2007 से नवंबर 2010 तक दिल्ली के मुख्य सचिव रहे थे राकेश मेहता, राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान भी संभाली थी जिम्मेदारी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव और 1975 बैच के आईएएस अधिकारी राकेश मेहता की नोएडा स्थित उनके आवास पर 6 सितंबर को कथित तौर पर आत्महत्या से मौत हो गई. उनकी उम्र करीब 75 वर्ष थी. मेहता दिल्ली के मुख्य सचिव के पद पर 2007 से नवंबर 2010 में अपनी सेवानिवृत्ति तक रहे थे. उनका कार्यकाल पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल के दौरान रहा और इसी अवधि में 2010 राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियां और आयोजन भी हुआ था.
राकेश मेहता नोएडा के सेक्टर-82 स्थित केंद्रीय विहार-2 सोसाइटी में किराए के फ्लैट में रह रहे थे. घटना की सूचना पुलिस को डायल-112 के जरिए मिली. इसके बाद फेज-2 थाना पुलिस की टीम मौके पर पहुंची. पुलिस ने बताया कि फ्लैट का दरवाजा अंदर से बंद था, जिसके बाद उसे खोलकर पुलिसकर्मी अंदर दाखिल हुए.
घर से कथित सुसाइड नोट बरामद
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस को आवास से एक कथित सुसाइड नोट भी मिला है. बताया जा रहा है कि इस नोट में 'मानसिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं' का जिक्र किया गया है. घटना के बाद फोरेंसिक टीम ने फ्लैट की जांच की और कई साक्ष्य जुटाए.
घटना के समय राकेश मेहता की पत्नी सुमंती मेहता देहरादून में अपने बेटे के पास थीं. बताया गया कि मेहता ने उनकी कई कॉल का जवाब नहीं दिया, जिसके बाद पत्नी को चिंता हुई और उन्होंने सोसाइटी के सुरक्षा गार्ड से मदद मांगी. नोएडा फेज-2 पुलिस मामले की जांच कर रही है. जांच में कथित सुसाइड नोट, फोरेंसिक रिपोर्ट और मौके से जुटाए गए अन्य साक्ष्यों को शामिल किया जा रहा है.
लोधी रोड श्मशान घाट में अंतिम संस्कार
पंचनामा और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राकेश मेहता का शव उनके परिवार को सौंप दिया गया. सोमवार को दिल्ली के लोधी रोड स्थित श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया.
राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान रहे दिल्ली के मुख्य सचिव
राकेश मेहता ने 2007 से नवंबर 2010 में सेवानिवृत्ति तक दिल्ली के मुख्य सचिव के रूप में काम किया. उनका कार्यकाल दिल्ली में 2010 राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों और आयोजन के महत्वपूर्ण दौर से जुड़ा था. उस समय दिल्ली प्रशासन के सामने कई बड़े बुनियादी ढांचे और नागरिक सुविधाओं से जुड़े प्रोजेक्ट्स को पूरा करने की जिम्मेदारी थी. अपने लंबे प्रशासनिक करियर के दौरान मेहता ने दिल्ली सरकार में कई वरिष्ठ पदों पर काम किया. वह दिल्ली नगर निगम के आयुक्त के पद पर भी रहे थे.
इस निवेश सौदे से पहले अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स की वैल्यूएशन करीब 18 अरब डॉलर आंकी गई है. यह निवेश कंपनी के एयरपोर्ट कारोबार के लिए एक अहम वैल्यूएशन बेंचमार्क भी तैयार करता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी समूह (Adani Group) के एयरपोर्ट कारोबार को घरेलू और वैश्विक निवेशकों का बड़ा भरोसा मिला है. अडानी एंटरप्राइजेज की सहायक कंपनी अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड करीब 1 अरब डॉलर यानी 9,825 करोड़ रुपये की नई इक्विटी पूंजी जुटाने जा रही है. इस निवेश में ब्लैकरॉक, टेमासेक, प्रेमजी इन्वेस्ट और अल्फा वेव ग्लोबल जैसे बड़े निवेशक शामिल हैं. कंपनी के मुताबिक, यह रकम एयरपोर्ट नेटवर्क के विस्तार, मौजूदा सुविधाओं के आधुनिकीकरण और एयरपोर्ट सिटी परियोजनाओं के विकास पर खर्च की जाएगी.
18 अरब डॉलर आंकी गई कंपनी की वैल्यूएशन
इस निवेश सौदे से पहले अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स की वैल्यूएशन करीब 18 अरब डॉलर आंकी गई है. यह निवेश कंपनी के एयरपोर्ट कारोबार के लिए एक अहम वैल्यूएशन बेंचमार्क भी तैयार करता है. कंपनी ने निवेशकों के समूह के साथ इसके लिए पक्के समझौते किए हैं. निवेश की पूरी रकम तीन चरणों में आएगी और अंतिम चरण जुलाई 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है. सभी चरणों के पूरा होने के बाद इन निवेशकों के समूह के पास अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स में करीब 5.54 फीसदी हिस्सेदारी होगी.
एयरपोर्ट नेटवर्क और ‘एयरपोर्ट सिटी’ पर खर्च होगी रकम
अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स इस पूंजी का इस्तेमाल अपने एयरपोर्ट नेटवर्क के विस्तार और मौजूदा बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने में करेगी. इसके साथ ही कंपनी एयरपोर्ट के आसपास ‘एयरपोर्ट सिटी’ विकसित करने की योजना पर भी काम कर रही है.
इन एयरपोर्ट सिटी परियोजनाओं में होटल, ऑफिस, रिटेल, मनोरंजन और अन्य कारोबारी सुविधाएं विकसित की जाएंगी. पहले चरण में करीब 2.2 करोड़ वर्ग फुट क्षेत्र विकसित करने की योजना है. इसके अलावा, निवेश का एक हिस्सा ग्राउंड हैंडलिंग, यात्री सेवाओं और अन्य गैर-एविएशन कारोबार को बढ़ाने में लगाया जाएगा. इससे कंपनी को यात्री शुल्क के अलावा कमाई के नए स्रोत विकसित करने में मदद मिल सकती है.
सालाना 20 करोड़ यात्रियों की क्षमता का लक्ष्य
अडानी समूह अपने एयरपोर्ट नेटवर्क की सालाना यात्री क्षमता को बढ़ाकर करीब 20 करोड़ करने की दिशा में काम कर रहा है. नए निवेश से इस विस्तार योजना को गति मिलने की उम्मीद है. एयरपोर्ट कारोबार में गैर-एविएशन आय बढ़ाने पर भी कंपनी का खास जोर है. एयरपोर्ट सिटी, रिटेल, होटल, ऑफिस और अन्य कमर्शियल गतिविधियों के विस्तार से कंपनी अपने एयरपोर्ट परिसरों को बड़े कारोबारी और ट्रांजिट हब के तौर पर विकसित करना चाहती है.
देश के बड़े निजी एयरपोर्ट ऑपरेटरों में शामिल
अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स देश के सबसे बड़े निजी एयरपोर्ट ऑपरेटरों में शामिल है. कंपनी आठ एयरपोर्टों का संचालन करती है और देश के कुल यात्री यातायात में उसकी हिस्सेदारी 23 फीसदी से अधिक है.
कंपनी के पोर्टफोलियो में मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, गुवाहाटी, तिरुवनंतपुरम और मंगलूरु समेत कई प्रमुख एयरपोर्ट शामिल हैं. नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी कंपनी की विस्तार रणनीति की प्रमुख परियोजनाओं में से एक है.
25,000 से अधिक कारोबारी आगंतुकों वाला इंडिया इंटरनेशनल कार्गो शो अब मेस्से म्यूनचेन के लॉजिस्टिक्स पोर्टफोलियो का हिस्सा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बी2बी व्यापार मेलों के आयोजक मेस्से म्यूनचेन इंडिया ने इंडिया इंटरनेशनल कार्गो शो (IICS) का अधिग्रहण कर लिया है. यह अधिग्रहण अपस्ट्रीम बिजनेस सॉल्यूशंस एलएलपी से किया गया है. इस सौदे के बाद IICS को मेस्से म्यूनचेन इंडिया के मौजूदा लॉजिस्टिक्स पोर्टफोलियो के साथ जोड़ा जाएगा, जिसमें ट्रांसपोर्ट लॉजिस्टिक इंडिया और एयर कार्गो इंडिया शामिल हैं. कंपनी 2027 में प्रोजेक्ट कार्गो इंडिया भी शुरू करने की तैयारी कर रही है.
इस कदम से मेस्से म्यूनचेन इंडिया का लक्ष्य भारत और दक्षिण एशिया में लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के लिए एक व्यापक और आपस में जुड़ा व्यापार मेला इकोसिस्टम तैयार करना है. नए पोर्टफोलियो में हवाई, समुद्री, रेल और सड़क परिवहन के साथ कार्गो हैंडलिंग, वेयरहाउसिंग और आपूर्ति-श्रृंखला प्रबंधन से जुड़े कारोबार को एक मंच मिलेगा.
2025 में IICS में पहुंचे 25,000 से ज्यादा कारोबारी आगंतुक
इंडिया इंटरनेशनल कार्गो शो के 2025 संस्करण में 80 से अधिक देशों से 25,000 से ज्यादा कारोबारी आगंतुक पहुंचे थे. इस दौरान 15,000 वर्ग मीटर से अधिक प्रदर्शनी क्षेत्र में 200 से ज्यादा प्रदर्शक ब्रांडों ने हिस्सा लिया था.
पिछले चार वर्षों में IICS माल ढुलाई एजेंटों, एयरलाइंस, शिपिंग कंपनियों, बंदरगाहों, टर्मिनलों, वेयरहाउसिंग और कोल्ड-चेन संचालकों, एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स कंपनियों, कार्गो हैंडलिंग और लॉजिस्टिक्स टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए एक प्रमुख कारोबारी मंच के रूप में विकसित हुआ है.
मेस्से म्यूनचेन के IMEA क्षेत्र के अध्यक्ष और मेस्से म्यूनचेन इंडिया के CEO भूपिंदर सिंह ने कहा कि IICS ने भारत के कार्गो और फ्रेट-फॉरवर्डिंग उद्योग के साथ मजबूत संबंध बनाए हैं. उन्होंने कहा कि इसे कंपनी के पोर्टफोलियो में शामिल करने से बाजार की जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा करने और लॉजिस्टिक्स वैल्यू चेन के व्यापक हिस्से को एक समन्वित मंच से जोड़ने में मदद मिलेगी. उन्होंने कहा कि प्रत्येक आयोजन अपने अलग कारोबारी उद्देश्य और संबंधित उद्योग समुदाय पर केंद्रित रहेगा, जबकि सभी आयोजन एक व्यापक लॉजिस्टिक्स पोर्टफोलियो के तहत आपस में जुड़े रहेंगे.
भारत का बढ़ता विदेशी व्यापार बना बड़ा अवसर
IICS का यह विस्तार ऐसे समय हुआ है जब भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लगातार वृद्धि हो रही है और इसके साथ माल ढुलाई, कार्गो तथा आपूर्ति-श्रृंखला बुनियादी ढांचे की मांग भी बढ़ रही है.
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के 15 अप्रैल 2026 को जारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का वस्तु निर्यात 441.78 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 774.98 अरब डॉलर तक पहुंच गया. इस तरह देश का कुल वस्तु व्यापार करीब 1.22 ट्रिलियन डॉलर रहा.
वैश्विक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क से जुड़ेगा IICS
अधिग्रहण के बाद IICS मेस्से म्यूनचेन के अंतरराष्ट्रीय ट्रांसपोर्ट लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का हिस्सा बन जाएगा. इस नेटवर्क में म्यूनचेन के अलावा चीन, भारत, केन्या, सऊदी अरब, सिंगापुर, तुर्किये और अमेरिका में आयोजित होने वाले व्यापार मेले शामिल हैं.
मेस्से म्यूनचेन के CEO स्टीफन रमेल ने कहा कि भारत वैश्विक व्यापार और लॉजिस्टिक्स के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बाजार है. उनके मुताबिक, IICS की फ्रेट-फॉरवर्डिंग और मल्टीमॉडल कार्गो क्षेत्र में मजबूत स्थानीय पहुंच को अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के साथ जोड़कर ग्राहकों और उद्योग के लिए दीर्घकालिक मूल्य तैयार किया जा सकेगा.
2026 में मुंबई में होगा IICS
ट्रांसपोर्ट लॉजिस्टिक इंडिया और एयर कार्गो इंडिया का आयोजन फरवरी 2026 में मुंबई में किया गया था. वहीं, प्रोजेक्ट कार्गो इंडिया का पहला संस्करण 2027 में आयोजित किया जाएगा.
इंडिया इंटरनेशनल कार्गो शो का 2026 संस्करण पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 2 से 4 दिसंबर 2026 तक मुंबई के जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर, बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में आयोजित होगा. 2027 संस्करण की तारीखों और अन्य विवरणों की घोषणा बाद में की जाएगी.
अपस्ट्रीम बिजनेस सॉल्यूशंस एलएलपी के संस्थापक और CEO मोहित मेवानी ने कहा कि IICS अपनी मौजूदा पहचान, उद्योग संबंधों और केंद्रित स्वरूप को बनाए रखेगा. साथ ही, प्रदर्शकों और प्रतिभागियों को मेस्से म्यूनचेन के वैश्विक नेटवर्क, क्षेत्रीय विशेषज्ञता और संसाधनों का लाभ मिलेगा.
लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में बड़ा पोर्टफोलियो तैयार करने की रणनीति
मेस्से म्यूनचेन इंडिया ने 2007 में भारत में परिचालन शुरू किया था. कंपनी देश में 25 से अधिक प्रमुख बी2बी व्यापार मेलों का आयोजन करती है. इसके पोर्टफोलियो में इलेक्ट्रॉनिक्स, निर्माण मशीनरी, पर्यावरण तकनीक, प्रयोगशाला एवं विश्लेषणात्मक तकनीक, फार्मास्युटिकल प्रोसेसिंग, पेय एवं डेयरी, परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्र शामिल हैं.
IICS के अधिग्रहण और नए प्रोजेक्ट कार्गो इंडिया के साथ कंपनी भारत के तेजी से बढ़ते लॉजिस्टिक्स और सप्लाई-चेन बाजार में अपनी मौजूदगी को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.
शोधकर्ता का दावा- Anthropic और OpenAI बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के सेल्फ-इंप्रूविंग AI और सुपरइंटेलिजेंस की दिशा में तेजी से बढ़ रहे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कंपनी Anthropic के एक शोधकर्ता ने इस्तीफा देते हुए AI के तेजी से विकास को लेकर गंभीर चिंता जताई है. शोधकर्ता का कहना है कि Anthropic और उसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनी OpenAI ऐसे AI सिस्टम विकसित करने की दिशा में बहुत तेजी से आगे बढ़ रही हैं, जो खुद अपनी क्षमताओं में सुधार कर सकेंगे. उनके मुताबिक, इन तकनीकों से जुड़े जोखिमों को नियंत्रित करने के लिए अभी पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद नहीं हैं.
जैकोब कॉक्सन (Jacob Coxon) ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट की एक श्रृंखला में अपने इस्तीफे की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि वह पिछले तीन वर्षों से Anthropic और OpenAI दोनों में प्री-ट्रेनिंग रिसर्च पर काम कर रहे थे. Coxon ने दोनों कंपनियों पर सेल्फ-इंप्रूविंग सुपरइंटेलिजेंस विकसित करने की दिशा में गैर-जिम्मेदाराना तरीके से आगे बढ़ने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि AI उद्योग मौजूदा स्थिति में “हमारी जिंदगी के साथ जुआ खेल रहा है.”
AI कंपनियों के बीच बढ़ रही प्रतिस्पर्धा
Coxon की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब दुनिया की प्रमुख AI कंपनियां ऐसे सिस्टम विकसित करने की होड़ में हैं, जो लगातार अधिक जटिल और स्वायत्त कार्य कर सकें. इससे AI की सुरक्षा और उसके नियमन को लेकर बहस और तेज हो गई है. Coxon के अनुसार, आने वाले समय में उन्नत AI सिस्टम कई क्षेत्रों में इंसानों से बेहतर प्रदर्शन करने, कंप्यूटर सिस्टम में प्रवेश करने और संसाधनों व शक्ति तक पहुंच हासिल करने में सक्षम हो सकते हैं. उनका तर्क है कि इतनी गंभीर संभावित चुनौतियों वाले तकनीकी विकास को केवल निजी कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा के आधार पर आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए. Coxon ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “दोनों कंपनियां जिम्मेदारी से काम नहीं कर रही हैं. वे सीधे सेल्फ-इंप्रूविंग सुपरइंटेलिजेंस की ओर बढ़ रही हैं और हमारी जिंदगी के साथ जुआ खेल रही हैं.”
क्या है प्री-ट्रेनिंग?
प्री-ट्रेनिंग AI मॉडल विकसित करने की शुरुआती प्रक्रिया है. इस चरण में मॉडल को बड़े पैमाने पर उपलब्ध डेटा से भाषा, तथ्यों, पैटर्न और अन्य संरचनाओं को सीखने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. इसके बाद मॉडल को विशेष कार्यों या एप्लिकेशन के लिए तैयार किया जाता है.
Coxon ने यह भी दावा किया कि Anthropic और OpenAI के कर्मचारियों के बीच AI के जोखिमों को लेकर सोच में अंतर है. उनके मुताबिक, OpenAI के कई कर्मचारियों ने अभी तक इन जोखिमों के “सभ्यतागत प्रभाव” को पूरी तरह नहीं समझा है. वहीं, Anthropic के कर्मचारी जोखिमों को समझते हैं, लेकिन उनका मानना है कि प्रतिस्पर्धी कंपनियां जिम्मेदारी से काम नहीं करेंगी, इसलिए उन्हें भी उन्नत AI विकसित करना जारी रखना होगा.
Anthropic ने खुद को AI सुरक्षा और AI Alignment पर विशेष ध्यान देने वाली कंपनी के रूप में पेश किया है. हालांकि, कंपनी ने Coxon के इस्तीफे और उनके आरोपों पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. OpenAI ने भी उनके दावों पर टिप्पणी नहीं की है.
Anthropic के सुरक्षा शोधकर्ता ने भी जताई चिंता
Anthropic के Alignment Science Lead Evan Hubinger ने Coxon की कुछ चिंताओं का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया. उन्होंने कहा कि कंपनी के भीतर AI से होने वाले संभावित विनाशकारी नुकसान के जोखिम को गंभीरता से लिया जाता है. Hubinger ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर उनका आकलन है कि अगले दशक में AI के कारण पूरी मानव आबादी के खत्म होने की संभावना 10 फीसदी से अधिक है. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उनका व्यक्तिगत आकलन है और Anthropic का आधिकारिक अनुमान नहीं है.
उन्होंने कहा कि Anthropic इन जोखिमों से निपटने की कोशिश कर रही है, लेकिन सुपरइंटेलिजेंट सिस्टम को मानव हितों और उद्देश्यों के अनुरूप रखने के लिए अभी कंपनी के पास कोई निश्चित समाधान नहीं है.
Hubinger ने Coxon की पोस्ट के जवाब में कहा, “मेरा मानना है कि Anthropic अपनी पूरी कोशिश कर रही है, लेकिन हमारे पास अभी सुपरइंटेलिजेंस के लिए Alignment की समस्या हल करने की कोई योजना नहीं है और हम स्पष्ट रूप से उस दिशा में आगे भी नहीं बढ़ रहे हैं.”
AI कंपनियों के बीच समन्वय की जरूरत
Coxon का कहना है कि अधिक शक्तिशाली AI सिस्टम विकसित करने की वैश्विक होड़ को AI कंपनियों और संभवतः सरकारों के बीच बेहतर समन्वय की दिशा में ले जाना चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया कि AI की क्षमताओं में सुधार को अस्थायी रूप से रोकना उन उपायों में शामिल हो सकता है, जिनसे ऐसी प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित किया जा सके जिससे कंपनियों के लिए पीछे हटना मुश्किल हो जाए.
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या शोधकर्ताओं को ऐसे Reinforcement Learning प्रयोगों में हिस्सा लेते रहना चाहिए, जिनमें बेहद शक्तिशाली AI सिस्टम तैयार किए जा रहे हों, जबकि उनके व्यवहार को समझने के लिए पर्याप्त कठोर शोध अभी उपलब्ध नहीं है.
Coxon का इस्तीफा ऐसे समय में AI कंपनियों के भीतर चल रही उस बहस को और सामने लाता है, जिसमें इस बात पर सवाल उठ रहे हैं कि भविष्य में खुद अपनी क्षमताओं को बेहतर बनाने वाले AI सिस्टम विकसित करने के साथ जुड़े जोखिमों को कैसे नियंत्रित किया जाए.
AI उद्योग में शोधकर्ता और अधिकारी लगातार यह चिंता जाहिर कर रहे हैं कि मौजूदा AI Alignment तकनीकें अधिक स्वायत्त और शक्तिशाली सिस्टम के विकास की रफ्तार के साथ तालमेल बिठा पाएंगी या नहीं.
Coxon ने सवाल उठाया कि केवल इसलिए AI विकास को लगातार तेज करते जाना कि प्रतिस्पर्धी कंपनियां ऐसा कर रही हैं, क्या संभावित और अपरिवर्तनीय जोखिम उठाने के लिए पर्याप्त वजह हो सकती है.
जानकारी के अनुसार, दोनों ब्रोकर्स फिलहाल MSE के साथ इंटीग्रेशन का परीक्षण कर रहे हैं. ग्राहकों के लिए एक्सचेंज उपलब्ध कराने से पहले उनके ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म में कुछ प्रोडक्ट-स्तरीय बदलाव करने होंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के दो बड़े रिटेल ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म ग्रोव और जेरोधा अगले तीन से चार महीनों में मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (MSE) को कैश मार्केट ट्रेडिंग के अतिरिक्त विकल्प के तौर पर अपने प्लेटफॉर्म पर जोड़ सकते हैं. इससे MSE की रिटेल निवेशकों तक पहुंच बढ़ने और एक्सचेंज की लिक्विडिटी में सुधार की संभावना है.
जानकारी के अनुसार, दोनों ब्रोकर्स फिलहाल MSE के साथ इंटीग्रेशन का परीक्षण कर रहे हैं. ग्राहकों के लिए एक्सचेंज उपलब्ध कराने से पहले उनके ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म में कुछ प्रोडक्ट-स्तरीय बदलाव करने होंगे. हालांकि, अंतिम रोलआउट इन प्रक्रियाओं के सफलतापूर्वक पूरा होने पर निर्भर करेगा.
MSE के कैश मार्केट में रोजाना 400-500 करोड़ रुपये का कारोबार
MSE में फिलहाल कैश मार्केट का दैनिक कारोबार करीब 400-500 करोड़ रुपये है. इसमें मार्केट मेकर के जरिए किए जाने वाले लेनदेन भी शामिल हैं. एक्सचेंज के बाजार आंकड़ों के मुताबिक, 9 सितंबर को दोपहर 2:01 बजे तक ट्रेडेड वैल्यू करीब 381.7 करोड़ रुपये थी.
ग्रोव और जेरोधा जैसे बड़े रिटेल ब्रोकर्स के जुड़ने से MSE को प्रोपाइटरी ट्रेडिंग फर्मों से आगे अपना निवेशक आधार बढ़ाने में मदद मिल सकती है. इससे एक्सचेंज को बड़ी संख्या में रिटेल निवेशकों तक पहुंच मिलेगी और कारोबार में विविधता आने की उम्मीद है.
MSE से पहले से जुड़ा है ग्रोव और जेरोधा का वित्तीय संबंध
ग्रोव और जेरोधा का MSE के साथ पहले से वित्तीय संबंध भी है. एक्सचेंज ने दिसंबर 2024 और अगस्त 2025 में दो चरणों में कुल 1,240 करोड़ रुपये जुटाए थे. इन फंडिंग राउंड में ग्रोव और जेरोधा समेत कई ब्रोकरेज हाउस ने भाग लिया था. MSE भारत का तीसरा स्टॉक एक्सचेंज है और इसने इस साल की शुरुआत में औपचारिक रूप से अपना परिचालन शुरू किया था.
3-4 महीने में F&O सेगमेंट लॉन्च करने की भी तैयारी
MSE अपने फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट को लॉन्च करने की भी तैयारी कर रहा है. हालांकि, डेरिवेटिव्स कारोबार शुरू करने से पहले एक्सचेंज कैश मार्केट में स्वस्थ और टिकाऊ ट्रेडिंग वॉल्यूम विकसित करना चाहता है. F&O सेगमेंट को भी करीब तीन से चार महीने में लॉन्च किए जाने की उम्मीद है. यह समयसीमा बड़े रिटेल ब्रोकर्स के साथ MSE के इंटीग्रेशन की संभावित समयसीमा के आसपास ही है. ऐसे में डेरिवेटिव्स कारोबार शुरू करने से पहले कैश मार्केट में पर्याप्त लिक्विडिटी बनाना MSE के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण होगा.
भारत के डेरिवेटिव्स बाजार में इस समय नियामकीय और संरचनात्मक बदलाव भी हो रहे हैं. अगस्त में इक्विटी डेरिवेटिव्स गतिविधि कमजोर हुई और नए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन मैकेनिज्म को लेकर अनिश्चितता के बीच ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट्स की ट्रेडिंग संख्या महीने-दर-महीने 30 फीसदी घट गई.
बड़े ब्रोकर्स से MSE को लिक्विडिटी बढ़ाने में मिलेगी मदद
ग्रोव और जेरोधा का जुड़ना MSE को भारत के इक्विटी बाजार में एक बड़े वैकल्पिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के तौर पर स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. रिटेल निवेशकों की अधिक भागीदारी से एक्सचेंज का ट्रेडिंग बेस अधिक विविध हो सकता है और प्रोपाइटरी मार्केट पार्टिसिपेंट्स पर उसकी निर्भरता कम हो सकती है.
इंटीग्रेशन पूरा होने के बाद इन ब्रोकरेज के ग्राहकों को कैश मार्केट में लेनदेन के लिए MSE एक और एक्सचेंज विकल्प के रूप में उपलब्ध होगा. फिलहाल मुख्य फोकस तकनीकी परीक्षण और ट्रेडिंग प्रोडक्ट में जरूरी बदलावों को पूरा करने पर है. इसलिए तीन से चार महीने की अनुमानित समयसीमा सफल इंटीग्रेशन पर निर्भर करेगी.
कोच्चि की इंटरनेशनल शिप रिपेयर फैसिलिटी को संयुक्त उद्यम में ट्रांसफर करेगा कोचीन शिपयार्ड, सुविधा के विस्तार से वर्कस्टेशन की संख्या 6 से बढ़कर 10 होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कोचीन शिपयार्ड ने विलिंगडन आइलैंड, कोच्चि स्थित अपनी इंटरनेशनल शिप रिपेयर फैसिलिटी (ISRF) के संचालन और प्रबंधन के लिए DP World की कंपनी Drydocks World–Dubai FZCO के साथ 50:50 संयुक्त उद्यम (JV) बनाने को मंजूरी दी है.
प्रस्तावित सौदे के तहत कोचीन शिपयार्ड ISRF को कम से कम ₹1,800 करोड़ के मूल्यांकन पर स्लंप-सेल आधार पर नए संयुक्त उद्यम को ट्रांसफर करेगा. इस राशि का आधा भुगतान नकद में किया जाएगा, जबकि बाकी आधी राशि JV के शेयरों के रूप में प्राप्त होगी. ₹1,800 करोड़ का यह मूल्यांकन कोचीन शिपयार्ड के लिए महत्वपूर्ण है. यह 31 मार्च 2026 तक कंपनी की नेटवर्थ के करीब 30.55 फीसदी के बराबर है.
DP World की कंपनी की संचालन में बड़ी भूमिका
संयुक्त उद्यम में कोचीन शिपयार्ड और Drydocks World की 50-50 हिस्सेदारी होगी. हालांकि, Drydocks World को JV के पांच निदेशकों में से तीन नामित करने का अधिकार होगा, जबकि कोचीन शिपयार्ड दो निदेशक नामित करेगा.
इसके अलावा, Drydocks World को वरिष्ठ प्रबंधन में CEO, CFO और COO समेत प्रमुख पदों पर अधिकारियों को नामित करने का अधिकार होगा. इससे सुविधा के संचालन और प्रबंधन में DP World की कंपनी की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी.
JV विलिंगडन आइलैंड स्थित ISRF का स्वामित्व, संचालन और प्रबंधन करेगा. यहां 130 मीटर तक लंबे और 6,000 टन तक वजन वाले वाणिज्यिक और नौसैनिक जहाजों की ड्राई-डॉकिंग, रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल का काम किया जा सकेगा. साझेदार सुविधा का विस्तार करने की भी योजना बना रहे हैं. इसके तहत चार नए वर्कस्टेशन जोड़े जाएंगे, जिससे कुल संख्या छह से बढ़कर 10 हो जाएगी.
₹970 करोड़ में बनी सुविधा ने FY26 में कमाए ₹207 करोड़
करीब 30 हेक्टेयर में फैली ISRF विलिंगडन आइलैंड पर स्थित है. यह सुविधा कोचीन पोर्ट अथॉरिटी से 60 साल की लीज पर मिली जमीन और जल क्षेत्र में विकसित की गई है.
इस सुविधा के निर्माण पर करीब ₹970 करोड़ खर्च हुए हैं. इसमें 6,000 टन क्षमता वाली शिप लिफ्ट और ट्रांसफर प्रणाली, छह वर्कस्टेशन और करीब 1,400 मीटर की बर्थिंग क्षमता शामिल है. यह सुविधा एक साथ छह जहाजों को संभाल सकती है और इसकी सालाना क्षमता 82 जहाजों तक है.
ISRF का उद्घाटन जनवरी 2024 में हुआ था और उसी साल अगस्त में इसने व्यावसायिक संचालन शुरू किया. वित्त वर्ष 2025-26 में इस सुविधा ने ₹207.33 करोड़ का राजस्व हासिल किया, जो कोचीन शिपयार्ड के ऑपरेशंस से प्राप्त कुल राजस्व का करीब 4.81 फीसदी था.
भारत की शिप रिपेयर क्षमता बढ़ाने पर जोर
इस साझेदारी से Drydocks World का जहाज मरम्मत और समुद्री परिचालन का अनुभव कोचीन शिपयार्ड की मौजूदा भारतीय सुविधा के साथ जुड़ेगा. इससे कंपनी को वाणिज्यिक और नौसैनिक जहाजों की मरम्मत क्षमता बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है. Drydocks World जहाज मरम्मत, जहाजों के रूपांतरण और ऑफशोर एनर्जी सेवाओं के क्षेत्र में काम करती है. दुबई स्थित इसकी सुविधा मध्य पूर्व की सबसे बड़ी शिप रिपेयर फैसिलिटी है.
प्रस्तावित लेनदेन के लिए कोचीन पोर्ट अथॉरिटी, बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय, निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) और कोचीन शिपयार्ड के शेयरधारकों समेत संबंधित मंजूरियां जरूरी होंगी.
संयुक्त उद्यम समझौते पर 11 सितंबर को हस्ताक्षर किए जाने का प्रस्ताव है. इसके बाद JV के गठन और नियामकीय मंजूरियां मिलने के बाद अन्य अंतिम समझौतों पर हस्ताक्षर किए जाएंगे. कंपनी के मुताबिक, यह लेनदेन मौजूदा वित्त वर्ष के अंत से पहले पूरा होने की उम्मीद है.
विदेश यात्रा करने वालों और विदेशी मुद्रा में खरीदारी करने वाले ग्राहकों को मिलेगा सीधा फायदा, बैंक ने अंतरराष्ट्रीय खर्च को किफायती बनाने पर दिया जोर
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC FIRST Bank) ने अपने क्रेडिट कार्ड पोर्टफोलियो में जीरो फॉरेक्स मार्कअप की सुविधा शुरू करने की घोषणा की है. बैंक का कहना है कि इस कदम से विदेश यात्रा करने वाले, अंतरराष्ट्रीय वेबसाइटों पर खरीदारी करने वाले और विदेशी मुद्रा में लेनदेन करने वाले ग्राहकों को फायदा होगा.
नई सुविधा के तहत पात्र आईडीएफसी फर्स्ट बैंक क्रेडिट कार्ड से विदेशी मुद्रा में किए गए लेनदेन पर ग्राहकों से सामान्य फॉरेक्स मार्कअप शुल्क नहीं लिया जाएगा. आमतौर पर कार्ड जारी करने वाले बैंक विदेशी मुद्रा में होने वाले लेनदेन पर मुद्रा रूपांतरण दर के अलावा फॉरेक्स मार्कअप शुल्क लेते हैं.
1.5 से 3.5 फीसदी तक हो सकता है फॉरेक्स मार्कअप
फॉरेक्स मार्कअप आम तौर पर कार्डधारक की घरेलू मुद्रा के अलावा किसी अन्य मुद्रा में किए गए लेनदेन पर लगाया जाता है. कार्ड और बैंक के आधार पर यह शुल्क करीब 1.5 से 3.5 फीसदी तक हो सकता है. ऐसे में जीरो फॉरेक्स मार्कअप की सुविधा से नियमित रूप से विदेश यात्रा करने वाले ग्राहकों और विदेशी वेबसाइटों से खरीदारी करने वालों को अच्छी-खासी बचत हो सकती है. बैंक ने इस पहल को “Travel more. Shop more. Save more” संदेश के साथ पेश किया है. इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय खर्च को क्रेडिट कार्ड ग्राहकों के लिए अधिक किफायती बनाना है.
कई कार्ड में पहले से उपलब्ध है जीरो फॉरेक्स सुविधा
IDFC FIRST Bank अपने कुछ क्रेडिट कार्ड में पहले से ही जीरो फॉरेक्स मार्कअप की सुविधा दे रहा है. इनमें FIRST WOW!, Mayura और Diamond Reserve क्रेडिट कार्ड शामिल हैं. FIRST WOW! कार्ड पर अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए जीरो फीसदी फॉरेक्स मार्कअप की सुविधा उपलब्ध है. वहीं, Diamond Reserve को इस साल की शुरुआत में जीरो-फॉरेक्स प्रीमियम ट्रैवल क्रेडिट कार्ड के तौर पर पेश किया गया था.
क्रेडिट कार्ड बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा
बैंक की यह पहल भारत के क्रेडिट कार्ड बाजार में प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा सकती है, खासकर ट्रैवल और प्रीमियम खर्च वाले ग्राहकों के बीच. इस सेगमेंट में फॉरेक्स शुल्क के साथ-साथ एयरपोर्ट लाउंज एक्सेस, ट्रैवल रिवॉर्ड और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता जैसे फीचर ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं.
विदेश यात्रा करने वाले भारतीयों की संख्या बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय कारोबारियों व वेबसाइटों के साथ लेनदेन में वृद्धि के बीच विदेशी मुद्रा में होने वाले खर्च की लागत भी क्रेडिट कार्ड कंपनियों की ओर से दिए जाने वाले ऑफर का अहम हिस्सा बन गई है. ऐसे में जीरो फॉरेक्स मार्कअप की सुविधा ग्राहकों के लिए कार्ड चुनने में एक महत्वपूर्ण आकर्षण बन सकती है.
मई 2026 में, S.K. Mohanty उस बोर्डरूम में वापस आ गए, जहां कभी उनके पास किसी दूसरे व्यक्ति को प्रवेश से रोकने की शक्ति थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
चार साल पहले, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के कार्यरत पूर्णकालिक सदस्य के रूप में एस.के. मोहंती ने डिश टीवी के तीन स्वतंत्र निदेशकों के डीमैट खातों को बिना उनका पक्ष सुने फ्रीज करने का आदेश दिया था. बाद में जब इन तीन निदेशकों में से एक, शंकर अग्रवाल ने मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) में जनहित निदेशक के रूप में बोर्ड बैठकों में दोबारा शामिल होने की कोशिश की, तो मोहंती के नेतृत्व वाले सेबी ने विशेष रूप से उन्हें ऐसा न करने का निर्देश दिया. उसी आदेश में शामिल अन्य दो निदेशकों के लिए ऐसा कोई निर्देश नहीं था. केवल अग्रवाल को इससे रोका गया.
अब मोहंती खुद एमसीएक्स के संचालन मंडल में जनहित निदेशक के रूप में बैठे हैं. यह वही पद है, जिस पर कभी अग्रवाल थे. वही शेयर बाजार है, जहां से किसी व्यक्ति को बाहर रखने में मोहंती की भूमिका रही थी. एमसीएक्स या सेबी ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह स्थिति कम से कम सवाल खड़े करने वाली क्यों नहीं है. सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार, किसी ने इस मुद्दे पर सवाल भी नहीं उठाया है.
वह आदेश जिसका कोई बचाव नहीं कर सका
2022 में वास्तव में क्या हुआ था, इसकी शुरुआत करना जरूरी है, क्योंकि बिना किसी अतिशयोक्ति के भी यह मामला अपने आप में गंभीर है.
मार्च 2022 में मोहंती ने अग्रवाल, बी.डी. नारंग और रश्मि अग्रवाल, यानी डिश टीवी के तीन स्वतंत्र निदेशकों के खिलाफ एकतरफा आदेश पारित किया था. कंपनी द्वारा वार्षिक आम बैठक के मतदान परिणामों का खुलासा नहीं करने के मामले में उनके डीमैट खातों को फ्रीज कर दिया गया था.
एकतरफा आदेश का अर्थ है कि संबंधित पक्ष को न तो पहले कोई नोटिस दिया गया और न ही कार्रवाई से पहले अपना पक्ष रखने का अवसर मिला. सेबी के अपने उस परिपत्र में, जो इससे महज दो साल पहले जारी हुआ था, किसी प्रवर्तक के डीमैट खातों को फ्रीज करने से पहले 10 दिन का नोटिस देना अनिवार्य किया गया था. इन तीन निदेशकों को कोई नोटिस नहीं मिला.
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. जिस जानकारी को छिपाने के लिए सेबी ने इन निदेशकों के खिलाफ कार्रवाई की थी, उनके मुताबिक वह जानकारी कभी उनके बोर्ड तक पहुंची ही नहीं थी. यह जानकारी कंपनी और नियामक के बीच हुए पत्राचार में थी और स्वतंत्र निदेशकों का कहना था कि उन्हें वह पत्राचार दिखाया ही नहीं गया था. यानी उन्हें ऐसी जानकारी छिपाने के लिए दंडित किया गया, जिसके बारे में उनका कहना था कि उन्हें उसकी जानकारी ही नहीं थी.
इसके बाद मई 2022 में अग्रवाल ने कहा कि वह एमसीएक्स बोर्ड की बैठकों में दोबारा शामिल होंगे, क्योंकि उन्हें अलग रहने की अवधि समाप्त हो चुकी थी. इसके दो दिन बाद सेबी ने एक नया आदेश जारी किया. इसमें विशेष रूप से अग्रवाल को, और केवल उन्हें, अगली सूचना तक एमसीएक्स के बोर्ड कक्ष से दूर रहने का निर्देश दिया गया. नारंग या रश्मि अग्रवाल के लिए ऐसा कोई निर्देश नहीं था.
इस चयनात्मक कार्रवाई को किसी अन्य तरीके से देखना मुश्किल है. तीन लोगों में से केवल एक को अलग से निशाना बनाया गया और वह भी ऐसे मामले में जिसका एमसीएक्स से सीधा संबंध नहीं था.
प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण ने इस कार्रवाई को स्वीकार नहीं किया. न्यायाधिकरण ने पाया कि सेबी अंतिम फैसला जारी करने की अपनी समयसीमा पार कर चुका था और बाद में प्रतिबंध हटाने का आदेश दिया. हालांकि, उसने देरी के लिए जिम्मेदार पूर्णकालिक सदस्य का नाम बताने से इनकार कर दिया.
जब सेबी का अंतिम आदेश दूसरे पूर्णकालिक सदस्य अनंत बरुआ ने जारी किया, तो तीनों निदेशकों के खिलाफ सभी आरोप हटा दिए गए. कोई उल्लंघन नहीं पाया गया और कोई जुर्माना भी नहीं लगाया गया.
यानी एकतरफा आदेश के तहत पहले तीन लोगों के खाते फ्रीज किए गए और चार साल बाद मामला पूरी तरह खत्म हो गया.
वह सिद्धांत जो सच होने के लिए बहुत व्यवस्थित है
स्वाभाविक रूप से, लोग इस पूरे घटनाक्रम के पीछे नौकरशाही की गलती से बड़ा कोई कारण तलाशना चाहते हैं. अब जो कहानी सामने आ रही है, उसके मुताबिक मोहंती रास्ता साफ कर रहे थे. कहा जा रहा है कि एमसीएक्स के सबसे वरिष्ठ जनहित निदेशक के रूप में अग्रवाल अध्यक्ष पद की अगली कतार में थे और उन्हें अयोग्य ठहराना मकसद था, जबकि हर्ष कुमार भनवाला उस पद पर आने की तैयारी कर रहे थे.
यह एक आकर्षक कहानी है. लेकिन उपलब्ध दस्तावेज इसके उलट तस्वीर पेश करते हैं.
भनवाला को एमसीएक्स के जनहित निदेशकों के बीच से अध्यक्ष नहीं बनाया गया था. उन्हें नाबार्ड से लाया गया था और सेबी की मंजूरी के बाद 7 नवंबर 2022 से प्रभावी अध्यक्ष नियुक्त किया गया था.
अग्रवाल को भी वास्तव में कभी हटाया नहीं गया था. एमसीएक्स की फरवरी 2023 तक की शेयर बाजार संबंधी सूचना में उन्हें कार्यरत जनहित निदेशक के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. यानी भनवाला के अध्यक्ष पद संभालने के करीब तीन महीने बाद तक अग्रवाल कागजों पर बोर्ड में मौजूद थे.
जिस व्यक्ति को कथित तौर पर उत्तराधिकार की दौड़ से बाहर करने की योजना बताई जा रही थी, वह उस समय भी रिकॉर्ड में मौजूद था, जब अध्यक्ष पद की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी.
इससे किसी को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता. इसका अर्थ केवल इतना है कि वास्तविक मामला किसी बड़ी साजिश से छोटा और अधिक विचित्र हो सकता है. लेकिन छोटा और वास्तविक सवाल उस बड़ी कहानी से अधिक महत्वपूर्ण है, जो दस्तावेजों की तारीखें सामने आते ही कमजोर पड़ जाती है.
वह हिस्सा जिस पर अभी कोई बात नहीं कर रहा
क्योंकि असली सवाल यह होना चाहिए और फिलहाल नहीं है.
मई 2026 में एमसीएक्स ने एस.के. मोहंती को अपने ही संचालन मंडल में शामिल कर लिया. वह जनहित निदेशक बने.
2022 की घटनाओं को पूरी तरह अलग रख दें, तब भी यह समयक्रम सवाल खड़े करता है. मोहंती ने सेबी के पूर्णकालिक सदस्य के रूप में पांच साल बिताए और उनके पास उसी तरह के बाजार ढांचे पर नियामकीय अधिकार था, जिसका प्रतिनिधित्व एमसीएक्स करता है.
वह जून 2023 में सेबी से बाहर हुए. तीन साल से भी कम समय बाद वह उसी शेयर बाजार के संचालन मंडल में आ गए, जिसकी निगरानी कभी उनका पुराना विभाग करता था.
इस दौरान भी वह निष्क्रिय नहीं रहे. सार्वजनिक सूचनाओं के मुताबिक, सेबी छोड़ने के बाद उन्होंने यूपीएल, एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया, सीएएमएस और बजाज फिनसर्व एएमसी में निदेशक पद हासिल किए. यह नियुक्तियों का ऐसा समूह है जो किसी बड़े कारोबारी समूह के शीर्ष अधिकारी को भी प्रभावित कर सकता है.
इसे जैसा है वैसा ही कहना चाहिए. यह किसी गड़बड़ी का सबूत नहीं है, बल्कि हितों के संभावित टकराव से जुड़े उस ढांचे पर सवाल उठाता है, जहां अलग-अलग देखें तो कोई एक नियुक्ति इतनी असामान्य नहीं लगती कि उसे रोका जा सके.
वरिष्ठता का सवाल: क्या मोहंती बनेंगे एमसीएक्स के अध्यक्ष?
एक और तथ्य को बिना किसी निष्कर्ष के रिकॉर्ड पर रखना जरूरी है. एमसीएक्स के जनहित निदेशक आम तौर पर वरिष्ठता के आधार पर अध्यक्ष पद की अगली कतार में होते हैं.
वर्तमान में बोर्ड के सबसे वरिष्ठ जनहित निदेशक पूर्व भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड के पूर्णकालिक सदस्य तथा सशस्त्र बलों की पृष्ठभूमि वाले डॉ. नवरंग सैनी हैं. उन्हें एक ईमानदार अधिकारी के रूप में देखा जाता है.
किसी भी सार्वजनिक सूचना, प्रस्ताव या बयान में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि वरिष्ठता के आधार पर अगले एमसीएक्स अध्यक्ष बनने वाले सैनी को बदलने या हटाने की कोई प्रक्रिया चल रही है.
फिर भी, यह ऐसा घटनाक्रम है जिस पर नजर रखना जरूरी है, खासकर इसलिए कि अब बोर्ड में कौन-कौन मौजूद है. इससे ज्यादा और इससे कम नहीं.
अगर डॉ. सैनी को किसी तरह हटाया जाता है, तो मोहंती अगले एमसीएक्स अध्यक्ष बन सकते हैं.
एक पूर्णकालिक सदस्य द्वारा एक स्वतंत्र निदेशक के खिलाफ पारित एकतरफा आदेश अपील में खारिज कर दिया गया. तीन साल बाद वही अधिकारी उसी शेयर बाजार के संचालन मंडल में बैठे हैं, जिसे उनके आदेश ने कभी एक व्यक्ति को बाहर रखने की कोशिश की थी.
यह कोई अनुमान नहीं है. यह घटनाक्रमों का दर्ज इतिहास है.
एमसीएक्स और सेबी ने सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि संभावित हितों का यह टकराव क्यों नहीं माना जाना चाहिए. मौजूदा सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर इस सवाल का कोई स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आया है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
2,800 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर से माल परिवहन में समय और लागत घटने की उम्मीद, दादरी से मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट तक रेल कनेक्टिविटी हुई मजबूत
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को करीब ₹73,000 करोड़ की लागत से तैयार पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारे (Western Dedicated Freight Corridor) को राष्ट्र को समर्पित किया. उत्तर प्रदेश के दादरी से महाराष्ट्र के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (JNPA) तक फैला यह कॉरिडोर देश के माल परिवहन नेटवर्क के लिए बड़ा बदलाव माना जा रहा है. इसके पूरा होने से उत्तर भारत के औद्योगिक क्षेत्रों और पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाहों के बीच माल की आवाजाही तेज होने के साथ लॉजिस्टिक्स लागत घटने की उम्मीद है.
20 साल बाद पूरा हुआ बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट
पश्चिमी DFC करीब 2,800 किलोमीटर लंबा है और इसकी योजना को औपचारिक रूप से वर्ष 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में शुरू किया गया था. इस परियोजना ने करीब दो दशकों में तीन प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल देखे. इसके साथ ही देश के दो प्रमुख समर्पित माल ढुलाई गलियारों को पूरा करने का लक्ष्य हासिल हो गया है.
इससे पहले पंजाब और बिहार से पश्चिम बंगाल तक जुड़ने वाला पूर्वी समर्पित माल ढुलाई गलियारा अक्टूबर 2023 में पूरा हुआ था. पूर्वी DFC पर करीब ₹51,000 करोड़ खर्च हुए हैं. दोनों कॉरिडोर की कुल लागत लगभग ₹1.24 लाख करोड़ रही है.
30 घंटे की जगह 10-12 घंटे में पूरी होगी यात्रा
पश्चिमी DFC पर मालगाड़ियों की अधिकतम गति 100 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है. अधिकारियों के मुताबिक, जहां सामान्य रेलवे ट्रैक पर 100 किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब छह घंटे लगते हैं, वहीं DFC पर यही दूरी औसतन ढाई घंटे में पूरी की जा सकती है.
प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, एक ट्रक को जिस यात्रा में करीब 30 घंटे लगते हैं, वही दूरी DFC के जरिए 10-12 घंटे में पूरी की जा सकती है. इससे माल ढुलाई की गति बढ़ने के साथ कारोबारियों के लिए परिवहन लागत में भी कमी आने की उम्मीद है.
मुंद्रा, कांडला और पिपावाव के साथ JNPA की कनेक्टिविटी मजबूत
पश्चिमी DFC को देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों और बंदरगाहों को जोड़ने वाली अहम कड़ी माना जा रहा है. यह मुंद्रा, कांडला, पिपावाव और JNPA जैसे प्रमुख बंदरगाहों को उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के औद्योगिक केंद्रों से जोड़ता है. विशेष रूप से JNPA से जुड़ने वाला अंतिम महत्वपूर्ण हिस्सा लंबे समय से परियोजना की सबसे बड़ी बाधाओं में शामिल था. अब इसके पूरा होने से देश के सबसे बड़े सरकारी कंटेनर बंदरगाहों में शामिल JNPA को उत्तर भारत से सीधे और तेज रेल संपर्क का फायदा मिलेगा.
कंटेनर ढुलाई में डबल-स्टैक ट्रेन से बढ़ेगी क्षमता
कॉरिडोर के पूरा होने से कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों को भी बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है. JNPA तक डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेन चलने से अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध होगी और बंदरगाह पर कंटेनरों के टर्नअराउंड में भी सुधार आ सकता है. हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक वास्तविक लागत बचत अनुमान से कम रह सकती है. कंटेनर ट्रेन ऑपरेटर एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष पुरी के अनुसार, मौजूदा नियमों और कंटेनरों के वजन एवं आकार से जुड़ी पाबंदियों के कारण डबल-स्टैकिंग का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है.
उनके मुताबिक, डबल-स्टैक कंटेनरों के लिए ट्रेन की गति भी 65-70 किलोमीटर प्रति घंटा तक सीमित हो सकती है, जबकि सिंगल-स्टैक ट्रेनें 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चल सकती हैं.
फीडर रूट और पोर्ट क्षमता में सुधार की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि DFC से अधिकतम लाभ हासिल करने के लिए सिर्फ मुख्य कॉरिडोर को तेज करना पर्याप्त नहीं होगा. बंदरगाहों को DFC से जोड़ने वाले फीडर रूट और सामान्य रेलवे नेटवर्क से DFC के इंटरचेंज पॉइंट को भी बेहतर करना होगा.
इसके अलावा, JNPA पर बढ़ने वाले कंटेनर यातायात को संभालने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी. बढ़ते रेल यातायात के साथ अगर बंदरगाह पर भीड़ बढ़ती है तो DFC से मिलने वाला समय लाभ प्रभावित हो सकता है.
लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के लिए गेमचेंजर बनने की उम्मीद
पश्चिमी और पूर्वी DFC के पूरा होने से देश में माल ढुलाई के लिए अलग रेल नेटवर्क तैयार हो गया है. इसका उद्देश्य मालगाड़ियों को यात्री ट्रेनों से अलग करके तेज, भरोसेमंद और अधिक कुशल परिवहन उपलब्ध कराना है.
पश्चिमी DFC खास तौर पर उत्तर भारत के औद्योगिक क्षेत्रों को पश्चिमी तट के बंदरगाहों से जोड़कर निर्यात-आयात कारोबार को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. इससे माल ढुलाई का समय कम होने, लॉजिस्टिक्स लागत घटने और उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ने की उम्मीद है.
UPI, आधार आधारित भुगतान और डिजिटल लेंडिंग ने बढ़ाई वित्तीय पहुंच, MSME के लिए कर्ज की राह आसान करने में भी तकनीक की अहम भूमिका
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के फिनटेक इकोसिस्टम ने देश की वित्तीय व्यवस्था को बड़े स्तर पर बदल दिया है. डिजिटल तकनीक की मदद से बैंकिंग और औपचारिक वित्तीय सेवाएं ग्रामीण इलाकों तक पहुंची हैं और लोगों के लिए भुगतान, बैंकिंग तथा कर्ज लेना पहले के मुकाबले आसान हुआ है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मंगलवार को मुंबई में ग्लोबल फिनटेक फेस्ट (GFF) 2026 के उद्घाटन के दौरान यह बात कही.
मल्होत्रा ने कहा कि फिनटेक कंपनियां भारत की विशाल और विविध आबादी तथा औपचारिक वित्तीय व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरी हैं. इनके चलते वित्तीय सेवाओं की लागत कम हुई है, ग्राहक अनुभव बेहतर हुआ है और पूरी व्यवस्था की दक्षता बढ़ी है.
शाखा से निकलकर हर नागरिक के हाथ तक पहुंची बैंकिंग
RBI गवर्नर ने कहा कि पिछले एक दशक में फिनटेक ने भारत की वित्तीय व्यवस्था के ढांचे को बुनियादी रूप से बदल दिया है. बैंकिंग अब सिर्फ बैंक शाखाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि डिजिटल माध्यमों के जरिए सीधे नागरिकों के हाथ तक पहुंच गई है. उन्होंने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI), आधार आधारित भुगतान प्रणाली और जनधन इकोसिस्टम को इस डिजिटल विस्तार की प्रमुख आधारभूत व्यवस्थाओं के रूप में रेखांकित किया. इन प्रणालियों की मदद से उन आबादी वर्गों तक भी वित्तीय सेवाएं पहुंची हैं, जो पहले औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से कम जुड़े हुए थे.
खाते खोलने से लेकर भुगतान तक, सब कुछ हुआ तेज
मल्होत्रा के मुताबिक, तकनीक ने केवल वित्तीय सेवाओं की पहुंच नहीं बढ़ाई, बल्कि इन्हें उपलब्ध कराने के तरीके को भी बदल दिया है. डिजिटल सिस्टम ने बैंक खाते खोलने और भुगतान निपटाने में लगने वाला समय कम किया है. इससे लेनदेन की लागत घटी है. साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस आधारित एनालिटिक्स की मदद से धोखाधड़ी की पहचान करने की क्षमता भी मजबूत हुई है.
उन्होंने रियल टाइम सुपरविजन में तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल का भी उल्लेख किया. इसके जरिए वित्तीय संस्थान और नियामक संभावित जोखिमों की पहले पहचान कर सकते हैं और तेजी से कार्रवाई कर सकते हैं.
MSME को कर्ज दिलाने में डिजिटल सिस्टम की बड़ी भूमिका
फिनटेक का प्रभाव
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण रहा है. छोटे कारोबारों के लिए औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से कर्ज हासिल करना लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है. मल्होत्रा ने कहा कि कैश फ्लो आधारित लेंडिंग, अकाउंट एग्रीगेटर और यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म छोटे कारोबारों की वित्तीय स्थिति को बेहतर तरीके से समझने में ऋणदाताओं की मदद कर रहे हैं.
इन प्रणालियों के जरिए कर्ज देने वाली संस्थाएं केवल पारंपरिक संपार्श्विक पर निर्भर रहने के बजाय डिजिटल वित्तीय जानकारी के आधार पर भी उधारकर्ता की क्षमता का आकलन कर सकती हैं. इससे छोटे कारोबारियों और उद्यमियों के लिए औपचारिक कर्ज तक पहुंच बढ़ने की संभावना है.
RBI फिनटेक को मानता है महत्वपूर्ण साझेदार
RBI गवर्नर ने कहा कि केंद्रीय बैंक भविष्य की वित्तीय व्यवस्था तैयार करने में फिनटेक को एक महत्वपूर्ण साझेदार मानता है. उन्होंने नियामकीय सैंडबॉक्स, रिजर्व बैंक इनोवेशन हब और स्टार्टअप्स, फिनटेक कंपनियों तथा अन्य हितधारकों के साथ लगातार संवाद का उल्लेख किया. उनके मुताबिक, लगातार खुले और रचनात्मक संवाद के जरिए ही बेहतर नीतियां तैयार की जा सकती हैं.
नवाचार के साथ ग्राहक सुरक्षा भी जरूरी
फिनटेक क्षेत्र के तेजी से विस्तार के बीच RBI ने उद्योग में स्व-नियमन को भी बढ़ावा दिया है. मल्होत्रा ने कहा कि तकनीकी नवाचार के साथ ग्राहक सुरक्षा, डेटा और लेनदेन की सुरक्षा तथा भरोसे से जुड़े मजबूत उपाय भी जरूरी हैं.
उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक का उद्देश्य ऐसा वित्तीय वातावरण तैयार करना है, जहां नवाचार को बढ़ावा मिले और इसके साथ वित्तीय व्यवस्था सुरक्षित, समावेशी, निष्पक्ष और कुशल भी बनी रहे.
डिजिटल ढांचा बना वित्तीय व्यवस्था का अहम हिस्सा
RBI गवर्नर की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब भारत की वित्तीय व्यवस्था में डिजिटल ढांचे की भूमिका लगातार बढ़ रही है. डिजिटल प्लेटफॉर्म ने लोगों और कारोबारों के भुगतान करने, कर्ज लेने तथा बैंकिंग और अन्य वित्तीय सेवाओं का इस्तेमाल करने के तरीके को तेजी से बदल दिया है.
फिनटेक के विस्तार के साथ भारत में वित्तीय सेवाओं का दायरा अब पारंपरिक बैंक शाखाओं से आगे बढ़कर मोबाइल, डिजिटल पहचान और आंकड़ों पर आधारित प्रणालियों तक पहुंच गया है. इससे वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिलने के साथ छोटे कारोबारों के लिए औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से कर्ज हासिल करना भी आसान होने की उम्मीद है.
इनसाइडर ट्रेडिंग से लेकर शेयर कीमतों में हेरफेर तक पर सख्त निगरानी, नए फ्रेमवर्क में गलत जानकारी फैलाने और कृत्रिम मांग बनाने पर भी कार्रवाई
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
गिफ्ट सिटी के वित्तीय बाजार में इनसाइडर ट्रेडिंग, धोखाधड़ी और बाजार में हेरफेर करने वालों पर अब और सख्त कार्रवाई होगी. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (IFSCA) ने प्रतिभूति बाजारों में बाजार के दुरुपयोग को रोकने के लिए नया ‘मार्केट अब्यूज फ्रेमवर्क 2026’ अधिसूचित किया है. यह नया ढांचा गिफ्ट सिटी में लागू भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के पुराने इनसाइडर ट्रेडिंग और धोखाधड़ी से जुड़े नियमों की जगह लेगा.
इनसाइडर ट्रेडिंग और हेरफेर पर सख्ती
नए नियमों के तहत धोखाधड़ी वाले लेनदेन, प्रतिभूतियों की कीमतों और बेंचमार्क में हेरफेर, कृत्रिम मांग पैदा करने, सर्कुलर ट्रेडिंग और गलत या भ्रामक जानकारी फैलाने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाई गई है. इसके अलावा ऐसे ऑर्डर देना और बाद में रद्द करना भी नियमों के दायरे में आएगा, जिनका मकसद वास्तविक कारोबार करना नहीं बल्कि किसी प्रतिभूति की मांग, आपूर्ति या कीमत को कृत्रिम रूप से प्रभावित करना हो.
गलत खबर फैलाने पर भी कार्रवाई
नए फ्रेमवर्क में डिजिटल और फिजिकल मीडिया के जरिए गलत या भ्रामक जानकारी फैलाने पर भी रोक लगाई गई है. ऐसी जानकारी भी प्रतिबंधित होगी, जिससे निवेशक किसी प्रतिभूति को खरीदने या बेचने के लिए प्रभावित हो सकते हैं. ग्राहक की अनुमति के बिना ट्रेड करना और कृत्रिम ट्रेडिंग गतिविधियां चलाना भी बाजार दुरुपयोग की श्रेणी में आएगा.
इनसाइडर्स के लिए क्या हैं नियम?
नए नियमों के तहत किसी कंपनी या बाजार से जुड़ी ऐसी अहम जानकारी रखने वाले व्यक्ति, जो अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, उसे बिना वैध कारण साझा नहीं कर सकेंगे. ऐसी जानकारी रखने वाले व्यक्ति को संबंधित प्रतिभूतियों में खुद ट्रेड करने या किसी अन्य व्यक्ति से ट्रेड करवाने की भी अनुमति नहीं होगी. इस तरह की गैर-सार्वजनिक महत्वपूर्ण जानकारी के आधार पर किए गए कारोबार को इनसाइडर ट्रेडिंग माना जाएगा.
बड़े ट्रेड की जानकारी देना जरूरी
नियंत्रक शेयरधारकों, निदेशकों और अन्य निर्धारित व्यक्तियों के लिए भी रिपोर्टिंग की व्यवस्था की गई है. उन्हें 25,000 डॉलर की तय तिमाही सीमा से अधिक के कारोबार की जानकारी दो कारोबारी दिनों के भीतर देनी होगी. सूचीबद्ध कंपनियों को ऐसी जानकारी मिलने के दो कारोबारी दिनों के भीतर संबंधित एक्सचेंज को इसकी सूचना देनी होगी. साथ ही कंपनी की वेबसाइट पर भी इसका खुलासा करना जरूरी होगा.
कंपनियों को मजबूत करना होगा आंतरिक नियंत्रण
नए नियमों के तहत सूचीबद्ध कंपनियों को बाजार के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी आंतरिक नियंत्रण और आचार संहिता तैयार करनी होगी. इन नियंत्रणों में अहम गैर-सार्वजनिक जानकारी की पहचान और उसकी गोपनीयता बनाए रखना, ऐसी जानकारी के अनधिकृत संचार को रोकना और उन कर्मचारियों की पहचान करना शामिल होगा, जिनकी ऐसी संवेदनशील जानकारी तक पहुंच है. इन व्यवस्थाओं की समय-समय पर समीक्षा भी करनी होगी.
नियम तोड़ने पर हो सकती है कड़ी कार्रवाई
IFSCA नियमों के उल्लंघन पर संबंधित कानून के तहत कार्रवाई कर सकता है. इसमें चेतावनी या निंदा से लेकर नियमन वाली इकाइयों या संबंधित व्यक्तियों का पंजीकरण रद्द करने तक की कार्रवाई शामिल है. गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों में गिफ्ट सिटी के नियामक ने कथित उल्लंघनों के मामलों में कार्रवाई तेज की है. इनमें जुर्माना लगाने और पंजीकरण रद्द करने जैसे कदम भी शामिल हैं.
पुराने SEBI नियमों की जगह नया फ्रेमवर्क
नए नियम लागू होने के साथ ही IFSCA में SEBI के ‘इनसाइडर ट्रेडिंग पर रोक लगाने वाले नियम, 2015’ और ‘प्रतिभूति बाजार से जुड़ी धोखाधड़ी एवं अनुचित व्यापार गतिविधियों पर रोक लगाने वाले नियम, 2003’ अब लागू नहीं होंगे. नए फ्रेमवर्क के जरिए IFSCA ने गिफ्ट सिटी के प्रतिभूति बाजार के लिए बाजार दुरुपयोग के मामलों से निपटने का एक व्यापक और एकीकृत नियामकीय ढांचा तैयार किया है.