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धारावी की निर्णायक करवट: कैसे बदले गए नियमों ने ₹3 लाख करोड़ के सपने की दिया नया आकार

भाग 2: सेकलिंक की सुप्रीम कोर्ट की लड़ाई ने एक ऐसे टेंडर की परतें खोलीं, जिसने बोली की राशि घटा दी, हिस्सेदारी की दिशा बदल दी, और भारत के शहरी पुनर्निर्माण को चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago

पलक शाह

जब धारावी पुनर्विकास परियोजना (DRP) को पहली बार 2018 में टेंडर किया गया था, तब इसे पारदर्शी वैश्विक भागीदारी के लिए एक मॉडल के रूप में पेश किया गया था. चार साल बाद, जब 2022 में एक नया टेंडर आया, तो उसमें सूक्ष्म लेकिन निर्णायक बदलाव किए गए, जिन्होंने यह तय किया कि कौन बोली लगा सकता है, उसे कितनी राशि देनी होगी, और उसे क्या लाभ मिल सकता है. ये संशोधन अब सुप्रीम कोर्ट में सेकलिंक टेक्नोलॉजीज कॉर्पोरेशन द्वारा दायर एक याचिका के केंद्र में हैं. यह दुबई आधारित कंसोर्टियम दावा करता है कि उसे उस परियोजना से बाहर कर दिया गया जिसे वह पहले ही बहुत अधिक बोली मूल्य पर जीत चुका था, जबकि अंतिम विजेता अडानी प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड थी.

सुप्रीम कोर्ट, हालांकि उसने चल रहे प्रोजेक्ट को रोकने से इनकार कर दिया है, लेकिन इस बात की जांच करने पर सहमत हो गया है कि क्या ये बदलाव वास्तव में पहले के बोलीदाता को निष्पक्ष शर्तों पर प्रतिस्पर्धा करने से “वंचित” करते हैं.

धारावी पुनर्विकास परियोजना का कुल मौद्रिक मूल्य लगभग ₹3 लाख करोड़ (लगभग $36 बिलियन) आंका गया है, जैसा कि परियोजना के सीईओ एसवीआर श्रीनिवास ने बताया. यह विशाल राशि मुख्य रूप से पुनर्विकसित भूमि के एक बड़े हिस्से की मुक्त बिक्री से उत्पन्न होती है. इस परियोजना का नेतृत्व एक संयुक्त उद्यम नवभारत मेगा डेवलपर्स प्रा. लि. (NMDPL) कर रही है, जिसमें अडानी समूह की 80% हिस्सेदारी है और महाराष्ट्र सरकार की 20% हिस्सेदारी. मुद्रीकरण एक पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के माध्यम से होगा जो पुनर्वास को वाणिज्यिक विकास के साथ संतुलित करता है.

वैश्विक खुली बोली से सशर्त पहुंच तक

पहला टेंडर DRP/1/2018, दिनांक 28 नवंबर 2018 एक वैश्विक प्रक्रिया के रूप में डिजाइन किया गया था. इसमें भारतीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों डेवलपर्स को 600 एकड़ की झुग्गी पुनर्विकास परियोजना के लिए समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने का आमंत्रण दिया गया था.

इसके विपरीत, 1 अक्टूबर 2022 को जारी नया टेंडर (DRP/2/2022) में कई नई पात्रता शर्तें जोड़ी गईं, जो याचिका के अनुसार, प्रतिस्पर्धा के दायरे को सीमित करती हैं और घरेलू बोलीदाताओं की ओर संतुलन को झुका देती हैं.

साथ-साथ तुलना: 2018 बनाम 2022 टेंडर ढांचा

पैरामीटर              2018 टेंडर (DRP/1/2018)                     2022 टेंडर (DRP/2/2022)                                                            प्रभाव (जैसा याचिका में कहा गया) 

न्यूनतम नेट वर्थ    ₹20,000 करोड़ (समूह स्तर पर पात्रता)  ₹20,000 करोड़ (केवल भारतीय संस्था या संयुक्त साझेदार से)   विदेशी नेतृत्व वाले कंसोर्टियम जैसे सेकलिंक को बाहर कर                                                                                                                                                                           दिया गया 

भूमि का दायरा    259 हेक्टेयर (राज्य स्वामित्व + अधिसूचित निजी भूमि)  259 हेक्टेयर + लगभग 45 एकड़ रेलवे भूमि        रेलवे भूमि की समावेशिता को पहले टेंडर की रद्दीकरण का                                                                                                                                                                                कारण बताया गया, हालांकि कोई अधिग्रहण नहीं हुआ.

बोली सुरक्षा जमा राशि    ₹400 करोड़ अग्रिम                                    ₹100 करोड़ अग्रिम                                             नई बोलीदाताओं के लिए प्रवेश बाधाएं कम हुईं 

SPV में सरकारी इक्विटी   20%                                                           20% (बदला नहीं)                                         कोई परिवर्तन नहीं, लेकिन संरचना लीड बिडर को तेज

                                                                                                                                                                         हस्तांतरण की ओर झुकाती है

बोली पैरामीटर (वित्तीय प्रस्ताव)    महाराष्ट्र सरकार को एकमुश्त अग्रिम प्रीमियम   अग्रिम + स्थगित घटकों के साथ “संयुक्त विकास मॉडल”         मूल्यांकन ढांचे में बदलाव के                                                                                                                                                                                                   कारण ₹7,200 करोड़ की बोली की तुलना कठिन 

TDR (हस्तांतरणीय विकास अधिकार)  सीमित और परियोजना-लिंक्ड सत्यापन पर आधारित    उदार उपयोग और व्यापक ट्रेडिंग अधिकार   याचिका में कहा गया कि इससे बड़े बैलेंस                                                                                                                                                                                       शीट वाले रियल एस्टेट खिलाड़ियों को लाभ मिला 

विदेशी स्वामित्व खंड      विदेशी कंपनियों को FDI मानदंडों के तहत अनुमति   "प्रमुख सदस्य" के लिए "भारतीय बहुल भागीदारी" अनिवार्य  पूरी तरह से विदेशी नेतृत्व वाले कंसोर्टियम                                                                                                                                                                                जैसे सेकलिंक को प्रभावी रूप से बाहर कर दिया गया 

याचिकाकर्ता का तर्क: ‘जानबूझकर बाहर करने के लिए डिजाइन किया गया’

सेकलिंक की याचिका का तर्क है कि 2022 के टेंडर ने “मूलभूत रूप से खेल के नियम बदल दिए”, जो कि अनुच्छेद 14 के तहत सार्वजनिक खरीद में निष्पक्षता और पारदर्शिता के दायित्व का उल्लंघन है.

कंपनी का कहना है कि पहले की प्रक्रिया को रद्द करने के लिए कोई ठोस कारण नहीं दिया गया, जबकि उसे पहले ही ₹7,200 करोड़ की सबसे ऊंची बोली के रूप में घोषित किया जा चुका था, जो नई विजेता बोली से ₹2,100 करोड़ अधिक थी.

कंपनी का यह भी दावा है कि विदेशी भागीदारी पर प्रतिबंध केवल 2022 में जोड़ा गया, “बिना किसी कानूनी या नीतिगत आधार के”.

- बोली सुरक्षा जमा ₹400 करोड़ से घटाकर ₹100 करोड़ करने से छोटे घरेलू खिलाड़ियों के लिए प्रवेश आसान हो गया.

- और TDR के प्रावधानों में बदलाव ने इस परियोजना को एक वाणिज्यिक रियल एस्टेट खेल में बदल दिया, न कि पुनर्वास-आधारित पुनर्विकास में.

राज्य का पक्ष

महाराष्ट्र सरकार ने उच्च न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में इन बदलावों को “नीतिगत निर्णय” बताया, जो रेलवे भूमि के समावेश और महामारी के बाद अधिक लचीले विकास मॉडल की आवश्यकता के कारण किए गए.

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि 2018 का टेंडर अब वैधता खो चुका था और उसे बिना नई मंजूरी के फिर से शुरू नहीं किया जा सकता था. बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने 20 दिसंबर 2024 के फैसले में इस तर्क को स्वीकार किया, यह मानते हुए कि रद्दीकरण सरकार के विवेकाधिकार में है, बशर्ते वह जनहित में किया गया हो.

सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया: एक विभाजित दृष्टिकोण

जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाया.

- उसने टेंडर रद्द करने में कोई तत्काल खामी नहीं पाई, क्योंकि रेलवे भूमि का समावेश एक वैध कारण हो सकता था.

- लेकिन उसने नई पात्रता शर्तों पर संभावित जांच की आवश्यकता पर बल दिया, यह टिप्पणी करते हुए कि वे “पहले के बोलीदाता को भाग लेने से अक्षम कर सकती हैं”.

अदालत ने सभी मूल सरकारी फाइलों को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया और यह आदेश दिया कि परियोजना की सभी वित्तीय निकासी एक निगरानी वाले बैंक खाते के माध्यम से की जाएं, ताकि केस लंबित रहने तक पारदर्शिता बनी रहे.

क्यों है यह मामला महत्वपूर्ण

दोनों टेंडर के बीच का अंतर ₹7,200 करोड़ बनाम ₹5,069 करोड़ सिर्फ अंकगणित नहीं है. यह सवाल उठाता है कि कैसे सार्वजनिक टेंडर बंद दरवाजों के पीछे विकसित होते हैं, और क्या "नीतिगत परिवर्तन" पहले ही पूरी हो चुकी प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का उचित आधार हो सकते हैं.

धारावी के दस लाख निवासियों के लिए सवाल यह नहीं है कि कौन नया टाउनशिप बनाएगा बल्कि यह है कि जो प्रक्रिया इसे तय करती है, क्या वह न्याय और पारदर्शिता की कसौटी पर खरी उतरती है.

जैसे ही सुप्रीम कोर्ट 13 अक्टूबर 2025 की सुनवाई की तैयारी करता है, 2018 और 2022 के वे सूक्ष्म बदलाव शायद भारत की सबसे चर्चित शहरी पुनर्विकास परियोजना का भविष्य तय करेंगे

दस्तावेज सन्दर्भ (सभी “धारावी सुप्रीम कोर्ट याचिका आदेश”, 2025 से):

- 2018 टेंडर (DRP/1/2018): पृष्ठ 284–313

- सचिवों की समिति का प्रस्ताव: पृष्ठ 314–322

- सरकार का रद्दीकरण एवं कैबिनेट प्रस्ताव: पृष्ठ 330–342

- 2022 टेंडर (DRP/2/2022): पृष्ठ 467–656

- नया टेंडर संशोधित करने वाला सरकारी प्रस्ताव: पृष्ठ 701–703

- अडानी को आवंटन पत्र: पृष्ठ 703–705

- याचिका के आरोप (TDR और बहिष्करण पर): पृष्ठ 697–699

- महाराष्ट्र सरकार का बचाव में हलफनामा: पृष्ठ 777–797

- बॉम्बे हाई कोर्ट का निर्णय (20.12.2024): पृष्ठ 1–24

- सुप्रीम कोर्ट आदेश (07.03.2025): पृष्ठ 2–3

भाग 3 इस श्रृंखला को सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2025 के आदेश से आगे बढ़ाएगा, यह बताते हुए कि अदालत ने मूल धारावी पुनर्विकास फाइलें क्यों मांगीं और यह कदम कैसे भारत की सबसे बड़ी शहरी नवीकरण परियोजना की जांच को नया मोड़ दे सकता है.


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