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GDP तेज, लेकिन राज्यों की तिजोरी खाली? बजट से पहले केंद्र के सामने राज्यों ने रखीं बड़ी मांगें

आगामी बजट में यदि टैक्स शेयरिंग, सेस-सरचार्ज और राज्यों की विशेष जरूरतों पर ठोस फैसले लिए जाते हैं, तो इससे केंद्र-राज्य वित्तीय रिश्तों को मजबूती मिल सकती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

देश की अर्थव्यवस्था तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही है. केंद्र सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष में GDP ग्रोथ 7.4 फीसदी रहने का अनुमान जताया है, लेकिन इस चमकदार तस्वीर के बीच राज्यों का कहना है कि उनकी आमदनी लगातार दबाव में है. 1 फरवरी को पेश होने वाले आम बजट से पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ हुई अहम बैठक में राज्यों ने टैक्स शेयरिंग से लेकर सेस-सरचार्ज और विशेष वित्तीय मदद तक कई बड़ी मांगें केंद्र के सामने रखी हैं.

GDP ग्रोथ मजबूत. राज्यों की कमाई कमजोर

लगातार दो तिमाहियों में बेहतर GDP आंकड़ों के बाद केंद्र सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर भरोसा जताया है. इसके बावजूद राज्यों का कहना है कि बढ़ती अर्थव्यवस्था का लाभ उन्हें अपेक्षित रूप से नहीं मिल पा रहा है. राज्यों का दावा है कि खर्च बढ़ने के मुकाबले उनके राजस्व स्रोत सीमित हो रहे हैं. जिससे वित्तीय संतुलन बिगड़ रहा है.

GST दरों में कटौती से राजस्व पर असर

प्री-बजट मीटिंग में राज्यों ने GST दरों में कटौती का मुद्दा जोर-शोर से उठाया. 22 सितंबर को GST रेट घटाए गए थे. SBI रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार,  इससे वित्त वर्ष में केंद्र और राज्यों को कुल मिलाकर करीब ₹1.11 लाख करोड़ के राजस्व नुकसान का अनुमान है. हालांकि कम टैक्स दरों से उपभोग बढ़ने की वजह से नेट नुकसान कुछ कम हो सकता है. फिर भी राज्यों का कहना है कि तत्काल असर उनके खजाने पर पड़ा है.

सेस और सरचार्ज पर हिस्सेदारी की मांग

राज्यों की सबसे बड़ी शिकायत सेस और सरचार्ज को लेकर है. मौजूदा व्यवस्था के तहत राज्यों को केंद्र के टैक्स रेवेन्यू का 41 फीसदी हिस्सा मिलता है. लेकिन सेस और सरचार्ज से होने वाली कमाई में उन्हें कोई हिस्सा नहीं दिया जाता. राज्यों ने मांग की है कि इन मदों से जुटाए गए राजस्व में भी उन्हें उचित हिस्सेदारी मिलनी चाहिए.

केंद्रीय योजनाओं में बढ़ते बोझ की शिकायत

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राज्यों ने केंद्र सरकार की नई योजनाओं में अपनी बढ़ती वित्तीय हिस्सेदारी पर भी चिंता जताई. उनका कहना है कि कई केंद्रीय योजनाओं में राज्यों को ज्यादा योगदान देना पड़ रहा है. जिससे उनके संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है. इसके साथ ही. राज्यों ने लोन सीमा बढ़ाने और प्राकृतिक आपदाओं के लिए विशेष वित्तीय पैकेज की भी मांग की है.

DBT स्कीमों से बढ़ा खर्च

कई राज्यों ने चुनावी वादों के तहत डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाएं लागू की हैं, लेकिन इन योजनाओं पर बढ़ते खर्च ने राज्यों के राजस्व घाटे को और बढ़ा दिया है. राज्यों का कहना है कि DBT पर होने वाला भारी खर्च विकास परियोजनाओं और पूंजीगत निवेश पर असर डाल रहा है.

बजट से पहले केंद्र के लिए बड़ा इम्तिहान

1 फरवरी को पेश होने वाले आम बजट से पहले राज्यों की ये मांगें केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं. जहां एक ओर केंद्र को आर्थिक स्थिरता बनाए रखनी है. वहीं दूसरी ओर राज्यों के वित्तीय संकट को दूर करने के लिए संतुलित समाधान भी निकालना होगा.

 


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