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पहली बार रुपया डॉलर के सामने 92.39 पर, कच्चा तेल महंगा और अर्थव्यवस्था दबाव में
वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता के बीच, शुक्रवार को एक डॉलर की कीमत 92.39 रुपये तक पहुँच गई. इससे पहले पिछले कारोबारी सत्र में रुपये ने 92.3575 का निचला स्तर छुआ था.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago
शुक्रवार को भारतीय रुपये ने डॉलर के मुकाबले एक बार फिर गिरावट दर्ज की और अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर 92.39 रुपये पर पहुँच गया. मध्य पूर्व में जारी युद्ध और महंगे कच्चे तेल ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाया है. इस बीच, भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को संभालने के लिए सक्रिय रूप से हस्तक्षेप कर रहा है, लेकिन वैश्विक उथल-पुथल और बढ़ती ऊर्जा लागत ने आर्थिक जोखिम बढ़ा दिए हैं.
डॉलर के सामने रुपया धड़ाम
वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता के बीच, शुक्रवार को एक डॉलर की कीमत 92.39 रुपये तक पहुँच गई. इससे पहले पिछले कारोबारी सत्र में रुपये ने 92.3575 का निचला स्तर छुआ था, लेकिन शुक्रवार की गिरावट ने यह रिकॉर्ड भी तोड़ दिया. रुपये की इस तेजी से गिरती कीमत ने बाजारों में चिंता बढ़ा दी है.
कच्चे तेल की आग में झुलसती भारतीय मुद्रा
रुपये की गिरावट का सबसे बड़ा कारण मध्य पूर्व में युद्ध है. ईरान में जारी संघर्ष ने वैश्विक बाजारों में डर और अनिश्चितता पैदा कर दी है. युद्ध से पहले कच्चा तेल लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल था, जो अब 100 डॉलर के करीब पहुँच गया है. भारत अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर तेल के आयात पर निर्भर है. तेल की महंगाई के कारण देश को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे रुपये पर दबाव और बढ़ गया है.
रुपये और अर्थव्यवस्था पर असर
ईरान युद्ध के बाद से भारतीय मुद्रा में एक प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की जा चुकी है. महंगे तेल और कमजोर रुपये का असर सीधे देश के आर्थिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल जैसी बुनियादी चीजों के बढ़ते दाम ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला महंगी कर देते हैं. यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है.
रिजर्व बैंक बना अस्थिरता में ढाल
इस बीच राहत की बात यह है कि अन्य उभरते बाजारों की मुद्राओं की तुलना में भारतीय रुपये की स्थिति थोड़ी बेहतर बनी हुई है. इसके पीछे भारतीय रिजर्व बैंक का सक्रिय हस्तक्षेप है. RBI ने समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में कदम उठाया, ताकि रुपये की गिरावट को रोका जा सके. हालांकि, जब तक मध्य पूर्व की स्थिति सामान्य नहीं होती और तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, बाजार में अस्थिरता बनी रहेगी.
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