2026 में अब तक भारत से जुटाए गए कुल 17 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज में 12 अरब डॉलर की हिस्सेदारी भारतीय बैंकों की है. RBI की विशेष स्वैप सुविधा और विदेशी निवेशकों के मजबूत भरोसे से बैंकिंग सेक्टर को बड़ा फायदा मिला है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
भारतीय बैंकों ने 2026 में अब तक विदेशी बाजारों से करीब 12 अरब डॉलर जुटाए हैं. देश से जुटाए गए कुल 17 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज में बैंकों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. इस रिकॉर्ड फंड जुटाने के पीछे भारतीय बैंकों की मजबूत साख के साथ रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की विशेष स्वैप सुविधा भी बड़ी वजह मानी जा रही है.
विदेशी बाजार से जुटाई गई इस पूंजी से बैंकों की विदेशी मुद्रा लिक्विडिटी मजबूत होगी. इससे उन्हें कारोबारियों और ग्राहकों को कर्ज देने तथा अन्य वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी. खास बात यह है कि 5 जून को RBI की विशेष स्वैप सुविधा की घोषणा के बाद बैंकों ने करीब 10 अरब डॉलर जुटाए हैं.
विदेशी बाजार में भारतीय बैंकों की मजबूत पकड़
2026 में अब तक भारत से कुल 17 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज जुटाया गया है. इसमें अकेले भारतीय बैंकों की हिस्सेदारी 12 अरब डॉलर है, जबकि बाकी रकम अन्य कंपनियों ने जुटाई है. अगर फंड जुटाने की मौजूदा रफ्तार जारी रहती है, तो इस साल का आंकड़ा 2021 के 22 अरब डॉलर के रिकॉर्ड को पार कर सकता है. 2025 में भारत से विदेशी बाजारों के जरिए महज 5 अरब डॉलर जुटाए गए थे.
हाल के दिनों में विदेशी बाजार में भारतीय बैंकों की गतिविधियां और तेज हुई हैं. ICICI बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, IDFC फर्स्ट बैंक, HDFC बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा ने मिलकर हालिया सप्ताह में 4.4 अरब डॉलर जुटाए हैं.
RBI की स्वैप सुविधा बनी बड़ी वजह
विदेशी बाजार से फंड जुटाने में RBI की वन-टाइम स्वैप सुविधा ने अहम भूमिका निभाई है. FCNR-B जमा के लिए 31 अगस्त की समयसीमा तय की गई है. इस तारीख तक बुक किए गए डिपॉजिट पर स्वैप सपोर्ट का लाभ मिलेगा.
RBI ने 5 जून को इस विशेष सुविधा का ऐलान किया था. इसके बाद बैंकों ने तेजी से विदेशी फंड जुटाना शुरू किया. 2026 में बैंकों द्वारा जुटाए गए कुल 12 अरब डॉलर में से करीब 10 अरब डॉलर की रकम 5 जून के बाद जुटाई गई है.
HDFC बैंक ने बनाया रिकॉर्ड
विदेशी बाजार से फंड जुटाने में HDFC बैंक सबसे आगे रहा है. बैंक ने गुरुवार को 1.75 अरब डॉलर जुटाए, जो किसी भारतीय बैंक द्वारा अब तक का सबसे बड़ा इश्यू है. इससे पहले जून में भी HDFC बैंक ने 75 करोड़ डॉलर जुटाए थे.
HDFC बैंक के ट्रेजरी हेड अरूप रक्षित के मुताबिक, जुटाई गई पूंजी का इस्तेमाल ग्राहकों को बेहतर वित्तीय सुविधाएं देने के साथ विदेशों में मौजूद ग्राहकों की फंडिंग जरूरतों को पूरा करने में किया जाएगा. उनके अनुसार, इतनी बड़ी रकम जुटाना भारतीय बैंकिंग सिस्टम और बैंक की क्रेडिट क्वालिटी पर निवेशकों के भरोसे को दिखाता है. इसी क्रम में IDFC फर्स्ट बैंक ने 10 करोड़ डॉलर और बैंक ऑफ बड़ौदा ने अपने पुराने इश्यू में 40 करोड़ डॉलर की बढ़ोतरी की है.
निवेशकों ने जमकर लगाया पैसा
विदेशी बाजार में भारतीय बैंकों के बॉन्ड की मांग काफी मजबूत रही है. आमतौर पर एक साथ बड़ी मात्रा में बॉन्ड जारी होने पर कर्ज की लागत बढ़ सकती है, लेकिन भारतीय बैंकों के मामले में ऐसा नहीं हुआ.
HSBC इंडिया के विनोद वेंकटेश के मुताबिक, भारी सप्लाई के बावजूद स्प्रेड साल की शुरुआत की तुलना में केवल 5 बेसिस पॉइंट बढ़ा है. वहीं, MUFG के गौरव भगत के अनुसार, अमेरिकी ट्रेजरी में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशकों की दिलचस्पी मजबूत बनी हुई है. भारतीय बैंकों के बॉन्ड इश्यू औसतन 2.89 गुना अधिक सब्सक्राइब हुए हैं.
साल के अंत तक और फंड आने की उम्मीद
जानकारों का मानना है कि विदेशी बाजार से फंड जुटाने का सिलसिला अभी जारी रह सकता है. साल के अंत तक 5 से 7.5 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी जुटाए जाने की उम्मीद है. हालांकि, 31 अगस्त को स्वैप विंडो बंद होने के बाद बैंकों की ओर से विदेशी बॉन्ड की सप्लाई कुछ कम हो सकती है. कम अवधि के लिए फंड जुटाने वाले बैंक बाद में रिफाइनेंसिंग के लिए बाजार में लौट सकते हैं. इसके अलावा 1.5% की एक अन्य स्वैप विंडो दिसंबर तक खुली है. कॉरपोरेट कंपनियों और NBFC की ओर से भी विदेशी बाजार में बॉन्ड जारी किए जाने का सिलसिला जारी रहने की उम्मीद है.
62,500 करोड़ रुपये की नई योजना के तहत कंपनियों को उत्पादन पर 5% तक प्रोत्साहन मिलेगा. सरकार का लक्ष्य भारत को मोबाइल फोन और उसके कंपोनेंट्स के लिए मजबूत मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार ने देश में मोबाइल फोन निर्माण को नई रफ्तार देने के लिए मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम-2 लॉन्च कर दी है. केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शुक्रवार को इस योजना की औपचारिक शुरुआत की. सरकार का लक्ष्य देश में मोबाइल फोन उत्पादन को दोगुना करने के साथ-साथ कंपोनेंट्स और सेमीकंडक्टर से जुड़े मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूत करना है.
करीब 62,500 करोड़ रुपये की इस योजना के तहत कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने के लिए 5% तक प्रोत्साहन दिए जाने की बात कही गई है. सरकार का फोकस केवल मोबाइल फोन की असेंबलिंग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डिजाइन, कंपोनेंट्स और अन्य महत्वपूर्ण पुर्जों के घरेलू निर्माण को भी बढ़ावा दिया जाएगा.
मेमोरी चिप के घरेलू उत्पादन पर जोर
अश्विनी वैष्णव ने कहा कि वैश्विक स्तर पर मेमोरी चिप की कीमतों में बढ़ोतरी का असर मोबाइल फोन की कीमतों पर भी पड़ रहा है. इसे देखते हुए सरकार अब मेमोरी चिप के घरेलू उत्पादन पर विशेष ध्यान दे रही है और इसके लिए देश में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स स्थापित करने की दिशा में काम किया जाएगा.
घरेलू स्तर पर चिप निर्माण बढ़ने से भारत की आयात पर निर्भरता कम हो सकती है. साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है.
एक मोबाइल फोन में करीब 1,000 पार्ट्स
वैष्णव के अनुसार, एक मोबाइल फोन में करीब 1,000 अलग-अलग पार्ट्स और कंपोनेंट्स होते हैं. भारत में इन कंपोनेंट्स का इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है और इसमें बड़ी संख्या में MSME कंपनियां भी शामिल हैं.
उन्होंने कहा कि अब तक देश में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का मुख्य फोकस उत्पादन बढ़ाने पर रहा है, लेकिन सरकार की अगली रणनीति भारत में डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग, दोनों क्षमताओं को मजबूत करने की है.
कंपनियों को आकर्षित करने के लिए मजबूत इकोसिस्टम
आईटी मंत्री ने कहा कि भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार हो चुका है, जो वैश्विक कंपनियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन रहा है. सरकार का मानना है कि नई स्कीम से मोबाइल निर्माण के साथ-साथ सप्लाई चेन और कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग को भी बढ़ावा मिलेगा.
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम-2 के जरिए सरकार भारत को केवल मोबाइल फोन असेंबलिंग हब के बजाय डिजाइन, कंपोनेंट्स और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण के बड़े वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.
अप्रैल-जून तिमाही में मजबूत प्रदर्शन से पूरे वित्त वर्ष की ग्रोथ RBI के 6.7% के आधिकारिक अनुमान से अधिक रह सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की आर्थिक वृद्धि वित्त वर्ष 2026-27 में 7 प्रतिशत के करीब पहुंच सकती है और यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मौजूदा 6.7 प्रतिशत के आधिकारिक अनुमान को भी पार कर सकती है. RBI की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने गुरुवार को यह आकलन जताया. उनका अनुमान अप्रैल-जून तिमाही में अर्थव्यवस्था के मजबूत प्रदर्शन की उम्मीद पर आधारित है. इस तिमाही के आधिकारिक GDP आंकड़े इस महीने के अंत में जारी होने हैं.
पहली तिमाही में मजबूत ग्रोथ की उम्मीद
रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल-जून तिमाही के लिए अर्थशास्त्रियों के अनुमान 6.9 प्रतिशत से 8 प्रतिशत के बीच हैं। पूनम गुप्ता ने कहा कि अगर पहली तिमाही का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहता है, तो पूरे वित्त वर्ष की आर्थिक वृद्धि 7 प्रतिशत के करीब पहुंच सकती है.
बाहरी चुनौतियों के बावजूद अर्थव्यवस्था मजबूत
पूनम गुप्ता का यह आकलन ऐसे समय आया है जब भारतीय अर्थव्यवस्था को कई बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. इनमें कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिका की ओर से लगाए गए टैरिफ, व्यापार से जुड़ी अनिश्चितता और कमजोर मानसून की आशंका शामिल हैं. इसके बावजूद उन्होंने घरेलू आर्थिक गतिविधियों की मजबूती को रेखांकित किया. RBI ने अगस्त में हुई मौद्रिक नीति समिति की बैठक में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए GDP वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया था. केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा था. RBI ने ऊंची तेल कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव से जुड़े जोखिमों को भी चिह्नित किया है.
लंबे समय में 7.5% या उससे अधिक की संभावना
पूनम गुप्ता ने कहा कि लंबी अवधि में भारत की आर्थिक वृद्धि और मजबूत रह सकती है. अर्थव्यवस्था के लिए सालाना करीब 7.5 प्रतिशत या उससे अधिक की वृद्धि दर का लक्ष्य संभव हो सकता है. उनके बयान से घरेलू मांग की मजबूती और वैश्विक झटकों को झेलने की भारतीय अर्थव्यवस्था की क्षमता को लेकर भरोसा दिखाई देता है.
बाहरी क्षेत्र और कर्ज की स्थिति पर भी नजर
गुप्ता ने भारत की बेहतर होती बाहरी स्थिति का भी उल्लेख किया. यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाएं ऊंचे कर्ज और आर्थिक अनिश्चितता का सामना कर रही हैं. अगर भारत की ग्रोथ का रुझान मजबूत बना रहता है, तो देश दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति बनाए रख सकता है.
हालांकि, पूनम गुप्ता की टिप्पणी RBI के आधिकारिक वृद्धि अनुमान में बदलाव नहीं है. फिलहाल वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.7 प्रतिशत की ग्रोथ का अनुमान ही केंद्रीय बैंक का आधिकारिक पूर्वानुमान है. गुप्ता का आकलन इस संभावना को दर्शाता है कि वास्तविक वृद्धि इस अनुमान से बेहतर रह सकती है.
रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी से मुलाकात में भारत-जापान रक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा, ‘मेक इन इंडिया’ के तहत सह-विकास और सह-उत्पादन के अवसरों पर जोर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत और जापान के बीच रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया है, जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने 20 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की. इस दौरान दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय रक्षा और सुरक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की. प्रधानमंत्री मोदी ने जुलाई 2026 में भारत की यात्रा पर आई जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची के साथ 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान हुई अपनी बातचीत को याद किया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग लगातार गति पकड़ रहा है.
हिंद-प्रशांत में शांति और स्थिरता पर जोर
मोदी ने भारत और जापान के बीच विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी को और मजबूत करने की अपनी दृष्टि साझा की। उन्होंने कहा कि रक्षा और सुरक्षा सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उससे आगे शांति, स्थिरता तथा समृद्धि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
जापानी कंपनियों को सह-विकास का न्योता
बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने रक्षा क्षेत्र में भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी के लिए जापानी कंपनियों और स्टार्टअप्स के सामने मौजूद अवसरों को रेखांकित किया। उन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत रक्षा उपकरणों और तकनीकों के सह-विकास तथा सह-उत्पादन में सहयोग की संभावनाओं पर विशेष जोर दिया.
रक्षा सहयोग की प्रगति से अवगत कराया
जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने प्रधानमंत्री मोदी को दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग में हुई प्रगति की जानकारी दी। उन्होंने भारत के साथ रक्षा संबंधों को और गहरा करने के लिए जापान की निरंतर प्रतिबद्धता दोहराई.
भारत और जापान के बीच यह बैठक ऐसे समय हुई है जब दोनों देश रक्षा औद्योगिक सहयोग का विस्तार करने और उभरती तकनीकों, विनिर्माण तथा संयुक्त विकास के क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी का भी अहम हिस्सा है.
DGFT ने FTP 2023 में किया बदलाव, रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में अहम कदम
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ावा देने की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. अब रुपये में निर्यात भुगतान हासिल करने वाले भारतीय निर्यातकों को भी विदेश व्यापार नीति (FTP) के तहत मिलने वाले प्रोत्साहनों का लाभ मिल सकेगा. विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने बुधवार को FTP 2023 में तत्काल प्रभाव से बदलाव कर इस व्यवस्था को भारतीय रिजर्व बैंक के मौजूदा विदेशी मुद्रा नियमों के अनुरूप कर दिया है.
रुपये में व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिश
नए नियमों के तहत एशियन क्लियरिंग यूनियन (ACU) की क्षेत्रीय भुगतान व्यवस्था से बाहर के देशों के साथ कारोबार करने वाले निर्यातक अपने निर्यात अनुबंध और बिल भारतीय रुपये या विदेशी मुद्रा, किसी भी मुद्रा में बना सकेंगे. भुगतान भी इन दोनों में से किसी एक मुद्रा में प्राप्त किया जा सकेगा.
इस बदलाव से रुपये में होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा मिलने और निर्यातकों के लिए भुगतान के विकल्प बढ़ने की उम्मीद है. सरकार लंबे समय से वैश्विक व्यापार में रुपये के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रही है.
अमेरिका के दबाव के बीच आया फैसला
सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ब्रिक्स देशों की ओर से डॉलर के विकल्प को बढ़ावा देने वाली किसी भी कोशिश के खिलाफ चेतावनी दे चुके हैं. ट्रंप ने ब्रिक्स की साझा मुद्रा या डॉलर को चुनौती देने वाली किसी पहल का समर्थन करने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी भी दी है. हालांकि, भारत ने ब्रिक्स की साझा मुद्रा बनाने के विचार को स्पष्ट रूप से खारिज किया है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि भारत ऐसी किसी योजना का समर्थन नहीं करता.
जुलाई 2022 में शुरू हुई थी प्रक्रिया
भारत का कहना है कि रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण किसी मौजूदा विदेशी मुद्रा व्यवस्था को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार में रुपये के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए है. नए नियम उसी दिशा में उठाया गया कदम हैं. ईरान के साथ रुपये में होने वाले व्यापार के लिए पहले से लागू सुरक्षा नियमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है. सरकार के ताजा संशोधन से जुलाई 2022 में शुरू हुई नियामकीय प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है.
कुल मिलाकर, सरकार का यह कदम भारतीय रुपये में सीमा पार कारोबार को आसान बनाने और निर्यातकों को मुद्रा के विकल्पों के साथ-साथ FTP प्रोत्साहनों का लाभ देने की दिशा में अहम माना जा रहा है.
अगस्त में सेवा क्षेत्र की गतिविधियों में सुधार से निजी क्षेत्र को मिला सहारा, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार लगातार कमजोर पड़ी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की अर्थव्यवस्था में अगस्त के दौरान निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में मामूली सुधार देखने को मिला है. हालांकि, इस सुधार का मुख्य आधार सेवा क्षेत्र रहा, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ पांच साल के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गई. शुक्रवार को जारी HSBC के फ्लैश PMI सर्वे के अनुसार, सर्विसेज PMI बढ़कर 54.5 हो गया, जबकि मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 52.9 पर आ गया.
S&P Global द्वारा तैयार HSBC Flash India Composite PMI अगस्त में 54.6 रहा, जो जुलाई में 54.3 था. हालांकि सूचकांक लगातार 61वें महीने 50 के स्तर से ऊपर बना हुआ है, लेकिन अगस्त का आंकड़ा मार्च 2022 के बाद दूसरा सबसे कमजोर स्तर है. PMI का 50 से ऊपर रहना कारोबारी गतिविधियों में विस्तार और 50 से नीचे रहना गिरावट का संकेत देता है.
सर्विसेज में सुधार, मैन्युफैक्चरिंग पर बढ़ा दबाव
अगस्त में सेवा क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में जुलाई के मुकाबले सुधार हुआ. HSBC Flash India Services PMI Business Activity Index जुलाई के 53.3 से बढ़कर 54.5 पर पहुंच गया. इससे निजी क्षेत्र की कुल गतिविधियों को सहारा मिला. इसके उलट मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सुस्ती और गहरी हो गई. HSBC Flash India Manufacturing PMI जुलाई के 53.5 से घटकर अगस्त में 52.9 रह गया. उत्पादन और नए ऑर्डर की वृद्धि पांच साल में सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गई.
नए ऑर्डर बढ़े, लेकिन ग्रोथ की रफ्तार रही धीमी
सर्वे के अनुसार, अगस्त में नए ऑर्डर में बढ़ोतरी जारी रही, लेकिन इसकी गति हाल के वर्षों की तुलना में कमजोर रही. सेवा क्षेत्र में मांग में सुधार ने कारोबारी गतिविधियों को गति दी, जबकि मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए उत्पादन और नए ऑर्डर की रफ्तार धीमी पड़ती दिखाई दी.
HSBC की भारत की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजल भंडारी ने कहा कि निजी क्षेत्र के कुल उत्पादन में वृद्धि मोटे तौर पर स्थिर रही और इसे सेवा क्षेत्र की बेहतर गतिविधियों का समर्थन मिला. वहीं, मैन्युफैक्चरिंग में उत्पादन और नए ऑर्डर की वृद्धि की रफ्तार कमजोर हुई है.
रोजगार में सुधार, सेवा क्षेत्र में बढ़ी भर्तियां
सेवा क्षेत्र में बढ़ती मांग का असर रोजगार पर भी दिखाई दिया. कंपनियों ने कामकाज का दबाव संभालने के लिए नए कर्मचारियों की भर्ती बढ़ाई. सर्वे के मुताबिक, कुल रोजगार सृजन में सुधार मुख्य रूप से सर्विस सेक्टर के कारण हुआ. वहीं, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कर्मचारियों की संख्या में करीब ढाई साल बाद पहली बार गिरावट दर्ज की गई, जो उद्योग क्षेत्र में बढ़ती सुस्ती का संकेत है.
लागत का दबाव कम, ग्राहकों पर बढ़ा बोझ
अगस्त में कंपनियों की इनपुट लागत में बढ़ोतरी की रफ्तार सात महीने के सबसे निचले स्तर पर रही. इसके बावजूद कंपनियों ने बिक्री कीमतों में अपेक्षाकृत तेज वृद्धि की. इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां लागत का बड़ा हिस्सा ग्राहकों पर डालने की कोशिश कर रही हैं. मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के पास तैयार माल का स्टॉक ऊंचा बना रहा, जबकि कच्चे माल की खरीद की रफ्तार धीमी हुई.
कुल मिलाकर, अगस्त के PMI आंकड़े भारतीय निजी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में दो अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं. एक ओर सेवा क्षेत्र में सुधार से कारोबारी गतिविधियों को सहारा मिला, वहीं दूसरी ओर मैन्युफैक्चरिंग की कमजोर होती रफ्तार आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ के लिए चिंता का विषय बन सकती है.
हर साल 21 अगस्त को मनाया जाने वाला वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे उन लोगों के योगदान को रेखांकित करता है, जो चुनौतियों में अवसर तलाशते हैं और नए विचारों को कारोबार में बदलने का जोखिम उठाते हैं.
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रितु राणा
भारत में उद्यमिता की तस्वीर तेजी से बदल रही है. आज उद्यमी सिर्फ अपना कारोबार खड़ा करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रोजगार पैदा करने, स्थानीय कारीगरों और समुदायों को आर्थिक अवसर देने, टिकाऊ उत्पादों को बढ़ावा देने और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे के मौके पर भूपेंद्र खनाल, लवली बबीश और विश्वम मोदी जैसे उद्यमियों की कहानियां दिखाती हैं कि सही विचार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और कारोबारी मार्गदर्शन के साथ छोटे कारोबार भी बड़े बाजार तक पहुंच बना सकते हैं.
हर साल 21 अगस्त को मनाया जाने वाला वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे उन लोगों के योगदान को रेखांकित करता है, जो चुनौतियों में अवसर तलाशते हैं और नए विचारों को कारोबार में बदलने का जोखिम उठाते हैं. भारत में इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि MSME सेक्टर देश की आर्थिक गतिविधियों और रोजगार में बड़ी भूमिका निभाता है. MSME मंत्रालय के अनुसार, यह क्षेत्र भारत के GDP में करीब 31.1 प्रतिशत और निर्यात में 48.5 प्रतिशत से अधिक योगदान देता है. साथ ही, यह 33.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है और कृषि के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है.
उद्यमिता से कारोबार के साथ सामाजिक बदलाव
देश के अलग-अलग हिस्सों में उभर रहे उद्यमी अपने कारोबार के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर रहे हैं. उनके उत्पाद पारंपरिक हुनर और स्थानीय संसाधनों को नए बाजारों से जोड़ रहे हैं. वहीं, वॉलमार्ट वृद्धि जैसी पहल उन्हें बिजनेस स्किल, डिजिटल कॉमर्स, मेंटरशिप और नए बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद कर रही हैं.
ऐसे ही तीन उद्यमियों की यात्रा बताती है कि कारोबार की सफलता केवल राजस्व तक सीमित नहीं है. इसके जरिए रोजगार, स्थानीय समुदायों के लिए अवसर और टिकाऊ विकास का रास्ता भी तैयार किया जा सकता है.
हिमालय की पारंपरिक चीज को बनाया ग्लोबल पेट वेलनेस ब्रांड
Dogsee Chew के संस्थापक भूपेंद्र खनाल ने हिमालय की पारंपरिक चीज बनाने की प्रक्रिया से प्रेरणा लेकर अपने कारोबार की शुरुआत की. उनकी कंपनी ने इस पारंपरिक उत्पाद को आधुनिक पेट वेलनेस प्रोडक्ट में बदलकर ग्लोबल बाजार तक पहुंच बनाई. आज कंपनी के प्राकृतिक डॉग ट्रीट्स 30 से ज्यादा देशों में बेचे जाते हैं.
डिजिटल मार्केटप्लेस पर बढ़ती मौजूदगी ने भी कंपनी की ग्रोथ को गति दी है. पिछले एक साल में कंपनी का ग्लोबल ऑनलाइन कारोबार करीब 300 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि ऑनलाइन बिक्री करीब 80 लाख रुपये से बढ़कर 4.2 करोड़ रुपये हो गई. अमेरिका में Walmart Marketplace के जरिए कंपनी हर महीने करीब 20 लाख रुपये की बिक्री कर रही है. वहीं, Flipkart के जरिए घरेलू कारोबार में 51 प्रतिशत की राजस्व वृद्धि दर्ज की गई है.
कंपनी का लक्ष्य इस वित्त वर्ष में 250 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल करना है. इसके साथ ही कारोबार ने डेयरी समुदायों के लिए रोजगार और आय के अवसर पैदा किए हैं. अतिरिक्त चीज का इस्तेमाल कर कंपनी खाद्य अपव्यय कम करने में भी योगदान दे रही है.
पर्यावरण अनुकूल उत्पादों के जरिए महिलाओं और कारीगरों को अवसर
Beetroots Eco Living की संस्थापक लवली बबीश ने पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अपना कारोबार शुरू किया. उनका ब्रांड नारियल के खोल, बांस और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से टिकाऊ जीवनशैली से जुड़े उत्पाद तैयार करता है.
कंपनी महिला स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों के साथ मिलकर काम करती है. इससे इन समूहों को रोजगार और कमाई के अवसर मिलते हैं. वॉलमार्ट वृद्धि से जुड़ने के बाद कंपनी ने अपने कारोबार को अधिक व्यवस्थित किया और डिजिटल माध्यमों पर अपनी मौजूदगी मजबूत की.
2023 में करीब 50,000 रुपये के राजस्व से शुरुआत करने वाली कंपनी की कमाई 2025 तक 25 गुना बढ़ गई. Flipkart ने भी इस वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कंपनी की कुल बिक्री में करीब 30 प्रतिशत योगदान दिया. बांस के बाथ टॉवल, नारियल के खोल से बने बाउल और पर्यावरण अनुकूल डेकोर आइटम इसके प्रमुख उत्पादों में शामिल हैं.
छोटे फ्रेगरेंस ब्रांड को डिजिटल मार्केटप्लेस से मिली रफ्तार
Bazuki Perfumes के संस्थापक विश्वम मोदी ने भारत में अपना फ्रेगरेंस ब्रांड खड़ा करने के विचार के साथ कारोबार शुरू किया. वॉलमार्ट वृद्धि से जुड़ने के बाद उन्होंने डिजिटल बिक्री और ऑनलाइन मार्केटप्लेस की क्षमता पर ज्यादा ध्यान दिया.
मेंटर की सलाह के बाद कंपनी ने विज्ञापन पर बड़े खर्च के बजाय पहले बिक्री और कारोबार की बुनियाद मजबूत करने पर फोकस किया. इसका असर कारोबार में भी दिखाई दिया. 2023 में करीब 30 लाख रुपये का कारोबार करने वाली Bazuki Perfumes की बिक्री 2024-25 में बढ़कर 70-80 लाख रुपये तक पहुंच गई. मई 2023 के मुकाबले ऑनलाइन और ऑफलाइन चैनलों की कुल बिक्री में करीब 1000 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.
कंपनी के उत्पादों की संख्या भी शुरुआती 7-9 SKU से बढ़कर करीब 60 SKU हो गई है. फिलहाल ऑनलाइन मार्केटप्लेस कंपनी की कुल बिक्री में करीब 80 प्रतिशत योगदान देते हैं, जिसमें Flipkart की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है. कार फ्रेशनर कंपनी के सबसे तेजी से बढ़ते उत्पादों में शामिल है और कुल बिक्री में इसका योगदान करीब 70 प्रतिशत है.
बदल रही है भारतीय उद्यमिता की तस्वीर
भूपेंद्र खनाल, लवली बबीश और विश्वम मोदी की कारोबारी यात्राएं अलग-अलग क्षेत्रों से आती हैं, लेकिन तीनों में एक समान सोच दिखाई देती है. इनका उद्देश्य सिर्फ कारोबार बढ़ाना नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करना, स्थानीय समुदायों को आर्थिक अवसर देना, टिकाऊ उत्पादों को बढ़ावा देना और भारतीय MSME इकोसिस्टम को मजबूत करना भी है.
वर्ल्ड एंटरप्रेन्योर डे पर इन उद्यमियों की कहानियां भारत में बदलती उद्यमिता की तस्वीर पेश करती हैं. अब कारोबार की सफलता को सिर्फ राजस्व और मुनाफे से नहीं, बल्कि उससे पैदा होने वाले रोजगार, सामाजिक प्रभाव और लंबे समय तक बनाए जाने वाले आर्थिक मूल्य से भी जोड़ा जा रहा है. यही बदलाव भारत की नई ग्रोथ स्टोरी को आकार दे रहा है.
1.20 करोड़ यात्रियों ने की घरेलू उड़ानों से यात्रा, Akasa Air का लोड फैक्टर सबसे ज्यादा 91.9%
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के घरेलू विमानन क्षेत्र में जुलाई 2026 में यात्री यातायात में सालाना आधार पर 4.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. हालांकि, यात्रियों की संख्या घटने के बावजूद एयरलाइंस ने सीटों का बेहतर इस्तेमाल किया. नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में घरेलू एयरलाइंस ने करीब 1.20 करोड़ यात्रियों को उड़ान सेवा दी, जबकि एक साल पहले इसी महीने में यह आंकड़ा करीब 1.26 करोड़ था.
IndiGo की बाजार हिस्सेदारी 67.4%
घरेलू विमानन बाजार में IndiGo का दबदबा जुलाई में भी कायम रहा. एयरलाइन ने महीने के दौरान 80.82 लाख यात्रियों को उड़ान सेवा दी और कुल घरेलू यात्री यातायात में इसकी हिस्सेदारी 67.4 फीसदी रही. Air India और Air India Express को मिलाकर बने Air India Group ने जुलाई में 28.75 लाख यात्रियों को सफर कराया. दोनों एयरलाइंस की संयुक्त बाजार हिस्सेदारी 24 फीसदी रही. वहीं, Akasa Air ने 6.65 लाख यात्रियों के साथ 5.5 फीसदी बाजार हिस्सेदारी हासिल की.
SpiceJet की बाजार हिस्सेदारी 1.6 फीसदी रही. इसके अलावा Star Air की 0.7 फीसदी, Fly91 की 0.5 फीसदी, Alliance Air की 0.4 फीसदी और IndiaOne Air की हिस्सेदारी 0.1 फीसदी से कम रही. इस तरह IndiGo और Air India Group ने मिलकर जुलाई में घरेलू हवाई यातायात का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा अपने नाम किया.
Akasa Air का लोड फैक्टर सबसे ज्यादा
यात्रियों की संख्या में गिरावट के बावजूद एयरलाइंस ने विमानों में उपलब्ध सीटों का अच्छा इस्तेमाल किया. जुलाई में Akasa Air का पैसेंजर लोड फैक्टर सबसे अधिक 91.9 फीसदी रहा. इसके बाद SpiceJet का 84.1 फीसदी, Air India Group का 83.2 फीसदी और IndiGo का 82.4 फीसदी रहा. लोड फैक्टर से पता चलता है कि किसी एयरलाइन की उपलब्ध सीटों में से कितनी सीटों पर यात्रियों ने यात्रा की.
0.62% रही उड़ानों की कैंसिलेशन दर
DGCA के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में निर्धारित घरेलू एयरलाइंस की कुल कैंसिलेशन दर 0.62 फीसदी रही. इनमें तकनीकी कारण सबसे बड़ी वजह रहे, जिनकी हिस्सेदारी 39.9 फीसदी थी. परिचालन संबंधी कारणों से 27.4 फीसदी उड़ानें रद्द हुईं, जबकि मौसम संबंधी कारणों की हिस्सेदारी 22.7 फीसदी रही. जुलाई में एयरलाइंस को यात्रियों से कुल 2,196 शिकायतें मिलीं. यह प्रति 10,000 यात्रियों पर करीब 1.83 शिकायत के बराबर है.
समय पर उड़ान के मामले में भी IndiGo आगे
देश के 10 सबसे व्यस्त हवाई अड्डों पर प्रमुख घरेलू एयरलाइंस के बीच समय पर उड़ान भरने के मामले में IndiGo सबसे आगे रही. जुलाई में उसका ऑन-टाइम परफॉर्मेंस (OTP) 91.2 फीसदी रहा. Akasa Air 90.8 फीसदी OTP के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि Air India Group का OTP 88.5 फीसदी रहा. Alliance Air का OTP 76 फीसदी और SpiceJet का 34.6 फीसदी रहा.
हवाई अड्डों की बात करें तो चेन्नई एयरपोर्ट ने 96.7 फीसदी के साथ सबसे बेहतर ऑन-टाइम परफॉर्मेंस दर्ज किया. इसके बाद बेंगलुरु 94 फीसदी और हैदराबाद 92.4 फीसदी के साथ रहे.
उड़ानों में देरी की सबसे बड़ी वजह 'रिएक्शनरी' कारण
जुलाई में उड़ानों में देरी की सबसे बड़ी वजह रिएक्शनरी कारण रहे. कुल देरी में इनकी हिस्सेदारी 65 फीसदी रही. परिचालन संबंधी और एयर ट्रैफिक कंट्रोल से जुड़ी समस्याओं की हिस्सेदारी 7-7 फीसदी रही.
तकनीकी और मौसम संबंधी कारणों से होने वाली देरी की हिस्सेदारी 6-6 फीसदी रही. यात्रियों से जुड़े कारण 3 फीसदी, एयरपोर्ट से संबंधित कारण 2 फीसदी और रैंप से जुड़े कारण 1 फीसदी रहे. बाकी 3 फीसदी देरी अन्य कारणों से हुई.
क्षमता में संतुलित बढ़ोतरी से यातायात पर असर
जुलाई में घरेलू हवाई यातायात में गिरावट के पीछे यात्रा गतिविधियों में मौसमी नरमी और एयरलाइंस की ओर से क्षमता को नियंत्रित तरीके से बढ़ाना प्रमुख कारण रहे. हालांकि, मजबूत पैसेंजर लोड फैक्टर से संकेत मिलता है कि उपलब्ध सीटों का इस्तेमाल अभी भी बेहतर स्तर पर हुआ, भले ही कुल यात्री यातायात में सालाना आधार पर कमी दर्ज की गई.
सेबी ने 20 अगस्त से डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित Power of Attorney जमा करने की दी मंजूरी, नोटरीकरण, अपोस्टिलाइजेशन और कॉन्सुलराइजेशन की जरूरत नहीं होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (Sebi) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए दस्तावेजी प्रक्रिया को आसान बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. सेबी ने FPIs को अब डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित पावर ऑफ एटोनॉमी (PoA) दस्तावेज जमा करने की अनुमति दे दी है. नई व्यवस्था के तहत ऐसे दस्तावेजों के लिए नोटरीकरण, अपोस्टिलाइजेशन या कॉन्सुलराइजेशन की जरूरत नहीं होगी. यह व्यवस्था 20 अगस्त 2026 से लागू हो गई है और इसका उद्देश्य विदेशी निवेशकों के लिए FPI ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया को तेज और आसान बनाना है.
डिजिटल PoA के लिए क्या है नियम
नई व्यवस्था के तहत FPIs अपने कस्टोडियन के पक्ष में जारी PoA डिजिटल रूप से जमा कर सकेंगे. दस्तावेज में पता स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए और PoA पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के प्रावधानों के अनुरूप डिजिटल हस्ताक्षर किए जाने जरूरी होंगे. हालांकि, डिजिटल PoA का विकल्प मौजूदा प्रक्रिया के साथ-साथ उपलब्ध रहेगा. यानी विदेशी निवेशक पहले की तरह नोटरीकृत, अपोस्टिलाइज्ड या कॉन्सुलराइज्ड PoA दस्तावेज भी जमा कर सकेंगे.
FPI ऑनबोर्डिंग में कम होगी कागजी प्रक्रिया
सेबी के मुताबिक, डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित PoA को मंजूरी देने से नोटरीकरण, अपोस्टिलाइजेशन और कॉन्सुलराइजेशन जैसी अतिरिक्त प्रमाणिकता प्रक्रियाओं की जरूरत खत्म होगी. इससे विदेशी निवेशकों के दस्तावेज पूरे करने और भारतीय पूंजी बाजार में निवेश शुरू करने में लगने वाला समय कम होने की उम्मीद है.
इस कदम से विदेशी निवेशकों के लिए PoA तैयार करने और जमा करने की प्रक्रिया भी डिजिटल हो जाएगी. इससे भौतिक दस्तावेजों और उनके प्रमाणीकरण पर निर्भरता कम होगी.
डिजिटल ऑनबोर्डिंग को बढ़ावा दे रहा सेबी
डिजिटल PoA की अनुमति सेबी की FPI रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को डिजिटल बनाने की व्यापक पहल का हिस्सा है. नियामक पहले ही FPI रजिस्ट्रेशन के लिए कॉमन एप्लीकेशन फोरम (CAF) की शुरुआत कर चुका है. इसके अलावा PAN, बैंक अकाउंट और डीमैट अकाउंट से जुड़ी प्रक्रियाओं को भी डिजिटल माध्यम से आसान बनाया गया है.
सेबी ने CAF और अन्य रजिस्ट्रेशन दस्तावेजों पर भारतीय डिजिटल हस्ताक्षर के इस्तेमाल की अनुमति भी दी है. CAF पोर्टल के जरिए डिजिटल हस्ताक्षर की सुविधा देने के साथ-साथ स्कैन की गई प्रतियों के आधार पर FPI रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को भी आसान बनाया गया है.
मास्टर सर्कुलर में किया गया बदलाव
डिजिटल PoA से जुड़ा यह बदलाव FPIs, निर्दिष्ट डिपॉजिटरी प्रतिभागी. (DDPs) और Eligible Foreign Investors (EFIs) के लिए जारी सेबी के मास्टर सर्कुलर में संबंधित प्रावधान में संशोधन के जरिए किया गया है.
सेबी ने यह सर्कुलर Securities and Exchange Board of India Act, 1992 और Sebi (Foreign Portfolio Investors) Regulations, 2019 के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए जारी किया है. नियामक के अनुसार, इस कदम का उद्देश्य निवेशकों के हितों की रक्षा करते हुए प्रतिभूति बाजार के विकास और बेहतर नियमन को बढ़ावा देना है.
टाटा ग्रुप समर्थित Nelco 2027 के अंत तक करेगी D2D सेवा का ट्रायल, रेगुलेटरी मंजूरी और स्पेक्ट्रम उपलब्धता के आधार पर होगा कमर्शियल लॉन्च
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाटा ग्रुप (Tata Group) समर्थित नेल्को (Nelco) भारत के उभरते डायरेक्ट टू डिवाइस (D2D) सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार में उतरने की तैयारी कर रही है. कंपनी की योजना 2028 की शुरुआत तक भारत और दक्षिण एशिया के चुनिंदा बाजारों में D2D सैटेलाइट कनेक्टिविटी सेवाएं शुरू करने की है. हालांकि, इसका कमर्शियल लॉन्च रेगुलेटरी मंजूरी और स्पेक्ट्रम की उपलब्धता पर निर्भर करेगा. कंपनी 2027 के अंत तक इन सेवाओं का ट्रायल शुरू करने की तैयारी कर रही है.
भारत के साथ बांग्लादेश और श्रीलंका पर नजर
Nelco के D2D ऑफरिंग के शुरुआती बाजारों में भारत के साथ बांग्लादेश और श्रीलंका भी शामिल हो सकते हैं. D2D तकनीक के जरिए मोबाइल फोन और अन्य डिवाइस सीधे सैटेलाइट नेटवर्क से कनेक्ट हो सकेंगे. कंपनी का मानना है कि आने वाले 7 से 10 वर्षों में यह सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है.
कंपनी की रणनीति को उसके Lunar Holdco Inc में किए गए 2 करोड़ डॉलर के निवेश से भी मजबूती मिली है. Lunar Holdco एक सैटेलाइट मोबाइल कनेक्टिविटी कंपनी है, जो Elveo Mobile ब्रांड के तहत काम करती है. Nelco के MD और CEO पीजे नाथ के मुताबिक, इस निवेश का उद्देश्य कंपनी को केवल सैटेलाइट सेवाओं के वितरक के बजाय D2D इकोसिस्टम में एक रणनीतिक भागीदार के रूप में स्थापित करना है.
खुद का सैटेलाइट कंस्टीलेशन बनाने की योजना नहीं
कंपनी अरबों डॉलर खर्च करके अपना खुद का सैटेलाइट कंस्टीलेशन बनाने के बजाय पार्टनरशिप के जरिए इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. Nelco का फोकस व्यापक सैटेलाइट कनेक्टिविटी इकोसिस्टम में योगदान देने पर है. कंपनी D2D के इस्तेमाल के लिए IoT, स्मार्ट एग्रीकल्चर, एसेट मॉनिटरिंग, कनेक्टेड व्हीकल और समुद्री संचार जैसे क्षेत्रों की संभावनाएं तलाश रही है. शुरुआती स्तर पर Nelco का कारोबार मुख्य रूप से B2B और B2G मॉडल पर केंद्रित रहेगा. इसके तहत कंपनी सीधे ग्राहकों को सेवाएं देने के बजाय टेलीकॉम ऑपरेटरों के साथ मिलकर काम करेगी.
रेगुलेशन और स्पेक्ट्रम से तय होगी लॉन्च की टाइमलाइन
भारत में D2D सेवाओं की शुरुआत काफी हद तक सैटेलाइट कम्युनिकेशन के लिए तैयार किए जा रहे रेगुलेटरी और स्पेक्ट्रम फ्रेमवर्क पर निर्भर करेगी. भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क के प्रस्तावित ऑथराइजेशन फ्रेमवर्क के तहत D2D सेवाओं पर इंडस्ट्री से सुझाव मांग रहा है.
D2D सेवाओं के लिए मोबाइल सैटेलाइट सर्विस स्पेक्ट्रम या टेरेस्ट्रियल मोबाइल स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर टेरेस्ट्रियल स्पेक्ट्रम का उपयोग होता है, तो मौजूदा टेलीकॉम ऑपरेटरों के साथ सहयोग जरूरी होगा.
Nelco के मुताबिक, सैटेलाइट कनेक्टिविटी को टेरेस्ट्रियल नेटवर्क के विकल्प के बजाय उसके विस्तार के रूप में देखा जा सकता है. खासकर दूरदराज के इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों और प्राकृतिक आपदा से प्रभावित जगहों पर इसका इस्तेमाल महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां पारंपरिक नेटवर्क स्थापित करना मुश्किल या महंगा होता है.
GEO, LEO और MEO के साथ मल्टी-ऑर्बिट रणनीति
D2D Nelco की व्यापक सैटेलाइट रणनीति का सिर्फ एक हिस्सा है. कंपनी ऑर्बिट-एग्नोस्टिक रणनीति पर काम कर रही है, जिसमें ग्राहकों की जरूरत के मुताबिक GEO, LEO और MEO सैटेलाइट के साथ D2D और टेरेस्ट्रियल नेटवर्क को जोड़ा जाएगा.
पीजे नाथ ने कहा कि LEO ब्रॉडबैंड सेवाओं के लॉन्च में देरी से भारतीय सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार में नए अवसरों की रफ्तार प्रभावित हुई है. हालांकि, Nelco कई LEO ऑपरेटरों के साथ बातचीत जारी रखे हुए है और रेगुलेशन तथा बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए संभावित साझेदारियों का आकलन कर रही है.
Reliance Jio समेत बढ़ती प्रतिस्पर्धा को सकारात्मक मानती है कंपनी
सैटेलाइट कम्युनिकेशन क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को Nelco सकारात्मक रूप में देखती है. Reliance Jio समेत कई कंपनियां इस क्षेत्र में उतरने की तैयारी कर रही हैं. Nelco का मानना है कि भारत जैसे बड़े बाजार में कई सैटेलाइट कनेक्टिविटी प्रदाताओं के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हैं.
कंपनी के अनुसार, सैटेलाइट कम्युनिकेशन का अगला चरण टेरेस्ट्रियल नेटवर्क को खत्म करने के बजाय अलग-अलग तकनीकों को एक साथ जोड़कर कनेक्टिविटी का विस्तार करने का होगा. ऐसे में रेगुलेटरी स्पष्टता के साथ D2D आने वाले वर्षों में भारत और दक्षिण एशिया के कम्युनिकेशन बाजार में एक अहम ग्रोथ सेगमेंट बन सकता है.
नए आधार वर्ष वाली सीरीज में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि जून के 6% से घटकर 5.4% पर आई, रिफाइनरी, कोयला और सीमेंट ने संभाली रफ्तार
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के नौ प्रमुख बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर जुलाई 2026 में घटकर 5.4 फीसदी रह गई, जबकि जून में संशोधित आंकड़ों के अनुसार यह 6 फीसदी थी. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में बिजली और लौह अयस्क उत्पादन की रफ्तार में कमी का असर कोर सेक्टर की कुल वृद्धि पर पड़ा. हालांकि, रिफाइनरी उत्पादों के उत्पादन में सुधार के साथ कोयला और सीमेंट क्षेत्र की बेहतर ग्रोथ ने गिरावट को कुछ हद तक सीमित किया.
नई सीरीज का दूसरा आंकड़ा
जुलाई का आंकड़ा नए आधार वर्ष 2022-23 पर आधारित संशोधित बुनियादी उद्योग सूचकांक (ICI) का दूसरा आंकड़ा है. नई सीरीज ने 2011-12 आधार वर्ष वाली पुरानी सीरीज की जगह ली है. इसमें लौह अयस्क को शामिल किए जाने के बाद प्रमुख बुनियादी उद्योगों की संख्या आठ से बढ़कर नौ हो गई है. जुलाई में इन नौ उद्योगों का समग्र सूचकांक बढ़कर 121.2 हो गया, जो जून में 120.7 था.
बिजली और लौह अयस्क की ग्रोथ में गिरावट
कोर सेक्टर इंडेक्स में 30.9 फीसदी की सबसे अधिक हिस्सेदारी रखने वाले बिजली क्षेत्र की वृद्धि दर जुलाई में घटकर 9 फीसदी रह गई, जबकि जून में यह 11.4 फीसदी थी. वहीं, 4.9 फीसदी भारांश वाले लौह अयस्क क्षेत्र की वृद्धि दर जून के 44.5 फीसदी से घटकर जुलाई में 29.5 फीसदी रह गई. लौह अयस्क उत्पादन की रफ्तार में आई इस बड़ी कमी का कुल कोर सेक्टर ग्रोथ पर खासा असर पड़ा.
रिफाइनरी उत्पादन में लौटी तेजी
जुलाई में नौ में से छह प्रमुख उद्योगों में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई. इनमें लौह अयस्क, बिजली, सीमेंट, इस्पात, रिफाइनरी उत्पाद और कोयला शामिल हैं. दूसरी ओर, प्राकृतिक गैस, कच्चे तेल और उर्वरक उत्पादन में गिरावट रही.
रिफाइनरी उत्पादों का प्रदर्शन खास तौर पर बेहतर रहा. लगातार तीन महीनों की गिरावट के बाद जुलाई में रिफाइनरी उत्पादन 2.7 फीसदी बढ़ा. जून में इसमें 4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी. वहीं, कोयला और सीमेंट उत्पादन में तेजी ने भी कोर सेक्टर की कुल वृद्धि को सहारा दिया.
अप्रैल-जुलाई में 4.3% बढ़ा कोर सेक्टर
अप्रैल-जुलाई 2026 के दौरान नौ प्रमुख बुनियादी उद्योगों का संचयी सूचकांक 4.3 फीसदी बढ़ा. पिछले साल की समान अवधि में इसमें 1.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी. इससे संकेत मिलता है कि चालू वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में बुनियादी उद्योगों का प्रदर्शन पिछले साल की तुलना में बेहतर रहा है, हालांकि जुलाई में वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी पड़ी है.