चीनी के दाम में उछाल के पीछे कौन? सरकार ने एथनॉल पर उठे सवालों को किया खारिज

सरकार ने कहा- चीनी की कीमतों में तेजी की वजह कम घरेलू उत्पादन, त्योहारी मांग, वैश्विक आपूर्ति में कमी और जमाखोरी; एथनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन घटकर 9% हुआ.

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Saturday, 22 August, 2026
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केंद्र सरकार ने चीनी की हालिया बढ़ती कीमतों के लिए चीनी को एथनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किए जाने को जिम्मेदार ठहराने वाली दलीलों को खारिज कर दिया है. सरकार के मुताबिक, कीमतों में वृद्धि के पीछे घरेलू उत्पादन में कमी, त्योहारी सीजन से पहले बढ़ी मांग, वैश्विक स्तर पर सीमित आपूर्ति और कुछ कारोबारियों द्वारा जमाखोरी जैसे कारण हैं.

उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों पर नियंत्रण के लिए कई कदम उठाए गए हैं. इनमें कारोबारियों पर स्टॉक लिमिट लगाना और कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देना शामिल है. मंत्रालय ने कहा, "चीनी की कीमतों में हालिया वृद्धि को एथनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन से जोड़ना सही नहीं है."

एथनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन घटा

सरकार के अनुसार, एथनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 में करीब 12% थी, जो 2025-26 सीजन में घटकर लगभग 9% रह गई है. सरकार ने बताया कि भारत में एथनॉल उत्पादन का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का, से आता है.

त्योहारी सीजन से पहले चीनी के दाम बढ़े

20 अगस्त को खुदरा चीनी की कीमत बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई, जो एक महीने पहले 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम थी. मंत्रालय ने कीमतों में इस बढ़ोतरी के लिए अनुमान से कम घरेलू उत्पादन, त्योहारी सीजन से पहले बढ़ी मांग, मौसम और फसल रोगों से हुआ नुकसान, वैश्विक आपूर्ति में कमी तथा कुछ उद्योग प्रतिभागियों द्वारा सट्टेबाजी और जमाखोरी को जिम्मेदार बताया.

सरकार ने 30 नवंबर तक देशभर में चीनी कारोबारियों के लिए 400 टन की स्टॉक लिमिट लागू की है. वहीं, 1 सितंबर से थोक उपभोक्ताओं को अपनी खपत के 15 दिनों से अधिक का चीनी स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी.

केंद्र ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को भी मंजूरी दी है. इसके अलावा, चीनी मिलों के पास मौजूद स्टॉक की भौतिक जांच के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों की संयुक्त टीमें गठित की गई हैं, ताकि जमाखोरी और कृत्रिम कमी की संभावना का पता लगाया जा सके.

चीनी उत्पादन अनुमान से कम

मंत्रालय के अनुसार, मौजूदा सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान घटकर करीब 30.6 मिलियन टन रह गया है. इससे पहले गन्ना उत्पादक राज्यों ने करीब 34.3 मिलियन टन उत्पादन का अनुमान जताया था.

उत्पादन में कमी के लिए गन्ने की फसल में रेड रॉट और टॉप बोरर रोग तथा अत्यधिक बारिश के कारण जलभराव को जिम्मेदार बताया गया है. हालांकि, सरकार का कहना है कि कम उत्पादन के बावजूद घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त चीनी स्टॉक उपलब्ध है और अक्टूबर में अगला पेराई सीजन शुरू होने तक आपूर्ति में कोई बड़ी समस्या नहीं होगी.

सरकार ने राज्य सरकारों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी है. इससे त्योहारी सीजन के दौरान बाजार में आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है. सरकार के मुताबिक, अक्टूबर में चीनी उत्पादन 10 लाख टन से अधिक रह सकता है, जबकि आमतौर पर इस महीने उत्पादन करीब 3-4 लाख टन रहता है.

वैश्विक बाजार में भी दबाव

घरेलू कीमतों में तेजी ऐसे समय आई है जब वैश्विक चीनी बाजार में भी आपूर्ति की स्थिति तंग है. सरकार ने 2026-27 में वैश्विक चीनी बाजार में करीब 3.3 मिलियन टन की कमी का अनुमान लगाया है. अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमतें 30 जून के 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को 552 डॉलर प्रति टन हो गईं. यानी इस दौरान कीमतों में 16% से अधिक की वृद्धि हुई है. मंत्रालय के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में इस तेजी ने घरेलू बाजार पर भी दबाव बढ़ाया है.

सरकार ने एथनॉल नीति का किया बचाव

सरकार ने एथनॉल कार्यक्रम का बचाव करते हुए कहा कि इसने चीनी उद्योग में संरचनात्मक अधिशेष को संभालने, मिलों की वित्तीय स्थिति सुधारने और गन्ना किसानों को भुगतान में मदद की है. भारत में सामान्य तौर पर हर साल 32-34 मिलियन टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 28-29 मिलियन टन है. अतिरिक्त उत्पादन से चीनी का बड़ा स्टॉक जमा हो सकता है, जिससे मिलों की कार्यशील पूंजी फंसती है और किसानों को भुगतान में देरी हो सकती है.

मंत्रालय ने कहा कि 20 अगस्त तक 2025-26 सीजन के गन्ना बकाये का 97% भुगतान किया जा चुका है. सरकार के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में चीनी उद्योग की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ है और सरकारी सहायता पर उसकी निर्भरता कम हुई है. 2014 से 2021 के बीच इस क्षेत्र को करीब 14,600 करोड़ रुपये की सब्सिडी मिली थी, जबकि 2021-22 के बाद ऐसी कोई नई सब्सिडी घोषित नहीं की गई है.

सरकार ने कहा कि हालिया कदमों का उद्देश्य घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्धता बनाए रखना और त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने के बीच कीमतों पर आगे का दबाव सीमित करना है.


68 लाख करोड़ रुपये का एनर्जी प्लान: मोदी के ऐलान में छिपा दलाल स्ट्रीट का सबसे बड़ा दांव

इस बार PM मोदी ने सिर्फ जलवायु की बात नहीं की, बल्कि सौर, परमाणु ऊर्जा, तेल, ग्रिड और मैन्युफैक्चरिंग के जरिए भारत को वैश्विक ऊर्जा दबाव से निकालने का 770 अरब डॉलर का रोडमैप पेश किया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 22 August, 2026
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पलक शाह

शुरुआत आंकड़ों से करते हैं, क्योंकि कहानी इन्हीं आंकड़ों में छिपी है.

सरकार के वित्तीय सेवा विभाग के अनुसार, 2030 तक 500 GW रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता हासिल करने की लागत 33 लाख करोड़ रुपये होगी. इसके बाद TERI ने मई में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया कि 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता के प्रधानमंत्री के लक्ष्य को हासिल करने के लिए 23-25 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी. राष्ट्रीय बिजली योजना ने 2032 तक केवल ट्रांसमिशन के लिए 9.15 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा है. कैबिनेट ने समुद्र मंथन के लिए 84,084 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, जो ऑफशोर तेल और गैस मिशन है. इन चार आंकड़ों को जोड़ें तो करीब 68 लाख करोड़ रुपये यानी लगभग 770 अरब डॉलर की रकम सामने आती है.

यह पूरी केंद्रीय बजट राशि से चार गुना से भी ज्यादा है और इसका इस्तेमाल केवल कागज पर नहीं हो सकता. इससे फोर्जिंग, ट्रांसफॉर्मर, टावर, पैनल, सेल, ड्रिलिंग रिग और कंटेनमेंट वेसल खरीदे जाएंगे. इन चीजों का निर्माण किसी को करना होगा और इनमें से लगभग सभी कंपनियां नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध हैं.

15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने इस खर्च की पूरी रूपरेखा रखी. बाजार पर इसका लगभग कोई असर नहीं हुआ.

बड़ा दांव

पांच सत्र बाद, 20 अगस्त को बाजार ने इस घोषणा पर कैसी प्रतिक्रिया दी, इसे देखिए. जुनिपर ग्रीन 7.5 प्रतिशत चढ़ा. प्राज इंडस्ट्रीज में 5 प्रतिशत की तेजी आई. देश की सबसे बड़ी निजी रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी अडानी ग्रीन में आधा प्रतिशत की बढ़त हुई. टाटा पावर 1 प्रतिशत गिर गया. दूसरे रिन्यूएबल एनर्जी शेयर भी नीचे रहे.

यह किसी बड़े एसेट-एलोकेशन बदलाव के हिसाब से बाजार के दोबारा मूल्यांकन जैसा नहीं है. भारत की दलाल स्ट्रीट इस बदलाव को समझ नहीं पा रही है. जिस बाजार ने इस घोषणा को समझा होता, वह केवल किसी एक छोटे शेयर को खरीदकर बड़ी कंपनियों को नहीं बेचता. वह पूरी सप्लाई चेन का एक साथ दोबारा मूल्यांकन करता, जैसा टेलीकॉम लाइसेंस, PLI योजनाओं या 1991 के बजट के बाद हुआ था. क्योंकि सरकार ने अभी संकेत दिया है कि अगले दो दशकों में वह किन कंपनियों और क्षेत्रों पर खर्च करने वाली है.

बाजार के इस बदलाव को न समझ पाने की एक वजह यह भी है कि प्रधानमंत्री के भाषण को गलत नजरिए से देखा गया. टिप्पणीकारों ने इसे ग्रीन एनर्जी पर केंद्रित भाषण बताया और फिर सवाल किया कि इसमें 84,084 करोड़ रुपये के उस कार्यक्रम की घोषणा क्यों की गई, जिसका इस्तेमाल तेल की खोज के लिए समुद्र में ड्रिलिंग करने में होगा. मोदी ने कहा था कि अतीत की ‘गलत सोच’ के कारण देश की तटरेखा का 99 प्रतिशत हिस्सा ‘नो-गो एरिया’ बना दिया गया था.

लेकिन अगर भाषण को केवल जलवायु नीति के बजाय ऊर्जा सुरक्षा के नजरिए से देखा जाए, तो तस्वीर साफ हो जाती है. मोदी ने शुरुआत में चेतावनी दी थी कि संसाधनों को हथियार बनाया जा रहा है, ‘पेट्रोल, डीजल, उर्वरक, दवाएं, तकनीक, चिप्स’ और शिपिंग लेन भी दबाव बनाने का जरिया बन गई हैं. भारत सिर्फ ग्रीन एनर्जी वाला देश बनने की कोशिश नहीं कर रहा है. वह ऐसा देश बनना चाहता है जिस पर ऊर्जा के लिए कोई दबाव न बना सके. सौर ऊर्जा एक हथियार है. परमाणु ऊर्जा एक हथियार है. घरेलू कच्चा तेल एक हथियार है. महत्वपूर्ण खनिज, बैटरी, ट्रांसमिशन और हाइड्रोजन भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं, जिनका प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उल्लेख किया.

इस रणनीति की जरूरत के पीछे एक बड़ी कीमत भी है. अमेरिका-ईरान तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में संकट और ब्रेंट क्रूड की कीमत 89 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने के बीच भारत ने अप्रैल से जुलाई के दौरान कच्चे तेल पर 63.4 अरब डॉलर खर्च किए. एक साल पहले इसी अवधि में यह खर्च 40.5 अरब डॉलर था. यानी लगभग समान मात्रा में तेल के लिए खर्च 56.5 प्रतिशत बढ़ गया. सिर्फ तेल की कीमत बढ़ने से 23 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च हुए, जबकि घरेलू उत्पादन वास्तव में घट गया. यही ऊर्जा निर्भरता की कीमत है और यही 68 लाख करोड़ रुपये की योजना को सिर्फ एक महत्वाकांक्षा के बजाय राजनीतिक जरूरत बनाती है, जिसके लिए 2029 की समयसीमा भी सामने है.

भारत सिर्फ ग्रीन बनने की कोशिश नहीं कर रहा है. वह ऊर्जा के मामले में किसी बाहरी दबाव के आगे मजबूर नहीं होना चाहता. और इस बदलाव में अडानी समूह का दांव सबसे बड़ा कॉरपोरेट दांव हो सकता है.

यहीं से कहानी का वह हिस्सा सामने आता है, जो सबके सामने होते हुए भी नजरअंदाज हो रहा है.

सबके सामने मौजूद बड़ा दांव

दिलचस्प सवाल यह नहीं है कि रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा देने से किन शेयरों को फायदा होगा. सवाल ज्यादा सीमित और असहज करने वाला है: भारत को जिस व्यवस्था की जरूरत है, उसे बनाने का काम पहले से किसने शुरू कर दिया है?

एक नाम बार-बार सामने आता है. वजह यह नहीं है कि अडानी समूह देश की सबसे बड़ी सोलर कंपनी है. वजह यह है कि वह इस पूरी व्यवस्था के लगभग हर हिस्से में मौजूद है.

अडानी ग्रीन ने FY26 में 5.05 GW की ग्रीनफील्ड क्षमता जोड़ी, जो उस साल दुनिया की किसी भी कंपनी द्वारा एक साल में जोड़ी गई सबसे बड़ी क्षमता थी. कंपनी की ऑपरेशनल क्षमता 20 GW को पार कर चुकी है और उसका लक्ष्य 2030 तक 50 GW तक पहुंचना है. लेकिन दिल्ली की समस्या सिर्फ 500 GW बिजली पैदा करना नहीं है. असली चुनौती कच्छ के रेगिस्तानी इलाकों से 500 GW बिजली को औद्योगिक केंद्रों तक पहुंचाना है. यहीं अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस और उसका निजी ट्रांसमिशन नेटवर्क महत्वपूर्ण हो जाता है.

अडानी पावर उस डिस्पैचेबल क्षमता की आपूर्ति करता है, जिस पर ग्रिड अभी भी निर्भर है, जबकि रिन्यूएबल एनर्जी का विस्तार हो रहा है. वहीं अडानी एंटरप्राइजेज इस पूरी व्यवस्था के पीछे औद्योगिक आधार तैयार कर रहा है, मॉड्यूल, विंड उपकरण और इलेक्ट्रोलाइजर.

इसके बाद आता है समय का संयोग, जो किसी उपन्यास की कहानी जैसा लगता है. 11 अगस्त को भाषण से चार दिन पहले अमेरिका के एक जज ने गौतम अडानी के खिलाफ अमेरिकी न्याय विभाग का रिश्वतखोरी मामला खारिज कर दिया और इस मामले में विभाग के अपने तरीके की भी आलोचना की. पिछले सोमवार को 18 महीने से चला आ रहा कानूनी दबाव खत्म हुआ. शुक्रवार को देश के इतिहास में सबसे बड़े ऊर्जा विस्तार की रूपरेखा सामने आई. इसके बावजूद शेयर करीब 1,300 रुपये पर कारोबार कर रहा है, जबकि उसका 52-सप्ताह का उच्च स्तर 2,091 रुपये है.

इनमें से कोई भी बात इसे सुरक्षित निवेश नहीं बनाती और यह स्पष्ट करना जरूरी है कि क्यों. इतना बड़ा कर्ज रखने वाला, प्रमोटर की हिस्सेदारी में इतना केंद्रित और सरकार की घोषित प्राथमिकताओं से इतनी निकटता रखने वाला समूह एक खास तरह का जोखिम भी लेकर चलता है. नीतिगत नजदीकी तब तक फायदा है, जब तक निवेशक उसी वजह से कंपनी पर छूट देना शुरू न कर दें. अडानी ग्रीन अपने पुराने उच्च स्तर से काफी नीचे है और इसके कारण सिर्फ कानूनी नहीं रहे हैं.

11 से 15 अगस्त के बीच की घटनाएं कोई निवेश सलाह नहीं हैं. लेकिन यह ऐसा सेटअप जरूर है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है.

रिलायंस का दांव

अडानी समूह इस बदलाव का एकमात्र रास्ता नहीं है. इस कहानी का शायद सबसे दिलचस्प हिस्सा किसी और कंपनी से जुड़ा है. भारत की सबसे बड़ी ऑयल रिफाइनरी कंपनी रिलायंस अपने ही मौजूदा कारोबार को भविष्य में कम जरूरी बनाने के लिए 75,000 करोड़ रुपये खर्च कर रही है.

रिलायंस जामनगर में HJT मॉड्यूल बना रही है, 40 GWh की बैटरी गीगाफैक्ट्री तैयार कर रही है और 2032 तक हर साल 30 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन बनाने का लक्ष्य रखती है. यह उसी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का दूसरा हिस्सा है.

NTPC और NTPC Green के पास ऐसी बैलेंस शीट है जिसका मुकाबला करना मुश्किल है. टाटा पावर और JSW Energy भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. घरेलू कंटेंट नियमों से सुरक्षित उपकरण क्षेत्र में Waaree, Premier Energies, Suzlon, Borosil और Inox Wind जैसी कंपनियां मौजूद हैं.

अडानी के अलावा ट्रांसमिशन क्षेत्र में Power Grid, Hitachi Energy India और Siemens Energy India प्रमुख नाम हैं. IREDA, PFC और REC वह वित्तीय आधार हैं, जिसके जरिए इस 68 लाख करोड़ रुपये के निवेश को आगे बढ़ना है. प्राज इंडस्ट्रीज का एथेनॉल और ओलेक्ट्रा का इलेक्ट्रिक बस कारोबार ऊर्जा आयात को कम करने वाले दांव हैं. हर लीटर पेट्रोल या डीजल की जगह घरेलू विकल्प का इस्तेमाल होने का मतलब है कि उतना डॉलर खाड़ी देशों को नहीं भेजना पड़ेगा.

यहां तक कि Websol Energy Systems जैसी मिड-कैप कंपनी भी मार्च 2027 तक अपनी 600 MW Mono-PERC लाइन को TOPCon में बदलने के लिए 270 करोड़ रुपये खर्च कर रही है. इसके अलावा कंपनी ने 4 GW की ग्रीनफील्ड योजना भी बनाई है. इससे पता चलता है कि कैपेक्स का चक्र सप्लाई चेन के निचले स्तर पर भी शुरू हो चुका है, भले ही शेयर बाजार कुछ और संकेत दे रहा हो.

परमाणु ऊर्जा का बड़ा बदलाव

इस पूरी कहानी में सबसे नई जानकारी परमाणु ऊर्जा से जुड़ी है और यही इस समय बाजार का सबसे कम चर्चा वाला क्षेत्र है. सौर ऊर्जा को लेकर बाजार पहले से उत्साहित है. अडानी ग्रीन की कहानी भी जानी-पहचानी है. रिलायंस के ऊर्जा बदलाव को भी निवेशकों के मॉडल में शामिल किया जा चुका है.

लेकिन SHANTI Act के नियम भाषण से कुछ दिन पहले ही अधिसूचित किए गए हैं. इसके साथ ही सिविल न्यूक्लियर पावर के क्षेत्र में सरकारी एकाधिकार खत्म हो गया है. Elara Securities ने इसे एक बड़ा बदलाव बताया है.

भारत अब निजी परमाणु ऊर्जा सप्लाई चेन को खड़ा करने की तैयारी में है. इसके लिए किसी को रिएक्टर के उपकरण बनाने होंगे, कंटेनमेंट स्ट्रक्चर तैयार करना होगा और EPC का काम संभालना होगा. L&T, BHEL, MTAR Technologies, Walchandnagar और Power Mech ऐसी कंपनियां हैं, जो इस नई सप्लाई चेन के लिए जरूरी उपकरण और सेवाएं उपलब्ध करा सकती हैं. यह ऐसा बाजार है जो अभी पूरी तरह बना भी नहीं है और इसलिए कई कंपनियों के मौजूदा अनुमानों में इसका असर शामिल नहीं है.

Elara की संभावित रिएक्टर ऑपरेटरों की सूची में NTPC, Tata Power और सबसे बड़ी कंपनी के रूप में Adani Power भी शामिल है.

इस पूरे दांव के गलत साबित होने का सबसे आसान रास्ता यह है कि होर्मुज संकट खत्म हो जाए, ब्रेंट क्रूड 65 डॉलर से नीचे आ जाए और सस्ता तेल इस पूरी रणनीति की आर्थिक जरूरत को कमजोर कर दे. शेयरों के मूल्यांकन पहले ही ऊंचे हैं, कर्ज वास्तविक है, परमाणु ऊर्जा से नकदी प्रवाह आने में एक दशक लग सकता है और SHANTI Act को लेकर भी कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि निवेशक इस कहानी से बहुत आगे निकल रहे हैं. पूंजीगत खर्च की योजनाओं में देरी होती है और भारतीय योजनाओं में यह देरी कई बार ज्यादा होती है.

लेकिन अगले पांच साल में भारत का सबसे बड़ा निवेश कार्यक्रम दलाल स्ट्रीट पर तय नहीं होगा. इसका फैसला दिल्ली में होगा. 15 अगस्त को दिल्ली ने बता दिया कि वह किन चीजों पर खर्च करना चाहती है. इसमें लाखों करोड़ रुपये का निवेश शामिल है और रिएक्टर, ग्रिड, फैक्ट्रियां और सोलर प्लांट उन कंपनियों को ही बनाने होंगे, जिनके शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं.

20 अगस्त को बाजार पर इसका बहुत कम असर दिखा.

यह इस दांव का अंत नहीं है. हो सकता है, यह गलत कीमत लगाए गए इस बड़े दांव की शुरुआत हो.

(बाजार विश्लेषण, निवेश सलाह नहीं. कीमतें 20 अगस्त, 2026 तक की हैं.)

 

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


RBI की स्वैप सुविधा का असर, भारतीय बैंकों ने विदेशी बाजार से जुटाए 12 अरब डॉलर

2026 में अब तक भारत से जुटाए गए कुल 17 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज में 12 अरब डॉलर की हिस्सेदारी भारतीय बैंकों की है. RBI की विशेष स्वैप सुविधा और विदेशी निवेशकों के मजबूत भरोसे से बैंकिंग सेक्टर को बड़ा फायदा मिला है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 22 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 22 August, 2026
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भारतीय बैंकों ने 2026 में अब तक विदेशी बाजारों से करीब 12 अरब डॉलर जुटाए हैं. देश से जुटाए गए कुल 17 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज में बैंकों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. इस रिकॉर्ड फंड जुटाने के पीछे भारतीय बैंकों की मजबूत साख के साथ रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की विशेष स्वैप सुविधा भी बड़ी वजह मानी जा रही है.

विदेशी बाजार से जुटाई गई इस पूंजी से बैंकों की विदेशी मुद्रा लिक्विडिटी मजबूत होगी. इससे उन्हें कारोबारियों और ग्राहकों को कर्ज देने तथा अन्य वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी. खास बात यह है कि 5 जून को RBI की विशेष स्वैप सुविधा की घोषणा के बाद बैंकों ने करीब 10 अरब डॉलर जुटाए हैं.

विदेशी बाजार में भारतीय बैंकों की मजबूत पकड़

2026 में अब तक भारत से कुल 17 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज जुटाया गया है. इसमें अकेले भारतीय बैंकों की हिस्सेदारी 12 अरब डॉलर है, जबकि बाकी रकम अन्य कंपनियों ने जुटाई है. अगर फंड जुटाने की मौजूदा रफ्तार जारी रहती है, तो इस साल का आंकड़ा 2021 के 22 अरब डॉलर के रिकॉर्ड को पार कर सकता है. 2025 में भारत से विदेशी बाजारों के जरिए महज 5 अरब डॉलर जुटाए गए थे.

हाल के दिनों में विदेशी बाजार में भारतीय बैंकों की गतिविधियां और तेज हुई हैं. ICICI बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, IDFC फर्स्ट बैंक, HDFC बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा ने मिलकर हालिया सप्ताह में 4.4 अरब डॉलर जुटाए हैं.

RBI की स्वैप सुविधा बनी बड़ी वजह

विदेशी बाजार से फंड जुटाने में RBI की वन-टाइम स्वैप सुविधा ने अहम भूमिका निभाई है. FCNR-B जमा के लिए 31 अगस्त की समयसीमा तय की गई है. इस तारीख तक बुक किए गए डिपॉजिट पर स्वैप सपोर्ट का लाभ मिलेगा.

RBI ने 5 जून को इस विशेष सुविधा का ऐलान किया था. इसके बाद बैंकों ने तेजी से विदेशी फंड जुटाना शुरू किया. 2026 में बैंकों द्वारा जुटाए गए कुल 12 अरब डॉलर में से करीब 10 अरब डॉलर की रकम 5 जून के बाद जुटाई गई है.

HDFC बैंक ने बनाया रिकॉर्ड

विदेशी बाजार से फंड जुटाने में HDFC बैंक सबसे आगे रहा है. बैंक ने गुरुवार को 1.75 अरब डॉलर जुटाए, जो किसी भारतीय बैंक द्वारा अब तक का सबसे बड़ा इश्यू है. इससे पहले जून में भी HDFC बैंक ने 75 करोड़ डॉलर जुटाए थे.

HDFC बैंक के ट्रेजरी हेड अरूप रक्षित के मुताबिक, जुटाई गई पूंजी का इस्तेमाल ग्राहकों को बेहतर वित्तीय सुविधाएं देने के साथ विदेशों में मौजूद ग्राहकों की फंडिंग जरूरतों को पूरा करने में किया जाएगा. उनके अनुसार, इतनी बड़ी रकम जुटाना भारतीय बैंकिंग सिस्टम और बैंक की क्रेडिट क्वालिटी पर निवेशकों के भरोसे को दिखाता है. इसी क्रम में IDFC फर्स्ट बैंक ने 10 करोड़ डॉलर और बैंक ऑफ बड़ौदा ने अपने पुराने इश्यू में 40 करोड़ डॉलर की बढ़ोतरी की है.

निवेशकों ने जमकर लगाया पैसा

विदेशी बाजार में भारतीय बैंकों के बॉन्ड की मांग काफी मजबूत रही है. आमतौर पर एक साथ बड़ी मात्रा में बॉन्ड जारी होने पर कर्ज की लागत बढ़ सकती है, लेकिन भारतीय बैंकों के मामले में ऐसा नहीं हुआ.

HSBC इंडिया के विनोद वेंकटेश के मुताबिक, भारी सप्लाई के बावजूद स्प्रेड साल की शुरुआत की तुलना में केवल 5 बेसिस पॉइंट बढ़ा है. वहीं, MUFG के गौरव भगत के अनुसार, अमेरिकी ट्रेजरी में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशकों की दिलचस्पी मजबूत बनी हुई है. भारतीय बैंकों के बॉन्ड इश्यू औसतन 2.89 गुना अधिक सब्सक्राइब हुए हैं.

साल के अंत तक और फंड आने की उम्मीद

जानकारों का मानना है कि विदेशी बाजार से फंड जुटाने का सिलसिला अभी जारी रह सकता है. साल के अंत तक 5 से 7.5 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी जुटाए जाने की उम्मीद है. हालांकि, 31 अगस्त को स्वैप विंडो बंद होने के बाद बैंकों की ओर से विदेशी बॉन्ड की सप्लाई कुछ कम हो सकती है. कम अवधि के लिए फंड जुटाने वाले बैंक बाद में रिफाइनेंसिंग के लिए बाजार में लौट सकते हैं. इसके अलावा 1.5% की एक अन्य स्वैप विंडो दिसंबर तक खुली है. कॉरपोरेट कंपनियों और NBFC की ओर से भी विदेशी बाजार में बॉन्ड जारी किए जाने का सिलसिला जारी रहने की उम्मीद है.
 


मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को नई रफ्तार, 62,500 करोड़ रुपये की स्कीम लॉन्च; चिप निर्माण पर भी जोर

62,500 करोड़ रुपये की नई योजना के तहत कंपनियों को उत्पादन पर 5% तक प्रोत्साहन मिलेगा. सरकार का लक्ष्य भारत को मोबाइल फोन और उसके कंपोनेंट्स के लिए मजबूत मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित करना है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 22 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 22 August, 2026
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केंद्र सरकार ने देश में मोबाइल फोन निर्माण को नई रफ्तार देने के लिए मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम-2 लॉन्च कर दी है. केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शुक्रवार को इस योजना की औपचारिक शुरुआत की. सरकार का लक्ष्य देश में मोबाइल फोन उत्पादन को दोगुना करने के साथ-साथ कंपोनेंट्स और सेमीकंडक्टर से जुड़े मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूत करना है.

करीब 62,500 करोड़ रुपये की इस योजना के तहत कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए 5% तक प्रोत्साहन दिए जाने की बात कही गई है. सरकार का फोकस केवल मोबाइल फोन की असेंबलिंग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डिजाइन, कंपोनेंट्स और अन्य महत्वपूर्ण पुर्जों के घरेलू निर्माण को भी बढ़ावा दिया जाएगा.

मेमोरी चिप के घरेलू उत्पादन पर जोर

अश्विनी वैष्णव ने कहा कि वैश्विक स्तर पर मेमोरी चिप की कीमतों में बढ़ोतरी का असर मोबाइल फोन की कीमतों पर भी पड़ रहा है. इसे देखते हुए सरकार अब मेमोरी चिप के घरेलू उत्पादन पर विशेष ध्यान दे रही है और इसके लिए देश में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स स्थापित करने की दिशा में काम किया जाएगा.

घरेलू स्तर पर चिप निर्माण बढ़ने से भारत की आयात पर निर्भरता कम हो सकती है. साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है.

एक मोबाइल फोन में करीब 1,000 पार्ट्स

वैष्णव के अनुसार, एक मोबाइल फोन में करीब 1,000 अलग-अलग पार्ट्स और कंपोनेंट्स होते हैं. भारत में इन कंपोनेंट्स का इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है और इसमें बड़ी संख्या में MSME कंपनियां भी शामिल हैं.

उन्होंने कहा कि अब तक देश में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का मुख्य फोकस उत्पादन बढ़ाने पर रहा है, लेकिन सरकार की अगली रणनीति भारत में डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग, दोनों क्षमताओं को मजबूत करने की है.

कंपनियों को आकर्षित करने के लिए मजबूत इकोसिस्टम

आईटी मंत्री ने कहा कि भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार हो चुका है, जो वैश्विक कंपनियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन रहा है. सरकार का मानना है कि नई स्कीम से मोबाइल निर्माण के साथ-साथ सप्लाई चेन और कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग को भी बढ़ावा मिलेगा.

मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम-2 के जरिए सरकार भारत को केवल मोबाइल फोन असेंबलिंग हब के बजाय डिजाइन, कंपोनेंट्स और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण के बड़े वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.
 


RBI की डिप्टी गवर्नर का बड़ा अनुमान, FY27 में 7% के करीब पहुंच सकती है भारत की GDP ग्रोथ

अप्रैल-जून तिमाही में मजबूत प्रदर्शन से पूरे वित्त वर्ष की ग्रोथ RBI के 6.7% के आधिकारिक अनुमान से अधिक रह सकती है.

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Friday, 21 August, 2026
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भारत की आर्थिक वृद्धि वित्त वर्ष 2026-27 में 7 प्रतिशत के करीब पहुंच सकती है और यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मौजूदा 6.7 प्रतिशत के आधिकारिक अनुमान को भी पार कर सकती है. RBI की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने गुरुवार को यह आकलन जताया. उनका अनुमान अप्रैल-जून तिमाही में अर्थव्यवस्था के मजबूत प्रदर्शन की उम्मीद पर आधारित है. इस तिमाही के आधिकारिक GDP आंकड़े इस महीने के अंत में जारी होने हैं.

पहली तिमाही में मजबूत ग्रोथ की उम्मीद

रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल-जून तिमाही के लिए अर्थशास्त्रियों के अनुमान 6.9 प्रतिशत से 8 प्रतिशत के बीच हैं। पूनम गुप्ता ने कहा कि अगर पहली तिमाही का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहता है, तो पूरे वित्त वर्ष की आर्थिक वृद्धि 7 प्रतिशत के करीब पहुंच सकती है.

बाहरी चुनौतियों के बावजूद अर्थव्यवस्था मजबूत

पूनम गुप्ता का यह आकलन ऐसे समय आया है जब भारतीय अर्थव्यवस्था को कई बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. इनमें कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिका की ओर से लगाए गए टैरिफ, व्यापार से जुड़ी अनिश्चितता और कमजोर मानसून की आशंका शामिल हैं. इसके बावजूद उन्होंने घरेलू आर्थिक गतिविधियों की मजबूती को रेखांकित किया. RBI ने अगस्त में हुई मौद्रिक नीति समिति की बैठक में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए GDP वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया था. केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा था. RBI ने ऊंची तेल कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव से जुड़े जोखिमों को भी चिह्नित किया है.

लंबे समय में 7.5% या उससे अधिक की संभावना

पूनम गुप्ता ने कहा कि लंबी अवधि में भारत की आर्थिक वृद्धि और मजबूत रह सकती है. अर्थव्यवस्था के लिए सालाना करीब 7.5 प्रतिशत या उससे अधिक की वृद्धि दर का लक्ष्य संभव हो सकता है. उनके बयान से घरेलू मांग की मजबूती और वैश्विक झटकों को झेलने की भारतीय अर्थव्यवस्था की क्षमता को लेकर भरोसा दिखाई देता है.

बाहरी क्षेत्र और कर्ज की स्थिति पर भी नजर

गुप्ता ने भारत की बेहतर होती बाहरी स्थिति का भी उल्लेख किया. यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाएं ऊंचे कर्ज और आर्थिक अनिश्चितता का सामना कर रही हैं. अगर भारत की ग्रोथ का रुझान मजबूत बना रहता है, तो देश दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति बनाए रख सकता है.

हालांकि, पूनम गुप्ता की टिप्पणी RBI के आधिकारिक वृद्धि अनुमान में बदलाव नहीं है. फिलहाल वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.7 प्रतिशत की ग्रोथ का अनुमान ही केंद्रीय बैंक का आधिकारिक पूर्वानुमान है. गुप्ता का आकलन इस संभावना को दर्शाता है कि वास्तविक वृद्धि इस अनुमान से बेहतर रह सकती है.
 

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जापान के साथ रक्षा सह-विकास पर पीएम मोदी का जोर, जापानी कंपनियों और स्टार्टअप्स को दिया साझेदारी का न्योता

रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी से मुलाकात में भारत-जापान रक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा, ‘मेक इन इंडिया’ के तहत सह-विकास और सह-उत्पादन के अवसरों पर जोर

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Friday, 21 August, 2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत और जापान के बीच रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया है, जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने 20 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की. इस दौरान दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय रक्षा और सुरक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की. प्रधानमंत्री मोदी ने जुलाई 2026 में भारत की यात्रा पर आई जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची के साथ 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान हुई अपनी बातचीत को याद किया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग लगातार गति पकड़ रहा है.

हिंद-प्रशांत में शांति और स्थिरता पर जोर

मोदी ने भारत और जापान के बीच विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी को और मजबूत करने की अपनी दृष्टि साझा की। उन्होंने कहा कि रक्षा और सुरक्षा सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उससे आगे शांति, स्थिरता तथा समृद्धि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

जापानी कंपनियों को सह-विकास का न्योता

बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने रक्षा क्षेत्र में भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी के लिए जापानी कंपनियों और स्टार्टअप्स के सामने मौजूद अवसरों को रेखांकित किया। उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत रक्षा उपकरणों और तकनीकों के सह-विकास तथा सह-उत्पादन में सहयोग की संभावनाओं पर विशेष जोर दिया.

रक्षा सहयोग की प्रगति से अवगत कराया

जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने प्रधानमंत्री मोदी को दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग में हुई प्रगति की जानकारी दी। उन्होंने भारत के साथ रक्षा संबंधों को और गहरा करने के लिए जापान की निरंतर प्रतिबद्धता दोहराई.

भारत और जापान के बीच यह बैठक ऐसे समय हुई है जब दोनों देश रक्षा औद्योगिक सहयोग का विस्तार करने और उभरती तकनीकों, विनिर्माण तथा संयुक्त विकास के क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी का भी अहम हिस्सा है.
 


रुपये में निर्यात भुगतान पर अब मिलेगा FTP प्रोत्साहन, सरकार ने बदले नियम

DGFT ने FTP 2023 में किया बदलाव, रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में अहम कदम

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Friday, 21 August, 2026
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भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ावा देने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. अब रुपये में निर्यात भुगतान हासिल करने वाले भारतीय निर्यातकों को भी विदेश व्यापार नीति (FTP) के तहत मिलने वाले प्रोत्साहनों का लाभ मिल सकेगा. विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने बुधवार को FTP 2023 में तत्काल प्रभाव से बदलाव कर इस व्यवस्था को भारतीय रिजर्व बैंक के मौजूदा विदेशी मुद्रा नियमों के अनुरूप कर दिया है.

 रुपये में व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिश

नए नियमों के तहत एशियन क्लियरिंग यूनियन (ACU) की क्षेत्रीय भुगतान व्यवस्था से बाहर के देशों के साथ कारोबार करने वाले निर्यातक अपने निर्यात अनुबंध और बिल भारतीय रुपये या विदेशी मुद्रा, किसी भी मुद्रा में बना सकेंगे. भुगतान भी इन दोनों में से किसी एक मुद्रा में प्राप्त किया जा सकेगा.

इस बदलाव से रुपये में होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा मिलने और निर्यातकों के लिए भुगतान के विकल्प बढ़ने की उम्मीद है. सरकार लंबे समय से वैश्विक व्यापार में रुपये के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रही है.

अमेरिका के दबाव के बीच आया फैसला

सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ब्रिक्स देशों की ओर से डॉलर के विकल्प को बढ़ावा देने वाली किसी भी कोशिश के खिलाफ चेतावनी दे चुके हैं. ट्रंप ने ब्रिक्स की साझा मुद्रा या डॉलर को चुनौती देने वाली किसी पहल का समर्थन करने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी भी दी है. हालांकि, भारत ने ब्रिक्स की साझा मुद्रा बनाने के विचार को स्पष्ट रूप से खारिज किया है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि भारत ऐसी किसी योजना का समर्थन नहीं करता.

जुलाई 2022 में शुरू हुई थी प्रक्रिया

भारत का कहना है कि रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण किसी मौजूदा विदेशी मुद्रा व्यवस्था को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार में रुपये के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए है. नए नियम उसी दिशा में उठाया गया कदम हैं. ईरान के साथ रुपये में होने वाले व्यापार के लिए पहले से लागू सुरक्षा नियमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है. सरकार के ताजा संशोधन से जुलाई 2022 में शुरू हुई नियामकीय प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है.

कुल मिलाकर, सरकार का यह कदम भारतीय रुपये में सीमा पार कारोबार को आसान बनाने और निर्यातकों को मुद्रा के विकल्पों के साथ-साथ FTP प्रोत्साहनों का लाभ देने की दिशा में अहम माना जा रहा है.
 


सर्विस सेक्टर ने संभाली रफ्तार, मैन्युफैक्चरिंग 5 साल के निचले स्तर पर

अगस्त में सेवा क्षेत्र की गतिविधियों में सुधार से निजी क्षेत्र को मिला सहारा, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार लगातार कमजोर पड़ी

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Friday, 21 August, 2026
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भारत की अर्थव्यवस्था में अगस्त के दौरान निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में मामूली सुधार देखने को मिला है. हालांकि, इस सुधार का मुख्य आधार सेवा क्षेत्र रहा, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ पांच साल के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गई. शुक्रवार को जारी HSBC के फ्लैश PMI सर्वे के अनुसार, सर्विसेज PMI बढ़कर 54.5 हो गया, जबकि मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 52.9 पर आ गया.

S&P Global द्वारा तैयार HSBC Flash India Composite PMI अगस्त में 54.6 रहा, जो जुलाई में 54.3 था. हालांकि सूचकांक लगातार 61वें महीने 50 के स्तर से ऊपर बना हुआ है, लेकिन अगस्त का आंकड़ा मार्च 2022 के बाद दूसरा सबसे कमजोर स्तर है. PMI का 50 से ऊपर रहना कारोबारी गतिविधियों में विस्तार और 50 से नीचे रहना गिरावट का संकेत देता है.

सर्विसेज में सुधार, मैन्युफैक्चरिंग पर बढ़ा दबाव

अगस्त में सेवा क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में जुलाई के मुकाबले सुधार हुआ. HSBC Flash India Services PMI Business Activity Index जुलाई के 53.3 से बढ़कर 54.5 पर पहुंच गया. इससे निजी क्षेत्र की कुल गतिविधियों को सहारा मिला. इसके उलट मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सुस्ती और गहरी हो गई. HSBC Flash India Manufacturing PMI जुलाई के 53.5 से घटकर अगस्त में 52.9 रह गया. उत्पादन और नए ऑर्डर की वृद्धि पांच साल में सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गई.

नए ऑर्डर बढ़े, लेकिन ग्रोथ की रफ्तार रही धीमी

सर्वे के अनुसार, अगस्त में नए ऑर्डर में बढ़ोतरी जारी रही, लेकिन इसकी गति हाल के वर्षों की तुलना में कमजोर रही. सेवा क्षेत्र में मांग में सुधार ने कारोबारी गतिविधियों को गति दी, जबकि मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए उत्पादन और नए ऑर्डर की रफ्तार धीमी पड़ती दिखाई दी.

HSBC की भारत की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजल भंडारी ने कहा कि निजी क्षेत्र के कुल उत्पादन में वृद्धि मोटे तौर पर स्थिर रही और इसे सेवा क्षेत्र की बेहतर गतिविधियों का समर्थन मिला. वहीं, मैन्युफैक्चरिंग में उत्पादन और नए ऑर्डर की वृद्धि की रफ्तार कमजोर हुई है.

रोजगार में सुधार, सेवा क्षेत्र में बढ़ी भर्तियां

सेवा क्षेत्र में बढ़ती मांग का असर रोजगार पर भी दिखाई दिया. कंपनियों ने कामकाज का दबाव संभालने के लिए नए कर्मचारियों की भर्ती बढ़ाई. सर्वे के मुताबिक, कुल रोजगार सृजन में सुधार मुख्य रूप से सर्विस सेक्टर के कारण हुआ. वहीं, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कर्मचारियों की संख्या में करीब ढाई साल बाद पहली बार गिरावट दर्ज की गई, जो उद्योग क्षेत्र में बढ़ती सुस्ती का संकेत है.

लागत का दबाव कम, ग्राहकों पर बढ़ा बोझ

अगस्त में कंपनियों की इनपुट लागत में बढ़ोतरी की रफ्तार सात महीने के सबसे निचले स्तर पर रही. इसके बावजूद कंपनियों ने बिक्री कीमतों में अपेक्षाकृत तेज वृद्धि की. इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां लागत का बड़ा हिस्सा ग्राहकों पर डालने की कोशिश कर रही हैं. मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के पास तैयार माल का स्टॉक ऊंचा बना रहा, जबकि कच्चे माल की खरीद की रफ्तार धीमी हुई.

कुल मिलाकर, अगस्त के PMI आंकड़े भारतीय निजी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में दो अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं. एक ओर सेवा क्षेत्र में सुधार से कारोबारी गतिविधियों को सहारा मिला, वहीं दूसरी ओर मैन्युफैक्चरिंग की कमजोर होती रफ्तार आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ के लिए चिंता का विषय बन सकती है.
 


वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे: छोटे विचारों से बड़े बदलाव तक, भारत की ग्रोथ स्टोरी लिख रहे ये उद्यमी

हर साल 21 अगस्त को मनाया जाने वाला वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे उन लोगों के योगदान को रेखांकित करता है, जो चुनौतियों में अवसर तलाशते हैं और नए विचारों को कारोबार में बदलने का जोखिम उठाते हैं.

रितु राणा by
Published - Friday, 21 August, 2026
Last Modified:
Friday, 21 August, 2026
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भारत में उद्यमिता की तस्वीर तेजी से बदल रही है. आज उद्यमी सिर्फ अपना कारोबार खड़ा करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रोजगार पैदा करने, स्थानीय कारीगरों और समुदायों को आर्थिक अवसर देने, टिकाऊ उत्पादों को बढ़ावा देने और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे के मौके पर भूपेंद्र खनाल, लवली बबीश और विश्वम मोदी जैसे उद्यमियों की कहानियां दिखाती हैं कि सही विचार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और कारोबारी मार्गदर्शन के साथ छोटे कारोबार भी बड़े बाजार तक पहुंच बना सकते हैं.

हर साल 21 अगस्त को मनाया जाने वाला वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे उन लोगों के योगदान को रेखांकित करता है, जो चुनौतियों में अवसर तलाशते हैं और नए विचारों को कारोबार में बदलने का जोखिम उठाते हैं. भारत में इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि MSME सेक्टर देश की आर्थिक गतिविधियों और रोजगार में बड़ी भूमिका निभाता है. MSME मंत्रालय के अनुसार, यह क्षेत्र भारत के GDP में करीब 31.1 प्रतिशत और निर्यात में 48.5 प्रतिशत से अधिक योगदान देता है. साथ ही, यह 33.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है और कृषि के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है.

उद्यमिता से कारोबार के साथ सामाजिक बदलाव

देश के अलग-अलग हिस्सों में उभर रहे उद्यमी अपने कारोबार के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर रहे हैं. उनके उत्पाद पारंपरिक हुनर और स्थानीय संसाधनों को नए बाजारों से जोड़ रहे हैं. वहीं, वॉलमार्ट वृद्धि जैसी पहल उन्हें बिजनेस स्किल, डिजिटल कॉमर्स, मेंटरशिप और नए बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद कर रही हैं.

ऐसे ही तीन उद्यमियों की यात्रा बताती है कि कारोबार की सफलता केवल राजस्व तक सीमित नहीं है. इसके जरिए रोजगार, स्थानीय समुदायों के लिए अवसर और टिकाऊ विकास का रास्ता भी तैयार किया जा सकता है.

हिमालय की पारंपरिक चीज को बनाया ग्लोबल पेट वेलनेस ब्रांड

Dogsee Chew के संस्थापक भूपेंद्र खनाल ने हिमालय की पारंपरिक चीज बनाने की प्रक्रिया से प्रेरणा लेकर अपने कारोबार की शुरुआत की. उनकी कंपनी ने इस पारंपरिक उत्पाद को आधुनिक पेट वेलनेस प्रोडक्ट में बदलकर ग्लोबल बाजार तक पहुंच बनाई. आज कंपनी के प्राकृतिक डॉग ट्रीट्स 30 से ज्यादा देशों में बेचे जाते हैं.

डिजिटल मार्केटप्लेस पर बढ़ती मौजूदगी ने भी कंपनी की ग्रोथ को गति दी है. पिछले एक साल में कंपनी का ग्लोबल ऑनलाइन कारोबार करीब 300 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि ऑनलाइन बिक्री करीब 80 लाख रुपये से बढ़कर 4.2 करोड़ रुपये हो गई. अमेरिका में Walmart Marketplace के जरिए कंपनी हर महीने करीब 20 लाख रुपये की बिक्री कर रही है. वहीं, Flipkart के जरिए घरेलू कारोबार में 51 प्रतिशत की राजस्व वृद्धि दर्ज की गई है.

कंपनी का लक्ष्य इस वित्त वर्ष में 250 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल करना है. इसके साथ ही कारोबार ने डेयरी समुदायों के लिए रोजगार और आय के अवसर पैदा किए हैं. अतिरिक्त चीज का इस्तेमाल कर कंपनी खाद्य अपव्यय कम करने में भी योगदान दे रही है.

पर्यावरण अनुकूल उत्पादों के जरिए महिलाओं और कारीगरों को अवसर

Beetroots Eco Living की संस्थापक लवली बबीश ने पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अपना कारोबार शुरू किया. उनका ब्रांड नारियल के खोल, बांस और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से टिकाऊ जीवनशैली से जुड़े उत्पाद तैयार करता है.

कंपनी महिला स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों के साथ मिलकर काम करती है. इससे इन समूहों को रोजगार और कमाई के अवसर मिलते हैं. वॉलमार्ट वृद्धि से जुड़ने के बाद कंपनी ने अपने कारोबार को अधिक व्यवस्थित किया और डिजिटल माध्यमों पर अपनी मौजूदगी मजबूत की.

2023 में करीब 50,000 रुपये के राजस्व से शुरुआत करने वाली कंपनी की कमाई 2025 तक 25 गुना बढ़ गई. Flipkart ने भी इस वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कंपनी की कुल बिक्री में करीब 30 प्रतिशत योगदान दिया. बांस के बाथ टॉवल, नारियल के खोल से बने बाउल और पर्यावरण अनुकूल डेकोर आइटम इसके प्रमुख उत्पादों में शामिल हैं.

छोटे फ्रेगरेंस ब्रांड को डिजिटल मार्केटप्लेस से मिली रफ्तार

Bazuki Perfumes के संस्थापक विश्वम मोदी ने भारत में अपना फ्रेगरेंस ब्रांड खड़ा करने के विचार के साथ कारोबार शुरू किया. वॉलमार्ट वृद्धि से जुड़ने के बाद उन्होंने डिजिटल बिक्री और ऑनलाइन मार्केटप्लेस की क्षमता पर ज्यादा ध्यान दिया.

मेंटर की सलाह के बाद कंपनी ने विज्ञापन पर बड़े खर्च के बजाय पहले बिक्री और कारोबार की बुनियाद मजबूत करने पर फोकस किया. इसका असर कारोबार में भी दिखाई दिया. 2023 में करीब 30 लाख रुपये का कारोबार करने वाली Bazuki Perfumes की बिक्री 2024-25 में बढ़कर 70-80 लाख रुपये तक पहुंच गई. मई 2023 के मुकाबले ऑनलाइन और ऑफलाइन चैनलों की कुल बिक्री में करीब 1000 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

कंपनी के उत्पादों की संख्या भी शुरुआती 7-9 SKU से बढ़कर करीब 60 SKU हो गई है. फिलहाल ऑनलाइन मार्केटप्लेस कंपनी की कुल बिक्री में करीब 80 प्रतिशत योगदान देते हैं, जिसमें Flipkart की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है. कार फ्रेशनर कंपनी के सबसे तेजी से बढ़ते उत्पादों में शामिल है और कुल बिक्री में इसका योगदान करीब 70 प्रतिशत है.

बदल रही है भारतीय उद्यमिता की तस्वीर

भूपेंद्र खनाल, लवली बबीश और विश्वम मोदी की कारोबारी यात्राएं अलग-अलग क्षेत्रों से आती हैं, लेकिन तीनों में एक समान सोच दिखाई देती है. इनका उद्देश्य सिर्फ कारोबार बढ़ाना नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करना, स्थानीय समुदायों को आर्थिक अवसर देना, टिकाऊ उत्पादों को बढ़ावा देना और भारतीय MSME इकोसिस्टम को मजबूत करना भी है.

वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे पर इन उद्यमियों की कहानियां भारत में बदलती उद्यमिता की तस्वीर पेश करती हैं. अब कारोबार की सफलता को सिर्फ राजस्व और मुनाफे से नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले रोजगार, सामाजिक प्रभाव और लंबे समय तक बनाए जाने वाले आर्थिक मूल्य से भी जोड़ा जा रहा है. यही बदलाव भारत की नई ग्रोथ स्टोरी को आकार दे रहा है.


जुलाई में घरेलू हवाई यातायात 4.8% घटा, IndiGo का दबदबा कायम; 67.4% रही बाजार हिस्सेदारी

1.20 करोड़ यात्रियों ने की घरेलू उड़ानों से यात्रा, Akasa Air का लोड फैक्टर सबसे ज्यादा 91.9%

Last Modified:
Friday, 21 August, 2026
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भारत के घरेलू विमानन क्षेत्र में जुलाई 2026 में यात्री यातायात में सालाना आधार पर 4.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. हालांकि, यात्रियों की संख्या घटने के बावजूद एयरलाइंस ने सीटों का बेहतर इस्तेमाल किया. नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में घरेलू एयरलाइंस ने करीब 1.20 करोड़ यात्रियों को उड़ान सेवा दी, जबकि एक साल पहले इसी महीने में यह आंकड़ा करीब 1.26 करोड़ था.

IndiGo की बाजार हिस्सेदारी 67.4%

घरेलू विमानन बाजार में IndiGo का दबदबा जुलाई में भी कायम रहा. एयरलाइन ने महीने के दौरान 80.82 लाख यात्रियों को उड़ान सेवा दी और कुल घरेलू यात्री यातायात में इसकी हिस्सेदारी 67.4 फीसदी रही. Air India और Air India Express को मिलाकर बने Air India Group ने जुलाई में 28.75 लाख यात्रियों को सफर कराया. दोनों एयरलाइंस की संयुक्त बाजार हिस्सेदारी 24 फीसदी रही. वहीं, Akasa Air ने 6.65 लाख यात्रियों के साथ 5.5 फीसदी बाजार हिस्सेदारी हासिल की.

SpiceJet की बाजार हिस्सेदारी 1.6 फीसदी रही. इसके अलावा Star Air की 0.7 फीसदी, Fly91 की 0.5 फीसदी, Alliance Air की 0.4 फीसदी और IndiaOne Air की हिस्सेदारी 0.1 फीसदी से कम रही. इस तरह IndiGo और Air India Group ने मिलकर जुलाई में घरेलू हवाई यातायात का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा अपने नाम किया.

Akasa Air का लोड फैक्टर सबसे ज्यादा

यात्रियों की संख्या में गिरावट के बावजूद एयरलाइंस ने विमानों में उपलब्ध सीटों का अच्छा इस्तेमाल किया. जुलाई में Akasa Air का पैसेंजर लोड फैक्टर सबसे अधिक 91.9 फीसदी रहा. इसके बाद SpiceJet का 84.1 फीसदी, Air India Group का 83.2 फीसदी और IndiGo का 82.4 फीसदी रहा. लोड फैक्टर से पता चलता है कि किसी एयरलाइन की उपलब्ध सीटों में से कितनी सीटों पर यात्रियों ने यात्रा की.

0.62% रही उड़ानों की कैंसिलेशन दर

DGCA के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में निर्धारित घरेलू एयरलाइंस की कुल कैंसिलेशन दर 0.62 फीसदी रही. इनमें तकनीकी कारण सबसे बड़ी वजह रहे, जिनकी हिस्सेदारी 39.9 फीसदी थी. परिचालन संबंधी कारणों से 27.4 फीसदी उड़ानें रद्द हुईं, जबकि मौसम संबंधी कारणों की हिस्सेदारी 22.7 फीसदी रही. जुलाई में एयरलाइंस को यात्रियों से कुल 2,196 शिकायतें मिलीं. यह प्रति 10,000 यात्रियों पर करीब 1.83 शिकायत के बराबर है.

समय पर उड़ान के मामले में भी IndiGo आगे

देश के 10 सबसे व्यस्त हवाई अड्डों पर प्रमुख घरेलू एयरलाइंस के बीच समय पर उड़ान भरने के मामले में IndiGo सबसे आगे रही. जुलाई में उसका ऑन-टाइम परफॉर्मेंस (OTP) 91.2 फीसदी रहा. Akasa Air 90.8 फीसदी OTP के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि Air India Group का OTP 88.5 फीसदी रहा. Alliance Air का OTP 76 फीसदी और SpiceJet का 34.6 फीसदी रहा.

हवाई अड्डों की बात करें तो चेन्नई एयरपोर्ट ने 96.7 फीसदी के साथ सबसे बेहतर ऑन-टाइम परफॉर्मेंस दर्ज किया. इसके बाद बेंगलुरु 94 फीसदी और हैदराबाद 92.4 फीसदी के साथ रहे.

उड़ानों में देरी की सबसे बड़ी वजह 'रिएक्शनरी' कारण

जुलाई में उड़ानों में देरी की सबसे बड़ी वजह रिएक्शनरी कारण रहे. कुल देरी में इनकी हिस्सेदारी 65 फीसदी रही. परिचालन संबंधी और एयर ट्रैफिक कंट्रोल से जुड़ी समस्याओं की हिस्सेदारी 7-7 फीसदी रही.

तकनीकी और मौसम संबंधी कारणों से होने वाली देरी की हिस्सेदारी 6-6 फीसदी रही. यात्रियों से जुड़े कारण 3 फीसदी, एयरपोर्ट से संबंधित कारण 2 फीसदी और रैंप से जुड़े कारण 1 फीसदी रहे. बाकी 3 फीसदी देरी अन्य कारणों से हुई.

क्षमता में संतुलित बढ़ोतरी से यातायात पर असर

जुलाई में घरेलू हवाई यातायात में गिरावट के पीछे यात्रा गतिविधियों में मौसमी नरमी और एयरलाइंस की ओर से क्षमता को नियंत्रित तरीके से बढ़ाना प्रमुख कारण रहे. हालांकि, मजबूत पैसेंजर लोड फैक्टर से संकेत मिलता है कि उपलब्ध सीटों का इस्तेमाल अभी भी बेहतर स्तर पर हुआ, भले ही कुल यात्री यातायात में सालाना आधार पर कमी दर्ज की गई.
 

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विदेशी निवेशकों के लिए सेबी का बड़ा कदम, अब बिना नोटरीकरण के डिजिटल PoA से होगा FPI ऑनबोर्डिंग

सेबी ने 20 अगस्त से डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित Power of Attorney जमा करने की दी मंजूरी, नोटरीकरण, अपोस्टिलाइजेशन और कॉन्सुलराइजेशन की जरूरत नहीं होगी.

Last Modified:
Friday, 21 August, 2026
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भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (Sebi) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए दस्तावेजी प्रक्रिया को आसान बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सेबी ने FPIs को अब डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित पावर ऑफ एटोनॉमी (PoA) दस्तावेज जमा करने की अनुमति दे दी है. नई व्यवस्था के तहत ऐसे दस्तावेजों के लिए नोटरीकरण, अपोस्टिलाइजेशन या कॉन्सुलराइजेशन की जरूरत नहीं होगी. यह व्यवस्था 20 अगस्त 2026 से लागू हो गई है और इसका उद्देश्य विदेशी निवेशकों के लिए FPI ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया को तेज और आसान बनाना है.

डिजिटल PoA के लिए क्या है नियम

नई व्यवस्था के तहत FPIs अपने कस्टोडियन के पक्ष में जारी PoA डिजिटल रूप से जमा कर सकेंगे. दस्तावेज में पता स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए और PoA पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के प्रावधानों के अनुरूप डिजिटल हस्ताक्षर किए जाने जरूरी होंगे. हालांकि, डिजिटल PoA का विकल्प मौजूदा प्रक्रिया के साथ-साथ उपलब्ध रहेगा. यानी विदेशी निवेशक पहले की तरह नोटरीकृत, अपोस्टिलाइज्ड या कॉन्सुलराइज्ड PoA दस्तावेज भी जमा कर सकेंगे.

FPI ऑनबोर्डिंग में कम होगी कागजी प्रक्रिया

सेबी के मुताबिक, डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित PoA को मंजूरी देने से नोटरीकरण, अपोस्टिलाइजेशन और कॉन्सुलराइजेशन जैसी अतिरिक्त प्रमाणिकता प्रक्रियाओं की जरूरत खत्म होगी. इससे विदेशी निवेशकों के दस्तावेज पूरे करने और भारतीय पूंजी बाजार में निवेश शुरू करने में लगने वाला समय कम होने की उम्मीद है.

इस कदम से विदेशी निवेशकों के लिए PoA तैयार करने और जमा करने की प्रक्रिया भी डिजिटल हो जाएगी. इससे भौतिक दस्तावेजों और उनके प्रमाणीकरण पर निर्भरता कम होगी.

डिजिटल ऑनबोर्डिंग को बढ़ावा दे रहा सेबी

डिजिटल PoA की अनुमति सेबी की FPI रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को डिजिटल बनाने की व्यापक पहल का हिस्सा है. नियामक पहले ही FPI रजिस्ट्रेशन के लिए कॉमन एप्लीकेशन फोरम (CAF) की शुरुआत कर चुका है. इसके अलावा PAN, बैंक अकाउंट और डीमैट अकाउंट से जुड़ी प्रक्रियाओं को भी डिजिटल माध्यम से आसान बनाया गया है.

सेबी ने CAF और अन्य रजिस्ट्रेशन दस्तावेजों पर भारतीय डिजिटल हस्ताक्षर के इस्तेमाल की अनुमति भी दी है. CAF पोर्टल के जरिए डिजिटल हस्ताक्षर की सुविधा देने के साथ-साथ स्कैन की गई प्रतियों के आधार पर FPI रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को भी आसान बनाया गया है.

मास्टर सर्कुलर में किया गया बदलाव

डिजिटल PoA से जुड़ा यह बदलाव FPIs, निर्दिष्ट डिपॉजिटरी प्रतिभागी. (DDPs) और Eligible Foreign Investors (EFIs) के लिए जारी सेबी के मास्टर सर्कुलर में संबंधित प्रावधान में संशोधन के जरिए किया गया है.

सेबी ने यह सर्कुलर Securities and Exchange Board of India Act, 1992 और Sebi (Foreign Portfolio Investors) Regulations, 2019 के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए जारी किया है. नियामक के अनुसार, इस कदम का उद्देश्य निवेशकों के हितों की रक्षा करते हुए प्रतिभूति बाजार के विकास और बेहतर नियमन को बढ़ावा देना है.