधाओं के रूप में जुटाने की योजना है. कंपनी की पूंजीगत व्यय योजना में 17 प्राथमिकता वाले सर्किल में 5G नेटवर्क का विस्तार, EBITDA को बढ़ाना और ग्राहकों की संख्या में इजाफा कर आय को मजबूत करना शामिल है.
पहले ही मिल चुके हैं 6,400 करोड़ रुपये
जून 2026 को समाप्त तिमाही तक वोडाफोन-आईडिया लंबी अवधि की बैंक सुविधा के तहत 6,400 करोड़ रुपये हासिल कर चुकी है. कंपनी के मुख्य कार्याधिकारी अभिजित किशोर ने 11 अगस्त को तिमाही नतीजों के बाद विश्लेषकों से बातचीत में कहा था कि कंपनी अपने सभी ऋणदाताओं के साथ बातचीत कर रही है और इस दिशा में अच्छी प्रगति हुई है. कंपनी के मुताबिक, ऋणदाताओं में SBI के नेतृत्व वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, निजी क्षेत्र के भारतीय बैंक और विदेशी बैंकों का समूह शामिल है.
FY27 के कैपेक्स के लिए बैंक कर्ज अहम
बैंकर के मुताबिक, SBI की शर्तें कंपनी के लिए स्वीकार्य हैं और बैंक अपने हिस्से का ऋण जारी करेगा. हालांकि, दूसरे ऋणदाताओं को अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं और बोर्ड की मंजूरी से गुजरना होगा. वोडाफोन-आईडिया को प्रत्येक ऋणदाता के साथ अलग-अलग बातचीत कर वित्तपोषण को अंतिम रूप देना होगा. कंपनी को उम्मीद है कि SBI के नेतृत्व वाले सरकारी बैंकों के साथ बातचीत जल्द अंतिम रूप लेगी. इसके साथ ही वह दूसरे स्रोतों से भी ऋण जुटाने की कोशिश कर रही है. वित्त वर्ष 2027 में पूंजीगत व्यय बढ़ाने और नेटवर्क विस्तार को गति देने के लिए बैंक ऋण वोडाफोन-आईडिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
शुक्रवार को सेंसेक्स 3.11 अंक की मामूली बढ़त के साथ 77,540.83 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 20.15 अंक चढ़कर 24,252 के स्तर पर पहुंच गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शेयर बाजार में लगातार दो हफ्तों की गिरावट के बाद अब निवेशकों की नजर बाजार की अगली चाल पर है. शुक्रवार को सेंसेक्स 3.11 अंक की मामूली बढ़त के साथ 77,540.83 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 20.15 अंक चढ़कर 24,252 के स्तर पर पहुंच गया. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निफ्टी इंडेक्स फिलहाल सीमित दायरे में रह सकता है, लेकिन 24,000 के मजबूत सपोर्ट के ऊपर टिके रहने पर शॉर्ट टर्म में रिकवरी की गुंजाइश बनी हुई है. वहीं, 24,350-24,500 के जोन के ऊपर मजबूती बाजार में तेजी का संकेत दे सकती है.
शुक्रवार को कैसी रही बाजार की चाल
शुक्रवार को निफ्टी 53 अंकों की बढ़त के साथ खुला, लेकिन पूरे कारोबारी सत्र में इंडेक्स सीमित दायरे में कारोबार करता रहा. अंत में निफ्टी 20 अंक यानी 0.08 फीसदी की बढ़त के साथ 24,252 पर बंद हुआ. क्लोजिंग ऑक्शन में भी इंडेक्स को करीब 19 अंकों का सहारा मिला. सेक्टोरल स्तर पर मेटल, प्राइवेट बैंक और रियल्टी शेयरों में खरीदारी देखने को मिली, जबकि ऑटो, मीडिया और आईटी सेक्टर दबाव में रहे. व्यापक बाजार में मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों ने बेहतर प्रदर्शन किया. Nifty Midcap 100 में 0.10 फीसदी और Nifty Smallcap 100 में 0.69 फीसदी की बढ़त दर्ज हुई.
इस हफ्ते किन फैक्टर्स पर रहेगी नजर
इस हफ्ते बाजार की दिशा तय करने में मानसून की रफ्तार, विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII की गतिविधियां, कच्चे तेल की कीमतें और बड़े आर्थिक घटनाक्रम अहम रहेंगे. दो हफ्तों की लगातार गिरावट के बाद इन संकेतकों के बीच अगर खरीदारी लौटती है, तो निफ्टी में शॉर्ट टर्म रिकवरी देखने को मिल सकती है.
24,000 के नीचे फिसला तो बढ़ सकता है दबाव
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, निफ्टी का मौजूदा ट्रेंड अभी पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ है. उनका मानना है कि इंडेक्स अगले हफ्ते 24,500-24,600 तक पहुंच सकता है. उन्होंने 24,100 को अहम सपोर्ट बताया है. विशेषज्ञों का कहना है कि निफ्टी 50 और 100 दिन के EMA के ऊपर बना हुआ है, जो करीब 24,200 के आसपास हैं. हालांकि इंडेक्स अभी 20 दिन के EMA यानी 24,300 और 200 दिन के EMA यानी 24,376 से नीचे है. ऐसे में फिलहाल बाजार में स्पष्ट दिशा का अभाव है. उनके मुताबिक 24,000 के नीचे क्लोजिंग होने पर बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है. वहीं, 24,400 के ऊपर टिकने पर शॉर्ट टर्म में तेजी की वापसी हो सकती है.
Bank Nifty के लिए 58,200-58,300 अहम
Bank Nifty भी शुक्रवार को करीब 290 अंकों के दायरे में कारोबार करता रहा. 58,200-58,300 का स्तर इंडेक्स के लिए बड़ा रेजिस्टेंस है. इसके ऊपर निकलने पर Bank Nifty 58,700 और फिर 59,000 तक जा सकता है. वहीं, नीचे की तरफ 57,300-57,200 का स्तर मजबूत सपोर्ट के तौर पर देखा जा रहा है.
आज इन शेयरों पर रहेगी नजर
विशेषज्ञों के अनुसार, आज के कारोबार में NTPC Green Energy, Meesho, Urban Company, Vodafone Idea, Power Grid, Swiggy, Mahindra & Mahindra, Zee Entertainment, Aurobindo Pharma, Lenskart Solutions और Bank of Baroda के शेयर फोकस में रह सकते हैं. इन कंपनियों से जुड़े बड़े ऑर्डर, ब्लॉक डील, फंडिंग, कारोबार विस्तार और नियामकीय अपडेट निवेशकों के लिए अहम हैं. NTPC Green Energy की इकाई को 500 MW की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता मिली है, जबकि Meesho में Y Combinator करीब 1.05 फीसदी हिस्सेदारी ब्लॉक डील के जरिए बेच सकता है. Urban Company और Kent RO के बीच विज्ञापन विवाद को लेकर मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा है. Vodafone Idea के कैपेक्स प्लान के लिए SBI ने अपने हिस्से के लोन को मंजूरी देने पर सहमति जताई है, वहीं Power Grid को गुजरात में रिन्यूएबल एनर्जी ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट के लिए सफल बोलीदाता घोषित किया गया है. Swiggy के शेयरधारकों ने कंपनी को Indian-Owned and Controlled Company बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. Mahindra & Mahindra नए पिकअप मॉडल के जरिए दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिम एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे विदेशी बाजारों में विस्तार की तैयारी कर रही है. Zee Entertainment ने प्रमोटर ग्रुप को ₹126 प्रति वारंट के भाव पर 20.9 करोड़ फुली कन्वर्टिबल वारंट जारी किए हैं. Aurobindo Pharma की इकाई AuroPeptides के तेलंगाना प्लांट के US FDA निरीक्षण में एक आपत्ति दर्ज की गई. इसके अलावा, SoftBank Vision Fund II Lenskart Solutions में 2.6 फीसदी तक हिस्सेदारी बेच सकता है, जबकि Bank of Baroda ने 400 मिलियन डॉलर के सीनियर अनसिक्योर्ड फिक्स्ड रेट नोट्स जारी किए हैं.
निवेशकों के लिए क्या संकेत?
कुल मिलाकर बाजार में फिलहाल सतर्क रुख बना हुआ है. निफ्टी के लिए 24,000 का स्तर अहम सपोर्ट और 24,350-24,500 का जोन प्रमुख रेजिस्टेंस रहेगा. 24,000 के नीचे कमजोरी बढ़ सकती है, जबकि 24,400-24,500 के ऊपर मजबूती आने पर रिकवरी का दायरा बढ़ सकता है. इसलिए अगले हफ्ते निवेशकों की नजर इन तकनीकी स्तरों के साथ FII फ्लो, क्रूड और वैश्विक बाजारों के संकेतों पर रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
एडवांस डायबेटिक केयर जूस और गिलोय पपीता जूस रहे प्रमुख आकर्षण, 20 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आयुर्वेद के विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक जीवनशैली की वेलनेस जरूरतों से जोड़ने की दिशा में काम कर रही क्यूरा (Cura) ने 21 से 23 अगस्त तक भारत मंडपम, प्रगति मैदान, नई दिल्ली में आयोजित 9वें अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं वेलनेस एक्सपो 2026 में अपने उत्पादों का प्रदर्शन किया. कंपनी ने एक्सपो में एडवांस डायबेटिक केयर जूस और गिलोय पपीता समेत अपने आयुर्वेद आधारित वेलनेस पोर्टफोलियो को पेश किया.
क्यूरा का फोकस प्राकृतिक रूप से प्राप्त सामग्रियों और उद्देश्यपूर्ण आयुर्वेदिक फॉर्मुलेशन के जरिए रोजमर्रा की वेलनेस जरूरतों के लिए सरल और सुलभ समाधान विकसित करने पर है. एक्सपो में कंपनी ने अपने उत्पादों की फॉर्मुलेशन प्रक्रिया और आयुर्वेद आधारित दृष्टिकोण को उपभोक्ताओं और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के सामने रखा.
एडवांस डायबेटिक केयर जूस रहा प्रमुख आकर्षण
एक्सपो में एडवांस डायबेटिक केयर जूस प्रमुख आकर्षणों में शामिल रहा. इसे डायबेटिक वेलनेस के तौर पर उन लोगों के लिए पेश किया गया, जो अपने ब्लड शुगर मैनेजमेंट को अपनी दैनिक वेलनेस दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहते हैं.
कंपनी के अनुसार, करीब 20 प्राकृतिक सामग्रियों से तैयार इस फॉर्मुलेशन में गुडमर (Gymnema sylvestre) को प्रमुख वनस्पति के रूप में शामिल किया गया है. इसके अलावा करेला, जामुन, नीम, गिलोय, मेथी, शिलाजीत, अश्वगंधा, अर्जुन, आंवला, हल्दी और दालचीनी जैसी सामग्रियां भी इसमें शामिल हैं. कंपनी के मुताबिक इसका शुगर-फ्री और ट्रिपल-रिफाइंड फॉर्मुलेशन प्राकृतिक सामग्रियों के संयोजन पर आधारित है.
क्यूरा ने गिलोय पपीता जूस को भी एक्सपो में प्रदर्शित किया. कंपनी के अनुसार, इसे बुखार के मौसम, इम्युनिटी और सामान्य स्वास्थ्य से जुड़ी वेलनेस जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है.
इसमें गिलोय, पपीते की पत्ती और तुलसी के साथ नीम, अश्वगंधा और एलोवेरा जैसी प्राकृतिक सामग्रियां शामिल हैं. कंपनी के मुताबिक फॉर्मुलेशन को इम्युनिटी, स्वास्थ्य लाभ, सूजनरोधी और ज्वररोधी सहायता, प्लेटलेट सपोर्ट तथा दैनिक प्रतिरक्षा सुरक्षा जैसी वेलनेस जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.
आयुर्वेद को रोजमर्रा की वेलनेस से जोड़ने पर जोर
क्यूरा आयुर्वेदिक एंड यूनानी के डायरेक्टर आदित्य मीहीर ने कहा, “हमारा उद्देश्य उद्देश्यपूर्ण वेलनेस को सरल और सुलभ बनाना है, साथ ही इसे आयुर्वेद के विज्ञान और विरासत से जोड़कर रखना है. इस एक्सपो ने हमें ऐसे उपभोक्ताओं और उद्योग जगत के हितधारकों से जुड़ने का अवसर दिया, जो आज तेजी से भरोसेमंद और प्राकृतिक वेलनेस समाधानों की तलाश कर रहे हैं.”
14 करोड़ से अधिक ग्राहकों तक पहुंच का दावा
कंपनी के मुताबिक क्यूरा ने अब तक 14 करोड़ से अधिक ग्राहकों को सेवाएं दी हैं और 28 से ज्यादा राज्यों में 3,000 से अधिक डॉक्टरों का विश्वास हासिल किया है. कंपनी की गुणवत्ता संबंधी प्रतिबद्धता ISO-GMP प्रमाणित विनिर्माण और NABL प्रयोगशाला प्रमाणन से मजबूत होती है.
क्यूरा के अनुसार, उसके चुनिंदा वेलनेस फॉर्मुलेशन की ताजगी और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए उन्हें हर 48 घंटे में SS-ग्रेड केतलियों में ताजा तैयार किया जाता है. कंपनी का दावा है कि ये उत्पाद अर्क-आधारित नहीं हैं, जैसा कि इस श्रेणी के कई उत्पादों में देखने को मिलता है.
20 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा
अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं वेलनेस एक्सपो क्यूरा के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के दर्शकों, उपभोक्ताओं और उद्योग हितधारकों से जुड़ने का मंच बना. तीन दिवसीय आयोजन में 150 से अधिक वैश्विक प्रदर्शक, 150 से अधिक विशेषज्ञ वक्ता और 20 से अधिक देशों से 10,000 से ज्यादा व्यापारिक आगंतुक शामिल हुए.
एक्सपो में स्वास्थ्य सेवा, AYUSH, वेलनेस, पोषण, मेडिकल टेक्नोलॉजी और निवारक स्वास्थ्य सेवा से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. क्यूरा ने इस मंच के जरिए अपने आयुर्वेद आधारित वेलनेस उत्पादों और फॉर्मुलेशन को पेश किया. कंपनी के मुताबिक, एक्सपो में भागीदारी उसके उस दृष्टिकोण का हिस्सा है, जिसके तहत आयुर्वेद के पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक सामग्रियों, ताजगी और सोच-समझकर तैयार किए गए फॉर्मुलेशन के जरिए आयुर्वेद आधारित वेलनेस को रोजमर्रा की जिंदगी का सरल और भरोसेमंद हिस्सा बनाने पर जोर दिया जा रहा है.
पूरी तरह कन्वर्जन के बाद Zee Entertainment में प्रमोटर ग्रुप की हिस्सेदारी बढ़कर 17.9% होगी, शेयरधारकों ने 23.79% हिस्सेदारी को मंजूरी दी थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जी मीडिया (Zee Entertainment Enterprises-ZEEL) ने प्रमोटर ग्रुप की इकाई Sunbright Mauritius Investments Ltd को 126 रुपये प्रति वारंट के इश्यू प्राइस पर 20,94,47,805 पूरी तरह कन्वर्टिबल वारंट आवंटित किए हैं. वारंट का आवंटन 21 अगस्त को शेयरधारकों और स्टॉक एक्सचेंजों से मंजूरी मिलने के बाद पूरा हुआ. यह प्रक्रिया सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) की ओर से दी गई अंतरिम राहत के बाद आगे बढ़ी.
659.76 करोड़ रुपये का भुगतान
Sunbright ने इश्यू प्राइस का 25 फीसदी यानी 31.50 रुपये प्रति वारंट की राशि अग्रिम रूप से चुकाई है. यह रकम करीब 659.76 करोड़ रुपये है. बाकी 75 फीसदी यानी 94.50 रुपये प्रति वारंट का भुगतान आवंटन की तारीख से 18 महीने के भीतर करना होगा. इसके लिए अंतिम तारीख 21 फरवरी 2028 है.
हर वारंट के कन्वर्जन पर धारक को 1 रुपये फेस वैल्यू का एक इक्विटी शेयर हासिल करने का अधिकार होगा. बाकी भुगतान होने और वारंट के इक्विटी शेयरों में कन्वर्जन तक ZEEL की पेड-अप शेयर कैपिटल में कोई बदलाव नहीं होगा.
कन्वर्जन के बाद 17.90 फीसदी होगी हिस्सेदारी
अगर सभी वारंट इक्विटी शेयरों में कन्वर्ट हो जाते हैं, तो पूरी तरह डायल्यूटेड आधार पर ZEEL में Sunbright की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 17.90 फीसदी हो जाएगी. इससे प्रमोटर ग्रुप को प्रेफरेंशियल इश्यू के जरिए कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का महत्वपूर्ण रास्ता मिलेगा.
शेयरधारकों ने इससे पहले प्रमोटर ग्रुप की हिस्सेदारी बढ़ाकर 23.79 फीसदी तक करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. हालांकि, मौजूदा वारंट के पूरी तरह कन्वर्जन के बाद हिस्सेदारी करीब 17.90 फीसदी तक ही पहुंचेगी.
SAT के आदेश के बाद आगे बढ़ी प्रक्रिया
यह आवंटन 14 अगस्त को SAT की ओर से दिए गए आदेश के बाद हुआ. ट्रिब्यूनल ने ZEEL और पुनीत गोयनका को प्रेफरेंशियल वारंट इश्यू आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी. इसके लिए दोनों अपीलकर्ताओं को एक सप्ताह के भीतर पूरी पेनल्टी जमा करने की शर्त रखी गई थी. ट्रिब्यूनल ने वारंट इश्यू पूरा करने की समयसीमा भी सात दिन बढ़ा दी थी.
SAT ने ZEEL को अपने म्यूचुअल फंड निवेश का इस्तेमाल रोजमर्रा की परिचालन जरूरतों के लिए करने की भी अनुमति दी. हालांकि, इन फंड्स का इस्तेमाल अन्य उद्देश्यों के लिए नहीं किया जा सकता. इसमें प्रस्तावित डिविडेंड का भुगतान भी शामिल है.
कृषि से लेकर पर्यावरण तक स्पेस टेक्नोलॉजी के नए इस्तेमाल पर जोर, युवा उद्यमियों और इनोवेटर्स की पीएम ने की तारीफ
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के साथ-साथ स्पेस टेक्नोलॉजी का लाभ आम लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया है. शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित सेवा तीर्थ में प्रधानमंत्री ने 20 स्वदेशी स्पेस स्टार्टअप्स के संस्थापकों और सीईओ से मुलाकात की. इस दौरान उन्होंने कंपनियों से अपनी तकनीकों के नए अनुप्रयोग तलाशने और कृषि, पर्यावरण समेत सामाजिक विकास से जुड़े क्षेत्रों के साथ सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया.
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का उभरता हुआ निजी स्पेस इकोसिस्टम देश और दुनिया के लिए बड़ी ताकत बन सकता है. स्पेस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल खेती, पशुपालन, डेयरी, पर्यावरण और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र की उपलब्धियां अंतरिक्ष क्षेत्र को कंपनियों के लिए खोलने के सरकार के फैसले को सही साबित कर रही हैं.
रॉकेट से लेकर स्पेस इंटेलिजेंस तक काम कर रहे स्टार्टअप
बैठक में स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस, पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, गैलेक्सी, पियरसाइट, बैलाट्रिक्स एयरोस्पेस, डिगंतारा, सैटश्योर, सुहोरा टेक्नोलॉजीज, मनास्टू स्पेस, एस्ट्रोबेस, टेकमी2स्पेस, व्योमआईसी, कॉसमॉस सर्व स्पेस, ऑर्बिटएड एयरोस्पेस, स्काईसर्व, सेरेंडिपिटी स्पेस, वासर लैब्स और मिस्टईओ समेत 20 स्पेस स्टार्टअप्स के प्रतिनिधि शामिल हुए.
ये कंपनियां रॉकेट, पुन: इस्तेमाल होने वाले लॉन्च व्हीकल, उपग्रह, एवियोनिक्स, उन्नत प्रणोदन, स्पेस इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष मलबे के प्रबंधन और एआई आधारित मौसम एवं जलवायु इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं. स्टार्टअप संस्थापकों ने प्रधानमंत्री के सामने अपनी तकनीकी प्रगति, उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं को साझा किया.
कृषि और पर्यावरण में बढ़े स्पेस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर जोर
मोदी ने स्पेस कंपनियों से अपनी तकनीकों का इस्तेमाल अंतरिक्ष तक सीमित रखने के बजाय जमीन पर लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए करने को कहा. उन्होंने कृषि और पर्यावरण से जुड़े संगठनों के साथ अधिक सहयोग की जरूरत बताई. सैटेलाइट और अन्य अंतरिक्ष आधारित तकनीकों के जरिए खेती, मौसम की निगरानी, जलवायु से जुड़ी चुनौतियों और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल सकती है.
प्रधानमंत्री ने युवाओं और छात्रों में अंतरिक्ष के प्रति रुचि बढ़ाने पर भी जोर दिया. इसके लिए स्पेस स्टार्टअप्स को अटल टिंकरिंग लैब्स के साथ मिलकर काम करने को प्रोत्साहित किया गया, ताकि स्कूली स्तर से ही बच्चों को अंतरिक्ष विज्ञान और नई तकनीकों से जोड़ने का अवसर मिल सके.
वैश्विक प्रतिभा और निवेश आकर्षित करने की क्षमता
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदलाव आया है. निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स की बढ़ती भागीदारी से देश में वैश्विक प्रतिभाओं, कंपनियों और निवेश को आकर्षित करने की संभावनाएं भी बढ़ी हैं. स्टार्टअप संस्थापकों ने अंतरिक्ष क्षेत्र में सरकार के समर्थन और उद्योग के भीतर बढ़ते सहयोग की सराहना की. उन्होंने भारत के निजी स्पेस उद्योग द्वारा विकसित तकनीकों को अपनाने में कंपनियों की बढ़ती रुचि का भी उल्लेख किया. बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और आईएन-स्पेस के चेयरमैन पवन गोयनका भी मौजूद थे.
एक्स पर पीएम मोदी ने की युवा उद्यमियों की तारीफ
बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी स्पेस स्टार्टअप्स के युवा उद्यमियों और इनोवेटर्स की तारीफ की. उन्होंने कहा कि भारत के स्पेस सेक्टर की युवा ऊर्जा से मिलना शानदार अनुभव रहा. मोदी ने कहा कि इन युवा उद्यमियों और इनोवेटर्स ने एक नए और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में कदम रखने का साहस दिखाया है. प्रधानमंत्री ने कहा कि इन उद्यमियों ने जोखिम उठाया, सुधार की प्रक्रिया पर भरोसा किया और लगातार प्रयास जारी रखे. उनके मुताबिक, इसी जज्बे और लगातार कोशिशों की वजह से भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है.
It was wonderful to meet the Yuva Urja of India’s space sector…young entrepreneurs and innovators who have shown remarkable courage by entering a new and demanding domain. They have taken risks, trusted the reform process and remained consistent in their efforts. Due to this,… pic.twitter.com/RV1Nd4dUKm
— Narendra Modi (@narendramodi) August 21, 2026
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में साइबर धोखाधड़ी से देश को करीब 52,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सरकार ने प्रमुख सरकारी और निजी बैंकों की वेबसाइट और मोबाइल ऐप की नकल कर ग्राहकों को ठगने वाले फर्जी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है. गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने गूगल (Google) से ऐसे कई फायरबेस (Firebase) वेब डेवलपमेंट अकाउंट हटाने को कहा है, जिनका इस्तेमाल बैंकिंग ऐप जैसे दिखने वाले फर्जी प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों से धोखाधड़ी के लिए किया जा रहा था.
बैंकिंग ऐप की नकल कर रहे थे ठग
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, साइबर अपराधी फर्जी वेबसाइट और ऐप के जरिए लोगों को रिवॉर्ड पॉइंट रिडीम कराने, क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाने और अन्य ऑफर का झांसा दे रहे थे. इन प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया गया था कि वे प्रमुख बैंकों के असली ऐप जैसे दिखाई दें.
गूगल फायरबेस, गूगल के क्लाउड कारोबार का हिस्सा है. इसका इस्तेमाल मोबाइल ऐप और वेबसाइट बनाने और होस्ट करने के लिए किया जाता है. सरकारी नोटिस पर गूगलने कहा कि फिशिंग, मैलवेयर और वित्तीय धोखाधड़ी के लिए उसकी सेवाओं के इस्तेमाल के खिलाफ उसकी सख्त नीति है. कंपनी ने कहा कि वह भारत में I4C समेत कानून प्रवर्तन एजेंसियों और सरकारी संस्थानों के साथ मिलकर काम करती है.
5 साल में साइबर फ्रॉड से 52,000 करोड़ रुपये का नुकसान
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में साइबर धोखाधड़ी से देश को करीब 52,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. अकेले 2025 में डिजिटल और साइबर फ्रॉड से करीब 22,500 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया गया और इस दौरान 28 लाख साइबर फ्रॉड शिकायतें सामने आईं.
फ्रॉड पीड़ितों को 25,000 रुपये तक मुआवजा
डिजिटल और साइबर फ्रॉड के पीड़ितों के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इस साल संशोधित मुआवजा ढांचा लागू किया है. इसके तहत डिजिटल धोखाधड़ी में 50,000 रुपये तक का नुकसान उठाने वाले पात्र पीड़ितों को एकमुश्त 25,000 रुपये तक का मुआवजा मिल सकता है.
RBI ने बढ़ाए डिजिटल सुरक्षा उपाय
RBI की धोखाधड़ी रोकने की व्यवस्था में ऑथेंटिकेशन, ग्राहक सुरक्षा और फ्रॉड डेटा एवं जागरूकता जैसे प्रमुख उपाय शामिल हैं. डिजिटल भुगतान में अतिरिक्त सुरक्षा सत्यापन (AFA) को SMS OTP के अलावा दूसरे सुरक्षित तरीकों तक बढ़ाने पर भी काम किया जा रहा है.
ग्राहकों को असली बैंकिंग वेबसाइट पहचानने में मदद के लिए .bank.in डोमेन उपलब्ध कराया गया है. वहीं, अन्य वित्तीय संस्थानों के लिए .fin.in डोमेन लाने की योजना है.
अनधिकृत लेनदेन में ग्राहक सुरक्षा
RBI के नियमों के तहत अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन की जानकारी समय पर देने पर ग्राहक की जिम्मेदारी शून्य या सीमित हो सकती है. छोटे मूल्य के फर्जी इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन के मामलों में पात्र ग्राहकों को तय शर्तों के तहत 25,000 रुपये तक मुआवजा भी मिल सकता है.
RBI ने डिजिटल भुगतान से जुड़े जोखिमों को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए BE(A)WARE अभियान भी चलाया है. इसके अलावा, केंद्रीय बैंक अनधिकृत लेनदेन की स्थिति में साझा जिम्मेदारी की व्यवस्था पर भी विचार कर रहा है, जिसमें पैसा भेजने और प्राप्त करने वाले बैंक की जिम्मेदारी तय की जा सकती है.
ऑनलाइन इंस्ट्रूमेंट्स ने मई 2026 में सेबी के पास अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया था. सेबी ने 18 अगस्त को कंपनी को अपने ऑब्जर्वेशन दिए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बेंगलुरु स्थित ऑडियो-विजुअल सिस्टम इंटीग्रेशन सॉल्यूशंस कंपनी ऑनलाइन इंस्ट्रूमेंट्स (इंडिया) को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) से IPO के लिए ड्राफ्ट ऑफर डॉक्यूमेंट्स पर ऑब्जर्वेशन मिल गया है. इसके साथ ही कंपनी के लिए शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने और पूंजी जुटाने का रास्ता साफ हो गया है. वहीं, मुंबई स्थित हैंडक्राफ्टेड गोल्ड ज्वैलरी सप्लायर सनिल गोल्ड इंडिया ने अपने IPO के ड्राफ्ट पेपर वापस ले लिए हैं.
750 करोड़ रुपये का फ्रेश इश्यू
ऑनलाइन इंस्ट्रूमेंट्स ने मई 2026 में सेबी के पास अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल किया था. सेबी ने 18 अगस्त को कंपनी को अपने ऑब्जर्वेशन दिए. कंपनी IPO के जरिए 750 करोड़ रुपये तक का फ्रेश इश्यू लाने की योजना बना रही है. इसके अलावा प्रमोटर्स अनिता महेश बेल्लाड और राजेश्वरी शिवानंद महाशेट्ट 57.1 लाख तक शेयरों की बिक्री ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए करेंगे. कंपनी IPO से पहले 150 करोड़ रुपये तक की राशि प्री-IPO प्लेसमेंट के जरिए भी जुटा सकती है. यह प्लेसमेंट पूरा होने पर फ्रेश इश्यू का आकार उसी अनुपात में घट जाएगा.
कर्ज चुकाने और कारोबार बढ़ाने में होगा इस्तेमाल
ऑनलाइन इंस्ट्रूमेंट्स फ्रेश इश्यू से मिली रकम का इस्तेमाल कर्ज चुकाने, वर्किंग कैपिटल की जरूरतें पूरी करने और अज्ञात कंपनियों के अधिग्रहण के जरिए इनऑर्गेनिक ग्रोथ के लिए करेगी. कुछ राशि सामान्य कॉरपोरेट जरूरतों के लिए भी इस्तेमाल की जाएगी. इस IPO के लिए Equirus Capital और Motilal Oswal Investment Advisors मर्चेंट बैंकर हैं.
सनिल गोल्ड इंडिया ने वापस लिए IPO पेपर
इस बीच, सनिल गोल्ड इंडिया ने अपने IPO के ड्राफ्ट पेपर वापस ले लिए हैं. कंपनी ने 14 अगस्त को कागजात वापस लिए. मुंबई स्थित इस कंपनी ने मार्च 2026 में सेबी के पास IPO के ड्राफ्ट पेपर दाखिल किए थे. इस इश्यू के लिए Unistone Capital एकमात्र मर्चेंट बैंकर था. प्रस्तावित IPO में 2 करोड़ इक्विटी शेयरों का फ्रेश इश्यू और प्रमोटर्स अनिल मोहनलाल जैन तथा उनकी बहन श्रेनिक मोहनलाल जैन की ओर से 65 लाख शेयरों का OFS शामिल था.
सेबी की मंजूरी का क्या मतलब?
सेबी की ओर से ड्राफ्ट ऑफर डॉक्यूमेंट्स पर ऑब्जर्वेशन मिलने के बाद कंपनियां IPO प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती हैं. हालांकि, इसके लिए रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के पास दाखिल करने समेत बाकी नियामकीय और प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं.
सरकार ने कहा- चीनी की कीमतों में तेजी की वजह कम घरेलू उत्पादन, त्योहारी मांग, वैश्विक आपूर्ति में कमी और जमाखोरी; एथनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन घटकर 9% हुआ.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने चीनी की हालिया बढ़ती कीमतों के लिए चीनी को एथनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किए जाने को जिम्मेदार ठहराने वाली दलीलों को खारिज कर दिया है. सरकार के मुताबिक, कीमतों में वृद्धि के पीछे घरेलू उत्पादन में कमी, त्योहारी सीजन से पहले बढ़ी मांग, वैश्विक स्तर पर सीमित आपूर्ति और कुछ कारोबारियों द्वारा जमाखोरी जैसे कारण हैं.
उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों पर नियंत्रण के लिए कई कदम उठाए गए हैं. इनमें कारोबारियों पर स्टॉक लिमिट लगाना और कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देना शामिल है. मंत्रालय ने कहा, "चीनी की कीमतों में हालिया वृद्धि को एथनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन से जोड़ना सही नहीं है."
एथनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन घटा
सरकार के अनुसार, एथनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 में करीब 12% थी, जो 2025-26 सीजन में घटकर लगभग 9% रह गई है. सरकार ने बताया कि भारत में एथनॉल उत्पादन का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का, से आता है.
त्योहारी सीजन से पहले चीनी के दाम बढ़े
20 अगस्त को खुदरा चीनी की कीमत बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई, जो एक महीने पहले 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम थी. मंत्रालय ने कीमतों में इस बढ़ोतरी के लिए अनुमान से कम घरेलू उत्पादन, त्योहारी सीजन से पहले बढ़ी मांग, मौसम और फसल रोगों से हुआ नुकसान, वैश्विक आपूर्ति में कमी तथा कुछ उद्योग प्रतिभागियों द्वारा सट्टेबाजी और जमाखोरी को जिम्मेदार बताया.
सरकार ने 30 नवंबर तक देशभर में चीनी कारोबारियों के लिए 400 टन की स्टॉक लिमिट लागू की है. वहीं, 1 सितंबर से थोक उपभोक्ताओं को अपनी खपत के 15 दिनों से अधिक का चीनी स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी.
केंद्र ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को भी मंजूरी दी है. इसके अलावा, चीनी मिलों के पास मौजूद स्टॉक की भौतिक जांच के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों की संयुक्त टीमें गठित की गई हैं, ताकि जमाखोरी और कृत्रिम कमी की संभावना का पता लगाया जा सके.
चीनी उत्पादन अनुमान से कम
मंत्रालय के अनुसार, मौजूदा सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान घटकर करीब 30.6 मिलियन टन रह गया है. इससे पहले गन्ना उत्पादक राज्यों ने करीब 34.3 मिलियन टन उत्पादन का अनुमान जताया था.
उत्पादन में कमी के लिए गन्ने की फसल में रेड रॉट और टॉप बोरर रोग तथा अत्यधिक बारिश के कारण जलभराव को जिम्मेदार बताया गया है. हालांकि, सरकार का कहना है कि कम उत्पादन के बावजूद घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त चीनी स्टॉक उपलब्ध है और अक्टूबर में अगला पेराई सीजन शुरू होने तक आपूर्ति में कोई बड़ी समस्या नहीं होगी.
सरकार ने राज्य सरकारों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी है. इससे त्योहारी सीजन के दौरान बाजार में आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है. सरकार के मुताबिक, अक्टूबर में चीनी उत्पादन 10 लाख टन से अधिक रह सकता है, जबकि आमतौर पर इस महीने उत्पादन करीब 3-4 लाख टन रहता है.
वैश्विक बाजार में भी दबाव
घरेलू कीमतों में तेजी ऐसे समय आई है जब वैश्विक चीनी बाजार में भी आपूर्ति की स्थिति तंग है. सरकार ने 2026-27 में वैश्विक चीनी बाजार में करीब 3.3 मिलियन टन की कमी का अनुमान लगाया है. अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमतें 30 जून के 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को 552 डॉलर प्रति टन हो गईं. यानी इस दौरान कीमतों में 16% से अधिक की वृद्धि हुई है. मंत्रालय के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में इस तेजी ने घरेलू बाजार पर भी दबाव बढ़ाया है.
सरकार ने एथनॉल नीति का किया बचाव
सरकार ने एथनॉल कार्यक्रम का बचाव करते हुए कहा कि इसने चीनी उद्योग में संरचनात्मक अधिशेष को संभालने, मिलों की वित्तीय स्थिति सुधारने और गन्ना किसानों को भुगतान में मदद की है. भारत में सामान्य तौर पर हर साल 32-34 मिलियन टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 28-29 मिलियन टन है. अतिरिक्त उत्पादन से चीनी का बड़ा स्टॉक जमा हो सकता है, जिससे मिलों की कार्यशील पूंजी फंसती है और किसानों को भुगतान में देरी हो सकती है.
मंत्रालय ने कहा कि 20 अगस्त तक 2025-26 सीजन के गन्ना बकाये का 97% भुगतान किया जा चुका है. सरकार के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में चीनी उद्योग की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ है और सरकारी सहायता पर उसकी निर्भरता कम हुई है. 2014 से 2021 के बीच इस क्षेत्र को करीब 14,600 करोड़ रुपये की सब्सिडी मिली थी, जबकि 2021-22 के बाद ऐसी कोई नई सब्सिडी घोषित नहीं की गई है.
सरकार ने कहा कि हालिया कदमों का उद्देश्य घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्धता बनाए रखना और त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने के बीच कीमतों पर आगे का दबाव सीमित करना है.
इस बार PM मोदी ने सिर्फ जलवायु की बात नहीं की, बल्कि सौर, परमाणु ऊर्जा, तेल, ग्रिड और मैन्युफैक्चरिंग के जरिए भारत को वैश्विक ऊर्जा दबाव से निकालने का 770 अरब डॉलर का रोडमैप पेश किया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
शुरुआत आंकड़ों से करते हैं, क्योंकि कहानी इन्हीं आंकड़ों में छिपी है.
सरकार के वित्तीय सेवा विभाग के अनुसार, 2030 तक 500 GW रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता हासिल करने की लागत 33 लाख करोड़ रुपये होगी. इसके बाद TERI ने मई में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया कि 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता के प्रधानमंत्री के लक्ष्य को हासिल करने के लिए 23-25 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी. राष्ट्रीय बिजली योजना ने 2032 तक केवल ट्रांसमिशन के लिए 9.15 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा है. कैबिनेट ने समुद्र मंथन के लिए 84,084 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, जो ऑफशोर तेल और गैस मिशन है. इन चार आंकड़ों को जोड़ें तो करीब 68 लाख करोड़ रुपये यानी लगभग 770 अरब डॉलर की रकम सामने आती है.
यह पूरी केंद्रीय बजट राशि से चार गुना से भी ज्यादा है और इसका इस्तेमाल केवल कागज पर नहीं हो सकता. इससे फोर्जिंग, ट्रांसफॉर्मर, टावर, पैनल, सेल, ड्रिलिंग रिग और कंटेनमेंट वेसल खरीदे जाएंगे. इन चीजों का निर्माण किसी को करना होगा और इनमें से लगभग सभी कंपनियां नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध हैं.
15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने इस खर्च की पूरी रूपरेखा रखी. बाजार पर इसका लगभग कोई असर नहीं हुआ.
बड़ा दांव
पांच सत्र बाद, 20 अगस्त को बाजार ने इस घोषणा पर कैसी प्रतिक्रिया दी, इसे देखिए. जुनिपर ग्रीन 7.5 प्रतिशत चढ़ा. प्राज इंडस्ट्रीज में 5 प्रतिशत की तेजी आई. देश की सबसे बड़ी निजी रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी अडानी ग्रीन में आधा प्रतिशत की बढ़त हुई. टाटा पावर 1 प्रतिशत गिर गया. दूसरे रिन्यूएबल एनर्जी शेयर भी नीचे रहे.
यह किसी बड़े एसेट-एलोकेशन बदलाव के हिसाब से बाजार के दोबारा मूल्यांकन जैसा नहीं है. भारत की दलाल स्ट्रीट इस बदलाव को समझ नहीं पा रही है. जिस बाजार ने इस घोषणा को समझा होता, वह केवल किसी एक छोटे शेयर को खरीदकर बड़ी कंपनियों को नहीं बेचता. वह पूरी सप्लाई चेन का एक साथ दोबारा मूल्यांकन करता, जैसा टेलीकॉम लाइसेंस, PLI योजनाओं या 1991 के बजट के बाद हुआ था. क्योंकि सरकार ने अभी संकेत दिया है कि अगले दो दशकों में वह किन कंपनियों और क्षेत्रों पर खर्च करने वाली है.
बाजार के इस बदलाव को न समझ पाने की एक वजह यह भी है कि प्रधानमंत्री के भाषण को गलत नजरिए से देखा गया. टिप्पणीकारों ने इसे ग्रीन एनर्जी पर केंद्रित भाषण बताया और फिर सवाल किया कि इसमें 84,084 करोड़ रुपये के उस कार्यक्रम की घोषणा क्यों की गई, जिसका इस्तेमाल तेल की खोज के लिए समुद्र में ड्रिलिंग करने में होगा. मोदी ने कहा था कि अतीत की ‘गलत सोच’ के कारण देश की तटरेखा का 99 प्रतिशत हिस्सा ‘नो-गो एरिया’ बना दिया गया था.
लेकिन अगर भाषण को केवल जलवायु नीति के बजाय ऊर्जा सुरक्षा के नजरिए से देखा जाए, तो तस्वीर साफ हो जाती है. मोदी ने शुरुआत में चेतावनी दी थी कि संसाधनों को हथियार बनाया जा रहा है, ‘पेट्रोल, डीजल, उर्वरक, दवाएं, तकनीक, चिप्स’ और शिपिंग लेन भी दबाव बनाने का जरिया बन गई हैं. भारत सिर्फ ग्रीन एनर्जी वाला देश बनने की कोशिश नहीं कर रहा है. वह ऐसा देश बनना चाहता है जिस पर ऊर्जा के लिए कोई दबाव न बना सके. सौर ऊर्जा एक हथियार है. परमाणु ऊर्जा एक हथियार है. घरेलू कच्चा तेल एक हथियार है. महत्वपूर्ण खनिज, बैटरी, ट्रांसमिशन और हाइड्रोजन भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं, जिनका प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उल्लेख किया.
इस रणनीति की जरूरत के पीछे एक बड़ी कीमत भी है. अमेरिका-ईरान तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट और ब्रेंट क्रूड की कीमत 89 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने के बीच भारत ने अप्रैल से जुलाई के दौरान कच्चे तेल पर 63.4 अरब डॉलर खर्च किए. एक साल पहले इसी अवधि में यह खर्च 40.5 अरब डॉलर था. यानी लगभग समान मात्रा में तेल के लिए खर्च 56.5 प्रतिशत बढ़ गया. सिर्फ तेल की कीमत बढ़ने से 23 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च हुए, जबकि घरेलू उत्पादन वास्तव में घट गया. यही ऊर्जा निर्भरता की कीमत है और यही 68 लाख करोड़ रुपये की योजना को सिर्फ एक महत्वाकांक्षा के बजाय राजनीतिक जरूरत बनाती है, जिसके लिए 2029 की समयसीमा भी सामने है.
भारत सिर्फ ग्रीन बनने की कोशिश नहीं कर रहा है. वह ऊर्जा के मामले में किसी बाहरी दबाव के आगे मजबूर नहीं होना चाहता. और इस बदलाव में अडानी समूह का दांव सबसे बड़ा कॉरपोरेट दांव हो सकता है.
यहीं से कहानी का वह हिस्सा सामने आता है, जो सबके सामने होते हुए भी नजरअंदाज हो रहा है.
सबके सामने मौजूद बड़ा दांव
दिलचस्प सवाल यह नहीं है कि रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा देने से किन शेयरों को फायदा होगा. सवाल ज्यादा सीमित और असहज करने वाला है: भारत को जिस व्यवस्था की जरूरत है, उसे बनाने का काम पहले से किसने शुरू कर दिया है?
एक नाम बार-बार सामने आता है. वजह यह नहीं है कि अडानी समूह देश की सबसे बड़ी सोलर कंपनी है. वजह यह है कि वह इस पूरी व्यवस्था के लगभग हर हिस्से में मौजूद है.
अडानी ग्रीन ने FY26 में 5.05 GW की ग्रीनफील्ड क्षमता जोड़ी, जो उस साल दुनिया की किसी भी कंपनी द्वारा एक साल में जोड़ी गई सबसे बड़ी क्षमता थी. कंपनी की ऑपरेशनल क्षमता 20 GW को पार कर चुकी है और उसका लक्ष्य 2030 तक 50 GW तक पहुंचना है. लेकिन दिल्ली की समस्या सिर्फ 500 GW बिजली पैदा करना नहीं है. असली चुनौती कच्छ के रेगिस्तानी इलाकों से 500 GW बिजली को औद्योगिक केंद्रों तक पहुंचाना है. यहीं अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस और उसका निजी ट्रांसमिशन नेटवर्क महत्वपूर्ण हो जाता है.
अडानी पावर उस डिस्पैचेबल क्षमता की आपूर्ति करता है, जिस पर ग्रिड अभी भी निर्भर है, जबकि रिन्यूएबल एनर्जी का विस्तार हो रहा है. वहीं अडानी एंटरप्राइजेज इस पूरी व्यवस्था के पीछे औद्योगिक आधार तैयार कर रहा है, मॉड्यूल, विंड उपकरण और इलेक्ट्रोलाइजर.
इसके बाद आता है समय का संयोग, जो किसी उपन्यास की कहानी जैसा लगता है. 11 अगस्त को भाषण से चार दिन पहले अमेरिका के एक जज ने गौतम अडानी के खिलाफ अमेरिकी न्याय विभाग का रिश्वतखोरी मामला खारिज कर दिया और इस मामले में विभाग के अपने तरीके की भी आलोचना की. पिछले सोमवार को 18 महीने से चला आ रहा कानूनी दबाव खत्म हुआ. शुक्रवार को देश के इतिहास में सबसे बड़े ऊर्जा विस्तार की रूपरेखा सामने आई. इसके बावजूद शेयर करीब 1,300 रुपये पर कारोबार कर रहा है, जबकि उसका 52-सप्ताह का उच्च स्तर 2,091 रुपये है.
इनमें से कोई भी बात इसे सुरक्षित निवेश नहीं बनाती और यह स्पष्ट करना जरूरी है कि क्यों. इतना बड़ा कर्ज रखने वाला, प्रमोटर की हिस्सेदारी में इतना केंद्रित और सरकार की घोषित प्राथमिकताओं से इतनी निकटता रखने वाला समूह एक खास तरह का जोखिम भी लेकर चलता है. नीतिगत नजदीकी तब तक फायदा है, जब तक निवेशक उसी वजह से कंपनी पर छूट देना शुरू न कर दें. अडानी ग्रीन अपने पुराने उच्च स्तर से काफी नीचे है और इसके कारण सिर्फ कानूनी नहीं रहे हैं.
11 से 15 अगस्त के बीच की घटनाएं कोई निवेश सलाह नहीं हैं. लेकिन यह ऐसा सेटअप जरूर है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है.
रिलायंस का दांव
अडानी समूह इस बदलाव का एकमात्र रास्ता नहीं है. इस कहानी का शायद सबसे दिलचस्प हिस्सा किसी और कंपनी से जुड़ा है. भारत की सबसे बड़ी ऑयल रिफाइनरी कंपनी रिलायंस अपने ही मौजूदा कारोबार को भविष्य में कम जरूरी बनाने के लिए 75,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है.
रिलायंस जामनगर में HJT मॉड्यूल बना रही है, 40 GWh की बैटरी गीगाफैक्ट्री तैयार कर रही है और 2032 तक हर साल 30 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन बनाने का लक्ष्य रखती है. यह उसी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का दूसरा हिस्सा है.
NTPC और NTPC Green के पास ऐसी बैलेंस शीट है जिसका मुकाबला करना मुश्किल है. टाटा पावर और JSW Energy भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. घरेलू कंटेंट नियमों से सुरक्षित उपकरण क्षेत्र में Waaree, Premier Energies, Suzlon, Borosil और Inox Wind जैसी कंपनियां मौजूद हैं.
अडानी के अलावा ट्रांसमिशन क्षेत्र में Power Grid, Hitachi Energy India और Siemens Energy India प्रमुख नाम हैं. IREDA, PFC और REC वह वित्तीय आधार हैं, जिसके जरिए इस 68 लाख करोड़ रुपये के निवेश को आगे बढ़ना है. प्राज इंडस्ट्रीज का एथेनॉल और ओलेक्ट्रा का इलेक्ट्रिक बस कारोबार ऊर्जा आयात को कम करने वाले दांव हैं. हर लीटर पेट्रोल या डीजल की जगह घरेलू विकल्प का इस्तेमाल होने का मतलब है कि उतना डॉलर खाड़ी देशों को नहीं भेजना पड़ेगा.
यहां तक कि Websol Energy Systems जैसी मिड-कैप कंपनी भी मार्च 2027 तक अपनी 600 MW Mono-PERC लाइन को TOPCon में बदलने के लिए 270 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. इसके अलावा कंपनी ने 4 GW की ग्रीनफील्ड योजना भी बनाई है. इससे पता चलता है कि कैपेक्स का चक्र सप्लाई चेन के निचले स्तर पर भी शुरू हो चुका है, भले ही शेयर बाजार कुछ और संकेत दे रहा हो.
परमाणु ऊर्जा का बड़ा बदलाव
इस पूरी कहानी में सबसे नई जानकारी परमाणु ऊर्जा से जुड़ी है और यही इस समय बाजार का सबसे कम चर्चा वाला क्षेत्र है. सौर ऊर्जा को लेकर बाजार पहले से उत्साहित है. अडानी ग्रीन की कहानी भी जानी-पहचानी है. रिलायंस के ऊर्जा बदलाव को भी निवेशकों के मॉडल में शामिल किया जा चुका है.
लेकिन SHANTI Act के नियम भाषण से कुछ दिन पहले ही अधिसूचित किए गए हैं. इसके साथ ही सिविल न्यूक्लियर पावर के क्षेत्र में सरकारी एकाधिकार खत्म हो गया है. Elara Securities ने इसे एक बड़ा बदलाव बताया है.
भारत अब निजी परमाणु ऊर्जा सप्लाई चेन को खड़ा करने की तैयारी में है. इसके लिए किसी को रिएक्टर के उपकरण बनाने होंगे, कंटेनमेंट स्ट्रक्चर तैयार करना होगा और EPC का काम संभालना होगा. L&T, BHEL, MTAR Technologies, Walchandnagar और Power Mech ऐसी कंपनियां हैं, जो इस नई सप्लाई चेन के लिए जरूरी उपकरण और सेवाएं उपलब्ध करा सकती हैं. यह ऐसा बाजार है जो अभी पूरी तरह बना भी नहीं है और इसलिए कई कंपनियों के मौजूदा अनुमानों में इसका असर शामिल नहीं है.
Elara की संभावित रिएक्टर ऑपरेटरों की सूची में NTPC, Tata Power और सबसे बड़ी कंपनी के रूप में Adani Power भी शामिल है.
इस पूरे दांव के गलत साबित होने का सबसे आसान रास्ता यह है कि होर्मुज संकट खत्म हो जाए, ब्रेंट क्रूड 65 डॉलर से नीचे आ जाए और सस्ता तेल इस पूरी रणनीति की आर्थिक जरूरत को कमजोर कर दे. शेयरों के मूल्यांकन पहले ही ऊंचे हैं, कर्ज वास्तविक है, परमाणु ऊर्जा से नकदी प्रवाह आने में एक दशक लग सकता है और SHANTI Act को लेकर भी कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि निवेशक इस कहानी से बहुत आगे निकल रहे हैं. पूंजीगत खर्च की योजनाओं में देरी होती है और भारतीय योजनाओं में यह देरी कई बार ज्यादा होती है.
लेकिन अगले पांच साल में भारत का सबसे बड़ा निवेश कार्यक्रम दलाल स्ट्रीट पर तय नहीं होगा. इसका फैसला दिल्ली में होगा. 15 अगस्त को दिल्ली ने बता दिया कि वह किन चीजों पर खर्च करना चाहती है. इसमें लाखों करोड़ रुपये का निवेश शामिल है और रिएक्टर, ग्रिड, फैक्ट्रियां और सोलर प्लांट उन कंपनियों को ही बनाने होंगे, जिनके शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं.
20 अगस्त को बाजार पर इसका बहुत कम असर दिखा.
यह इस दांव का अंत नहीं है. हो सकता है, यह गलत कीमत लगाए गए इस बड़े दांव की शुरुआत हो.
(बाजार विश्लेषण, निवेश सलाह नहीं. कीमतें 20 अगस्त, 2026 तक की हैं.)
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
2026 में अब तक भारत से जुटाए गए कुल 17 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज में 12 अरब डॉलर की हिस्सेदारी भारतीय बैंकों की है. RBI की विशेष स्वैप सुविधा और विदेशी निवेशकों के मजबूत भरोसे से बैंकिंग सेक्टर को बड़ा फायदा मिला है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय बैंकों ने 2026 में अब तक विदेशी बाजारों से करीब 12 अरब डॉलर जुटाए हैं. देश से जुटाए गए कुल 17 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज में बैंकों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. इस रिकॉर्ड फंड जुटाने के पीछे भारतीय बैंकों की मजबूत साख के साथ रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की विशेष स्वैप सुविधा भी बड़ी वजह मानी जा रही है.
विदेशी बाजार से जुटाई गई इस पूंजी से बैंकों की विदेशी मुद्रा लिक्विडिटी मजबूत होगी. इससे उन्हें कारोबारियों और ग्राहकों को कर्ज देने तथा अन्य वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी. खास बात यह है कि 5 जून को RBI की विशेष स्वैप सुविधा की घोषणा के बाद बैंकों ने करीब 10 अरब डॉलर जुटाए हैं.
विदेशी बाजार में भारतीय बैंकों की मजबूत पकड़
2026 में अब तक भारत से कुल 17 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज जुटाया गया है. इसमें अकेले भारतीय बैंकों की हिस्सेदारी 12 अरब डॉलर है, जबकि बाकी रकम अन्य कंपनियों ने जुटाई है. अगर फंड जुटाने की मौजूदा रफ्तार जारी रहती है, तो इस साल का आंकड़ा 2021 के 22 अरब डॉलर के रिकॉर्ड को पार कर सकता है. 2025 में भारत से विदेशी बाजारों के जरिए महज 5 अरब डॉलर जुटाए गए थे.
हाल के दिनों में विदेशी बाजार में भारतीय बैंकों की गतिविधियां और तेज हुई हैं. ICICI बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, IDFC फर्स्ट बैंक, HDFC बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा ने मिलकर हालिया सप्ताह में 4.4 अरब डॉलर जुटाए हैं.
RBI की स्वैप सुविधा बनी बड़ी वजह
विदेशी बाजार से फंड जुटाने में RBI की वन-टाइम स्वैप सुविधा ने अहम भूमिका निभाई है. FCNR-B जमा के लिए 31 अगस्त की समयसीमा तय की गई है. इस तारीख तक बुक किए गए डिपॉजिट पर स्वैप सपोर्ट का लाभ मिलेगा.
RBI ने 5 जून को इस विशेष सुविधा का ऐलान किया था. इसके बाद बैंकों ने तेजी से विदेशी फंड जुटाना शुरू किया. 2026 में बैंकों द्वारा जुटाए गए कुल 12 अरब डॉलर में से करीब 10 अरब डॉलर की रकम 5 जून के बाद जुटाई गई है.
HDFC बैंक ने बनाया रिकॉर्ड
विदेशी बाजार से फंड जुटाने में HDFC बैंक सबसे आगे रहा है. बैंक ने गुरुवार को 1.75 अरब डॉलर जुटाए, जो किसी भारतीय बैंक द्वारा अब तक का सबसे बड़ा इश्यू है. इससे पहले जून में भी HDFC बैंक ने 75 करोड़ डॉलर जुटाए थे.
HDFC बैंक के ट्रेजरी हेड अरूप रक्षित के मुताबिक, जुटाई गई पूंजी का इस्तेमाल ग्राहकों को बेहतर वित्तीय सुविधाएं देने के साथ विदेशों में मौजूद ग्राहकों की फंडिंग जरूरतों को पूरा करने में किया जाएगा. उनके अनुसार, इतनी बड़ी रकम जुटाना भारतीय बैंकिंग सिस्टम और बैंक की क्रेडिट क्वालिटी पर निवेशकों के भरोसे को दिखाता है. इसी क्रम में IDFC फर्स्ट बैंक ने 10 करोड़ डॉलर और बैंक ऑफ बड़ौदा ने अपने पुराने इश्यू में 40 करोड़ डॉलर की बढ़ोतरी की है.
निवेशकों ने जमकर लगाया पैसा
विदेशी बाजार में भारतीय बैंकों के बॉन्ड की मांग काफी मजबूत रही है. आमतौर पर एक साथ बड़ी मात्रा में बॉन्ड जारी होने पर कर्ज की लागत बढ़ सकती है, लेकिन भारतीय बैंकों के मामले में ऐसा नहीं हुआ.
HSBC इंडिया के विनोद वेंकटेश के मुताबिक, भारी सप्लाई के बावजूद स्प्रेड साल की शुरुआत की तुलना में केवल 5 बेसिस पॉइंट बढ़ा है. वहीं, MUFG के गौरव भगत के अनुसार, अमेरिकी ट्रेजरी में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशकों की दिलचस्पी मजबूत बनी हुई है. भारतीय बैंकों के बॉन्ड इश्यू औसतन 2.89 गुना अधिक सब्सक्राइब हुए हैं.
साल के अंत तक और फंड आने की उम्मीद
जानकारों का मानना है कि विदेशी बाजार से फंड जुटाने का सिलसिला अभी जारी रह सकता है. साल के अंत तक 5 से 7.5 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी जुटाए जाने की उम्मीद है. हालांकि, 31 अगस्त को स्वैप विंडो बंद होने के बाद बैंकों की ओर से विदेशी बॉन्ड की सप्लाई कुछ कम हो सकती है. कम अवधि के लिए फंड जुटाने वाले बैंक बाद में रिफाइनेंसिंग के लिए बाजार में लौट सकते हैं. इसके अलावा 1.5% की एक अन्य स्वैप विंडो दिसंबर तक खुली है. कॉरपोरेट कंपनियों और NBFC की ओर से भी विदेशी बाजार में बॉन्ड जारी किए जाने का सिलसिला जारी रहने की उम्मीद है.